पेरियार की सच्ची रामायण

पेरियार रामायण को धार्मिक किताब नहीं मानते थे। उनका कहना था कि यह एक राजनीतिक पुस्तक है; जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा। यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का भी उपकरण है। प्रस्तुत है पेरियार की सच्ची रामायण

(ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ (17 सितंबर, 1879—24 दिसंबर, 1973) हमारे समय के महानतम चिंतकों और विचारकों में से एक हैं। वे तर्कवादी हैं। मानवीय विवेक पर भरोसा करते हैं। किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता उन्हें स्वीकार नहीं है। वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को वे चुनौती देते हैं। उनकी विशिष्ट तर्कपद्धति, तेवर और अभिव्यक्ति शैली के चलते जून 1970 में यूनेस्को ने उन्हें ‘आधुनिक युग का मसीहा’, ‘दक्षिण-पूर्वी एशिया का सुकरात’, ‘समाज सुधारवादी आंदोलनों का पितामह’ तथा ‘अज्ञानता, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और निरर्थक रीति-रिवाजों का कट्टर दुश्मन’ स्वीकार किया है। उन्हें वाल्तेयर की श्रेणी का दार्शनिक, चिंतक, लेखक और वक्ता माना जाता।‘सच्ची रामायण’ उनकी एक चर्चित कृति है।

पेरियार रामायण को धार्मिक किताब नहीं मानते थे। उनका कहना था कि यह एक राजनीतिक पुस्तक है; जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा। यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का भी उपकरण है। रामायण की मूल अंतर्वस्तु को उजागर करने के लिए पेरियार ने ‘वाल्मीकि रामायण’ के ब्राह्मणों द्वारा किए गए अनुवादों सहित; अन्य राम कथाओं, जैसे- ‘कंब रामायण’, ‘तुलसीदास की रामायण’ (रामचरित मानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों तथा उनसे संबंधित ग्रंथों का सम्यक अध्ययन किया था। इसके साथ ही उन्होंने रामायण के बारे में विद्वान अध्येताओं और इतिहासकारों की टिप्पणियों का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने करीब चालीस वर्षों तक अध्ययन करने के बाद तमिल भाषा में लिखी पुस्तक ‘रामायण पादीरंगल’ में उसका निचोड़ प्रस्तुत किया। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसका जिक्र पेरियार की पत्रिका ‘कुदी अरासू’ (गणतंत्र) के 16 दिसंबर 1944 के अंक में किया गया है। इसका अंग्रेजी अनुवाद द्रविड़ कषगम पब्लिकेशन्स ने ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ नाम से 1959 में प्रकाशित किया गया। इसका हिंदी अनुवाद 1968 में ‘सच्ची रामायण’ नाम से किया गया। हिंदी अनुवाद के प्रकाशक ललई सिंह यादव और अनुवादक राम आधार थे। ललई सिंह यादव उत्तर प्रदेश-बिहार के प्रसिद्ध मानवतावादी संगठन ‘अर्जक संघ’ से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे।

9 दिसंबर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी के साथ पुस्तक की सभी प्रतियों को जब्त कर लिया गया। उत्तर भारत के पेरियार नाम से चर्चित हुए प्रकाशक ललई सिंह यादव ने जब्ती के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुकदमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट में इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई तीन जजों की खंडपीठ ने की। खंडपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर; तथा दो अन्य न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली थे। 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया। फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

ललई सिंह यादव ने हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ को प्रकाशित कर एक ऐतिहासिक कार्य को अंजाम दिया था। हिंदी के पाठक इस संदर्भ में उनके ऋणी हैं। समय विशेष में इस हिंदी अनुवाद की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकार करते हुए हमें कहना पड़ रहा है कि इस अनुवाद में अनेक सीमाएं और त्रुटियां रही हैं। हमने अपनी इस किताब के पहले संस्करण में राम आधार जी द्वारा अनुवादित और ललई सिंह द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ को समाहित किया था। लेकिन, निरंतर यह लगता रहा कि ‘सच्ची रामायण’ का एक शुद्ध, सटीक और प्रवाहमय अनुवाद नए सिरे से कराना चाहिए। इस संस्करण में सच्ची रामायण का एक नया अनुवाद समाहित किया गया है। उम्मीद है कि नया अनुवाद पाठकों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा। प्रस्तुत है पेरियार तमिल कृति ‘रामायण पादीरंगल’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ का अविकल हिंदी अनुवाद )


प्रस्तावना

रामायण किसी ऐतिहासिक तथ्य पर आधारित नहीं है। यह एक कल्पना है। रामायण के अनुसार, राम न तो तमिल था और न ही तमिलनाडु का रहने वाला था। वह उत्तर भारतीय था। रावण लंका यानी दक्षिण यानी तमिलनाडु के राजा थे; जिनकी हत्या राम ने की। राम में तमिल-सभ्यता (कुरल संस्कृति) का लेश मात्र भी नहीं है। उसकी पत्नी सीता भी उत्तर भारतीय चरित्र की है। तमिल विशेषताओं से रहित है। वह उत्तरी भारत की रहने वाली थी। रामायण में तमिलनाडु के पुरुषों और महिलाओं को बंदर और राक्षस कहकर उनका उपहास किया गया है।

रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उसमें उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया। एक आर्य-पुत्र के बीमारी के कारण मर जाने की कीमत रामायण में एक शूद्र को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। वे सारे लोग, जो इस युद्ध में मारे गए; वे तमिल थे। जिन्हें राक्षस कहा गया।

रावण राम की पत्नी सीता को हर ले गया। क्योंकि, राम ने उसकी बहन ‘सूर्पनखा’ का अंग-भंग किया व उसका रूप बिगाड़ दिया था। रावण के इस काम के कारण लंका क्यों जलाई गई? लंका निवासी क्यों मारे गए? रामायण की कथा का उद्देश्य तमिलों को नीचा दिखाना है। तमिलनाडु में इस कथा के प्रति सम्मान जताना तमिल समुदाय और देश के आत्मसम्मान के लिए खतरनाक और अपमानजनक है। राम या सीता के चरित्र में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे दैवीय कहा जाए।

जिस तरह तथाकथित आजादी(1947) मिलने के बाद गोरे लोगों की मूर्तियों को हटा दिया गया और उनके नामों पर रखे गए स्थानों के नामों को मिटा दिया गया तथा उनकी जगह भारतीय नाम रख दिए गए। उसी तरह आर्य देवताओं और उनकी महत्ता बताने वाली हर बात को मिटा देना चाहिए; जो तमिलों के प्रति आदर और सम्मान की भावनाओं को आघात पहुंचाते हैं। हर तमिल, जिसकी नसों में शुद्ध द्रविड़ खून बहता है; उसको इसे अपना कर्तव्य समझकर ऐसा करने का शपथ लेनी है।

– पेरियार ई.वी. रामासामी

प्रकाशकीय टिप्पणी

( प्रथम अंग्रेजी संस्करण, 1959)

रामायण के विषय में किए गए अनुसंधान का एक श्रेष्ठ अंश यहां प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तिका के लेखक पेरियार ई.वी. रामासामी हैं। वे दक्षिण में द्रविड़ आंदोलन के नेता हैं। उन्होंने करीब चालीस वर्षों से अधिक समय तक रामायण का गहन अध्ययन किया और उस पर गंभीर चिंतन किया। यह सब उन्होंने तमिलनाडु के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रतिदिन प्रचार कार्य की अन्य गतिविधियोंं में व्यस्त रहते हुए किया।

1988 में ‘द रामायणा : अ ट्रू रीडिंग’ के पांचवें संस्करण का कवर पृष्ठ और पेरियार की तस्वीर

लेखक ने ‘वाल्मीकि रामायण’ के ब्राह्मणों द्वारा किए गए अच्छे अनुवादों को पढ़ा है। इसके साथ ही उन्होंने अन्य रामायणों जैसे ‘कंब रामायण’, ‘तुलसीदास की रामायण’ (रामचरित मानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों का भी सम्यक अध्ययन किया है। यह वयोवृद्ध लेखक (जो अब 80 वर्ष के हो चुके हैं), आज भी उसी प्रेरणादायी अभिरुचि और प्रतिबद्धता के साथ इस महाकाव्य की विसंगतियों, उसकी बेतुकी बातों, उसके विरोधाभासों और उसकी बेहूदगी का भंडाफोड़ करने के लिए उक्त महाकाव्यों का अध्ययन कर रहे हैं।

हमने इस रामायण का नाम ‘द रामायण- ए ट्रू रीडिंग’ (रामायण का सच्चा अध्ययन) क्यों रखा है? इसलिए, क्योंकि साहित्य के किसी अंश का अध्ययन आलोचनात्मक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। उसको पवित्र मानकर अंधभक्ति के साथ नहीं किया जाना चाहिए।

स्वामी वेदाचलम, पी.वी. मनिका नायगर, पी. चिदंबरम पिल्लई, वी.पी. सुब्रमनिया मुदालियर, एस.एम. पुनारलिंगम पिल्लई और चंद्रशेखर पावलर इत्यादि प्रसिद्ध तमिल विद्वानों द्वारा तमिलनाडु में कुछ पुस्तकें लिखी गई हैं। उन्होंने बहुत पहले ही यह साबित कर दिया था कि रामायण के लेखकों का एकमात्र उद्देश्य आर्यों की प्रशंसा करना और द्रविड़ों को बदनाम करना था। यहां तक कि स्वामी विवेकानंद और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘रामायण एक मिथक है, जो प्राचीन आर्यों और द्रविड़ों के बीच लंबे समय तक चले संघर्ष का चित्रण करता है।’

इस विषय पर पेरियार ई.वी. रामासामी का अध्ययन इतना व्यापक और गहन है कि उनके विषय में कहा जा सकता है कि ‘रामायण’ का विवरण उनकी जुबान और अंगुलियों पर है।

आश्चर्यजनक दृष्टांत-युक्त यह पुस्तिका अपने पक्ष तथा उदाहरणों को सही साबित करते हुए एक ललकार है। यह एक चुनौती देने वाली किताब है। अत्यंत प्रभावशाली दृष्टांतों के साथ यह किताब अपनी धारणाओं को प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत करती है।

रामायण क्या है?  

  1. यह एक पवित्र पुस्तक नहीं है।
  2. राम और सीता के चरित्र घृणित हैं। उनके चरित्र संसार के तुच्छतम मानव के एक चतुर्थांश के लिए भी प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय नहीं हैं।
  3. रावण का चरित्र एक आदर्श चरित्र है।

रामायण के विषय में ये निष्कर्ष उसके ‘सच्चे अध्ययन’ पर आधारित हैं। यह अध्ययन किसी श्रद्धा एवं पूर्वाग्रह युक्त चिंतन पर आधारित नहीं है। जैसा राम को अपना आराध्य मानने वाले इस मूखर्तापूर्ण कथा का अध्ययन करते हैं। 3 साल पहले 1 अगस्त 1956 को एक ही दिन में राम की हजारों तस्वीरें विशाल जनसमूह के बीच जलाई गई थीं। उसका उद्देश्य राम की पूजा के प्रति द्रविड़ियन समाज के विरोध का प्रदर्शन करना था। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आज तमिलनाडु में राम की पूजा निरंतर कम होती जा रही है। अब केवल यहां ब्राह्मण-वर्ग राम और उनकी कथा का सम्मान करता है। न नाटक के मंच पर, न ही सिनेमा के पर्दे पर राम का चरित्र समझदार द्रविड़ों को आकर्षित करता है।

अनुवाद के विषय में कुछ बातें। पेरियार की वेधक तमिल शैली का अंग्रेजी में सटीक और शुद्ध अनुवाद कर पाना कठिन है। हमारे अनुवादकों ने यह महान कार्य अत्यंत शीघ्रतापूर्वक किया। उन्होंने करीब एक सप्ताह के भीतर ही यह कार्य संपन्न किया। शब्द चयन और अभिव्यक्ति की कुछ गलतियों से हम अवगत हैं।

हम एक जड़ समाज में रहते हैं। ऐसे समय में जब दुनिया की तीन-चौथाई से अधिक आबादी प्रगति कर रही है; हमारा समाज अभी पिछड़ा और बर्बर हालात में पड़ा हुआ है और कट्टरता के साथ अतीत की रूढ़ियों का पालन करता है; क्योंकि लंबे समय पहले उनके पुरखों ने इसे अपनाया था।

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हमारा समाज बहुत सारी जातियों, धर्मों और पंथों से बना हुआ है। इंसान-इंसान और समाज के बीच जो विभेद हमारे देश में मौजूद हैं; उसका खात्मा होना चाहिए। किसी न किसी को यह परिवर्तन लाना होगा। हममें से प्रत्येक को अपने समाज के लिए कुछ करना चाहिए।

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चाहे मैं किसी को प्यार करूं या घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है। वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए।

  – पेरियार ई.वी. रामासामी    

रामायण

1. भूमिका

रामायण और बरधाम (महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं। उन ग्रंथों में प्रमुखतम जिन्हें आर्यों ने अपने हित में सर्वाधिक तोड़ा-मरोड़ा है। उन्हें द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, उनके निर्णय सामर्थ्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए तैयार किया गया है।

इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं, जो कि आर्य हैं। कुल मिलाकर वे बेहद साधारण व्यक्ति हैं।

ये कथाएं एक बार फिर इसलिए थोपी गई थीं कि इनके कथानायकों, उनके रिश्तेदारों तथा सहायकों को अलौकिक और अतिमानवीय माना जाए; तथा उन्हें पूज्य मानते हुए जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए।

इनके मूल आख्यानों का सावधानीपूर्वक, विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए, तो पता चलता है कि जो भी तथाकथित घटनाएं इनमें वर्णित हैं; वे अधिकाधिक असभ्य और बर्बर थीं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इनमें लोगों, विशेषकर तमिलों के लिए इनसे सीखने और इनके अनुरूप आचरण करने लायक कुछ भी नहीं है। इनमें न तो नैतिकता है, न ही सराहनीय दर्शन। इन पुराकथाओं को इस चतुराई के साथ लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें; महिलाओं को इनके द्वारा दबाया जा सके तथा उन्हें दासी बनाकर रखा जा सके। इनका उद्देश्य ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों, रूढ़ियों तथा ‘मनुस्मृति’ को समाज पर थोपना है; जो कि तमिलों के लिए अपमानजनक है। ये आख्यान राम और कृष्ण का अनुचित, अवांछित देवताकरण करते हैं; उन्हें स्थायी तौर पर थोपते हैं।

ये कहानियां मूलतः संस्कृत में लिखी गई हैं। इन्होंने आर्यों को इस योग्य बनाया कि वे लोगों की बौद्धिक क्षमताओं तथा अलग-अलग समय और अवसर के अनुरूप धर्मोपदेश देकर अपना प्रचार-प्रसार कर सकें। वे इन कहानियों को वेद कहते हैं। बताते हैं कि ये उन उद्धारकर्ताओं की प्रशंसा में कही गई बातें हैं, जो दुनिया की रक्षा करने हेतु स्वर्ग से नीचे आए। वे यह भी दावा करते हैं कि ये दैवी धर्मशास्त्र हैं; जो बताते हैं कि लोगों को कैसे रहना चाहिए। वे इन कहानियों को वेदों का सारतत्त्व, पांचवां वेद और न जाने क्या-क्या बताते हैं। इस तरह के सफेद झूठों द्वारा वे अपने उस स्वघोषित महत्व को बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते हैं, जिसका उनमें सरासर अभाव है। वे यहीं नहीं रुकते, बल्कि इसे जबरन धर्म का हिस्सा बना देते हैं। फिर दावा करते हैं कि यह ऐसा स्तंभ है, जिस पर धर्म टिका हुआ है। जनसाधारण से लेकर तथाकथित शिक्षितों तक सब इनके झांसे में आ चुके हैं। इन कहानियों को यह कहकर चारों ओर फैलाया गया है कि ये बहुमूल्य और पवित्र हैं। इन्हें शिक्षा की शुरुआत के साथ ही लोगों के खून में मिला दिया जाता है।

90 प्रतिशत तमिल निरक्षर हैं। शेष 10 प्रतिशत लोगों को गुमान है कि वे साक्षर हैं। इनमें से अधिकतर धर्मांध हैं और शायद ही अपने विवेक का उपयोग करते हैं। वे आर्यों की इस लोक से परे दूसरी दुनिया में विश्वास करते हैं। इस विश्वास के दास होकर वे आर्यों के आदेश का पालन करते हैं तथा उनके निर्देशों को ज्यों का त्यों स्वीकारते हैं। संक्षेप में कहें, तो सिर्फ मुस्लिम और ईसाई तमिलों को छोड़कर सभी तमिल रामायण के पक्के अनुयायी हैं।

तमिलों के सामने पूरा परिदृश्य साफ हो सके और इन मूर्खतापूर्ण और वाहियात मान्यताओं को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए; इस सबके लिए यह आवश्यक है कि दिव्य चरित्रों और धर्मशास्त्रों के कुत्सित इरादों का भंडाफोड़ किया जाए। ताकि उनमें स्वाभिमान की भावना विकसित हो और वे खुद को आर्यों की दासता से मुक्त कर सकें।

यह ध्यान रखते हुए कि इनको पढ़ने में पाठकों का ज्यादा समय खर्च न हो, बल्कि वे इसे तीव्र उत्कंठा के साथ पढ़ें; रामायण के अध्यायों को छोटा किया गया है। सभी महत्वपूर्ण एवं संगत तथ्यों को शामिल करते हुए 140 पृष्ठों की पुस्तक, संवाद शैली में ‘वाल्मीकि रामायण कन्वर्सेशन’ नाम से प्रकाशित की गई है।

हम उन तथाकथित घटनाओं को कोई महत्व नहीं देते, जिनके घटने के बारे में यहां दावा किया गया है। तय है कि ये घटनाएं वास्तविक नहीं हैं। फिर इन घटनाओं की चर्चा पर हम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं? ऐसा इसलिए, क्योंकि मेरी यह इच्छा है कि हम लोगों, खासकर अपने लोगों को यह स्पष्ट रूप में बताएं कि जिस रामायण के बारे में जिन बातों का प्रचार-प्रसार आर्यगण करते हैं तथा हमारे लोग जिन्हें महत्ता देते हैं, उसमें मूलत: ऐसा कुछ भी नहीं है; जिसकी प्रशंसा की जा सके। इसमें न तो दैवीय तत्त्व है; न ऐसी कोई नैतिकता जिससे कुछ सीखा जा सके अथवा जिसका अनुसरण किया जा सके। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तर्कों पर खरा उतरे। इस चर्चा का यह भी उद्देश्य है कि हमारे लोग खुले दिमाग से इन पर विचार करें; तथा अपनी आंखों से आर्यों द्वारा थोपी गई कहानियों के ढोंग तथा खोखलेपन को समझें, जिनके आधार पर वे स्वयं को जन्म से ही श्रेष्ठतर मानते हैं और दूसरे लोग भी उनका समर्थन करते हैं।

यहां हम देवताओं, ऋषियों, इंद्र तथा तथाकथित संतों की मानवरूपी प्रस्तुतियों एवं उनके गुणों की पड़ताल करेंगे।

आर्यों ने जब द्रविड़ों की प्राचीन भूमि पर हमला किया, तो उन्होंने यहाँ के लोगों के साथ बुरा बर्ताव किया; उनके साथ अनादर से पेश आए और एक ऐसा इतिहास लिखा, जो झूठ और दुर्भावनाओं से भरा है। इसी को वे रामायण कहते हैं, जिसमें राम और उसके शागिर्दों को उन्होंने आर्य कहा है तथा द्रविड़ मूल के रावण को राक्षस, हनुमान, सुग्रीव, बालि आदि को बंदर की संज्ञा दी है। इस विषय में बड़े-बड़े शोधकर्ताओं का भी यही निष्कर्ष है।

यही इस पुस्तक की विषयवस्तु है। यह तमिलों के लिए यह आईना है; ताकि वे इसमें देख सकें कि आर्यों को स्वयं को कितना ऊंचा दर्जा दिया गया है और अन्य समुदायों को कितना नीचा दिखाया गया है। और कैसे स्वाभिमान से शून्य तथा इस कारण भ्रष्ट हो चुका यह समुदाय रामायण के आर्य चरित्रों का आदर करता है। जान सकें कि कैसे अपने ही लोगों को धोखा देने वाले दगाबाज द्रविड़ों ने उन्हें अलवार, देवता और पूजनीय बताया है।

एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तमिल, खासकर पढ़े-लिखे तमिल जब रामायण के बारे में बोलते हैं, तो उनका मतलब ‘कंब रामायण’ होता है। तमिल पंडित अपनी रोजी-रोटी कमाने और साहित्य संबंधी अपनी जानकारी की शेखी बघारने के लिए कंब रामायण के बारे में पढ़ते और सीखते हैं; फिर लोगों में जाकर उस पर प्रवचन देते हैं। आम लोगों को इतना शिक्षित होना चाहिए, जिससे वे समझ सकें कि दुष्ट कंब ने वाल्मीकि रामायण के सच को किस तरह से छिपाया है। किस तरह तथ्यों को निगलते हुए उसने कहानी की आधी-अधूरी तस्वीर पेश की है। यह अफसोस की बात है कि तमिल विद्वान अपने स्वाभिमान और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर लोगों के सामने जाते हैं और कंब की कृति की पवित्रता और महानता का बखान करते हैं।

