h n

पेरियार की सच्ची रामायण

पेरियार रामायण को धार्मिक किताब नहीं मानते थे। उनका कहना था कि यह एक राजनीतिक पुस्तक है; जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा। यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का भी उपकरण है। प्रस्तुत है पेरियार की सच्ची रामायण

(ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ (17 सितंबर, 1879—24 दिसंबर, 1973) हमारे समय के महानतम चिंतकों और विचारकों में से एक हैं। वे तर्कवादी हैं। मानवीय विवेक पर भरोसा करते हैं। किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता उन्हें स्वीकार नहीं है। वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को वे चुनौती देते हैं। उनकी विशिष्ट तर्कपद्धति, तेवर और अभिव्यक्ति शैली के चलते जून 1970 में यूनेस्को ने उन्हें ‘आधुनिक युग का मसीहा’, ‘दक्षिण-पूर्वी एशिया का सुकरात’, ‘समाज सुधारवादी आंदोलनों का पितामह’ तथा ‘अज्ञानता, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और निरर्थक रीति-रिवाजों का कट्टर दुश्मन’ स्वीकार किया है। उन्हें वाल्तेयर की श्रेणी का दार्शनिक, चिंतक, लेखक और वक्ता माना जाता।‘सच्ची रामायण’ उनकी एक चर्चित कृति है।

पेरियार रामायण को धार्मिक किताब नहीं मानते थे। उनका कहना था कि यह एक राजनीतिक पुस्तक है; जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा। यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का भी उपकरण है। रामायण की मूल अंतर्वस्तु को उजागर करने के लिए पेरियार ने ‘वाल्मीकि रामायण’ के ब्राह्मणों द्वारा किए गए अनुवादों सहित; अन्य राम कथाओं, जैसे- ‘कंब रामायण’, ‘तुलसीदास की रामायण’ (रामचरित मानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों तथा उनसे संबंधित ग्रंथों का सम्यक अध्ययन किया था। इसके साथ ही उन्होंने रामायण के बारे में विद्वान अध्येताओं और इतिहासकारों की टिप्पणियों का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने करीब चालीस वर्षों तक अध्ययन करने के बाद तमिल भाषा में लिखी पुस्तक ‘रामायण पादीरंगल’ में उसका निचोड़ प्रस्तुत किया। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसका जिक्र पेरियार की पत्रिका ‘कुदी अरासू’ (गणतंत्र) के 16 दिसंबर 1944 के अंक में किया गया है। इसका अंग्रेजी अनुवाद द्रविड़ कषगम पब्लिकेशन्स ने ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ नाम से 1959 में प्रकाशित किया गया। इसका हिंदी अनुवाद 1968 में ‘सच्ची रामायण’ नाम से किया गया। हिंदी अनुवाद के प्रकाशक ललई सिंह यादव और अनुवादक राम आधार थे। ललई सिंह यादव उत्तर प्रदेश-बिहार के प्रसिद्ध मानवतावादी संगठन ‘अर्जक संघ’ से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे।

9 दिसंबर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी के साथ पुस्तक की सभी प्रतियों को जब्त कर लिया गया। उत्तर भारत के पेरियार नाम से चर्चित हुए प्रकाशक ललई सिंह यादव ने जब्ती के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुकदमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट में इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई तीन जजों की खंडपीठ ने की। खंडपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर; तथा दो अन्य न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली थे। 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया। फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

ललई सिंह यादव ने हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ को प्रकाशित कर एक ऐतिहासिक कार्य को अंजाम दिया था। हिंदी के पाठक इस संदर्भ में उनके ऋणी हैं। समय विशेष में इस हिंदी अनुवाद की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकार करते हुए हमें कहना पड़ रहा है कि इस अनुवाद में अनेक सीमाएं और त्रुटियां रही हैं। हमने अपनी इस किताब के पहले संस्करण में राम आधार जी द्वारा अनुवादित और ललई सिंह द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ को समाहित किया था। लेकिन, निरंतर यह लगता रहा कि ‘सच्ची रामायण’ का एक शुद्ध, सटीक और प्रवाहमय अनुवाद नए सिरे से कराना चाहिए। इस संस्करण में सच्ची रामायण का एक नया अनुवाद समाहित किया गया है। उम्मीद है कि नया अनुवाद पाठकों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा। प्रस्तुत है पेरियार तमिल कृति ‘रामायण पादीरंगल’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ का अविकल हिंदी अनुवाद )


