बेड़ियां तोड़ती स्त्री : मेरी रॉय

लेखक अरविंद जैन बता रहे हैं मां की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए मेरी रॉय के अदालती संघर्ष और 24 फरवरी, 1986 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बारे में। जिससे केरल की हजारों नहीं, लाखों औरतों को संपत्ति में समान अधिकार मिलने का रास्ता खुला

न्याय क्षेत्रे – अन्याय क्षेत्रे

अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय के नाम से कौन परिचित नहीं! वही अरुंधति रॉय, जिसे ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए ‘बुकर प्राइज’ (1997) मिला था।

हाँ! पर एक और मिस रॉय हैं, जिसका नाम है मेरी रॉय! मेरी रॉय को जब पिता की मृत्यु (1960) के बाद संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिला, तो वह स्त्री विरोधी और भेदभावपूर्ण कानूनों के विरुद्ध लड़ने के लिए निकलती हैं और ज़िला अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक की 26 साल लंबी संघर्ष यात्रा करके ही घर लौटती हैं। सदियों पुराने कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देकर, अपने अधिकार पाने का दुःसाध्य काम करने वाली मेरी रॉय, स्त्री अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता भी हैं और सम्मानीय शिक्षक भी।

शायद अधिकाँश पाठकों को यह जानकर आश्चर्य हो कि अरुंधति रॉय की माँ का नाम है मेरी रॉय। अरुंधति जब दो साल की थी तो माँ मेरी रॉय और पिता राजीव रॉय के बीच विवाह विच्छेद हो गया था। माँ मेरी रॉय केरल की सीरियन ईसाई और पिता बंगाली हिन्दू हैं। कहते हैं मां और बेटी दोनों ‘विद्रोही’ हैं।

खैर…मेरी रॉय ने 1983 में त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए, अनुच्छेद 32 के तहत याचिका (नंबर 8260/1983) दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती और आर.एस. पाठक ने विद्वान् वकीलों की बहस और कानूनी प्रावधानों की गहन समीक्षा करने के बाद 24 फरवरी, 1986 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया[1] जिससे केरल की हजारों नहीं, लाखों औरतों को संपत्ति में समान अधिकार मिलने का रास्ता खुला।

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मुकदमे की पृष्ठभूमि यह है कि केरल में ईसाई समुदाय में संपत्ति पर अलग-अलग उत्तराधिकार कानून थे, जो प्राचीन काल से धर्मशास्त्रों के आधार पर बने-बनाये गए थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रथा और कानून होने के कारण, अनिश्चितता और संपत्ति विवाद बढ़ते जा रहे थे। 1916 में त्रावणकोर में राजशाही थी और महाराजा ने सभी नियमों को मिला कर भारतीय ईसाईयों के लिए उत्तराधिकार सम्बन्धी पहला कानून त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 (अधिनियम, 1916) बनाया था। 1949 में त्रावणकोर को कोचीन में मिला दिया गया, जहां पहले से कोचीन ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम,1921 (अधिनियम, 1921) लागू था। 1949 में मलबार का भी कुछ हिस्सा केरल से मिलाया गया, जहाँ भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (अधिनियम, 1925) लागू था।

मेरी रॉय 

उल्लेखनीय है कि अधिनियम, 1925 में स्त्री-पुरुष को मिलने वाले हिस्से में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया गया था। परिणामस्वरूप एक ही राज्य के तीन भागों (त्रावणकोर, कोचीन और मलबार व अन्य) में, तीन अलग-अलग अधिनियम (1916, 1921 और 1925) अपना-अपना काम कर रहे थे। अधिनियम,1916 में विधवाओं को संपत्ति पर जीवन काल तक सीमित अधिकार था (अगर पुनर्विवाह ना करें) और स्त्रियों को सम्पत्ति में पांच हज़ार से अधिक नहीं मिल सकता था और वो भी तब जब उसे विवाह के समय स्त्रीधन के रूप में कुछ ना मिला हो। 1951 में संसद ने (पार्ट बी स्टेट (लॉज़) एक्ट, 1951) कानून पारित किया, जिसके अनुसार 1 अप्रैल, 1951 से उत्तराधिकार संबंधी सभी पुराने प्रदेशीय कानूनों को रद्द करते हुए, केन्द्रीय कानून अधिनियम, 1925 लागू करने कि घोषणा की थी। लेकिन केरल के ईसाइयों ही नहीं, विद्वान वकीलों और न्यायाधीशों को भी उत्तराधिकार कानून के बारे में बहुत से संशय बने रहे।

संविधान में कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार के बावजूद, धर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है। साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में ही सालों लटके रहते हैं। मेरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है। स्वयं अर्जित संपत्ति के वसीयत करने के असीमित अधिकार के होते हुए, उत्तराधिकार कानून (जहां मृतक की कोई वसीयत नहीं) एक स्तर पर अर्थहीन ही सिद्ध होते रहे हैं। समृद्ध व्यक्ति बिना वसीयत किये, कहां मरते हैं!