यदि पक्षपात रहित दिमाग से पढ़ने वाले पाठकों को इस पुस्तक में कुछ ऐसा मिलता है, जो उन्हें अनसुना, अनजाना, अजीब और सनक भरा लगता है; तो कृपा करके उन्हें श्री अनंदाचारियार के संस्कृत से तमिल अनुवाद, जो कि 1877 में प्रकाशित हुआ था; तथा उसके बाद प्रकाशित अनुवादों जैसे कि पंडित नटेसा शास्त्रीयार, श्री सी.आर. श्रीनिवास आयंगर, नरसिम्हाचारियार, गोविंद राजार, अन्नंगाचारियार और अन्य ब्राह्मणों की कृतियों को पढ़ना चाहिए। पाठकों से यह उम्मीद भी की जाती है कि वे संस्कृत और बांग्ला के महान विद्वान पंडित मम्मतनाथ थाठार की कृतियों को भी पढ़ेंगे। श्री विल्सन के अंग्रेज़ी अनुवाद और कुछ अन्य लोगों द्वारा अनुदित कृतियों को भी उन्हें पढ़ना चाहिए।

2. कथा-प्रसंग

रामायण की घटनाएं और कथा-क्रम बहुत कुछ ‘अरेबियन नाइट्स, शेक्सपियर, मदनकाम राजन, पंचतंत्र और अन्य कपोल कल्पित कहानियों की तरह हैं। उनमें वर्णित तथ्य मानवीय क्षमता और सोच से परे हैं। इसलिए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि रामायण की कहानी वास्तविक नहीं है। कोई कह सकता है कि देवताओं का देवत्व तथा उनकी शक्तियां केवल अजीबोगरीब बातों में प्रकट होती हैं। पर कोई भी देख सकता है कि जिन तथ्यों का इसमें उल्लेख किया गया है, वे स्पष्ट रूप से निराधार, अनावश्यक और बेतुके हैं। इसके अलावा जब सदगुण, सुविचारित निर्णय, सज्जनता और शुभेच्छा जैसी बातों को व्यवहार में उतारना चाहिए; उस समय हम देखते हैं कि रामायण के तथाकथित नायक-नायिकाओं के सारे व्यवहार एक औसत व्यक्ति के स्तर से नीचे गिर जाता है।

इस बात पर जोर दिया जाता है कि कथा-नायक राम को, मानव-वेष में स्वर्ग से अवतरित देवता के रूप में माना जाए। रामायण के लेखक वाल्मीकि राम को मनसा और कर्मणा एक दुष्ट, झूठा, धोखेबाज, फरेबी, धूर्त, निर्दयी, लालची, हत्यारा, शराबी, मांसभक्षी, लोगों को छिपकर मारने वाला, दुष्टों की संगति रखने वाला, पुरुषत्वहीन और न जाने किन-किन अन्य रूपों में चित्रित करते हैं। यह साफ दिखाई देता है कि राम अथवा उनकी कहानी में कोई दैवीय-तत्त्व नहीं है। उसमें जो भी गुण हैं, वे औसत गुणों से भी काफी नीचे हैं। उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है; जिससे तमिल शिक्षा ग्रहण कर सकें या जिसका अनुकरण किया जा सके।

3. कथा का उद्गम   

रामायण की कथा न तो धार्मिक है और न ही तर्क-संगत। देवताओं ने चतुर्मुख ब्रह्मा से शिकायत की। उन्होंने ब्रह्मा से कहा कि ‘राक्षस लोग हमारे यज्ञों में विघ्न डालते हैं।’ ब्रह्मा ने यह बात अपने पिता विष्णु से कही। विष्णु ने राम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेने तथा राक्षसों के राजा रावण को मारने का निश्चय किया। यह रामायण की कथा का स्रोत (प्रारंभ) है। (बालकांड, 15वां अध्याय)

पृथ्वी पर अवतार धारण करने के पश्चात विष्णु को अनेक कष्ट और यातनाएं सहनी पड़ीं। आर्यों के पुराणों में इसका निम्नलिखित कारण बताया गया है। विष्णु (तिरुमला) ने पहले बहुत-से अनैतिक और घृणित कार्य किए थे। जिसके दंडस्वरूप उसे उन ऋषियों, मुनियों ने श्राप दिया; जिनके साथ उसने अन्याय किया था। आखिर ऋषियों ने श्राप क्यों दिया? क्योंकि, उस विष्णु (तिरुमल) ने बिरुहु मुनि की स्त्री को मार डालने का घृणित पाप किया था। उस (तिरुमल) ने मनुष्यों के समक्ष दिन-दहाड़े जालंधर असुर की स्त्री का सतीत्व छल-कपट से भंग किया था। कदाचित अपने प्रभाव को दर्शाने के लिए उस (तिरुमल) ने अपनी पत्नी (तिरुमगल) के साथ दिन-दहाड़े, खुली जगह में सहवास किया था।पुराणों में इस तरह के बेहूदा प्रसंगों की भरमार है। इन्हें ऐसे ही छोड़ दीजिए जैसे ये हैं। विवेकवान मनुष्य की शोभा तो इसमें है कि वह पूछे कि ये देवता और असुर कौन हैं? राक्षस कौन हैं? बलि का क्या मतलब है? देवता होने के बाद भी विष्णु अशोभनीय हरकतों जैसे चोरी, हत्या और अन्य घृणित कर्म कैसे करने लग गया? क्या इस तरह के भोंडे काम करने वाले लोग देवता कहलाने का हक रखते हैं? ऐसा कब और कहां किया गया? उस कल्पित स्वर्गलोक में या इस भौतिक जगत में? ये देवता कहां रहते हैं? यज्ञ करने या बलि देने के लिए वे इस मृत्युलोक में ही क्यों आए? क्या मदिरा पीकर मतवाले लोगों के साथ वेद-मंत्रों का उच्चारण करते हुए, छल-कपट-पूर्ण उपायों द्वारा, निरीह जानवरों को तड़पाकर मारना और उनका गोश्त खाना ही यज्ञ की परिभाषा है? यह सब करने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इससे ईश्वर खुश हुआ है; और प्रसन्न होकर वह यज्ञ में शामिल देवताओं तथा यज्ञकर्ता मनुष्यों को देवलोक में स्थान देने के अलावा उन्हें सुख-समृद्धि भी उपलब्ध कराएगा? क्या गूंगे जानवरों के प्रति की जाने वाली इस प्रकार की निर्दयता पर अंकुश लगाना पाप है? इन निर्दयी-निर्मम कसाइयों को देवता कहना क्या परमात्मा के लिए जायज है? क्या इन कुकृत्यों को रोकने वाले दयालु प्राणियों को राक्षस या दानव कहा जाना उचित होगा? पढ़े-लिखे लोगों द्वारा इनपर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

आज कल मादक पदार्थों का सेवन तथा पशुओं के प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार को सरकार और जनता दोनों ही दंडनीय अपराध मानती है। इसके लिए जुर्माने और कारावास की सजा का प्रावधान है। क्या रावण के भी जमाने में भी इसे रोकना उचित और न्यायसंगत नहीं होता? रावण शिव भक्त था और एक भक्त के अनुरूप कानून को मानते हुए यह कहना उसका कर्तव्य था कि उसके राज्य में अकाल भले ही पड़ जाए; लेकिन जिस यज्ञ में पशुओं के साथ क्रूरता का वर्ताब हो, उस यज्ञ की इजाजत नहीं होगी। क्या यह उचित है कि जो राजा अपने राज्य में इस तरह के अमानवीय कृत्य को होने से रोकता है; उसको, उसके पूरे राज्य को, देश को तथा उसके पूरे वंश और समस्त प्रजा का सर्वनाश करने के लिए ईश्वर अवतार ले? इन बातों पर विचार करने से पता चलता है कि रामायण अन्यायपूर्ण और मूर्खतापूर्ण बातों से भरी पड़ी है।

4. यज्ञ

रामायण के पहले अध्याय बालकांड में इस बात का वर्णन है कि अयोध्या का राजा दशरथ पुत्र प्राप्त करने के लिए यज्ञ की तैयारी कर रहा था। उस यज्ञ में भेड़, घोड़े, चिड़िया व सांप जैसे पिंडज और अंडज लगभग सभी जानवरों को वध करने के लिए रखा गया था। यह सोच भी कितना डरावना है कि किसी एक मनुष्य को पुत्र प्राप्ति के लिए इतने सारे पशुओं की बलि चढ़ा दी जाए? क्या यह विश्वसनीय है कि यज्ञ कुंड में अनगिनत जानवरों की बलि से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उसको पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया था। क्या देवताओं को ऐसे वध से प्रसन्नता हो सकती है? कहा जाता है कि इन देवताओं का एक राजा है, जिसको देवेंद्र कहा जाता है। पुराणों में इंद्र (देवेंद्र) की दुष्टता-भरी, घृणित एवं निर्लज्जतापूर्ण कहानियों का जिस तरह वर्णन किया गया है; उससे कुटिल और निर्मम आर्यों की सभ्यता व चरित्र का पता चलता है।

यज्ञ के बार में आप क्या सोचते हैं? दशरथ की पत्नियों में से एक कौशल्या यज्ञ के लिए लाए गए घोड़े की गर्दन को एक वार में ही धड़ से अलग कर देती है और पूरी रात इस घोड़े की देह से चिपकी रहती है। (बालकाण्ड, 14वाँ अध्याय)। यदि उनके ईश्वर का चरित्र ऐसा है, तो उनके इंसानों के चरित्र के बारे में कल्पना हमारे लिए असंभव है। यह सब यहीं नहीं रुकता। यदि कोई जानना चाहे कि यज्ञ-शास्त्र के अनुसार यज्ञ क्या है? तो सच उसके दिलो-दिमाग के लिए अप्रिय एवं घृणास्पद होगा। सच जानकर उसे सदमा पहुंच सकता है। इस घृणित कार्य का वर्णन कुदी अरासु (जनता का राज) प्रेस से प्रकाशित पुस्तक ‘ज्ञान सूर्यम’ में किया गया है। यज्ञ संपादित कराने के लिए उस दिन सुबह ही यज्ञ-संपादन शुल्क के रूप में राजा दशरथ ने बड़ी रानी कौशल्या सहित कैकेई और सुमित्रा अपनी तीनों पत्नियों को तीन ब्राह्मण पुरोहितों को भेंट कर दिया था। उन तीनों पुरोहितों ने इन तीनों रानियों के साथ अपनी पाशविक इच्छाओं (संभोग करने) की पूर्ति करने के बाद इन्हें उनके राजा को वापस कर दिया। पुरोहितों के कृत्य पर राजा को कोई एतराज नहीं था (बालकांड 14वां अध्याय)। इसके बाद ये तीनों महिलाएं गर्भवती हो गईं। मन्मथनाथ दातार अपने अंग्रेजी अनुवाद में लिखते हैं कि ‘होत’, ‘अद्वार्यु’ और ‘युक्ध’ नामक तीनों पुरोहितों के पास इन तीनों महिलाओं को गिरवी रख दिया गया, ताकि वे इनके साथ मौज-मस्ती कर सकें।

तो फिर संतान की प्राप्ति के लिए इस तरीके से यज्ञ करने की क्या जरूरत थी? अगर हम इस पर ढंग से विचार करें, तो पूर्णत: स्पष्ट है कि यज्ञ तथा पुराणों एवं यज्ञ शास्त्र के अनुसार संपन्न घटनाओं के कारण बच्चे पैदा नहीं हुए; बल्कि उन पुरोहितों द्वारा ही दशरथ की पत्नियां गर्भवती हुई थीं। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि जिस समय यज्ञ का आयोजन हुआ उस समय दशरथ की उम्र 60 हजार वर्ष थी और उसकी 60 हजार पत्नियां थीं; ऐसा कंबन ने कहा है। लेकिन, वाल्मीकि के अनुसार दशरथ की पत्नियों की संख्या 350 थी। इन बातों से यह स्पष्ट है कि दशरथ काफी बूढ़ा होकर मांस का एक कामुक लोथड़ा भर रह गया था। यह बहुत अस्वाभाविक नहीं है कि एक कमजोर और अशक्त बूढ़े व्यक्ति में महिलाओं के प्रति पागलपन मात्र हो सकता है; उससे संतान पैदा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। वह बस महिलाओं से घिरे रहकर जीवन का अपना शेष समय काटेगा।

यह सोचने वाली बात है कि दशरथ कि तीनों पत्नियां जो इतने लम्बे समय से बांझ थीं, क्या यज्ञ के अगले दिन उसी व्यक्ति से गर्भवती हो सकती थीं? जो बूढ़ा था, दुर्बल था और नपुंसक था और अपने जीवन की सांध्य वेला में पहुंच चुका था।

तीनों स्त्रियों को तीन पुरोहितों को सौंप दिया गया था। हर पुरोहित को एक-एक महिला सुपुर्द कर दी गई। उनका वे जैसा चाहें और जब तक चाहें पूरी तरह इस्तेमाल करें। उसके बाद उन्हें राजा को वापस करके बदले में किए गए काम के लिए राजा से अपना पारिश्रमिक लें। कौन कह सकता है कि उन महिलाओं के गर्भवती होने का कारण दशरथ था? बावजूद इसके कि राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न वास्तव में पुरोहितों के कारण पैदा हुए थे; न कि दशरथ के कारण। आर्य धर्म में इसको निंदनीय नहीं माना गया।

उनके शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि अगर कोई ब्राह्मण स्त्री को बच्चा नहीं हो रहा है, तो वह कुछ शर्तों पर अन्य पुरुषों से बच्चा पैदा कर सकती है। उदाहरण के लिए, आर्यों की एक अन्य कहानी महाभारत में कई विधवाओं के उनके परिवार के गुरु व्यास से बच्चे पैदा हुए और उन्हें इसके लिए यज्ञ कराने का दिखावा भी नहीं करना पड़ा। धृतराष्ट्र और पांडु इसी तरह से पैदा हुए थे। महाभारत में इस तरह से कई लोगों की पैदाइश हुई। आप सीता के ही जन्म को लीजिए; सीता की माँ ने किसी अनाम पुरुष के साथ कुछ समय बिताया था। जिसके बाद सीता की पैदाइश हुई और उस बच्ची को एक जंगल में फेंक दिया। सीता ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसकी शादी में देरी उसके माता-पिता के नाम पता न होने कारण हुई थी। यह देखकर आश्चर्य लगता है कि कई बार आर्यों के पुराणों में महिलाएं पुरुषों से गर्भवती नहीं होकर जानवरों से गर्भवती होती हैं। इन तथ्यों से यह स्पष्ट है कि बच्चों के पैदा होने का यज्ञ से कोई लेना-देना नहीं है; बल्कि वह तो शराब पीने एवं मांस खाने और मजे लेने का महज एक समारोह होता था।

अब हम रामायण के चरित्रों पर विचार करेंगे; जैसा कि उन्हें रामायण में देखते हैं :

5. दशरथ

यज्ञ के बाद दशरथ द्वारा राम का राजतिलक की कहानी पर विचार करते हैं। इन बातों का जिन अध्यायों में वर्णन है, उनसे दशरथ, उसके बेटों, पत्नियों, मंत्रियों, गुरुओं आदि के नैतिक और मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है।

  1. कैकेई से ब्याह करते समय दशरथ ने उसे वचन दिया था कि उससे उत्पन्न पुत्र को ही अयोध्या की राजगद्दी दी जाएगी। इस संबंध में कुछ कथाओं में वर्णन मिलता है कि दशरथ ने अपना राज्य विवाह के समय ही कैकेई को सौंप दिया था और वह उसका प्रतिनिधि मात्र बनकर शासन करता था।
  2. रामायण की मूल कथा इसका समर्थन करती है; तथा डॉ. सोमसुद्रा बरथीयार एम.ए., बी.एल. ने अपनी पुस्तक ‘कैकेई चैसिटी एंड दशरथ टर्पीट्यूड’ (कैकयी की शुचिता और दशरथ की चरित्रहीनता) में इसका वर्णन किया है। 
  3. राम और उसकी मां कौशल्या दशरथ द्वारा दिए गए वचन से अनजान नहीं थे। बूढ़े राजा ने राम को खुलेआम कहा कि भरत (कैकेई का बेटा) अपने मामा के घर गया है और यह राम को राजगद्दी पर बैठाने का अच्छा अवसर है (अयोध्याकांड, चौथा अध्याय)। दशरथ ने भरत को अपने नाना के घर 10 साल के लिए भेज दिया और इसके पीछे उसकी मंशा भरत को अयोध्या का राजा बनने से रोकना था। भरत को अयोध्या बुलाए बिना, लगातार दस साल तक उसके ननिहाल में रखने का कोई औचित्य नहीं था। वाल्मीकि ने मंथरा के रूप में एक चरित्र गढ़ा है, जो 7वें और 8वें अध्याय में कहती है- ‘राम को राजा बनाने की योजना दशरथ ने पहले ही बना रखी थी और इसीलिए भरत को उसके ननिहाल भेज दिया गया। भरत यदि राजधानी अयोध्या में होगा, तो उसे देश की प्रजा की सहानुभूति प्राप्त होगी। प्रवास (अपने मामा के घर में) में होने के कारण जनता से उसका सम्पर्क टूट जाएगा। दशरथ की यह भी मंशा थी।’
  4. राम को राजा बनाने की घोषणा करने के अगले ही दिन दशरथ ने राम को गद्दी पर बैठाने की तैयारी शुरू कर दी। (अयोध्याकांड, पहला अध्याय)।
  5. दशरथ के मंत्री, वशिष्ठ, और अन्य गुरुओं और राम को यह पूरी तरह पता था कि गद्दी का उत्तराधिकारी भरत है। लेकिन, इसके बावजूद इन लोगों ने धूर्तता बरतते हुए राम को राजा बनाने की योजना को मंजूरी दे दी।
  6. राम की मां कौशल्या हमेशा ही मनाया करती थी कि उसका बेटा राम गद्दी पर बैठे।
  7. भरत, शत्रुघ्न, कैकेई और कैकेय के राजा को इतने महत्वपूर्ण राज्यारोहण के लिए आमंत्रित किए बिना ही दशरथ ने जल्दबाजी में तैयारी शुरू कर दी (अयोध्याकांड, पहला अध्याय)।
  8. एक निजी वार्तालाप में दशरथ ने राम से कहा था कि यदि भरत की अनुपस्थिति में उसको गद्दी पर बैठाने का समारोह रोकना पड़ा, तो भरत वापस लौटते ही शांत मन से इसे स्वीकार कर लेगा। क्योंकि, वह विनम्र है; उसका स्वभाव अच्छा है । एक सज्जन व्यक्ति के रूप में वह सारी बातों को मान लेगा (अयोध्याकांड, 12वां अध्याय)।
  9. कैकेई ने हठ किया कि उसके पुत्र भारत को राजा बनाया जाए और इसे सुनिश्चित बनाने के लिए राम को वनवास दिया जाए। दशरथ कैकेई को मनाने के लिए उसके पैरों पर गिर पड़ा और उससे प्रार्थना करने लगा कि मैं तुम्हारी इच्छानुसार कोई भी घृणित से घृणित कार्य करने के लिए तैयार हूं। बस राम को वनवास पर भेजने का हठ न करो। (अयोध्या कांड 12 सर्ग)
  10. दशरथ ने कैकेई से कहा- ‘तुमने इतने यत्न से किए व्यापक आयोजन को विफल कर दिया।” उसने कैकेई को एक बार भी यह नहीं कहा कि राम भाइयों में सबसे बड़ा है और इसलिए वह राजा बनने का अधिकारी है। जब वह किसी भी तरह से कैकेई को इस बात के लिए राज़ी नहीं कर पाया, तो उसने राम को अपने पास बुलाया और उसकी कानों में कहा, “राम, मैंने उस समय भरत को राजा बनाने का वचन दे दिया था, जब मैं अपने आपे में नहीं था। इसलिए यह तुम्हारे लिए बाध्यकारी नहीं है। तुम मुझे गद्दी से हटाकर राजा बन सकते हो।”
  11. सभी प्रयत्न निष्फल हो चुकने के पश्चात दशरथ ने सुमंत्र को आज्ञा दी कि कोषागार का संपूर्ण धन, भंडार का अनाज, व्यापारियों और वेश्याओं को राम के साथ वन भेजने का प्रबंध करे (अयोध्याकांड, 36 सर्ग)।
  12. कैकेई ने जब इस पर भी आपत्ति प्रकट की। तब दशरथ ने पूरे मुद्दे को मोड़ते हुए कहा, “तुम्हें तो सिर्फ राज्य चाहिए था न कि राज्य में जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब। (अयोध्याकांड, 36वाँ अध्याय)।
  13. दशरथ ने कोषागार में रखे हुए संपूर्ण आभूषण सीता को सौंप दिए। (अयोध्या कांड 36 सर्ग)
  14. राम और सीता को वनवास भेजने के लिए ज़िम्मेदार कैकेई पर दशरथ ने गालियों की वर्षा कर दी। पर वह अपने एक अन्य बेटे लक्ष्मण को राम के साथ जंगल जाने पर कतई चिंतित नहीं हुआ। यहाँ तक कि रामायण में लक्ष्मण की पत्नी की कहीं भी कोई चर्चा नहीं दिखती है।

संस्कृत कॉलेज मद्रास के प्रोफेसर स्वर्गीय श्री सीआर श्रीनिवास आयंगर ने वाल्मीकि रामायण का 1925 ई. में तमिल में अनुवाद किया था। 1925 में प्रकाशित (दूसरे संस्करण) में अपने अनुवाद ‘अयोध्या कांड पर टिप्पणी’ नामक पुस्तक के द्वितीय संस्करण में उन्होंने लिखा है कि दशरथ स्वात्मघाती था। आयंगर सुमित्रा व कैकेई का समर्थन करते हैं, जबकि दशरथ के खिलाफ निम्नलिखित आरोप लगाते हैं—