प्रस्तावना

रामायण किसी ऐतिहासिक तथ्य पर आधारित नहीं है। यह एक कल्पना है। रामायण के अनुसार, राम न तो तमिल था और न ही तमिलनाडु का रहने वाला था। वह उत्तर भारतीय था। रावण लंका यानी दक्षिण यानी तमिलनाडु के राजा थे; जिनकी हत्या राम ने की। राम में तमिल-सभ्यता (कुरल संस्कृति) का लेश मात्र भी नहीं है। उसकी पत्नी सीता भी उत्तर भारतीय चरित्र की है। तमिल विशेषताओं से रहित है। वह उत्तरी भारत की रहने वाली थी। रामायण में तमिलनाडु के पुरुषों और महिलाओं को बंदर और राक्षस कहकर उनका उपहास किया गया है।

रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उसमें उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया। एक आर्य-पुत्र के बीमारी के कारण मर जाने की कीमत रामायण में एक शूद्र को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। वे सारे लोग, जो इस युद्ध में मारे गए; वे तमिल थे। जिन्हें राक्षस कहा गया।

रावण राम की पत्नी सीता को हर ले गया। क्योंकि, राम ने उसकी बहन ‘सूर्पनखा’ का अंग-भंग किया व उसका रूप बिगाड़ दिया था। रावण के इस काम के कारण लंका क्यों जलाई गई? लंका निवासी क्यों मारे गए? रामायण की कथा का उद्देश्य तमिलों को नीचा दिखाना है। तमिलनाडु में इस कथा के प्रति सम्मान जताना तमिल समुदाय और देश के आत्मसम्मान के लिए खतरनाक और अपमानजनक है। राम या सीता के चरित्र में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे दैवीय कहा जाए।

जिस तरह तथाकथित आजादी(1947) मिलने के बाद गोरे लोगों की मूर्तियों को हटा दिया गया और उनके नामों पर रखे गए स्थानों के नामों को मिटा दिया गया तथा उनकी जगह भारतीय नाम रख दिए गए। उसी तरह आर्य देवताओं और उनकी महत्ता बताने वाली हर बात को मिटा देना चाहिए; जो तमिलों के प्रति आदर और सम्मान की भावनाओं को आघात पहुंचाते हैं। हर तमिल, जिसकी नसों में शुद्ध द्रविड़ खून बहता है; उसको इसे अपना कर्तव्य समझकर ऐसा करने का शपथ लेनी है।

– पेरियार ई.वी. रामासामी

 

पूरा लेख फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ई.वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण’ में संकलित है।

किताब खरीदने के लिए विज्ञापन पर क्लिक करें

 

लेखक के बारे में

पेरियार ई.वी. रामासामी

पेरियार ई. वी. आर. (जन्म : 17 सितंबर 1879 - निधन : 24 दिसंबर 1975)

संबंधित आलेख

सहजीवन : बदलते समाज के अंतर्द्वंद्व के निहितार्थ
विवाह संस्था जाति-धर्म की शुद्धता को बनाये रखने का एक तरीका मात्र है, इसलिए समाज उसका हामी है और इसलिए वह ऐसे जोड़ों की...
यात्रा संस्मरण : वैशाली में भारत के महान अतीत की उपेक्षा
मैं सबसे पहले कोल्हुआ गांव गयी, जहां दुनिया के सबसे प्राचीन गणतंत्र में से एक राजा विशाल की गढ़ी है। वहां एक विशाल स्नानागार...
शैक्षणिक बैरभाव मिटाने में कारगर हो सकते हैं के. बालगोपाल के विचार
अपने लेखन में बालगोपाल ने ‘यूनिवर्सल’ (सार्वभौमिक या सार्वत्रिक) की परिकल्पना की जो पुनर्विवेचना की है, उसे हम विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को समझना चाहिए।...
भारत में वैज्ञानिक परंपराओं के विकास में बाधक रहा है ब्राह्मणवाद
कई उद्धरणों से ब्राह्मणवादी ग्रंथ भरे पड़े हैं, जिनसे भलीभांति ज्ञात होता है कि भारतीय खगोल-विद्या व विज्ञान को पस्त करने में हर प्रकार...
ओबीसी महिला अध्येता शांतिश्री धूलीपुड़ी पंडित, जिनकी नजर हिंदू देवताओं की जाति पर पड़ी
जब उत्पादक समुदायों जैसे शूद्र, दलित और आदिवासी समाजों से गंभीर बुद्धिजीवी उभरते हैं तब जाति व्यवस्था में स्वयं की उनकी स्थिति, उनकी चेतना...