  1. दशरथ ने कैकेई को बिना विचारे जो दो वचन दिए थे, उनको वह भूल गया था। प्राप्त वचनों के अनुसार कैकई दशरथ से कुछ भी माँग सकती थी।
  2. दशरथ यह भूल गया था कैकई के साथ विवाह के समय उसने यह वादा किया था कि उस(कैकई)से उत्पन्न पुत्र को ही वह राजा बनाएगा।
  3. साठ वर्ष की पकी हुई उम्र में भी वह पाशविक लालसाओं से दूर नहीं था। यही नहीं अपनी दो पत्नियों कौशल्या और सुमित्रा का उसने कोई ख़याल नहीं रखा, जिसका उन्हें अधिकार था।
  4. कैकेई को ख़ुश रखने के लिए उसने मूर्खतापूर्ण वचन उसे दिए थे।
  5. दशरथ ने अपनी प्रजा के सामने यह घोषणा की कि वह राम को राजगद्दी सौंप रहा है। यह दशरथ द्वारा कैकेई और उसके पिता को दिए गए वचनों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था।
  6. कैकेई ने दशरथ से मिले दो वचनों के अनुसार राम को जंगल भेज दिया। जिससे राम को राजा बनाने के उसके सारे प्रयास विफल रहे।
  7. इन पापों की वजह से भरत को वह राज्य मिलना असंभव हो गया, जो दशरथ ने उसको देने का वचन दिया था।
  8. वशिष्ठ ने परामर्श दिया था कि इक्ष्वाकु-वंशीय परंपरा के अनुसार परिवार के जेष्ठ पुत्र को राजगद्दी मिलनी चाहिए, किंतु कैकई के प्रेम में पागल दशरथ ने उस परंपरा का त्याग कर दिया था।
  9. दशरथ को अपनी मूर्खता का प्रायश्चित करना तथा इसका मूल्य चुकाना चाहिए था। इसके उलटे उसने कैकेई से उसे दिए गए अपने वचन वापस लेने का आग्रह किया।
  10. यह भूलकर कि राजा के रूप में उसकी हैसियत क्या है? वह कैकई के पैरों पर गिर पड़ा।
  11. सुमंत्र और वशिष्ठ जो दशरथ के वचनों से अवगत थे, वे उसे कैकेई को किए गए वादे की याद दिला सकते थे। दशरथ को सचेत कर सकते थे। राम को राजगद्दी न देने का परामर्श दे सकते थे; किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
  12. वशिष्ठ, जो कि भविष्यदृष्टा था, उसने ही राम के राजतिलक के समारोह के आयोजन का मुहूर्त तय किया था। जबकि, वह जानता था कि उसकी यह (राम का राज्यारोहण) निष्फल सिद्ध होने वाला है।
  13. सिद्धार्थ, सुमंत्र और वशिष्ठ कैकेई से यह कहने पहुंच गए कि वह अपना वचन पूरा कराने पर जोर न डाले और जब वे इसमें सफल नहीं हुए, तो उन्होंने उसे काफी फटकार लगाई थी।
  14. राम का अभिषेक कराने के लिए दशरथ ने आम जनता और ऋषियों की अनुमति ली थी; मगर उन लोगों से बिना किसी परामर्श के ही उसने राम को जंगल भेज दिया। न मंत्रियों से मशविरा किया, न ही ऋषियों से या आम लोगों से। यह उसका अहंकार और लोगों की इच्छाओं का अनादर था।
  15. ऋषि या आम लोग जिनका अनादर हुआ था, उन्होंने भी इसका प्रतिरोध नहीं किया; न ही उन्होंने राम को जंगल जाने से रोका।
  16. राम को अपने जन्म तथा दशरथ द्वारा विवाह के समय कैकेई को दिए गए वचनों की जानकारी थी। वह जानता था कि पिता द्वारा दिए गए वचन के अनुसार कैकेई के बेटे को ही राजा बनाया जाएगा (अयोध्याकांड, अध्याय 107)। इसके बावजूद चुप रहा और अपने पिता को उसके द्वारा दिए गए वचनों की याद दिलाने के बजाय स्वयं राजा बनने के लिए तैयार हो गया।
  17. दशरथ ने राम से कहा था- ‘संभव है कुछ बाधाएं उनकी योजना पर पानी फेर दें।’ उसने आगे कहा कि भरत उदार और सज्जन है और आध्यात्मिक प्रकृति का है। अपने मामा के घर गए उसे काफी दिन हो चुके हैं। कई बार मजबूत इरादे वाले लोग भी बाहरी कारणों से अपने विचार बदल लेते हैं। इसलिए अपेक्षित होगा कि समारोह भरत के लौटने के पहले ही सम्पन्न हो जाए (अयोध्याकांड, अध्याय -4)। इस तरह दशरथ ने भरत को (उसका वाजिव हक़ नहीं देकर) धोखा देने की कोशिश की और मिली-भगत द्वारा राम को राजा बनाने का निर्णय किया। राम ने भी इस षड्यंत्र चुपचाप मान लिया था। दशरथ ने राम से कहा कि मान लें हमारे सभी प्रबंध और कार्यक्रम निरस्त हो जाएं, तब भी भरत मान सकता है। क्योंकि वह उदार, सरल हृदय, धर्मात्मा तथा बुद्धिमान है। भरत को अपने नाना के यहां गए हुए बहुत समय हो गया है। दृढ़ तथा निश्चय विचार वाले परदेसी व्यक्ति का भी मस्तिष्क परिवर्तित हो सकता है।
  18. जनक को आमंत्रित ही नहीं किया गया था। डर था कि भरत को राजा बनते देख वह (जनक) इसका विरोध कर सकता है। क्योंकि, सिर्फ राम को ही गद्दी पर बैठने का अधिकार था।
  19. कैकेई के पिता को भी आमंत्रित नहीं किया गया था। क्योंकि, भरत के पक्ष में कैकेई को दिए गए वचन को नजर अंदाज कर राम का राज्याभिषेक होते देख वह कुपित हो सकता था।
  20. इन्हीं कठिनाइयों की वजह से अन्य राजाओं को नहीं बुलाया गया था। कैकेई और मंथरा ने जो किया वह सही था। इसके समर्थन में बहुत सारे तथ्य उपलब्ध हैं। इन बातों पर गौर किए बिना उन दोनों को गाली देना, भला-बुरा कहना या उन पर अनगिनत आरोप लगाना असंगत है।

6. राम

आइए अब हम राम और उसके चरित्र पर विचार करते हैं-

  1. राम भली-भांति जानता था कि उसके पिता ने विवाह के समय ही पूरा साम्राज्य सिद्धांतत: कैकेई को सौंप दिया गया था। यह बात राम ने भरत को स्वयं बताई थी (अयोध्या कांड, सर्ग 107)।
  2. राम अयोध्या की गद्दी पर कब्जा करना चाहता था। अपनी प्रजा, पिता और कैकेई के प्रति राम का व्यवहार उसकी इच्छाओं द्वारा अनुप्रेत था, (इस प्रकार राम घास में छिपे हुए सांप की तरह था)।
  3. भरत की अनुपस्थिति में राम के पिता ने उसे गद्दी पर बैठाने के लिए जो भी प्रपंच रचे थे, उनसे उसने सहमति जताई थी।
  4. यह समझकर कि कहीं लक्ष्मण को उससे ईर्ष्या हो जाए और वह कहीं उसे नुकसान पहुंचाने की न सोच डाले; राम ने उससे कहा था- “लक्ष्मण, सिर्फ तुम्हारे लिए मैं राजा बन रहा हूं। तुम्हीं इस देश पर शासन करोगे (अयोध्याकांड, अध्याय 4)। और अंत में लक्ष्मण का राज्य के मामलों से कोई मतलब नहीं था।
  5. समारोह के दौरान पूरे समय राम के मन में यह संदेह बना रहा कि कहीं उसमें कोई बाधा ना पड़ जाए और यह सारा कार्यक्रम धरा का धरा न रह जाए।
  6. राम को उस समय काफी दुःख हुआ था, जब दशरथ ने राम से कहा कि ‘अयोध्या की गद्दी तुम्हें नहीं मिलेगी। तुम्हें जंगल जाना पड़ेगा।’ (अयोध्याकांड, सर्ग 19)
  7. राम ने दुःखी होकर अपनी मां से कहा था- ‘ऐसा कुछ किया गया है कि मुझे गद्दी से हाथ धोना पड़ेगा। राजसी ठाठ से विमुख होना पड़ेगा, स्वादिष्ट मांसाहार का आनंद नहीं उठा पाऊंगा और जंगल जाकर फल और सब्जियों पर जिंदगी गुजारनी होगी।’ (अयोध्या कांड 20 सर्ग)
  8. उसने शोकाकुल होकर अपनी पत्नी और मां से कहा- ‘वह साम्राज्य जो मेरा होने वाला था, मेरे हाथ से निकल चुका है; और मुझे जंगल जाने का आदेश दिया गया है।’ (अयोध्याकांड 20, 26, 94 सर्ग)
  9. उसने लक्ष्मण के पास जाकर उससे कहा कि उनका बाप (दशरथ) अपराधी है और कहा- ‘क्या कोई मूर्ख ऐसे व्यक्ति को जंगल भेजेगा, जो हमेशा से उसकी बात मानता आ रहा है?’ (अयोध्याकांड, 53 सर्ग)
  10. राम ने बहुत-सी स्त्रियों के साथ विवाह किया था। यह बात श्री सी.आर. श्रीनिवास आयंगर की 1925 ई. में प्रकाशित वाल्मीकि-रामायण के अनुवाद के द्वितीय संस्करण में बताई गई है (अयोध्याकांड, 8 सर्ग, पृष्ठ-28)। सी.आर.एस. आयंगर लिखते हैं- ‘राम ने सीता को केवल रानी बनाने के लिए उससे शादी की थी। राजाओं की परम्परा के अनुरूप, यौन आनंद के लिए उसने कई और स्त्रियों से शादी की थी।’ श्री मन्मथनाथ दातार लिखते हैं- ‘राम की पत्नियाँ अपने नौकरों की पत्नियों की सोहबत का आनंद उठाती थीं। इसी तरह तुम्हारी (कैकेई की) बहू (भरत की पत्नी) भी खुद को दुःख के सागर में डुबो देगी (यह अनुवाद 1892 में प्रकाशित हुआ, अयोध्याकांड, पृष्ठ-202, अध्याय-8)।’ ‘राम की पत्नियां’ यह वाक्य रामायण में कई स्थानों पर प्रयोग में आया है।
  11. यद्यपि राम के प्रति कैकेई का प्रेम संदेह से परे था; लेकिन कैकेई के प्रति राम का प्रेम कपटी और बनावटी था।
  12. राम कैकेई के प्रति ईमानदार और अनुरागी होने का नाटक करता रहा। मगर अंत में उसने आरोप लगाया कि ‘कैकई एक दुष्ट स्त्री थी।’ (अयोध्याकांड 31, 53 सर्ग)
  13. यद्यपि कैकेई दुष्टता-पूर्ण तथा नीच विचारों से रहित थी। इसके बावजूद राम ने उस पर दोषारोपण करते हुए कहा था कि ‘वह मेरी माता के साथ दुष्टता-पूर्ण व्यवहार कर सकती है।’ (अयोध्या कांड, 31 और 53 सर्ग)
  14. ‘वह मेरे पिता को मरवा सकती है।’ -राम ने कैकेई पर इस तरह का दोषारोपण किया। (अयोध्याकांड, 53 अध्याय)
  15. वनवास के दौरान जब कभी ऐसी स्थिति आई जब राम को लगा कि संकट अवश्यंभावी है; तब कई बार उसने कहा कि, ‘कैकेई की इच्छा पूरी हुई; कैकेई को संतोष हुआ होगा।’
  16. राम ने जंगल में लक्ष्मण से कहा था कि चूंकि हमारे पिता वृद्ध और निर्बल हो चुके हैं और हम लोग वहां से आ गए। ऐसी स्थिति में अब भरत अपनी पत्नी के साथ, बिना किसी विरोध के अयोध्या पर शासन कर रहा होगा। इससे उसकी राजगद्दी की चाहत और भरत के प्रति ईर्ष्या की स्वाभाविक तथा निराधार अभिलाषा प्रकट होती है। (अयोध्या कांड 53 सर्ग)
  17. जब कैकेई ने राम से कहा- ‘हे राम! राजा ने मुझे तुम्हारे पास तुम्हें यह बताने के लिए भेजा है कि भरत को राजगद्दी मिलेगी और तुम्हें वनवास।’ तब राम ने उससे कहा कि, ‘राजा ने मुझसे यह कभी नहीं बताया कि वह भरत को राजगद्दी देंगे ।’ (अयोध्या कांड 19 सर्ग)
  18. उसने अपने पिता को मूर्ख और पागल कहा। (अयोध्या कांड 53 सर्ग)
  19. उसने अपने पिता से प्रार्थना की, कि ‘जब तक मैं वनवास से वापस न लौट आऊँ, तब तक तुम अयोध्या पर राज करते रहो और किसी को राजगद्दी पर न बैठने दो।’ इस प्रकार उसने भरत को गद्दी पर बैठने में अड़चन पैदा कर दी थी। (अयोध्याकांड, 34 सर्ग)
  20. राम ने यह कहकर सत्य व न्याय का गला घोंटा कि ‘यदि मुझे क्रोध आया तो मैं स्वयं अपने शत्रुओं को कुचलकर राजा बन सकता हूं, किंतु मैं यह सोचकर रुक जाता हूं कि ऐसा करने पर प्रजा मुझसे घृणा करने लगेगी।’ (अयोध्याकांड, 53 सर्ग)
  21. उसने अपनी पत्नी सीता से कहा- ‘तुम भरत के अनुकूल चलना, ताकि वह नाराज नहीं हो। इससे हमें बाद में फायदा होगा।’ (अयोध्याकांड, 26 सर्ग)
  22. राम के वनवास चले जाने का समाचार सुनकर भरत उसे अयोध्या वापस लाने के लिए वन में गया। भरत को देखकर राम ने उससे प्रश्न किया कि, ‘भरत! क्या तुम प्रजा द्वारा खदेड़कर भगाए गए हो? क्या तुम अनिच्छा से हमारे पिता की सहायता करने आए हो?’ (अयोध्याकांड, 100 सर्ग)
  23. राम ने भरत से पुन: कहा- ‘अब तुम्हारी मां का मनोरथ सिद्ध हो गया होगा, क्या वह प्रसन्न हैं?’ (अयोध्याकांड, 100 सर्ग)
  24. भरत ने राम को विश्वास दिलाया कि वह सिंहासन पर अपना दावा त्याग चुका है। उसके बाद राम ने भरत से यह रहस्योद्घाटन किया कि दशरथ अयोध्या का राज्य पहले ही उसकी मां कैकई को सौंप चुका है। (अयोध्याकांड, 107 सर्ग)
  25. भरत वन में ही अयोध्या की राजगद्दी राम को सौंपकर और उसकी खड़ाऊँ लेकर अयोध्या वापस लौटा। उसने उन्हें सिंहासन पर रखकर चौदह वर्ष तक एक तपस्वी का जीवन व्यतीत किया। निर्धारित दिन राम के अयोध्या नहीं लौटने पर भरत चिंतित हुआ और यहां तक कि उसने चिता में जलने की तैयारी भी कर ली।राम ने ऐसे सज्जन और सच्चे व्यक्ति पर संदेह किया था। चौदह वर्ष बाद जब वह लौटकर अयोध्या के बाहरी भाग पर पहुंचा, तो उसने हनुमान को भरत के पास उसे यह सूचना देने के लिए भेजा- ‘(उससे कहना कि) मैं भारी सेना लेकर वापस आ गया हूं। विभीषण और सुग्रीव भी मेरे साथ है। उस समय तुम उसके चेहरे पर आए भावों को पढ़ना, देखना कि यह सब सुनने के बाद वह जल्दबाजी में कौन-से कदम उठाता है। क्योंकि, अयोध्या के राजा के रूप में उपलब्ध सुख और भोग विलास को भला कौन छोड़ना चाहेगा।’ (उत्तरकांड, 127 सर्ग)
  26. राम सीता के चरित्र पर हमेशा संदेह करता था। उसने सीता को अग्नि-परीक्षा देकर अपने सतीत्व को सिद्ध करने को कहा। राम के आदेशानुसार सीता जब अग्नि परीक्षा दे रही थी, तब उसे उसके गर्भवती होने का पता चला। सीता की शुचिता संबंधी चर्चा उस समय हर व्यक्ति की जुबान पर थी। राम ने सीता का ध्यान आकर्षित किया कि कैसे लोग उसके चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं। फिर उसने बिना अपनी राय बताए सीता को जंगल में छोड़ आने का आदेश दिया। यह आदेश उसने ऐसे समय दिया था, जब सीता गर्भवती थी।
  27. जब वाल्मीकि ने सीता को पवित्र बताया, तो भी राम ने इस पर विश्वास नहीं किया और सीता को पृथ्वी के गर्भ में समाकर अपने प्राण त्यागने पड़े।
  28. यह जानते हुए भी कि सुग्रीव व विभीषण दोनों धोखेबाज हैं और अपने ही भाइयों को मरवाकर उनकी गद्दी हासिल करने की निकृष्ट इच्छा रखते हैं; राम ने उन दोनों से दोस्ती की थी।
  29. राम ने गैर वफादार भाई के कहने पर बालि को, जो उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा था; छिपकर पीछे से मारा। यह वही राम था, जिसमें बलि से आमने-सामने लड़ने की हिम्मत नहीं थी। ऐसे राम को अज्ञानी लोग अपना लोग हीरो समझते हैं; जबकि ब्राह्मण उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते।
  30. विभीषण द्वारा राम की अधीनता स्वीकार करते समय, राम अनजाने में अपनी बुरी और धोखेबाजी भरी नीयत के बारे में बता देता है। उस समय राम ने भरत की प्रशंसा की थी कि धरती पर एकमात्र भरत ऐसा वफादार और आज्ञाकारी है जो उसको (बड़े भाई को) दुष्ट होने के बावजूद अपना सकता है। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि क्या (एक ही पिता और मां की सन्तान) कोई और भाई हैं; जो भरत की तरह आज्ञाकारी और वफादार हों। (अयोध्याकांड, 17 सर्ग) इस तरह देखें तो राम ने यह मान लिया था कि वह दुष्ट है।
  31. बालि को मारते हुए राम ने अपने इस कार्य को यह कहते हुए उचित ठहराया कि ‘जानवरों को मारते हुए धर्म का पालन ज़रूरी नहीं है।’ और राम ने बालि को इस आधार पर मार डाला कि उसने विवेकानुसार आचरण नहीं किया था। बालि को उस पर लगे आरोपों का जवाब देने का मौका देने की कोशिश किए बगैर राम ने केवल स्वार्थी सुग्रीव के कहने पर बालि की हत्या कर दी।
  32. राम ने बहुत-सी स्त्रियों के कान, नाक, स्तन इत्यादि काट कर उन्हें कुरूप बना दिया था; और उन्हें बहुत-सी यातनाएं दी थीं। (सूर्पनखा और अयोमुखी)
  33. राम ने बहुत-सी स्त्रियों को मार डाला था। (ताड़का)
  34. राम ने कई अवसरों पर स्त्रियों से झूठ बोला था।
  35. राम ने यह कहते हुए स्त्रियों का अपमान किया कि ‘औरतों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए’ और ‘अपने गुप्त भेद पत्नी को भी नहीं बताने चाहिए।’ (अयोध्याकांड, 100 सर्ग)
  36. राम में हमेशा ही यौन सुख के प्रति अनुचित आसक्ति थी। (उत्तरकांड, 42 सर्ग)
  37. राम ने कई जीवों को अनावश्यक रूप से मारा तथा उन्हें खा गया।
  38. राम ने कहा था कि वह केवल राक्षसों को मारने के लिए वन गया था। उसने कहा कि वह इसलिए भी वन गया था, क्योंकि उसने किसी और को यह वचन दिया गया था कि वह राक्षसों का नाश करेगा । (अरण्यकांड, 10 सर्ग)
  39. राक्षसों को ज़बरन लड़ाई में घसीटने के लिए राम ने सीता के मना करने के बावजूद रावण के राज्य में प्रवेश किया था। (अरण्यकांड, 9 एवं 10 सर्ग)
  40. ‘खर’ से लड़ते हुए राम ने कहा था- ‘जंगल में मुझे सिर्फ राक्षसों को मारने के एकमात्र मिशन को पूरा करने के लिए भेजा गया है।’ (अरण्यकांड, 29 सर्ग)
  41. स्वार्थवश राम ने खुद को सुग्रीव के हवाले कर दिया जो स्वयं बेहद नालायक और विश्वासघाती था। राम ने सुग्रीव से कहा था कि ‘मुझे स्वीकार कर लो’, ‘मेरे ऊपर दया करो।’ (किष्किन्धाकांड)
  42. यह जानते हुए भी कि विभीषण ने अपने भाई रावण को धोखा दिया है, राम ने उसे अपने पक्ष में कर लिया। (उत्तरकांड, 17 सर्ग)
  43. राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाने का वचन पहले ही दे दिया था (उत्तरकांड, 18 सर्ग)। बाद में उसने अंगद को दूत बनाकर रावण को यह संदेश भेजा कि अगर वह उसे (राम को) सीता को लौटा देता है, तो वह लंका पर अपना दावा छोड़ देगा। ‘रावण को कहो कि अगर उसने सीता को लौटा दिया तो मैं लंका उसके पास ही छोड़ दूंगा।’ (उत्तरकांड, 40 सर्ग)। इससे यह सिद्ध होता है कि रावण अन्य तरह के दोषों से मुक्त था। लेकिन, राम अविश्वसनीय व्यक्ति था।
  44. भरत, कैकेई, प्रजा एवं गुरुजन सभी वन में राम के पास गए। उन्होंने राम से अयोध्या लौट चलने का आग्रह किया। यहां तक कि उन लोगों ने राम के समक्ष ‘सत्याग्रह’ भी किया। किंतु जिद पर अड़े, कठोर हृदय राम ने उत्तर दिया- ‘मैंने अपने पिता के वचनों का पालन करने का निश्चय कर लिया है और मैं किसी का कहना नहीं मानूंगा।’ इस प्रकार उसने लौटने से इनकार कर दिया और उसी राम ने अपने पिता के वचनों का तिरस्कार कर उस समय अयोध्या का राजा बनना स्वीकार कर लिया था, जब दशरथ ने उसको ऐसा प्रस्ताव दिया था। वह यह भूल गया था कि यह गद्दी भारत को देने का वचन दशरथ कैकेई को दे चुका है। (युद्धकांड, 130 सर्ग)
  45. राम ने न केवल गद्दी प्राप्त करने की इच्छा जताई, बल्कि जब से उसके पिता ने उसे जंगल जाने का आदेश सुनाया तभी से लेकर, जंगल से वापस आने पर तथा राजतिलक होने तक वह अयोध्या का राजा बनने का स्वप्न देखता रहा। अपनी कई बातों से राम ने स्वयं कई बार इसको उजागर किया है।
  46. शूद्र होकर भी तपस्या जैसा वेद विरुद्ध आचरण करने के कारण राम ने शंबूक का कत्ल किया (उत्तरकांड, 76 सर्ग)।
  47. लक्ष्मण को एक नदी (गुप्तार घाट पर सरयू नदी) में फेंककर, साधारण मनुष्य की भांति राम भी उस नदी में जा गिरा (उत्तरकांड, 106 सर्ग) और वहीं मर गया। उसके बाद राम का जन्म उपेन्द्र (उप-इंद्र) के रूप में हुआ (उत्तरकांड, 110 सर्ग)।
  48. अपने हाथ की ओर देखकर राम ने संस्कृत में कहा- ‘अरे ओ दाहिने हाथ, तुमने इस शूद्र की ऐसे बेहिचक हत्या कर दी जैसे शूद्र को मारकर ही ब्राह्मण के मृत बेटे को जिंदा किया जा सकता है। क्या तुम राम के ही शरीर का हिस्सा नहीं हो? (वाल्मीकि रामायण)

टिप्पणी – राम जिसने तपस्या कर रहे शम्बूक की वगैर किसी गलती के लिए निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है! अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों कि क्या दशा होती; जिन्हें शूद्र, जो एक गालीनुमा संबोधन है; कहा जाता है?

  1. राम ने जिस धनुष को तोड़ा, वह शिव का था। वह पहले से ही टूटा हुआ था। (देखिए, अबिधान चिंतामणि पृष्ठ-157, 331, 571, 663, 894, 1151, 1173 व 1494)
  2. विभिन्न रामायणों और परशुराम द्वारा इसका समर्थन किया गया है। जब राम ने धनुष को तोड़ा उस समय उसकी उम्र पर ज़रा ध्यान दीजिए : राम की मां के अनुसार, राम ने जब धनुष तोड़ा उस समय उसकी उम्र 5 साल थी; उसके पिता के अनुसार, वह लगभग 10 साल का था। उसकी पत्नी (सीता) के अनुसार, उसकी उम्र 12 साल थी। उसकी उम्र चाहे जो रही हो; कहानी के अनुसार वह धनुष पहले से ही टूटा हुआ था।

नवलार डॉक्टर सोमसुन्द्रा भरथिअर का दृष्टिकोण –

  1. वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम भला और ईमानदार व्यक्ति नहीं था। अनेक कपटपूर्ण कार्यों में उसका हाथ था।
  2. राम इस तथ्य से भली-भांति जानता था कि अयोध्या की गद्दी पर उसका दावा जायज नहीं है और भरत उसका कानूनी वारिस है।
  3. राम के पिता दशरथ ने भरत की माता कैकेई से विवाह करने के पूर्व ही कैकेई के पिता को यह वचन दिया था कि, ‘कैकेई से पैदा होने वाले पुत्र को ही अयोध्या का राजा बनाया जाएगा।’ केवल इसी शर्त पर कैकेई की दशरथ से शादी कराई गई थी।
  4. राम इस तथ्य से अवगत था और उसने खुद इस सत्य को स्वीकार किया है।
  5. राम ने खुद भरत को यह बात बताई थी और उससे यह विनती की थी कि वह मां कैकेई को इसके लिए दोषी न माने।
  6. राम की मां कौशल्या, वशिष्ठ, अन्य ऋषियों और मंत्रियों को भी यह मालूम था। संक्षेप में कहें तो राम की मां, ऋषि, गुरु और मंत्री भरत को छलपूर्वक से गद्दी से वंचित करने और राम को अयोध्या का राजा बनाने के लिए दशरथ के षड्यंत्र में शामिल थे।

एक अमेरिकन (ओबेई मेनन) की लिखी रामायण जो कि रूसी अखबारों में प्रकाशित हुआ

अमरीकी व्याख्या में राम को शिकागो के गैंगस्टर की प्रकृति का बताता है और सीता को सरल हृदय की बालिका, जो रावण द्वारा हरण किए जाने के बावजूद खुश दिखती थी। (देखिए 20 नवंबर 1954 को प्रकाशित “न्यूज एंड व्यूज फ्रॉम द सोवियत यूनियन’, वॉल्यूम नंबर 13, जिल्द नंबर 263, पृ.-2)।

7. सीता

आइए अब हम सीता के चरित्र की पड़ताल करें। पूरे रामायण में सीता की प्रशंसा में एक भी शब्द नहीं कहा गया है-

  1. उसका जन्म संदेहास्पद है। उसे लेकर कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं। (अयोध्याकांड, सर्ग 66)। वह राम की अपेक्षा आयु में बड़ी है।
  2. वह कहती है- ‘मैं धूल में पाई गई। इसीलिए मेरे माता-पिता के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। इसलिए काफी बड़ी हो जाने के बाद भी बहुत दिनों तक कोई मुझसे विवाह करने के लिए तैयार नहीं हुआ था।’
  3. विवाह हो जाने के कुछ ही दिन बाद भरत ने सीता का तिरस्कार करना शुरू कर दिया था।
  4. राम ने भी इस बात का समर्थन किया है। इस तथ्य की पुष्टि इससे होती है कि उसने सीता से कहा- ‘तुम इस योग्य नहीं हो कि भरत तुम्हारी प्रशंसा करे।’ (अयोध्याकांड, 26 सर्ग)
  5. सीता ने इसे खुद स्वीकारती है। उसने राम को बताया- ‘मैं उस भरत के साथ नहीं रहना चाहती, जो मेरा तिरष्कार करता है।’
  6. वह अपने पति (राम) को ‘मंदबुद्धि’ कहती थी।
  7. उसने राम से कहा- ‘तुम सिर्फ दिखने में आदमी जैसे हो; परन्तु, तुम्हारे भीतर पौरुष का अभाव है।’
  8. ‘तुम क्षमताहीन हो, तुममें शिष्टाचार और आकर्षण नहीं है।’
  9. तुम स्त्री का व्यापार करने वाले व्यक्ति से भी अच्छे नहीं हो, जो अपनी स्त्री को किराये पर उठाकर आजीविका चलाता है। तुम मुझसे वेश्यावृत्ति कराकर उससे लाभ उठाना चाहते हो।
  10. यह जानकर कि राम उसके व्यवहार को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखता है; सीता बोली- ‘राम, तुम मेरे रक्षक हो! मैं केवल तुमको प्यार करती हूँ। मैं तुम्हारी शपथ लेकर यह बार-बार तुमसे कहती हूँ। इसके बावजूद तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते हो!’
  11. राम ने कहा- ‘मैं तुम्हारी परीक्षा ले चुका हूं।’ (अयोध्याकांड, 6,7,8,,9,10, से 11 सर्ग, अध्याय-30)
  12. राम ने सीता के ठाठ-बाट और दिमाग़ी दुर्बलता को याद करते हुए सीता को निर्देश दिया कि यदि वह उसके साथ जंगल जाना चाहती है, तो उसे अपने आभूषण उतार देने चाहिए। (अयोध्याकांड, 30 सर्ग)
  13. सीता ने ऐसा ही किया, किंतु उसने अनजाने में अन्य आभूषण पहन लिए । (अयोध्याकांड, 30 सर्ग)
  14. कौशल्या जो यह सब देख रही थी, उसने सीता से कहा- ‘एक नेक और सच्चरित्र महिला के रूप में व्यवहार करो। अपने पति की वजूद को नजरंदाज नहीं करो।’ सीता ने बड़ी बेअदबी से अपनी सास को जवाब दिया- ‘मुझे इन सब बातों के बारे में पता है।’ लेकिन, इसके बावजूद उसने अपने सारे गहने नहीं उतारे। (अयोध्याकांड, 37 सर्ग)
  15. जब राम और लक्ष्मण पेड़ों की छाल के वस्त्र धारण किए हुए थे; उस समय सीता ने ऐसे वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया। (अयोध्याकांड- 37 सर्ग)
  16. जो स्त्रियां जो सीता की अनिच्छा से परिचित थीं; उन्होंने सीता पर तरस खाते हुए राम से उसे साथ नहीं ले जाने की विनती की थी। इसके बावजूद राम ने उसे वल्कल वस्त्र पहनने को कहा और उसे जंगल ले गया। क्योंकि, कैकेई ने अन्य स्त्रियों की इच्छा को मानने से इनकार कर दिया था। (अयोध्याकांड, 37 और 38 सर्ग)
  17. हालांकि, सीता ने दी गई किसी भी सलाह की परवाह नहीं की थी। उसने अपने सुंदर परिधान और गहने धारण किए। इस तरह यह स्पष्ट है की भरत की नापसंदगी और कैकेई का सीता को अपने राज्य (अयोध्या) में रहने की अनुमति नहीं देने के कारण सीता को जंगल में जाना पड़ा था।
  18. वन-गमन के दौरान नदी पार करते समय सीता ने उससे प्रार्थना की- ‘हे नदी! यदि मैं सकुशल लौटी, तो तुम्हें एक हजार गाय और एक हजार पात्र मदिरा (शराब) भेंट करूंगी।’ (अयोध्याकांड, 52 सर्ग)
  19. वनवास में जब कभी भी सीता को आसन्न खतरे का आभास हुआ, वह कुढ़ करके कहती- ‘हमारे दुःख से कैकेई को सुख-संतोष प्राप्त होगा।’ इस तरह सीता कैकेई के प्रति अपनी शत्रुता का भाव प्रकट करती थी।
  20. जब कभी राम सीता को न देखकर उदास होता तो लक्ष्मण उससे कहता कि, ‘तुम एक साधारण स्त्री के लिए इतना क्यों परेशान होते हो? (अयोध्याकांड, 66 सर्ग)
  21. लक्ष्मण कहा करता था कि सीता संदेहास्पद चरित्र की महिला है। (अरण्यकांड, 18 सर्ग)
  22. राम हिरण की खोज में बाहर गया था। सीता राम की सहायता करने के लिए लक्ष्मण को मना रही थी। यह देखते हुए कि लक्ष्मण उसे यहां अकेला छोड़कर जाने में हिचकिचा रहा है। सीता ने लक्ष्मण पर अपनी बातों से तीखे प्रहार किए- ‘क्या मुझे फुसलाने के लिए तुम यहां मँडरा रहे हो और राम की जान बचाने के लिए नहीं जाना चाहते? क्या इसी के लिए एक अच्छे आदमी बनकर तुम हमारे साथ जंगल आए हो? तुम धूर्त हो। मुझसे भोग-विलास करने के लिए तुम राम को मार देने पर तुले हुए हो। क्या इसी वजह से भरत ने तुमको हमारे साथ जंगल भेजा है? मैं तुम्हारे या भरत की इच्छा के समक्ष कभी भी आत्मसमर्पण नहीं करूंगी।’
  23. जब लक्ष्मण ने सीता के प्रति मां का सम्मान प्रदर्शित करते हुए कहा कि तुम्हें ऐसी निर्लज्जता प्रकट करना शोभा नहीं देता। सीता ने उससे कहा- ‘तुम धूर्त हो; तुमने यह दिखा दिया है कि मुझे पाने की तुममें उत्कट लालसा है और मेरे ऊपर नजर डालने के लिए तुम समय की ताक में हो। (उपरोक्त दोनों के संदर्भ अयोध्याकांड के 45वें सर्ग में देखे जा सकते हैं ।)
  24. रावण सीता को उठा ले जाने के उद्देश्य से उसकी झोंपड़ी तक आया था। उसकी सुंदरता को देखकर वह उस पर मोहित हो गया। वह उसकी ओर बढ़ा। वह उसके स्तनों और जादूभरी जांघों की प्रशंसा करने लगा। इन सब बातों की सीता पर क्या प्रतिक्रिया हुई? क्या सीता ने रावण से घृणा की? क्या उसे अस्वीकार किया? क्या उसने उसे फटकारा? नहीं, बिलकुल नहीं। उसका गर्मजोशी से स्वागत हुआ। उसने रावण की उपस्थिति में अपनी ऊंची प्रतिष्ठा और अपनी जवानी की, बिना अपनी सही उम्र बताए, प्रशंसा की। (अरण्यकांड, 46, 47 सर्ग)
  25. सीता ने रावण को उस समय नापसंद करना शुरू कर दिया, जब उसने यह बताया कि वह राक्षसों का प्रधान रावण है।
  26. जब अपनी गोद में रखकर वह सीता को ले जा रहा था, उस समय सीता अर्धनग्न थी और अपने शरीर के ऊपरी भाग से खुद ही कपड़े हटा दिए। (अरण्यकांड, 54 सर्ग)
  27. जैसे ही सीता ने रावण के महल में पैर रखा। रावण के प्रति उसका प्रेम और बढ़ गया। (अरण्यकांड, 54 सर्ग)
  28. रावण ने सीता से कहा- ‘आओ हम दोनों मिलकर आनंद उठाएँ। सीता अपनी आंखें बंदकर सुबकती रही। (अरण्यकांड, 55 सर्ग)
  29. रावण ने कहा- ”सीता! तुम्हारा और हमारा यह मिलन भाग्य से ही सम्भव हुआ है। ऋषि भी इसके समर्थन में हैं। (अरण्यकांड, 55 सर्ग)
  30. सीता ने रावण को उत्तर दिया- ‘तुम मेरे शरीर को अपने आलिंगन में लेने के लिए स्वतंत्र हो। मुझे उसकी रक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मुझे इस बात का पश्चाताप नहीं कि मैंने भूल की है।’ (अरण्यकांड, 59 सर्ग)। इन तथ्यों से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि सीता ने रावण को अपने साथ सहवास की अनुमति नहीं दी थी।
  31. राम ने सीता से कहा- ‘सीता! ऐसा कैसे हो सकता है कि रावण ने तुम्हारे साथ संभोग किए बिना ही तुमको छोड़ दिया? राम के इस आरोप पर सीता ने निम्नांकित उत्तर दिया जो कि उपरोक्त कथन की पुष्टि करते हैं।’
  32. सीता ने उत्तर दिया कि, ‘तुम सत्य कहते हो। किंतु, तुम ही बताओ कि मैं क्या कर सकती थी? मैं तो अबला स्त्री हूँ। मेरा शरीर उसके अधिकार में था। मैंने स्वेच्छा से कोई भूल नहीं की है। इसके बावजूद भी मैं मन से तुम्हारे पास थी। जो हुआ उसके पीछे ईश्वर की इच्छा रही होगी।’ उसने बस इतना ही कहा; लेकिन उसने यह स्वीकारोक्ति नहीं की कि रावण ने उसके साथ सहवास नहीं किया था। (उत्तरकांड, 118 सर्ग)
  33. सीता का गर्भ देखकर राम का संदेह और पुष्ट हो गया। उसने प्रजा द्वारा सीता पर लगाए गए आरोपों की आड़ लेकर लक्ष्मण को आज्ञा दी कि वह उसको जंगल में छोड़ दे। सीता ने लक्ष्मण को अपना पेट दिखाते हुए कहा- ‘देखो! मैं गर्भवती हूं।’ (उत्तरकांड, 48 सर्ग)
  34. जंगल में उसने दो पुत्रों को जन्म दिया। (उत्तरकांड, 66 सर्ग)
  35. अंत में जब राम ने इस संबंध में सीता से शपथ खाने को कहा, तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और वह मर गई। (उत्तरकांड, 97 सर्ग)
  36. रावण ने नतमस्तक होकर बहुत ही सम्मानपूर्वक बिना उनके शरीर को स्पर्श किए उसको अपने पीछे आने को कहा। इसका मतलब हुआ कि, ‘रावण ने सीता के प्रति किसी तरह की शक्ति का प्रयोग नहीं किया और सीता अपनी इच्छा से उसके पीछे गई।’ सीता सिर्फ अपनी इच्छा से ही रावण के पीछे जा सकती थी। उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ रावण उनको छू तक नहीं सकता था। क्योंकि रावण को यह श्राप दिया गया था कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुएगा, तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। ब्रह्मा का भी उसे यह श्राप था कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी अनिच्छा के बावजूद छुएगा तो वह भस्म हो जाएगा। अत: रावण ने किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध न तो कभी छुआ, न कभी छू सकता था।
  37. रावण से सीता को वापस प्राप्त करने के बाद राम अयोध्या का राजा बना। एक दिन उसकी साली कुकुवावती ने राम के पास जा कर कहा- ‘हे श्रेष्ठ! तुम सीता को खुद से ज्यादा प्यार कैसे करते हो? मेरे साथ आओ और अपनी प्यारी सीता के हृदय की वास्तविकता को देखो। वह अब भी रावण को नहीं भूल सकी है। वह रावण के ऐश्वर्य पर गर्व करती हुई उसका चित्र अपने पंखा पर बनाए हुए है। उसे अपनी छाती से चिपकाए हुए है। उसके ध्यान में मग्न अपनी चारपाई पर लेटी हुई है।’ इसी समय राम का मुख्य गुप्तचर दुर्मुहा राम के पास आया और उसे बताया कि ‘रावण से सीता को वापस लेने और उसे पुन: अपनी पत्नी बना लेने से प्रजा में उसकी निंदा एवं बदनामी हो रही है। यह सुनते ही राम को क्रोध आ गया। उस समय राम को जिस तरह का अपमान और दुःख का अनुभव हुआ उसे उसके चेहरे के भावों से स्पष्ट देखा जा सकता था। उसने आहें भरीं और अपनी साली कुकुवावती के साथ सीता के कमरे में गया। राम ने सीता को रावण के चित्र वाले पंखे को अपनी छाती से चिपकाए सोया हुआ पाया। यह बात ‘श्रीमती चंद्रावती’ द्वारा लिखित ‘बंगाली रामायण’ के पृष्ठ-199 और 200 में लिखी गई है। घटनाओं के गंभीर अध्ययन से पता चलता है कि राम को जब यह पता चला कि सीता गर्भवती है। अंदाजन यह समय रावण से सीता को छुड़ाने और अयोध्या लौटने के लगभग एक माह बाद का था।
  38. सीता को रावण का चित्र बनाते हुए राम ने रंगे हाथ पकड़ा था। (श्री सी.आर. श्रीनिवास आयंगर की ‘नोट्स ऑन रामायण’)
  39. रामायण के अनुसार हम कह सकते हैं कि राम अयोग्य व्यक्ति और सीता व्यभिचारिणी थी।

इस बात को साबित करने के लिए कई दृष्टांत हैं कि राम ने सीता को जंगल में अकेला छोड़ देने के लिए कहा। यह एक बहुत ही निर्मम क्रूरता है।

जहां तक सीता के चरित्र की बात है। रावण के साथ अनुचित अंतरंगता के कारण वह नैतिक रूप से पवित्र नहीं थी। अगर यह कहा जाता है कि राम ने जो किया वह उचित था। तो इस तथ्य को भी स्वीकार करना होगा कि सीता को रावण ने गर्भवती किया था।

यदि यह भी मान लें कि सीता ने कोई नैतिक अपराध नहीं किया था और राम से गर्भवती हुई थी, तो गर्भवती सीता को उस समय जंगल भेजने के राम के निर्णय को गलत और अमानवीय मानना चाहिए। राम ने सीता के गर्भवती होने की बात सुनी और दूसरे ही दिन उसे जंगल भेज दिया।

इस स्थिति में यह साबित की करने की किसी कोशिश की जरूरत नहीं है कि सीता व्यभिचारिणी थी और न ही राम दुष्ट था। ऐसा स्वीकार करने का अर्थ यह होगा कि व्यभिचार और दुष्टता दोनों ही क्षम्य हैं।

तब यह कथन कैसे सत्य हो सकता है कि राम का अवतार सदाचारण सिखाने लिए और सीता पवित्रता सिखाने के लिए धरती आई थी?

अगर ब्राह्मणों की यह बात मान ली जाए कि राम और सीता ने जो किया वह सही था, तो क्या यह भोले-भाले आम लोगों को ठगने जैसा नहीं होगा? सुधारक कैसे इस तरह की बेतुकी बातों को बर्दाश्त कर सकते हैं? इन सब कारणों से हम यह कहते हैं कि राम और सीता दोनों ही चरित्रहीन ‘पात्र’ हैं।

सीता का गर्भवती होना

वाल्मीकि रामायण का गंभीर तथा सूक्ष्म अध्ययन स्पष्ट प्रकट करता है कि सीता राम से गर्भवती नहीं थी।

रावण को मारने के बाद राम सीता के साथ अयोध्या लौटा और उसका राजा बनकर राज करने लगा। इसके बाद उसने सुग्रीव, विभीषण और अन्य लोगों को अपने-अपने स्थान पर वापस भेज दिया। अंत में पुष्पक विमान भी वापस भेज दिया। पुष्पक विमान के भेजे जाने के तुरंत बाद भरत ने दोनों हाथ जोड़कर राम से कहा- ‘हे नाथ! तुम तो दैवी शक्ति हो। तुम्हारे शासन के एक माह के अंदर ही प्रजा सब प्रकार से आनंदित तथा संतुष्ट है।’

कहा गया है कि दस हजार वर्ष शासन कर चुकने के पश्चात एक दिन राम और सीता अपने महल के बाग में बैठे हुए थे। उसी समय राम को सीता के गर्भवती होने का पता चला। वाल्मीकि रामायण के अनुवादक श्री श्रीनिवास आयंगर के उत्तरकांड के श्लोक संख्या 42 एवं पृष्ठ 163 के अनुसार, यह दस हजार वर्ष वाली बात वाल्मीकि ने खुद नहीं लिखी थी। इसे बाद में जोड़ा गया था। अपनी संपादकीय टिप्पणी में वे लिखते हैं- ‘ऐसा लगता है कि यह श्लोक, जिसमें 10 हजार वर्षों का शासन की बात लिखी है; उसे वाल्मीकि ने नहीं लिखा है।’

वाल्मीकि रामायण के बालकांड के अध्याय-2 के प्रथम श्लोक के अनुसार राम ने सीता को जंगल में भेजने के बाद देश पर 10 हजार वर्ष तक राज्य किया। उसने बहुत से अश्वमेध यज्ञ भी किए। (देखें उत्तरकांड, 99 अध्याय) कहा जाता है कि यह श्लोक सीता को संदेह से परे रखने के लिए इसमें जोड़ दिया गया है। सीता गर्भवती होने की बात का पता एक महीने के अंदर ही चल गया और इसके बाद उसको घने जंगल में छोड़ दिया गया। जंगल में पहुंचकर सीता ने लक्ष्मण को अपना पेट दिखाया और कहा कि उसके पेट में चार महीने का गर्भ पल रहा है। उसने लक्ष्मण से कहा, “मेरा पेट देखो! मेरा गर्भ चार महीने का है।” यह कहकर उसने लक्षमण को विदा किया। अगर मामला ऐसा है, तो ऐसे कैसे हो सकता है कि एक महीने का गर्भ चार महीने का हो गया और यह कैसे कहा जा सकता है कि उसका यह गर्भ राम से था?

8. लक्ष्मण

जहां तक लक्ष्मण के चरित्र की बात है, हमें उसके चरित्र में कोई उल्लेखनीय तत्त्व नजर नहीं आता। रामायण में अनेक स्थानों पर लक्ष्मण का जिक्र सिर्फ इसलिए मिलता है, क्योंकि वह हमेशा ही राम के साथ रहता है। कहीं भी इस बात का पता नहीं चलता है कि वह औसत व्यक्ति से अच्छा था। बड़े आश्चर्य की बात है कि उसे ‘युवा अवतारी’ कैसे कहा जाता है।

  1. भरत से राजगद्दी छीनने के षड्यंत्र में उसका हाथ था।
  2. राम ने अपने प्रति लक्ष्मण की भक्ति पर संदेह करके उसे छलपूर्वक फुसलाया। उसने कहा कि, ‘लक्ष्मण! राजगद्दी भले ही मुझे मिले, पर राज तुम्हीं करोगे।’ यह सुनने के बाद लक्ष्मण तन-मन से राम को राजा बनवाने के लिए सब कुछ कुछ करने में जुट गया। सुमित्रा के बेटे लक्ष्मण ने राम का साथ दिया। जबकि, उसके दूसरे बेटे शत्रुघ्न ने भरत के प्रति अपनी वफादारी दिखाई। शायद वे इस बात को जानते थे कि उनमें से कोई भी किसी भी तरह राजा नहीं बन सकता था।
  3. लक्ष्मण ने अपने पिता दशरथ को काफी गालियां दीं और उसे विश्वासघाती कहा।
  4. उसने प्रस्ताव रखा था कि उसके पिता को जेल में डाल देना चाहिए।
  5. उसने कहा कि उसके पिता की हत्या कर देनी चाहिए।
  6. उसने यहां तक कहा कि, ‘मनु के अनुसार पिता को मारना धर्म है।’
  7. उसने कहा था, ‘मैं भरत तथा उसके सहयोगियों को पूरी तरह मिटा दूंगा।’ (अयोध्याकांड, 21 सर्ग, श्लोक 3 से 7 तक )
  8. राम ने आहें भरते हुए कहा- ‘यह ईश्वर की ही इच्छा थी कि मैं राजा नहीं बन सका।’ यह सुनकर लक्ष्मण ने राम की आलोचना की और कहा- ‘ईश्वर की इच्छा की बात सिर्फ डरपोक और मूर्ख करते हैं।’
  9. लक्ष्मण ने राम को बताया कि तुम्हें धोखा देने के लिए दशरथ और कैकेई ने अपनी पूर्व-सुनिश्चित योजनानुसार तुम्हें राजगद्दी देने के मुद्दे पर अलग-अलग मत रखने का दिखावा किया है।
  10. लक्ष्मण ने चुनौती देते हुए राम से कहा- ‘मैं दशरथ और कैकेई को वन में भेज सकता हूं और तुम्हें राजगद्दी पर बैठा सकता हूं।’
  11. उसने यह भी कहा- ‘यदि तुममें ख़ुद का राजतिलक करने का साहस नहीं है तो मैं खुद राजगद्दी पर अधिकार कर लूँगा और अयोध्या पर राज करूंगा। (अयोध्याकांड, 23 सर्ग, श्लोक 8 से 11)
  12. अपना देश छोड़ वनवास के लिए जाते हुए उसने कहा- ‘वह धन्य है जो वेश्याओं की नगरी/भोग-विलास की नगरी अयोध्या पर राज करता है।’ (अयोध्याकांड, 51 सर्ग)
  13. उसने आहें भरते हुए कहा- ‘क्या हम सुरक्षित अयोध्या लौट आएंगे।’ (अयोध्याकांड, 51 सर्ग)
  14. राम को ससम्मान अयोध्या वापस ले जाने और उसको राजा बनाने के लिए जंगल आए भरत को देखकर वह उस पर ग़ुस्से में बोला- ‘अब मैं उसको जान से मार दूंगा।’ (अयोध्याकांड, 98 सर्ग)
  15. विरादन को वन में देखकर उसने कहा- ‘गद्दी हड़पने वाले भरत से अब मैं बदला लेने जा रहा हूं।’ (अरण्यकांड, 2 सर्ग)
  16. उसने सूर्पनखा से कहा कि सीता चरित्रहीन है, उसकी छातियां ढीली हो चुकी हैं। (अरण्यकांड, 18 सर्ग)
  17. सीता के प्रति उसके बर्ताव ने सीता के मन में संदेह पैदा कर दिया कि उसके साथ प्रेम दिखाकर उसके साथ संभोग करना चाहता था।
  18. जो भी सीता को ले जाना चाहे, ले जाने दो! उसे मर जाने दो! क्या फर्क पड़ता है? क्या हम किसी नीच महिला के कारण अपनी जान जोखिम में डाल दें?’ उसने अपने बड़े भाई को उसकी (भाई की) पत्नी के बारे में इस तरह की अनुचित और गैर जिम्मेदारी भरी बातें कहीं।
  19. लक्ष्मण ने ताड़का, सूर्पनखा व अयोमुखी जैसी स्त्रियों के कान, नाक और स्तन काटकर उनका रूप बिगाड़ दिया था।
  20. ‘दुःख में खोया हुआ राम स्वयं तुम्हारी शरण में आया है। उस पर दया करो।’ -ऐसा कहते हुए लक्ष्मण ने सुग्रीव के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
  21. इसके कुछ समय बाद लक्ष्मण ने उसी ‘सुग्रीव का कत्ल करने’ की आज्ञा राम से मांगी।
  22. राम के इशारे पर उसने सीता से झूठ बोला था और गर्भवती होने के बावजूद उसे जंगल में छलपूर्वक छोड़ आया था।
  23. राम और भरत दोनों उसके बड़े भाई थे। किंतु, वह राम का सहायक व भरत का विरोधी था। इसी प्रकार वह कौशल्या का भक्त था। लेकिन, कैकेई से घृणा करता था। ऐसा क्यों? गद्दी प्राप्त करने की उसकी लालसा के अलावा इसका और क्या कारण हो सकता है?

अब हम निम्नांकित लोगों के बारे में संक्षिप्त में जानें:-

भरत, कैकेई, सुग्रीव, शत्रुघ्न, सुमंत्र, अंगद, कौसल्या, वशिष्ठ, विभीषण, सुमित्रा, हनुमान, रावण और बालि।

9. भरत

हम भरत में ऐसा कोई गुण नहीं पाते हैं जिसके आधार पर उसे श्रेष्ठ कहा जा सके-

  1. उसने अपने बचपन के शुरुआती दस वर्ष अपने नाना के महल में एक चंचल बालक के रूप में बिताए थे।
  2. वहां से बुलाए जाने पर ही वह अयोध्या लौटा। उसे अपने मां-बाप व परिवार की कोई चिंता नहीं थी।
  3. अपने नाना के यहां से अयोध्या लौटने पर जब उसे यह पता चला कि राम को जंगल भेजा जा रहा है; तब उसने यह जानना चाहा कि क्या उसने (राम ने) किसी महिला के साथ बलात्कार किया है? (जिसकी वजह से उसको यह सजा दी जा रही है)। (अयोध्याकांड, 72 सर्ग)
  4. उसने अपनी मां को गालियां दीं और उसे कर्कशा, पिशाचिनी, वेश्या, दुष्टा व नटखट स्त्री कहा। इसके साथ यह भी कहा कि अच्छा होता कि वह मर जाती। उसने अपनी मां से कहा कि तुम इस देश से निकल जाओ। मुझे तेरा पुत्र होने का दुःख है। इस प्रकार उसने अपनी उस माता को फटकारा और बुरा-भला कहा, जिसने उसे बड़ी मुश्किल से उसके लिए अयोध्या का राज्य प्राप्त किया था। उसने वस्तुस्थिति तथा अपनी माता के पक्ष को समझने का प्रयत्न नहीं किया।
  5. उसने अपने पिता को उपद्रवी व प्रजा-पीड़क बताया। (अयोध्या कांड, ऊपर 4 और 5 में कही गई बातें सर्ग 73, 74 से लिए गए हैं)
  6. वन में राम से वार्तालाप करते हुए उसने उससे प्रार्थना की कि, ‘अयोध्या लौट कर आओ और खुशी प्रदान करने वाली शाही महिलाओं के बीच राजमुकुट धारण करो।’ (अयोध्या कांड, 105 सर्ग)
  7. भरत की भी कई पत्नियां थीं। 

10. शत्रुघ्न

वह एक अव्वल दर्जे का मूर्ख था-

  1. उसने अपनी सौतेली मां कैकेई को गालियां दीं।
  2. उसने मंथरा को फटकारा, मारा और उसके अंगों को तोड़ दिया। वह आद्योपांत सब भेद जानती थी और अपनी मालकिन कैकेई के प्रति कर्तव्यनिष्ठ थी। वह कैकेई की विश्वासपात्र थी और न्याय पाने की कोशिश में उसकी मदद कर रही थी।

टिप्पणी : ध्यान देने की बात यह है कि भरत और शत्रुघ्न, जिन्होंने अपने माता-पिता को गालियां दीं; उन्हें बुरी तरह अपमानित किया, उन दोनों ने ही अपने बड़े भाई राम के प्रति भक्ति-भाव प्रदर्शित किया था।

11. कौशल्या

उसका व्यवहार निम्न कोटि के उन परिवारों जैसा था जिन परिवारों में एक पुरुष की कई पत्नियां होती हैं-

  1. उसके मन में सदैव यह उत्कट अभिलाषा रहती थी कि किसी भी तरह से, अयोध्या का राजपाट उसके पुत्र राम मिले।
  2. वह कैकेई से द्वेष करती थी और उसके प्रति शत्रुता का भाव रखती थी।
  3. उसे इस बात का मलाल था कि वह वृद्ध हो चुकी है और उसके शरीर का आकर्षण समाप्त हो गया है। इससे वह दुःखी रहती थी। (अयोध्या कांड 20 सर्ग)
  4. अपने पति के प्रति तनिक भी सम्मान की भावना न रखते हुए उसने उसे गालियां दीं।

12. सुमित्रा

उसमें वर्णन करने योग्य गुणों का अभाव है-

  1. वह जानती थी कि उसके पुत्र को गद्दी मिलनी नहीं है। इस कारण वह राम को राजा बनाने की इच्छुक थी।
  2. ‘चौदह वर्ष व्यतीत होते ही राम तुरंत लौट आएगा और भरत से राजगद्दी छीन लेगा।’- यह कहकर वह कौशल्या को ढांढस बंधाया करती थी। इससे प्रकट होता है कि दोनों के मन में भरत के प्रति कटुता थी।

13. कैकेई

  1. वह सुंदर वीरांगना रानी थी। वह अधिकृत रानी थी।
  2. एक या दो अवसरों पर उसने अपने पति की प्राण-रक्षा की थी।
  3. अयोध्या का राज्य उसी का था। क्योंकि, उसने अपने पति की जान बचाई और उससे विवाह करते समय राजा दशरथ ने अपना राज्य उसी को सौंप दिया था।
  4. भरत ने कैकई से जब भी यह कहा- ‘मैं राम को राज्य सौंप दूंगा… मैं उसे यह राज्य सौंप चुका हूं।’ कैकई ने इस पर कभी आपत्ति नहीं की।
  5. राजगद्दी पर अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए उसने कठिन प्रयत्न किए। उसने दुष्टतापूर्ण विचारों को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया और न उसने कोई तुच्छतापूर्ण कार्य किया।

14. सुमंत्र

मंत्री होने के बावजूद भी वह ईमानदार और उच्च चरित्र का व्यक्ति नहीं था-

  1. दशरथ के साथ उसका व्यवहार छल-कपटपूर्ण था। उसने उसे कभी भी उचित परामर्श नहीं दिया।
  2. वह रानी कैकेई से उपहासास्पद वार्तालाप किया करता था। (अयोध्या कांड 35 सर्ग)
  3. वह झूठ भी बोलता था।

15. वशिष्ठ

गुरु वशिष्ठ ने एक साधारण पुरोहित (ब्राह्मण पुजारी) से बेहतर आचरण नहीं किया।

  1. यह जानते हुए कि राजगद्दी पर भरत का अधिकार है, उसने राम को गद्दी पर बैठाने की चाल चली।
  2. षड्यंत्र को सफल बनाने के लिए उसने जल्दबाजी में राम को राजा बनाने के लिए तिथि निश्चित की।
  3. जिस दिन को उसने राम के राजतिलक के लिए शुभ दिन के रूप में चुना था। आखिरकार उसी दिन राम को वनवास के लिए निकलना पड़ा।

16. हनुमान

वह एक साधारण व्यक्ति था। उसने कोई बुद्धिमतापूर्ण कार्य नहीं किया था। उसके बारे में रामायण में कहा गया है कि उसे जो यश तथा प्रसिद्धि प्राप्त हुई। वह इसलिए हुई, क्योंकि उसने अच्छे काम किए थे। लेकिन, इसे तथ्यों से साबित करना काफी कठिन है।

  1. उसने अन्यायपूर्वक लंका में आग लगा दी। अनेक असहाय व निर्दोष लोगों का वध किया और इस तरह उसने बहुत तबाही मचाई।
  2. सीता से वार्तालाप करते समय उसने निर्लज्ज एवं असभ्यतापूर्ण शब्दों का प्रयोग किया था। यहां तक कि उसने मनुष्य के लिंग के विषय में भी सीता से बातचीत की थी, जैसा स्त्रियों के समक्ष नहीं करना चाहिए था। (सुंदर कांड 35 सर्ग)

17. बालि

बालि किसी प्रकार भी दोषी नहीं था-

  1. वह अपने भाई को नहीं मारना चाहता था।
  2. सुग्रीव ने अनावश्यक रूप से बालि के साथ झगड़ा किया था।
  3. बालि का स्वभाव किसी को नुकसान पहुचाने वाला नहीं था और इसलिए उसमें कोई दोष नहीं था।
  4. उसने अपनी पत्नी को वचन दिया था कि वह अपने भाई को नहीं मारेगा। इस वादे के साथ उसने उसके साथ लड़ाई की।
  5. वह बहुत ही धैर्यवान और शक्तिशाली था।
  6. वह सच्चा व खरा था।
  7. कोई भी मनुष्य उसको आमने-सामने के युद्ध में हरा नहीं सकता था।
  8. वह बहुत से महान व्यक्तियों का प्रिय मित्र था।
  9. उसने राम को ग़लती से ईमानदार व्यक्ति समझ लिया था।
  10. बालि की मृत्यु पर सुग्रीव ने उसके गुणों की प्रशंसा की थी और कहा था- ‘मैं अपने ऐसे भाई को खोकर जीवित नहीं रहना चाहता। अब मैं चिता में जलकर भस्म हो जाऊंगा।’

बालि जैसे योग्य पुरुष को मार डालने को सही ठहराने के लिए राम ने कहा था- ‘पशुओं को मारने में धर्म का विचार नहीं करना चाहिए। क्या वह (बालि) पशु था?’

18. सुग्रीव

  1. उसने अपने भाई को धोखा दिया।
  2. वह केवल अपने भाई को मार डालने के लिए राम का सेवक बना।

19. अंगद

अंगद में आत्मसम्मान की भावना नहीं थी। उसने उस राम से मित्रता की, जिसने उसके पिता को मार डाला था।

  1. उसके मन में अपने चाचा सुग्रीव के प्रति अच्छे भाव नहीं थे।
  2. उसका व्यवहार एक बिना शर्त सेवा करने वाले उस दास की तरह था, जो अपने बारे में कोई राय नहीं रखता।

20. विभीषण

  1. अपने भाई रावण की हत्या कराकर वह लंका का राजा बन गया; और फिर अपने परिवार के दुश्मन राम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
  2. जब इंद्रजीत से पराजित होकर राम व लक्ष्मण धाराशायी हो गए, तब विभीषण ने कहा- ‘राम व लक्ष्मण की शक्ति पर भरोसा कर मैं अपना भविष्य बनाने के लिए उनके पास गया था। किंतु, अब मेरी संपूर्ण आशाओं पर पानी फिर गया। मैं अब विपत्ति में फंस गया हूं और राज्य भी मैंने खो दिया। मेरा शत्रु रावण अपनी प्रतिज्ञा पूरी हो जाने के कारण प्रसन्न है।’ इस प्रकार उसने लंका का राजा बनने की अपनी लालच को स्पष्ट प्रकट किया था। ( उत्तरकांड, 49 सर्ग)
  3. हनुमान, सुग्रीव तथा अन्य लोग राम को विभीषण की महत्वाकांक्षा के बारे में बता चुके थे।
  4. राम यह जानता था और उसने कहा- ‘मुझे ऐसे ही नीच मनुष्य की आवश्यकता है।’ (उत्तरकांड, 17 सर्ग)
  5. रावण के जीवित रहते ही राम ने उसे राजा बना दिया था और उसने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था। (उत्तरकांड, 18 सर्ग)
  6. इसके परिणामस्वरूप उसने (विभीषण) राम को बहुत से गुप्त भेद बताए।
  7. उसने अपने आपको राम के हवाले कर दिया और अपने भाई को यह कहकर धोखा दिया कि उसका भाई रावण सीता को हर लाया है। पर जिस वास्तविक कारण से वह यह सब करने के लिए प्रेरित हुआ, वह था लंका पर राज करने की उसकी इच्छा थी। वह सच्चा और न्यायी नहीं था।

कैसे?

  1. रावण की वाटिका में राम के अनधिकृत रूप में प्रवेश करने और वहां जानवरों का शिकार करने पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया था।
  2. जब उसकी बहन सूर्पनखा व अन्य संबंधित स्त्रियों को अपमानित कर उनके नाक, कान व स्तन काट डाले गए, तब भी उसका ख़ून नहीं खौला। कुछ महिलाओं की हत्या तक कर दी गई थी। इन सभी बातों से उसे कोई बेचैनी नहीं हुई।
  3. उसने गलती और भयानक भूल करने वाले व्यक्ति (राम) की ईमानदार, न्यायी और बहादुर कहकर प्रशंसा की। जबकि अपने सच्चे और बहादुर भाई (रावण) से घृणा करता रहा। जो सीता के साथ उस समय भी आदर से पेश आया था, जब वह उसकी कैद में थी। यह सब कुछ उसने अपने भाई रावण से दगा कर लंका का राज हड़पने के निश्चित मंतव्य के साथ किया। क्या इसे स्वार्थी और घटिया मानसिकता नहीं कहेंगे?

21. रावण

रावण की विशेषताएं

1. वह

  1. एक महान विद्वान था।
  2. बहुत बड़ा संत था।
  3. वेद और शास्त्रों का ज्ञाता था।
  4. अपने संबंधियों व प्रजा के प्रति दयालु और उनका संरक्षक था।
  5. वीर योद्धा था।
  6. बहुत शक्तिशाली था।
  7. शूरवीर था।
  8. पवित्र व्यक्ति था।
  9. परमात्मा का प्रिय पुत्र था।
  10. वरदानी पुरुष था।

वाल्मीकि ने खुद रावण की उपरोक्त दस विशेषताओं का वर्णन किया है और उसकी प्रशंसा कई स्थलों पर की है।

2. कमीना विभीषण अपने भाई रावण की प्रभुता से द्वेष रखता था। उसने रावण को धोखा दिया और उसकी मृत्यु का कारण बना। रावण के मरने के तुरंत बाद भ्रातृ-प्रेम से अभिभूत विभीषण उसके शव पर पछाड़ खाकर विलाप करने लगा और उसके गुणों का बखान करने लगा। विभीषण ने कहा- ‘तुम न्याय करने में कभी पीछे नहीं रहे। तुमने महान लोगों का हमेशा आदर किया।’ (उत्तरकांड, 111 सर्ग)

3. अपनी बहन सूर्पनखा के प्रति की गई भयानक दुष्टता और अपमान से कुपित होकर उसने राम से बदला लेने का निर्णय लिया। वह सीता को लंका उठा लाया। वह सीता को इसलिए नहीं लाया था कि उसको प्रेम करता था। न ही किसी की पत्नी को बहलाने-फुसलाने का उसका कोई इरादा था।

4. प्रेम प्रसंग के बारे में रावण के गुणों की हनुमान ने स्वयं प्रशंसा की है- ‘रावण के राजभवन में रह रही महिलाओं ने रावण की पत्नी बनने के लिए ख़ुद को प्रस्तुत किया। उसने किसी भी महिला को उसकी अनुमति के बिना छुआ तक नहीं और न ही उनके ख़िलाफ़ बल प्रयोग किया।’ (सुंदरकांड, 9 सर्ग)

5. रावण देवताओं और ऋषियों आखिर क्यों घृणा करता? क्योंकि, वे यज्ञ करते थे यानी पवित्र अग्नि को आहुति देने के नाम पर निर्दयतापूर्वक गूंगे पशुओं की बलि देने का जघन्य अपराध करते थे। वह किसी अन्य कारणों से उनसे घृणा नहीं करता था।

वाल्मीकि ने खुद कहा है- ‘रावण एक सज्जन पुरुष था। वह सुन्दर व उत्साही था। लेकिन, जब वह ब्राह्मणों को यज्ञ करते हुए व सोमरस पीते हुए देखता था, तब उन्हें दंड देता था।

6. वाल्मीकि ने स्वयं कहा है कि राम व लक्ष्मण द्वारा सूर्पनखा का नाक-कान काटने बाद, यानी भयानक रूप से उकसाए जाने और अपना आपा खोने की स्थिति में भी, रावण ने सीता के नाक, कान एवं स्तन काटने की बात सोची तक नहीं थी।

7. सीता को पूर्व नियोजित योजना के तहत जंगल में एकांत छोड़ दिया गया था। ताकि, रावण सीता को आसानी से उठा ले जाए। सीता भी यह उम्मीद लगाए थी कि रावण उसे उठा ले जाए और वह इसी को ध्यान में रखकर तैयारी कर रही थी। इसके पक्ष में कई अनुवादकों ने अपने मत व्यक्त किए हैं।

8. उसने अपने मंत्रियों की जो सभाएं आमंत्रित की और उसमें जो विचार विमर्श हुआ, उसी पर उसने अमल किया, वह उसके न्यायशील शासन के उदाहरण हैं।

टिप्पणी : रामायण के पात्रों के चरित्र, आचरण और योग्यता के बारे में ऊपर जो वर्णन किया गया है; वह वाल्मीकि रामायण और खुद ब्राह्मणों द्वारा तमिल में किए गए इसके अनुवाद पर आधारित है। इससे हमारे पाठक यह समझ पाएंगे कि अब तक रामायण के बारे में, जो तमिल समाज की राय थी वह पूरी तरह गलत है। संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि रामायण में सच बोलने वाले और सही सोच वाले लोगों को नीचा दिखाया गया है और उन्हें नालायक बताया गया है। जबकि बेईमान और दुराचारियों को बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और पूजनीय का दर्जा दिया गया है। इस पुस्तक की रचना का उद्देश्य इस तरह की भ्रांतियों को दूर करना और उन पर विश्वास करने वालों को यह बताना है कि साधु का कपड़ा पहन लेने से ही कोई साधु नहीं हो जाता।

बंगाली रामायण

बंगाली रामायण के ‘लंकावतार सूत्र’ में वर्णन किया गया है कि रावण द्रविड़ राजा था। उसने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। वह अरस्तू तथा प्लेटो के स्तर का दार्शनिक था। चूंकि बौद्ध साहित्य में रावण की काफ़ी प्रशंसा की गई है। इसी कारण ब्राह्मणों तथा पंडितों द्वारा रामायण में रावण की अनुचित ढंग से आलोचना तथा निंदा की गई है। कृत्तिवास ने अपनी रामायण में कहा है कि रावण प्रेम एवं सम्मानपूर्वक अपने देश में शासन करता था।

रणक्षेत्र में मरते समय रावण ने राम को अपने पास बुलाकर उसके कान में दयालुता के सिद्धांतों का वर्णन किया और कहा कि जो लड़ाई उसने (राम ने) लड़ी है वह छल-कपट से भरी थी। इस प्रकार कृत्तिवासी रामायण में हम पाते हैं कि रावण सच्चाई और शुचिता का उपदेश देता है।(पृ.-124)

रामायण काल के मादक पेय पदार्थ

(यह आलेख डॉक्टर एस.एन. व्यास ने दिल्ली से प्रकाशित कारवां नामक पत्रिका में ‘ड्रिंक्स इन रामायण’ नाम से लिखा था; जो 15-8-54 को प्रकाशित हुआ था।)

  1. किथाई सुरा : किथाई सुरा ऐसी शराब को कहा जाता है उबालकर बनाई जाती है।
  2. मैरेय : यह मसालों से तैयार होने वाली शराब है।
  3. मद्य : बेहोश तथा मतवाला बना देने वाला पेय पदार्थ।
  4. मंधा : यह साधारण मादक पेय पदार्थ था, जिसमें ज़्यादा नशा नहीं होता था। यह पिथ मंध भी कहलाता था। ज्यादा नशा नहीं होने के कारण सब इसे पीना पसंद करते थे।
  5. सुराबनम : यह किथाई सुरा से भिन्न है। किथाई सुरा कृत्रिम विधि से बनाई जाती थी, जबकि सुराबनम प्राकृतिक मादक पेय है। यह आम लोगों का पेय था और इसे निथारने की प्रक्रिया से तैयार किया जाता था। पुराणों में इस बारे में बहुत कुछ कहा गया है।
  6. सिधु : यह गुड़ के शीरे से बनाई जाती थी।
  7. सौविराक : यह निचले दर्जे का पेय था।
  8. वारुणी : उन दिनों प्रयोग होने वाले पेय पदार्थों में यह सबसे कड़ी (नशीली) थी। इसे पीते ही लोग लड़खड़ाने लगते थे।

राम और सीता का चरित्र चित्रण

(यह पेरियार ई.वी. रामास्वामी द्वारा वाल्मीकि रामायण पर दिए गए भाषणों पर आधारित है।)

जब भी हम रामायण के अनर्गल एवं घृणास्पद प्रसंगों का भंडाफोड़ करने का प्रयत्न करते हैं, समस्त ब्राह्मण संगठन तथा उनके पदाधिकारी और प्रेस हमारे विरोध में खड़े हो जाते हैं। वे तुरंत अपने अखबारों में छापते हैं कि ‘रामास्वामी नायकर ने राम को पाजी और सीता को वेश्या बताया।’ ऐसा वे मेरे भाषणों से एक या दो वाक्य इधर-उधर से उठाकर उसका संदर्भ बताए बिना और मेरे ऐसा कहने का कारण दिए बिना करते हैं। इसका क्या मतलब है? इस तरह के आधी-अधूरी खबरों के द्वारा वे लोगों को मेरे खिलाफ भड़काना चाहते हैं।

रामायण केवल कपोल कल्पना है, यह ईश्वर की कथा नहीं है। जैसा कि आज लोग इसे समझ रहे हैं। इस तथ्य को कई लोग स्वीकार करते हैं। श्री गांधी ने स्वयं कहा है- ‘मेरा राम रामायण का राम नहीं है।’

‘कलियुग कंब’ के उपनाम से जाने जाने वाले श्री टी.के. चिदंबरनाथ मुदालियर ने घोषणा की है कि रामायण कोई दैवी-कथा नहीं है; यह एक साहित्य मात्र है। बंबई की ‘भारत इतिहास समिति’ ने बहुत सारे विद्वान लोगों की मदद से और बिड़ला जैसे धनवान लोगों की आर्थिक सहायता से प्रकाशित पुस्तक ‘वैदिक एज’ (वैदिक युग) में लिखा है कि किसी भी पुराण का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है, न ही वे इस योग्य हैं कि वे लोगों को न्याय और नैतिकता की शिक्षा दे सकें। यह भी कि ये सिर्फ काल्पनिक हैं। यहां तक कि श्री सी. राजागोपालाचारी ने कहा है कि राम कोई देवता नहीं है; पर हां, वह नायक अवश्य है।

क्या राम ईश्वर का अवतार है?

बहुत सारे शोधकर्ता और विद्वान राम को ईश्वर का अवतार नहीं मानते हैं और न ही रामायण को ही इस तरह के दैवीय व्यक्ति का जीवन वृत्तांत मानते हैं। इसके अलावा, मूल रामायण के लेखक वाल्मीकि ने अपने कृति में कहीं भी राम के बारे में ऐसा कुछ नहीं लिखा है, जो राम को ईश्वर का अवतार सिद्ध करता हो।

पहली बात तो यह कि इसकी कहानी की शुरुआत जिस तरह से होती है उसे मूर्खतापूर्ण ही कहा जा सकता है। कहा गया है कि कि विष्णु ने बिरुहु ऋषि की पत्नी की हत्या कर दी थी और इसलिए उस ऋषि ने उसे श्राप दे दिया था कि वह आदमी बनकर पैदा होगा और और उसकी पत्नी उससे अलग हो जाएगी और उसके वियोग में वह रोएगा। एक कहानी तो यह है। दूसरी कहानी में यह कहा गया है कि उसी विष्णु ने जलंद्रासुर की पत्नी वृन्दा की सुंदरता से आकर्षित होकर उसके पति (जलंद्रासुर) का छद्म वेष धारण कर उसको मार दिया। उसकी पत्नी की पवित्रता को नष्ट कर दिया था। उससे संभोग के दौरान वृन्द्रा को पता चला कि उसके साथ छल हुआ है और उसने विष्णु को श्राप देते हुए कहा कि, ‘तुम्हारी पत्नी के साथ भी ऐसा ही होगा।’ यही वह श्राप था; जिसके कारण विष्णु को पृथ्वी पर पैदा होना पड़ा था।

एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि थिरूमल यानी विष्णु अपनी पत्नी जिसका नाम थिरूमगल था, के साथ दिन में यौन क्रिया में लिप्त था। उसी समय दास समुदाय का मुखिया, शिवागनाम वहां पहुंचा। थिरूमल ने उसके आने की परवाह नहीं की और अपनी पत्नी के साथ सहवास में लगा रहा। नाराज़ शिवागनम दौड़ता हुआ नंदी के पास गया और उसे बताया कि कैसे उसकी अनदेखी की गई है। इस पर नंदी ने उसको श्राप दिया- ‘थिरूमल को इस ज़मीन पर पैदा होना होगा और उसे अपनी पत्नी का वियोग झेलना होगा।’ इस तरह थिरूमल को इस धरती पर आना पड़ा।

पुनर्जन्म के ये कितने हास्यास्पद कारण हैं! अब उस परिवार के बारे में जिसमें वह पैदा हुआ। राम के पिता दशरथ की, तीन राजवंशीय स्त्रियों के अतिरिक्त साठ हजार स्त्रियां थी। यह वह ‘आदर्श’ पिता है, जिसका पुत्र बनकर राम पैदा हुआ। यह कहा जाता है कि राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न यज्ञ की पैदाइश हैं। उनकी पैदाइश यज्ञ और उसमें बलि देने से हुई। अब हम यज्ञ की विशेषताओं पर ध्यान दें। यज्ञ के लिए कई तरह के पक्षियों, जानवरों, कीड़े-मकोड़ों और जंगली जानवरों को मारा जाता था। उसके बाद उन जीव-जंतुओं को यज्ञ की इस आग में पकाया जाता था (इसे पवित्र माना जाता था)। ब्राह्मण लोग उसे खाते थे। तदनंतर दशरथ की पत्नियों को उन पुरोहितों को सौंप दिया जाता है जिन्होंने यज्ञ कराया था और इन लोगों ने उन्हें गर्भवती बनाया। रामायण के अनुवादक बंगाल निवासी पंडित मन्मथनाथ दातार लिखते हैं- ‘कौशल्या ने बड़ी खुशी-खुशी एक घोड़े के तीन टुकड़े कर डाले। उसने बिना किसी मनोव्यथा के उस मृत घोड़े के साथ संपूर्ण रात बिता दी। होता, अद्वर्यु, उक्था और अन्य पुरोहितों (रिक्विका) ने तीनों रानियों के साथ संभोग किया। और इस प्रकार दशरथ के पुत्रों की उत्पत्ति हुई।

क्या अवतार लेने का यह तरीका होना चाहिए? क्या कोई कहानी इस बेढंगे तरीके से लिखी जानी चाहिए?

दशरथ की चरित्रहीनता

मूर्खतापूर्ण उद्देश्यों एवं प्रयत्नों द्वारा राम को अयोध्या की राजगद्दी देने संबंधी दशरथ की योजनाओं एवं प्रबंधों पर यदि हम विचार करें, तो उसकी नीचता प्रकट हो जाती है। भरत को उसके नाना के यहां भेज दिया गया और लगभग दस वर्ष तक नहीं बुलाया गया। ऐसा इसलिए किया गया कि कहीं उसकी उपस्थिति राम के राज्याभिषेक में रोड़ा न बन जाए। इसीलिए राम को गद्दी पर बैठाने का प्रबंध बहुत ही जल्दबाजी में किया गया। कैकय देश के राजा को इसके लिए कोई आमंत्रण नहीं भेजा गया। भरत को इस समारोह के बारे में नहीं बताया गया। दशरथ ने राम से अकेले में कहा- ‘भरत इस समय अपने नाना के घर पर है। तुम्हारे राजा बनने का यही सबसे उपयुक्त समय है। इससे पहले कि वह लौटकर आए यह समारोह पूरा हो जाना चाहिए। कल सुबह तुम्हारा राजतिलक हो जाना है। तुम्हारे मित्र तुम्हारी रक्षा करेंगे, ताकि आज रात को कोई अप्रिय घटना न होने पाए।’

राजपरिवार के सभी सदस्य और आम लोग उस कार्यक्रम को लेकर आनंदित थे। लेकिन कैकेई को दशरथ ने अंधेरे में रखा, जबकि वह राम और भरत को बराबर चाहती थी। जब दशरथ के षड्यंत्र के बारे में उसको पता चला तो उसने हठ किया कि उसके बेटे को राजा बनाया जाए और राम को जंगल में भेजा जाए। दशरथ ने उसको अंधेरे में रखने का कोई कारण और औचित्य नहीं बताया। उलटे कैकई के पाँवों पर गिरकर उससे अपने वचन वापस लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगा। दशरथ ने उस पर समारोह के लिए किए गए सभी इंतज़ाम को बर्बाद कर देने का आरोप लगाया।

दशरथ ने राम से गुप्तरूप से बताया कि उसकी इच्छा उसको वनवास देने की नहीं थी, बल्कि उसको सिर्फ कैकेई को दिए गए वादे के प्रति सच्चा दिखना था। फिर दशरथ ने राम को उकसाया कि वह उसकी आज्ञाओं को न मानकर गद्दी पर अधिकार कर सकता है। वह चाहता था कि राज्य का सभी खजाना, सेना व वेश्याएं आदि राम के साथ वन जाएं।

कैकेई के साथ विवाह करते समय दशरथ ने कैकेई को वचन दिया था कि उससे उत्पन्न पुत्र ही अयोध्या का उत्तराधिकारी होगा। अपने इस न्यायसंगत वचन का खंडन कर उसने राम को राजगद्दी देने की योजना बना डाली। ‘ईमानदार व्यक्ति’ राम यह जानते हुए भी कि अयोध्या पर राज करने का अधिकारी भरत है; गद्दी पर बैठने के लिए तैयार हो गया। दशरथ के गुरु वशिष्ठ, मंत्रीगण सुमंत्र आदि ने भी दशरथ की इस कपटपूर्ण योजना को अपना समर्थन दे दिया। ‘राम को वनवास जाना होगा’ -अपने पिता की इस घोषणा पर लक्ष्मण ने गुस्से में कहा कि वह अपने पिता की हत्या कर देगा। कौशल्या ने भी अपने पुत्र राम से कहा कि वह अपने पिता के आदेश को न माने और अयोध्या में ही रहे।

औसत व्यक्ति से कहीं नीचे की श्रेणी के राम और सहकर्मी

रामायण में कई स्थलों पर राम और उसके सहकर्मियों को बहुत ही हीन प्रवृत्ति का मनुष्य कहा गया है।

जहां तक राम के ‘सद्गुणों’ का संबंध है, तो यह बताया जाता है कि वह कई निर्दोष व्यक्तियों का निर्मम हत्यारा था। उसने ताड़का का सिर्फ इसलिए वध किया, क्योंकि उसने उन ब्राह्मण पुरोहितों को उसके क्षेत्र में ज़बरदस्ती घुसकर यज्ञ नहीं करने दिया था। क्योंकि, उसके क्षेत्र में यज्ञ का प्रचलन ही नहीं था।

राम जब वनवास जा रहा था तब उसने अपनी मां और पत्नी से बहुत ही दुःखी होकर कहा था कि जिस गद्दी पर वह बैठने वाला था, वह उसके हाथ से निकल गई है तथा उसे जंगल जाने को कह दिया गया।

जंगल में राम ने लक्ष्मण से कहा- ‘क्या कोई ऐसा मूर्ख बाप हो सकता है, जो अपने कर्तव्यनिष्ठ और आज्ञापालक बेटे को जंगल में भेज दे?’ इस तरह गद्दी तक न पहुंच पाने की पीड़ा से ग्रस्त राम ने अपने पिता के बारे में कई निंदनीय बातें कहीं।

जंगल में उसने उस सूर्पनखा के कान और नाक काट दिए, जो उससे प्रेम करती थी। उसने जानबूझकर यह कहते हुए लड़ाई मोल ली कि वह राक्षसों को मारने के दृढ़ निश्चय के साथ ही जंगल में आया है। सुग्रीव के लिए उसने बालि को छल और कायरता पूर्वक मार डाला से मारा जबकि उसने उसका कोई नुकसान नहीं किया था। उसने विभीषण को यह जानते हुए भी खुशीपूर्वक गले लगाया कि वह दुष्ट और विश्वासघाती है और अपने भाई रावण का वध कर स्वयं लंका का राज्य हथियाने के कपटपूर्ण उद्देश्य से उसकी शरण में आया है। राम ने विभीषण को रावण के लंका का राजा रहते हुए ही वहां का राजा घोषित कर दिया था।

राम के कपटपूर्ण विचार

पूरे रामायण में राम का पाखंडी, छली, कपटी और दुष्ट चेहरा सामने आया है। वह कुछ भी कर सकता था। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए वह किसी भी स्तर तक गिरने के लिए तैयार था।

जब सीता उसके साथ जंगल जा रही थी, तब उसने यह इच्छा प्रकट की थी कि सीता अयोध्या में ही रहे और भरत की इच्छानुसार कार्य करे। क्योंकि इससे उसको काफी लाभ होगा। इस पर सीता ने ग़ुस्से में भरकर कहा- ‘तुम नपुंसक हो! मैं यह नहीं जानती थी कि मेरे पिता ने एक ऐसे व्यक्ति से मेरा विवाह शादी की है जो पुरुष के वेष में एक स्त्री (हिजड़ा) है। तुम एक ऐसे व्यक्ति की तरह बात कर रहे हो जो अपनी पत्नी को दूसरों को किराए पर देकर कमाई करता है।’

यह सुनने के बाद राम पूरी तरह पलट गया। उसने कहा- ‘मैं तो तुम्हारे मानसिक सोच की परीक्षा ले रहा था।’

इसके बाद राम सीता को जंगल ले गया। जब भी उसको जंगल में मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वह कैकेई को बुरी तरह कोसता था। वह कहता था कि उसको जो तकलीफ हो रही है उससे उसको ठंडक पहुंचती होगी। वह इस बात से कुढ़ रहा था कि वह जंगल आ गया है और उसके पिता बूढ़े हो चले हैं और भरत एक निरंकुश राजा की तरह काम करेगा। कोई उससे कुछ नहीं कहेगा।

अयोध्या का राजा बनने का बाद वह क्या करता है? वह शम्बूक की हत्या कर देता है क्योंकि वह शूद्र था और तपस्या कर रहा था।

इस तरह के अधम और ओछी मानसिकता वाले व्यक्ति को भला भगवान का अवतार कैसे कहा जा सकता है? धूर्त ब्राह्मणों ने इस तरह के बेईमान, नपुंसक, नालायक़ और चरित्रहीन व्यक्ति को भगवान बना दिया और अब हमें इस तरह के व्यक्ति की पूजा करने के लिए कहते हैं। क्या हमें इन वाहियात बातों की जांच नहीं करनी चाहिए?

सीता का जन्म

राम की अपने चारित्रिक विशेषताएं हैं। अब हम सीता की ओर अपना ध्यान मोड़ें। उसे संपूर्ण रामायण में एक साधारण स्त्री माना गया है। उसे एक कर्कश स्त्री कहा गया है, जिसमें ऐसे कोई गुण नहीं हैं, जो एक कुलीन, शालीन और पवित्र स्त्री में होते हैं। उसके माता-पिता पर संदेह है। हमें नहीं पता कि उसके माता-पिता कौन हैं?

ऐसा कहा जाता है कि राजा जनक ने हल चलाते हुए उसे जमीन के नीचे पाया। उसे कलंक से बचाने के लिए यह कहा गया कि वह लक्ष्मी से अवतरित नहीं हुई है, बल्कि वह पृथ्वी पर खुद एक बालिका के रूप में प्रकट हुई।

माता-पिता के बारे में संदेह होने के कारण, जवान हो जाने के बाद भी वह कई वर्षों तक वह कुंवारी बनी रही। जंगल में उसने यह बात बहुत दुख प्रकट करते हुए स्वयं बताई थी कि उसके जन्म के बारे में संदेह होने के कारण शादी योग्य हो जाने के बाद भी उसकी शादी काफी देरी से हुई। महालक्ष्मी का जन्म भी निराधार तथा हास्यास्पद है। इसके बाद भी पूरे रामायण में उसके चरित्र के विषय में कोई प्रशंसनीय बात नहीं है।

सीता का गुमान

जब निर्णय हुआ कि राम को जंगल जाना होगा, तब सीता ने कहा कि उसके विषय में भविष्य वक्ताओं ने पहले ही कहा था कि उसे भी वन में रहना होगा। इसको पूरा करने के लिए उसने भी पति के साथ जंगल जाने की इच्छा व्यक्त की। राम और लक्ष्मण ने वल्कल वस्त्र धारण किया; किंतु सीता ने वह भेष पसंद नहीं किया। इस पर दशरथ ने आज्ञा दी कि आवश्यक वस्त्र और आभूषण जितने चौदह वर्ष के लिए पर्याप्त हों सीता के प्रयोग के लिए उसके साथ भेज दिए जाएं। उसने अति प्रसन्नतापूर्वक उन्हें पहना और अपने आप को सुंदरतापूर्वक सुसज्जित किया। उसका पति वल्कल वस्त्र में! उसकी प्रिय और प्यारी पत्नी राजसी भेष में! इस तरह वे वन की ओर चले।

वन गमन के समय वशिष्ठ, सुमंत्र और अन्य लोगों ने सीता के जंगल जाने का विरोध किया, क्योंकि दशरथ ने तो सिर्फ राम को जंगल जाने को कहा था। सीता को नहीं। लेकिन कैकेई इस पर राजी नहीं हुई और सीता को भी अपने पति के साथ जाना पड़ा। तथाकथित आदर्श और पवित्र स्त्री सीता की गतिविधि यहीं नहीं रुकी।

राम की मां और सीता की सास ने गहनों के प्रति सीता के भारी ललक को देखते हुए उसे यह कहते हुए डांटा था- ‘अपने पति के प्यार के लायक बनो और मूर्खता नहीं करो।’ इस पर उसने अपनी सास को उत्तर दिया, ‘मुझे सब पता है। मुझे आपसे कुछ सीखने के ज़रूरत नहीं है।’ जब राम ने चाहा कि सीता भरत के साथ रहे और कहा- ‘तुम भारत के साथ रहो।’ तो उसने पलटकर जवाब दिया कि वह उस भरत के साथ नहीं रह सकती, जो उसका तिरस्कार करता है।

जंगल में जब भी उन्हें कोई तकलीफ हुई, या मुश्किलों के आने की आशंका होती, वे कैकेई को बुरी तरह कोसते थे।

सीता : इतनी कर्कशा कि कर्कशा’ भी कांप जाए

जब राम ने हिरण का पीछा किया और जब उसने मरते हुए तड़पकर पुकारा- ‘सीता! लक्ष्मण!’ तो सीता ने लक्ष्मण से अनुनय किया। उससे राम की मदद के लिए जाने को कहा गया। लक्ष्मण ने उससे कहा- ‘उसके भाई को कोई खतरा नहीं हो सकता है।’ इस पर वह ग़ुस्से से उबल पड़ी और लक्ष्मण पर आरोप लगाते हुए बोली- ‘क्या राम के मर जाने पर तुम मुझको पाना चाहते हो? क्या तुम जंगल यही सब सोचकर आए हो? मैं जानती हूं कि तुम और भरत ने मुझ पर डोरे डालने का षड्यंत्र रचा है।’

यह सुनकर लक्ष्मण सन्न रह गया और हाथ जोड़कर विनम्रता से बोला- ‘हे! मां! मैंने तुम्हारे पांव के अतिरिक्त तुमको और कहीं नहीं देखा है; कृपा कर इस तरह की बातें न कहो।’ सीता की इस पर प्रतिक्रिया कैसी थी? उसने उससे कहा- ‘इस तरह कहकर क्या तुम मुझे देखने का आनंद उठाने के लिए और समय मांगना चाहते हो?’

एक देवी के अवतार के मुंह से निकलने वाले शब्दों को देखिए, जिसे जगत-जननी या दुनिया की मां कहा जाता है! कोई कितना भी कर्कश हो, इस तरह बोलने से डरेगा। पर सीता ने यह सब कुछ कहा। इस तरह की कर्कशा को सर्वव्यापी और सर्वज्ञ व्यक्ति की पत्नी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वह इस पृथ्वी पर लोगों को नैतिकता और एक अनुकरणीय जीवन जीने का पाठ पढ़ाने आई थी। सीता के जीवन की ‘महानता’ यहीं खत्म नहीं होती! अभी बहुत कुछ बाकी है।

रावण द्वारा सीता के अंग-प्रत्यंग का सौंदर्य बखान

सीता रावण को भोजन भी परोसती थी-

सीता की तुच्छता पर कुपित और उसमें किसी भी तरह के शिष्टाचार, विनम्रता और गरिमा का अभाव देख लक्ष्मण ने उससे मुख मोड़ लिया था। तुरंत, मानो जैसे यह पूर्व नियोजित हो, दृश्य में संन्यासी के वेश में रावण का अवतरण होता है। सीता गर्मजोशी से उसका स्वागत करती है। इस पर रावण सीता की आंखों, दांतों, चेहरे तथा जंघाओं की प्रशंसा करने लगा। उसने सीता के स्तन की तुलना नारियल से की। वह सीता के शरीर की प्रशंसा करता हुआ कहने लगा- ‘मैं ज्यों-ज्यों तुम्हारे अंग-प्रत्यंगों को देखता हूं, त्यों-त्यों अपने आप को संभालने में असमर्थ हो जाता हूं। तुम्हारी सुंदरता मेरे हृदय को घायल कर रही है; जैसे नदी की लहरें उसके किनारों को खरोंच डालती हैं।’

इस प्रकार वह सीता के एक-एक अंग की प्रशंसा करता रहा। यदि सीता वास्तव में आदर्श चरित्र वाली स्त्री होती, जिसका सभी को अनुकरण करना चाहिए था तो वह उस स्थिति में वह क्या करती? क्या कोई मनुष्य हमारी स्त्रियों से इस प्रकार की बेहूदा बातें कर सकता है? और यदि वह ऐसा करता भी तो क्या वह बच जाता? किंतु सीता ने क्या किया? रावण से अपनी सुंदरता का बखान सुनकर निहाल सीता रावण को खाना परोसती रही।

सीता का अपनी उम्र के बारे में झूठ बोलना, कहना कि वह अभी किशोरी ही है

रावण को भोजन कराने के बाद सीता ने रावण को बताया कि वह जनक की बेटी और राम की पत्नी है….वगैरह वगैरह। उसने रावण को अपनी वास्तविक से कम उम्र बताई। जब वह रावण से बात कर रही थी, उस समय जंगल में आए उसे 13 साल हो चुके थे। उसने रावण को बताया कि शादी के बाद वह अयोध्या में 12 साल तक रही। पर इसके बावजूद यह कहा कि जब वह जंगल आई तो तो उस समय सिर्फ 18 साल की थी। यह कैसे हो सकता है? अपनी शादी के बाद वह 12 साल तक अयोध्या में थी। उसने खुद कहा है उसे पिता के घर शादी योग्य होने के बाद भी वर्षों तक अविवाहित रहना पड़ा। ऐसा कहा गया है रावण से सीता ने कहा कि उसकी शादी 6 साल की उम्र में हो जानी चाहिए थी। क्या वह 6 साल की उम्र में विवाह के लायक हो सकती थी? इसे देखते हुए क्या ऐसा हो सकता है कि छह वर्ष की उम्र में विवाह लायक होने के बाद काफी लम्बे समय तक अपने पिता के घर में अविवाहित ही रही? उसने इस तरह के बातें क्यों की? सिर्फ इसलिए कि उसकी ज़्यादा उम्र के बारे में पता नहीं चले। उस समय वह 45 से ऊपर की रही होगी। चूंकि उसने खुद कहा है कि शादी के योग्य होने के बाद काफी वर्षों तक वह अविवाहित ही रही, तो माना जा सकता है कि शादी के समय वह 20 साल की रही होगी। (12 साल अयोध्या में रही और 13 साल जंगल में और शादी के समय वह 20 साल की थी। तो इस तरह उसकी उम्र 45 साल रही होगी, उस समय)।

लक्ष्मण इस बात की पुष्टि करता है। वह कहता है कि सीता एक ढलती उम्र की महिला थी; जिसका पेट बाहर निकला था। यह उसने कब कहा? सूर्पनखा राम से प्यार करती थी और उससे शादी करना चाहती थी। राम ने कहा कि वह शादीशुदा है और उसकी पत्नी है और उसे लक्ष्मण के पास जाना चाहिए। जो अविवाहित है। इसी के अनुसार वह लक्ष्मण के पास गई। पर लक्ष्मण ने उससे यह कहते हुए शादी से मना कर दिया कि वह तो दास है और उसने उसको दोबारा राम के पास यह कहते हुए भेज दिया कि उसकी पत्नी उम्रदराज़ है और उसका पेट बाहर निकला हुआ है। चाहे जो हो, जब रावण सीता से मिला, वह काफी अधिक उम्र की थी। पर सवाल उठता है कि जब रावण खुश होकर उसकी सुंदरता का वर्णन कर रहा था, तब सीता को अपने उम्र के बारे में झूठ बोलने की क्या जरूरत थी?

जरा इस पर गौर कीजिए! क्या आप इसे किसी पवित्र और देवी समझी जाने वाली महिला की कहानी कह सकते हैं? तो फिर हुआ क्या? इसके बाद उसने सीता से कहा कि वह रावण है और उसे उसके साथ लंका चलने का आग्रह किया। पर उसने मना कर दिया। रावण ने एक हाथ से उसका केश पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी जांघ को और उसे अपने जांघ पर बिठा लिया और लंका ले आया। उसने शोर मचाया। कुल मिलाकर यही कहानी है।

मेरा भौतिक शरीर कहीं है, पर मन तुम्हारे साथ

यह इस कहानी की दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि रावण को दो श्राप दिए गए थे। पहला यह कि यदि वह किसी स्त्री को बिना उसकी अनुमति के छुएगा तो वह भस्म हो जाएगा। दूसरा यह कि उसके हृदय में किसी स्त्री के प्रति कुविचार उत्पन्न होते ही उसके सिर के हजार टुकड़े हो जाएंगे।

इस बात को ध्यान में रखते हुए तमिल कवि कंबन लिखते हैं कि, ‘रावण ने सीता को बिना अपने हाथों से स्पर्श किए जिस स्थान पर वह खड़ी थी, उस जमीन के साथ उसे ले गया।’ इन श्रापों को मानने को लेकर जो दूसरी कहानी कही जाती है वह यह है कि रावण ने वास्तविक सीता को अपने साथ नहीं लाया; वह उसके छद्म तस्वीर को लेकर लंका लौटा आया। इस बारे में तीसरी कहानी यह है कि वह सिर्फ सीता की छाया लेकर लौटा। पर वाल्मीकि ने जो लिखा है, उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि रावण ने उसके शरीर को छुआ और उसको अपने गोद में रखकर लंका लाया।

यदि इन श्रापों में कोई शक्ति होती, तो सीता को ले जाते हुए रावण का शरीर मिट्टी में मिल जाता। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह सुरक्षित लंका पहुंचा और उसे अपना राजमहल दिखाया। यहां भी उसके साथ कुछ भी अनर्थ नहीं हुआ। तो फिर इसका क्या मतलब है?

कलकत्ता विश्वविद्यालय के सदस्य तथा बंगाली इतिहास के अनुसंधान के प्रतिष्ठित शोधकर्ता विद्वान राय साहब दिनेशचंद्र सेन, बी.ए. इस पर यह लिखते हैं- ‘मेरा यह निष्कर्ष है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि रावण सीता को जबरदस्ती उठाकर ले गया। मेरे इस निष्कर्ष पर कट्टरपंथी लोग भड़केंगे; पर मैं अपना विचार नहीं बदलूंगा। अगर आप साहित्यिक सुंदरता से परदा हटाएंगे तो आपको इसके अंदर इसका ढांचा मात्र दिखाई देगा।’

उसके साथ लंका में रहते हुए रावण ने कहा- ‘अरे सीता! लज्जित होने की जरूरत नहीं है। हमारा मिलन दैवी इच्छा से सम्भव हुआ है। ऋषियों ने भी इसका स्वागत किया है।’ सीता ने इसके जवाब में कहा- ‘तुम जैसा चाहो मेरे शरीर का प्रयोग कर सकते हो। मैं अपने शरीर की परवाह नहीं करती।’ रावण के मारे जाने के बाद जब राम सीता के साथ लौट रहा था, तो राम ने उससे कहा- ‘तुम इतने समय तक रावण की कैद में रहीं। क्या वह तुम्हें बिना स्पर्श किए छोड़ा होगा और तुमसे संबंध नहीं बनाया होगा, ऐसा हो सकता है?’ उसने उत्तर दिया- ‘मैं क्या कर सकती थी? मैं अकेली थी और तिस पर भी एक औरत! वह ताकतवर था। कुछ भी मेरी मर्जी से नहीं हुआ। मेरा मन उस समय भी और अभी भी तुम्हारे साथ है।’ उसने उस बात का जवाब नहीं दिया, जो उससे पूछा गया था। वह इधर-उधर की बात करती रही। ‘अपने शरीर पर मेरा कोई अधिकार नहीं था; पर मेरा मन पवित्र है। इस बात का आश्वासन मैं तुमको दे सकती हूं।’ उसने इस तरह की बातों से उसके सवालों का उत्तर दिया।

अंत में घर वापस आने पर जब राम ने उसको अपनी पवित्रता की परीक्षा देने को कहा- ‘तो उसने उसकी बात नहीं मानी; वह धरती में समा गई। एक तरह से उसने आत्महत्या कर ली।

राम के अनुचर निंदनीय हैं

जहां तक सीता के पति राम की बात है, वह पाखंडी, कपटी, विश्वासघाती और बेईमान था। उसका देवर लक्ष्मण आततायी था। उसने अपने पिता को जान से मार देने की ठान ली थी। राम का भाई लक्ष्मण उपद्रवी व प्रजा-पीड़क था। जो अपने पिता की हत्या तक करने को तैयार था। वह ऐसा लंपट था, जिसे गद्दी प्राप्त करने के लिए कुछ भी करने में कोई हिचक नहीं थी। साठ हजार साल की उम्र के बाद भी उसका बाप कामुक था। उसने अपने पुत्रों को समान रूप से प्यार न करते हुए एक को प्यार किया तथा दूसरे से घृणा की। राम की मां ने अपने पति की परवाह नहीं की। सुमित्रा ने भी ऐसा ही किया। दशरथ मर गया था और कौशल्या और सुमित्रा जो उसके पास सर्वाधिक नजदीक थी, सो रही थीं। आसपास के लोगों का विलाप सुनकर उनकी नींद टूटी। यह साबित करता है कि अपने ही पति के प्रति उनका व्यवहार अच्छा नहीं था।

सुग्रीव और विभीषण जिनके साथ राम ने दोस्ती की। वे विश्वासघाती व आलसी थे। जिन्होंने गद्दी पर कब्जा करने के लिए अपने भाइयों से धोखा किया। राम की संपूर्ण मंडली ही धूर्तों की मंडली थी। लेकिन, फिर भी उन्हें देवताओं का दर्जा मिला! पर इस कथा के अनुरूप इन तथाकथित दैवी लोगों की प्रशंसा हो रही है और यह कहा जा रहा है कि वे बहुत ही ईमानदार और सभ्य लोग थे।

रावण की महानता

रावण की वीरता की प्रशंसा हर जगह की गई है। हनुमान ने खुद उसके महल की सुंदरता और भव्यता का वर्णन किया है। अपने ज़नाना खाने में सर्वाधिक सुंदर महिलाओं के बीच सो रहे रावण को आकाशगंगा का सर्वाधिक चमकता हुआ तारा बताया। उसने कहा है कि ये सभी महिलाएं उसके रूप, बुद्धि और वीरता से आकर्षित होकर स्वेच्छा से उसके पास आई थीं और इनमें से किसी को भी जबरदस्ती वहां नहीं लाया गया था। उसको (हनुमान को) अपने मन में यह कहते हुए भी बताया गया है कि अगर सीता को शादी से पहले लंका लाया जाता तो बेहतर होता।

वाल्मीकि ने कई स्थलों पर रावण की प्रशंसा के पुल बांधे हैं। उसने लिखा है कि वह एक बहुत बड़ा विद्वान, घोर तपस्या करने वाला, वेदों को जानने वाला, अपनी प्रजा का ख़याल रखने वाला, बहादुर सिपाही, बहुत ही शक्तिशाली व हृष्ट-पुष्ट, निष्कपट भक्त, ईश्वर का कृपापात्र और कई तरह का वरदान प्राप्त करने वाला व्यक्ति था। रावण को कहीं भी राम की तरह कमतर ( षड्यंत्रकारी और नमकहराम तथा नपुंसक जैसे) शब्दों से नहीं नवाजा गया है। जिस प्रकार राम ने सूर्पनखा का अंग-भंग कर उसका रूप बिगाड़ दिया था, उसी प्रकार का व्यवहार रावण भी सीता के साथ कर सकता था। पर, बदले की भावना से उसने ऐसा करने की बात सोची भी नहीं। उसने सीता को अशोक वाटिका में अपनी भतीजी ( भाई की बेटी) के संरक्षण में रखा। वह बहुत भला और सज्जन पुरुष था। वाल्मीकि ने कहा है कि जहां कहीं रावण ब्राह्मणों को यज्ञ करते हुए या सोमरस पीते हुए देखता था; वह उनसे घृणा करता था।

इस तरह के सज्जन रावण और उसके लोगों को सिर्फ इसलिए क्रूर राक्षस कहा गया, क्योंकि वे ब्राह्मणों के दुश्मन थे।

रामायण जैसा वाल्मीकि ने लिखा है

रामायण की कथा कदापि सत्य नहीं हो सकती है। शंकराचार्यों, बुद्धिमानों और धर्माधिकारियों ने यही विचार व्यक्त किए हैं। यही विचार कई धर्म धुरंधरों तथा बुद्धिमानों द्वारा व्यक्त किए गए हैं।

दूसरा वाल्मीकि ने स्वयं कहा है कि राम न तो ईश्वर था न उसमें कोई स्वर्गीय शक्ति थी।

ऐसी स्थिति में भी हिंदू रामायण को पवित्र कथा मानते हैं; तथा उसमें वर्णित पात्रों को महत्वपूर्ण समझकर उनका सम्मान करते हैं।

ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए सम्भव हुआ, क्योंकि ब्राह्मणों ने इसके पक्ष में काफी अधिक प्रचार किया। जबकि गैर-ब्राह्मणों में बुद्धि और आत्मसम्मान की कमी थी। कुछ भी हो, हमें रामायण में निम्नांकित बातों का पुनर्निरीक्षण करना चाहिए।

  1. क्या राम दैवी शक्ति है या वह साधारण मनुष्यों से ऊपर है?
  2. क्या राम ईमानदार है?
  3. क्या वह वीर योद्धा है?
  4. क्या राम बुद्धिमान है? क्या वह जातीय भेदभावों से ऊपर है?
  5. क्या सीता सच्चरित्र है?
  6. क्या सीता में साधारण स्त्रियों के साधारणतम गुण मौजूद हैं? क्या रावण दुष्ट है?
  7. क्या रावण सीता को हर ले गया?
  8. क्या रावण सीता को बहका ले गया और उसका सतीत्व भंग किया?

भागवत में विष्णु के जिन अवतारों का वैष्णवों के लिए वर्णन किया गया है उसमें राम का वर्णन ‘राक्षस’ रावण के वध के लिए आया है।

विष्णु के अवतार

उसके नौ अवतार हैं : 1. मत्स्यावतार 2. कच्छप अवतार 3. कूर्मावतार 4. गंगावतार 5. वामनवतार 6. परशुराम अवतार 7. राम अवतार 8. कृष्ण अवतार 9. बलराम अवतार।

कहा जाता है कि ये सभी नौ अवतारों का उद्देश्य ब्राह्मणों की ओर से उनके दुश्मन द्रविड़ राजाओं (राक्षसों) को मारना है। इन नौ अवतारों में से ब्राह्मणों ने राम के अवतार को अपनी रामायण की कल्पित कथा का आधार बनाया है। रामायण की यह कथा नम्बियांदर नंबी तथा दूसरे शैव संतों पर आधारित पेरियापुराणम के अनुरूप ही है।

शैवों ने ईश्वर भक्ति के प्रेरित होकर ‘लीलामृतम’ के अनुरूप पेरियापुराणम की रचना की। जिसमें वैष्णव संतों की कहानी है, जो कि उस समय मौजूद थे।

किंतु, रामायण की कथा शैव संतों के कंड पुराण से ली गई है। दोनों में सिर्फ नामों का ही अंतर है। रामायण की रचना द्रविड़ों (राक्षसों) के खिलाफ ज्यादा घृणा पैदा करने के लिए की गई है। इतनी घृणा कंड पुराण में प्रदर्शित नहीं की गई है।

रामायण से काफी पहले कंड पुराण की रचना हुई और इसलिए इसे एक ही व्यक्ति ने लिखा है।

चूंकि, रामायण बहुत बाद में अलग-अलग समय में अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा लिखा गया इसलिए उसकी कहानी में ही कई जगह विरोधाभास हैं। राम के प्रमुख पात्र राम और सीता के बारे में जो वर्णन किया गया है; उसके हिसाब से उन्हें बहुत ही नीच चरित्र का दिखाया गया है।

राम के जीवन का इतिहास पांच वर्ष के बालक के रूप में ताड़का के वध से शुरू होता है और उसकी शादी छह साल की उम्र में हो जाती है।

उपरोक्त दो घटनाओं के कारण राम को सामने लाने का कोई कारण नहीं था। जब राम 18 वर्ष का था, तब उसके पिता दशरथ ने उसे अयोध्या का राजा बनाने के लिए उसके साथ मिलकर षड्यंत्र किया। जबकि, दोनों भली-भांति जानते थे कि अयोध्या पर सिर्फ कैकेई और उसके बेटे भरत का अधिकार है; जो कि उसके उत्तराधिकारी थे। क्योंकि, दशरथ ने कैकेई को इसके बारे में वचन दिया था।

हमें यहां दशरथ के षड्यंत्र से कोई लेना देना नहीं है। क्योंकि, दशरथ न तो उत्तम व्यक्तित्वयुक्त था और न ही कोई सैद्धांतिक पुरुष। यहां हमारा सिर्फ इस बात से संबंध है कि राम को चारित्रिक दोषों से सर्वथा मुक्त माना गया है; और ऐसे प्रस्तुत किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति उसे एक सत्यवादी और वीर योद्धा माने। लेकिन, राम को सत्यवादी और वीर योद्धा क्यों माना जाए? धर्माधिकारियों, राम और राम भक्तों सहित अब तक किसी भी व्यक्ति ने इस समस्या का संतोषपूर्ण समाधान नहीं किया है।

यहां तक कि श्री सी. राजागोपालाचार्य ने अंग्रेजी पुस्तक ‘एम्परर्ज सन’ नामक पुस्तक में उपरोक्त दोषों का संतोषपूर्ण स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

अब हम सीता की ओर रुख करें। सीता का जन्म ही प्रश्न के घेरे में है। उसके माता-पिता का पता नहीं है; और वह जंगल में पाई गई। इसके बारे में भी कई तरह की बातें प्रचलित हैं।

वाल्मीकि के अनुसार सीता ने स्वयं स्वीकार किया है- ‘जैसे ही मैं पैदा हुई, मुझे जंगल में फेंक दिया गया। राजा जनक को मैं मिली। वही मुझे उठाकर लाए और मेरा लालन-पालन किया। जब मैं रजस्वला हुई, तब कोई भी राजकुमार मुझसे शादी करने को इसलिए राजr नहीं हो रहा था, क्योंकि मेरे जन्म के साथ यह कलंक जुड़ा हुआ था।’ जब जनक को सीता के लिए उपयुक्त वर नहीं मिला, तो उसने अपने मित्र विश्वामित्र को सीता के लिए उपयुक्त वर की तलाश में मदद करने को कहा। विश्वामित्र इस पांच साल के बालक राम को जनक के पास लेकर आया और उसकी सीता से शादी करा दी। जो उस समय कम-से-कम 25 साल की थी और उसने इस बेमेल विवाह के बारे में अपना मुंह तक नहीं खोला।

एक अन्य रामायण (वाल्मीकि रामायण नहीं) में यह कहा गया है कि राजा जनक की पत्नी विवाह से पहले विवाह स्थल पर आईं और वहां मौजूद लोगों से मुखातिब होकर ज़ोर से चिल्लाई- ‘महानुभावों! आज आप यहां जमा हुए हैं। आप सब लोग इस अन्यायपूर्ण समारोह को अपने सामने होते हुए कैसे देख रहे हैं।’ दुल्हन के अयोध्या पहुंचने पर भरत ने सीता को नापसंद किया। वाल्मीकि के अनुसार, यह बात खुद सीता ने बताई थी।

जब राम ने जंगल जाने से पहले सीता को अयोध्या में ही रहने को और भरत को खुश रखने को कहा, तो सीता ने बहुत असम्मानजनक और अपमानजनक तरीक़े से कहा- ‘मैं क्या करूँ? भरत मुझे पसंद नहीं करता। मैं उसके साथ कैसे रह सकती हूं।’ सीता के इन विचारों के अलावा वाल्मीकि ने भी सीता की ओर से जो कहा है वह इस प्रकार से है- ‘हे राम! तुम तुम वीर योद्धा नहीं। तुम नपुंसक हो; तुम चाहते हो कि मैं भरत के साथ व्यभिचार करूंं जैसे कि मैं कोई वेश्या हूं। ताकि, तुम अयोध्या का राजा बनने का लाभ उठा सको।’ उस समय राम सत्रह वर्ष का था।

वाल्मीकि ने कौशल्या के मुंह से जो वर्णन किया है वह इस तरह से है :- मतलब जब राम जंगल जाने से पहले अपनी मां को कौशल्या से आज्ञा लेने गया। तब कौशल्या ने कहा- ‘तुम्हारे पिता और मेरे पति दशरथ और कैकेई ने मेरे साथ बहुत ही अपमानजनक व्यवहार किया है। मैंने इन 17 साल में बहुत बर्दाश्त किया है। पर, तुम्हारे लिए मैं अपनी जान भी दे सकती हूं।’ इससे हमें यह पता चलता है कि उस समय राम 17 साल का था।

जब विश्वामित्र ने दशरथ से अपने बड़े बेटे राम को ताड़का का वध करने के लिए उसके साथ जंगलों में भेजने का निवेदन किया, तो दशरथ ने उसे यह उत्तर दिया- ‘हे ऋषि! मेरी गोद में खेलता हुआ राम अभी शिशु है। अभी उसका मुंडन-संस्कार भी नहीं हुआ। इतने छोटे शिशु को मैं युद्ध के लिए कैसे भेज दूं?’ इससे स्पष्ट है कि विवाह के समय राम केवल पांच वर्ष का था।

इस तरह यह स्पष्ट है कि सीता, जो उस समय पूरी तरह जवान थी। राम जैसे छोटे बच्चे के साथ शादी करने को राजी हो गई। जो उस समय सिर्फ पांच साल का ही था। इसीलिए वह अपने पति राम से हमेशा ही असम्मानजनक व्यवहार करती थी।

फिर, वनवास जाने के पहले जब राम ने सीता से बहुमूल्य वस्त्र तथा आभूषण त्यागने एवं तपस्वी के समान वल्कल चीर धारण करने को कहा तब उसने अस्वीकार कर दिया। तब उसकी सास कैकेई ने राम को तापस भेष में देखकर अपनी बहू सीता से पहले से पहने हुए बहुमूल्य वस्त्र तथा आभूषणों के ऊपर तापसोचित वस्त्र पहन लेने को कहा।

जब राम ने शिकार करने के लिए कपटी हिरण का पीछा किया और उसे मार डाला। मरने से पहले हिरण ‘हे लक्ष्मण! हे लक्ष्मण!’ चिल्लाया। तब सीता ने लक्ष्मण को संबोधित करते हुए कहा- ‘मुझे ऐसा लगता है कि राम पर कोई खतरा उत्पन्न हो गया है। शीघ्र जाओ और देखो क्या बात है।’ इस पर लक्ष्मण ने उसे उत्तर दिया- ‘हे माता! यह उसी कपटी हिरण की आवाज है। चिंता न करो; राम को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता। वह बहुत शक्तिशाली है। उसने हिरन को मार डाला होगा और वही हिरण इस प्रकार चिल्ला रहा है। तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है।’ लक्ष्मण ने अपनी शक्ति तथा योग्यतानुसार सीता को समझाया। किंतु वह संतुष्ट नहीं हुई। इसके बाद सीता ने कहा- ‘अरे पापी! क्या तू समझता है कि राम की मृत्यु के पश्चात तू मेरे साथ आनंद ले सकता है? क्या भरत ने इसी उद्देश्य से तुझे मेरे साथ वन में भेजा है कि भरत और तू स्वयं मेरे साथ भोग- विलास कर सको?’ यह सुनकर लक्ष्मण शीघ्र ही राम की सहायता करने चला गया।

जब हम सीता के बारे में कुछ बताते हैं तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि ऐसा हम सीता का अपमान करने की दृष्टि से करते हैं। पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए। ऐसा मैं जोर देकर कहता हूं।

हम सीता के वजूद को कभी स्वीकार नहीं करते हैं, विशेषकर जैसा रामायण में बताया गया है। हम सीता के अस्तित्व को काल्पनिक मानते हैं। यही नहीं, यह कल्पना भी मूर्खता पर आधारित है। रामायण लेखक ने सीता को कहीं भी एक पवित्र स्त्री, वीरांगना अथवा संवेदनशील स्त्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। न ही कम से कम ऐसी स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया है जो खुद के चरित्र को बचाने की कोशिश कर रही हो। ऐसा कुछ बताने की जहमत लेखन ने नहीं उठाई है। उलटे जानबूझकर यह बताया गया है कि वह चरित्रहीन है। इसके अलावा यह कि रामायण न केवल एक कपोल कल्पना है, बल्कि यह काल्पनिकता और असम्भव परिस्थितियों पर आधारित है।

रामायण में सीता का वर्णन साधारण स्त्री के रूप में किया गया है। रामायण के अनुसार, जन्म के समय एक शिशु के रूप में जनक को जंगल में मिलने से लेकर, पृथ्वी के गर्भ में समाकर आत्महत्या करने तक हम उसमें सामान्य गुण ही पाते हैं। हमें उसमें किसी भी तरह के देवत्व या विशिष्ट मानुषी का दर्शन नहीं होता है। कुल मिलाकर रामायण की सीता एक साधारण स्त्री है। वह जलती आग में प्रविष्ट हो गई। यह सुनकर लगता है कि वह असाधारण स्त्री थी। पर हमें इसमें कोई आश्चर्य नहीं लगता; क्योंकि, हम आज भी वेश्याओं को मंदिर में होने वाले समारोहों में आग पर चलते हुए देखते हैं। न केवल वेश्याएं ऐसा करती हैं, बल्कि धूर्त और फरेबी लोग आग पर चलने का काम आज भी करते हैं।

हम यदि वाल्मीकि रामायण का सतर्कता-पूर्वक अध्ययन करें, तो हम उस समय सीता को तीन मास की गर्भवती पाते हैं। अब हम इसकी व्याख्या करेंगे कि वह तीन मास की गर्भवती कैसे थी? सीता की अग्नि-परीक्षा का कार्य समाप्त होते ही, राम सीता को अयोध्या ले गया। एक मास तक अयोध्या पर राज्य कर चुकने के पश्चात एक दिन राम और सीता दोनों प्रेमी-प्रेमिका की भांति एक पुष्प वाटिका में बैठे हुए आनंद से समय बिता रहे थे कि अचानक राम की नजर सीता के उभरे हुए पेट पर पड़ी। राम ने तुरंत सीता से पूछा कि, ‘तुम्हारा पेट इतना बड़ा क्यों हैं?’ इस पर सीता ने कहा कि, ‘उसके पेट में चार-पांच मास का गर्भ है।’

यह सुनकर चिंतित और दुःखी राम तुरंत से उठकर चला गया और उसे जंगल में छोड़ देने पर विचार करने लगा। जला-बुझा राम वहां से उठकर अपने महल के सामने के आंगन में जाकर बैठ गया। महल के बहुरूपियों ने राम को इस अवस्था में देखकर कुछ मजाकिया बातें कहकर राम की मनोदशा को बदलने की कोशिश की। पर राम का मन वैसा ही उदास बना रहा। उसके भाइयों को पता चला तो उन्होंने राम से उसकी उदासी के बारे में पूछना शुरू कर दिया। बदले में राम ने अपने भाइयों से पूछा कि इस राज्य की प्रजा सीता के बारे में क्या सोचती है। उसके भाइयों ने बताया कि लोग मानते हैं कि सीता के साथ रहकर राम अपमानित हो रहा है। राम ने तुरंत अपने भाई लक्ष्मण को बुलाया और उसे सीता को अगली सुबह जंगल में छोड़ आने को कहा।

आदेश का पालन करते हुए लक्ष्मण सीता को जंगल में छोड़ आया और अपने देश में निंदा के डर से सीता को जंगल में छोड़ने के लिए राम की आलोचना की। पर, सीता ने कहा कि उसका राम की आलोचना करना उचित नहीं है। क्योंकि, वह पांच महीने का गर्भ लेकर जी रही है और यह सब उसके कर्मों का फल है। उसने लक्ष्मण को अपना पेट भी दिखाया।

इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि जो महिलाएं आग पर चलती हैं, वे पवित्र और दैवी शक्तियों से लैस होती हैं। इस तरह सीता महज एक साधारण स्त्री है। इसलिए सीता जैसी कोई साधारण स्त्री अगर वह स्वस्थ है, तो 100 वर्षों या 10-20 साल अधिक जिंदा रह सकती है। पर हम रामायण में पढ़ते हैं कि सीता हजारों वर्षों तक जिंदा रही। अब हम यह कल्पना करें कि राम 10 हजार वर्ष तक जिंदा रहा। पर हम इस बात को नहीं समझ रहे कि कैसे इस तरह की सीता राम के साथ इतने वर्षों तक जिंदा रह सकती है। सीता को इतने लम्बे समय तक जिंदा रहने का वरदान किसने दिया था? रामायण में हमें इन प्रश्नों का कोई उपयुक्त उत्तर नहीं मिलता है।

इन बातों को छोड़कर अब हम रामायण के उस अंश पर विचार करेंगे, जो सीता व रावण से संबंधित है। वहां हम देखते हैं कि सीता में पवित्र स्त्री का कोई गुण नहीं था।

यदि हम रावण पर सीता को बहलाने-फुसलाने के आरोप की जांच का काम एक सीआईडी अधिकारी को सौंप दें और उससे कहें कि वह सच का पता लगाए और इस जांच की रिपोर्ट एक निष्पक्ष न्यायाधीश के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत किया जाए और यदि राम को अभियोगी तथा रावण को अभियुक्त समझकर राम के मामले की सुनवाई की जाए तो भी हमें पूर्ण विश्वास है कि न्यायाधीश रावण के पक्ष में ही अपना निर्णय देगा और कहेगा कि रावण निर्दोष तथा निष्कलंक है और उसको अनावश्यक तरीके से बदनाम किया गया।

फिर, अगर कोई शिकारी किसी शेर को प्रलोभन देकर उसे फंसाने के उद्देश्य से एक मोटे-ताजे हिरण को किसी पिंजड़े में बंद करके पिंजड़े को जंगल में रख दे और यदि शेर पिंजड़े के अंदर घुस आए और पिंजड़ा बंद हो जाए, तो देखने में यही लगेगा कि शेर स्वेच्छापूर्वक पिंजड़े में घुसा। खुफिया विभाग सीआईडी) की उपरोक्त रिपोर्ट ऐसी ही होगी।

महाकाव्यों पर नेहरू की राय

(15-12-1954 को ‘द मेल’ में छपी राय का अंश )

प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु में रामायण के बारे में की जा रही पैरोडी के बारे में कहा कि दक्षिण में चल रहे इस आंदोलन को इस अर्थ में देखा जाना चाहिए कि उन्हें इस बात का डर है कि उत्तर के लोग उन पर अत्याचार कर सकते हैं। उनका यह डर मात्र भाषा के क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी व्याप्त है। उनकी इस भावना को ठीक से समझने की जरूरत है। हिंदी के वे समर्थक जिन्होंने इसकी अनदेखी की है, वे कहीं से भी हिंदी का भला नहीं कर रहे हैं और न कुल मिलाकर वे देश का ही भला कर रहे हैं।

नेहरू ने कहा- ‘अगर हम कोई गलत कदम उठाते हैं, तो हमारी मुश्किलें बढ़ेंगी। भावनाओं का बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है और जब उत्पीड़न के भय की भावना को भड़काया जाता है, तो इसके परिणाम बहुत ही बुरे होते हैं।’

नेहरू ने तमिलनाडु में रामायण की नाटकीय पैरोडी की चर्चा की और कहा- ‘हमें यह पता करना चाहिए कि इस सबके पीछे क्या कारण है। उदाहरण के लिए रामायण की यह पैरोडी हमें बताना चाहती है कि उत्तर के लोगों ने उन्हें सिर्फ वर्तमान में ही उत्पीड़ित नहीं किया है, बल्कि हज़ारों सालों से वे ऐसा करते आ रहे हैं; और यह कि अगर उन्हें यह मौक़ा आज भी मिले तो वे पुन: ऐसा करने से बाज़ नहीं आएंगे।’

महाभारत की कहानी

उड़ीसा में उन्होंने जो देखा, उससे उन्हें दुःख पहुंचा।

नेहरू ने आगे कहा- ‘दो दिन पहले मैं उड़ीसा में था। वहां पर मैंने एकलव्य के बारे में नाटक देखा। यह महाभारत की कहानी है : एक गरीब किसान ने क्षत्रियों के महान शिक्षक द्रोण से तीर-धनुष चलाने की विद्या सीखने में उनकी मदद चाही। द्रोण ने उसे यह कहते हुए सिखाने से मना कर दिया कि वह क्षत्रिय नहीं है। पर, किसान के इस लड़के ने द्रोण की मूर्ति बनाई, ताकि वे उसके लिए शिक्षक के रूप में मौजूद रहें और फिर उसने तीर-धनुष चलाने का अभ्यास करने लगा। और वह बहुत ही बड़ा तीरंदाज बना। जब द्रोण ने यह सुना कि किसान का यह बेटा उनके प्रिय शिष्य अर्जुन से भी बड़ा धनुर्धारी बन गया है तो उन्होंने इस लड़के से अपनी गुरुदक्षिणा की मांग की। क्योंकि, उसने उनकी मूर्ति को सामने रखकर तीर-धनुष चलाने का अभ्यास किया था और दक्षिणा के रूप में उन्होंने उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांगा। एकलव्य की कहानी महाभारत की बहुत ही हृदयविदारक कहानी है।

इस कहानी के बारे में अभी तक मैंने ज्यादा सोचा नहीं था। पर उस दिन के बाद से इससे मुझे काफी दुःख पहुंचा है। मुझे बताया गया कि उड़ीसा के ये आदिवासी इस बात को उदाहरण बनाकर यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि विगत में उनके साथ किस तरह का अन्याय हुआ है। हमें इस तरह की प्रतिक्रियाओं के प्रति सचेत होना चाहिए। यह तथ्य है कि पहले जो इतिहास लिखा गया वह एकपक्षीय है। इसलिए आज लोग इन घटनाओं के बारे में अपनी बात बताने के लिए कहानी लिख रहे हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि दूसरों को ख़तरे में डाल रहे हैं। मैं जब इस घटना के बारे में सोचता हूं, तो मुझे इस बात पर काफी गुस्सा आता है कि दूसरों को प्रतिस्पर्धा से रोकने के लिए लोगों ने किस तरह का व्यवहार किया।’

 तिहासकारों के विचार

‘आम तौर माना जाता है कि विष्णु एक ईश्वरी नायक और एक महान क्षत्रिय शिक्षक था। जो आर्य नस्ल को रास्ता दिखाने और उन्हें विजय दिलाने के लिए समय-समय पर अवतार लेता था।’

—हैवेल, ‘आर्यन रूल इन इंडिया’, (पृष्ठ 32)

‘जब गोरे-चिट्टे आर्यों ने उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से हिंदू-कुश पर्वत को पार कर धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू किया। उससे चार हजार साल से अधिक समय पहले से द्रविड़ लोग उत्तर और दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थायी तौर पर बस चुके थे। आर्यों ने अफगानिस्तान होते हुए भारत में प्रवेश किया। स्वाभाविक तौर पर द्रविड़ों ने पूरी ताक़त से इन नए घुसपैठियों का विरोध किया और इस वजह से उनके बीच तीखा और लंबा संघर्ष चला। यह सिर्फ दो राष्ट्रीयताओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो तरह की सभ्यताओं के बीच का संघर्ष था।

द्रविड़ों को यह लड़ाई अपना अस्तित्व बचाने के लिए लड़नी पड़ी और ऋग्वेद में ऐसे कई पद/ऋचाएं हैं, जिनमें इस युद्ध की भयानकता का जिक्र हुआ है।’

—रमेश चंद्र मजूमदार, एमए, पीएचडी, ‘आउटलाइन ऑफ एनसिएंट इंडियन हिस्ट्री एंड सिविलाइज़ेशन’, (पृष्ठ-21 और 22)

‘रामायण और महाभारत में इंडो-आर्यन जमाने की बातों, उनकी जीतों और गृहयुद्धों के बारे में लिखा गया है। मुझे नहीं लगता है कि मैंने कभी इन कहानियों को सच समझकर इनको कोई महत्व दिया और यहां तक कि मैंने इनमें वर्णित जादुई और अलौकिक बातों की आलोचना भी की है। पर मेरे लिए इनकी बातें अरबियन नाइट्स और पंचतंत्र की काल्पनिक कहानियों जितनी ही सच्ची थीं।’

श्री जवाहरलाल नेहरू, ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, (पृष्ठ 75 और 76)

‘भारत में आर्यों के आगमन से नई तरह की समस्याएं पैदा हुईं— नस्लीय और राजनीतिक। पराजित नस्ल द्रविड़ों की सभ्यता का एक लंबा इतिहास रहा है, पर इस बात में कोई संदेह नहीं कि आर्य ख़ुद को इनसे ज़्यादा श्रेष्ठ मानते थे और दोनों के बीच का फासला काफी बड़ा था।’

—श्री जवाहरलाल नेहरू, ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’, (पृष्ठ 62)

‘रामायण की कहानी दक्षिण में आर्यों के प्रभुत्व के विस्तार की कहानी है।’

—श्री जवाहरलाल नेहरू, ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’, (पृष्ठ 82)

‘विरोधाभास देखिए कि आर्यों को उन जातियों की भाषा सीखनी पड़ी और कम से कम उनकी सभ्यता के एक हिस्से को अपनाना पड़ा।’

—श्री आर.जी. भंडारकर, संकलित रचनाएं (भाग III, पृष्ठ-10)

‘इंद्र और अन्य देवताओं के अनुयायियों को देव कहा जाता था और इंद्र की पूजा और बलियों का विरोध करने वालों को असुर माना जाता था। इस प्रकार देव और असुर संज्ञाए एक दूसरे के लिए अपमानजनक हो गईं।’

—ए.सी. दास, एम.ए., बी.एल., ‘ऋग्वेदिक इंडिया’, पृष्ठ 151

‘रामायण मदिरा पीने वाले सुरों और मदिरा नहीं पीने वाले असुरों में अंतर करता है।’

‘द हिस्टॉरीयंज़ हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड’ (भाग II, पृष्ठ 521)

 

(अंग्रेजी संस्करण ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद : अशोक, कॉपी संपादन :  सिद्धार्थ/ओमप्रकाश कश्यप/नवल)


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