न्यायमूर्तियों के समक्ष सार्वजनिक महत्व का रोचक कानूनी प्रश्न यह था कि 1 अप्रैल, 1951 के बाद  केन्द्रीय कानून भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का त्रावणकोर और कोचीन में लागू अधिनियम, 1916 और अधिनियम, 1921 पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस वैधानिक सवाल पर मद्रास उच्च न्यायालय के एकल और खंडपीठ का अलग-अलग मत था,  सो न्यायमूर्तियों को देखना था कि कौन सा निर्णय सही है। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति इस्माइल[2] का मत था कि 1951 के बाद त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 रद्द हो चुका है। मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ[3] ने भी परोक्ष रूप से यह माना है कि अधिनियम,1916  दरअसल में अधिनियम, 1925 से भी पहले का है।

अधिनियम, 1925 के प्रावधानों से स्पष्ट था कि यह पूरे देश में (पारसी धर्म के अनुयाइयों के अलावा) सब पर लागू होगा। न्यायमूर्तियों ने केरल राज्य के वकीलों का यह तर्क मानने से इंकार कर दिया कि 1951 के बाद भी, त्रावणकोर के ईसाईयों पर अधिनियम, 1916 ही लागू रहेगा। 1925 का अधिनियम बाद में बना है और अधिक स्पष्ट भी है, सो किसी भी तर्क से 1916 का कानून नहीं बच सकता। वह तो बहुत पहले रद्द किया जा चुका है, सो उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। राज्य सरकार के वकीलों का यह तर्क भी बहुत ही धुंधला है कि अधिनियम, 1925 की धारा 29 में कहा गया है कि त्रावणकोर में 1916 का कानून ही लागू रहेगा, क्योंकि 1951 के अधिनियम में साफ़ तौर पर 1916 (और 1921 भी) का कानून रद्द किया जाता है। इस संदर्भ में त्रावणकोर और कोचीन उच्च न्यायालय का मत सही नहीं ठहराया जा सकता।[4] अपवाद और विलय के प्रावधान विधायिका द्वारा अपनायी प्रक्रिया है। दोनों की भाषा का उदेश्य ही भिन्न है। हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि 1 अप्रैल 1951 के बाद पूरे राज्य में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के ही प्रावधान लागू हैं/होंगे, ना कि पुराने कानून अधिनियम,1916 (या अधिनियम, 1921)

न्यायमूर्तियों ने विचार-विमर्श के बाद अंतिम निर्णय सुनाते हुए कहा “इस विचार के उपरांत अब इस बात पर बहस करना जरूरी नहीं है कि त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 के धारा 24, 28 और 29 असंवैधानिक हैं या नहीं। हम याचिका स्वीकार करते हुए यह घोषित करते हैं कि पूर्व राज्य त्रावणकोर के भारतीय ईसाईयों की संपत्ति में उत्तराधिकार के मामलों में (जहां कोई वसीयत नहीं है) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम,1925 के अध्याय 2 भाग 5 ही लागू होगा।”

सुप्रीम कोर्ट के मेरी रॉय फैसले के आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने अधिनियम, 1921 को भी रद्द करार दे दिया।[5] सुप्रीम कोर्ट का यह (1986) निर्णय एक प्रकार से पिछली तारीख (1अप्रैल,1951) से लागू नया कानून बन गया। परिणामस्वरूप 1 अप्रैल,1951 से लेकर 24 फरवरी, 1986 तक के बीच की अधिकांश ईसाई सम्पत्ति की खरीद-बेच और अदालती फैसले/डिक्री नये विवाद का कारण बन गए। उत्तराधिकार कानूनों की स्थिति पहले ही बेहद पेचीदा थी, सुप्रीम कोर्ट निर्णय (1986) के बाद और ‘विचित्र’ हो गई।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी मेरी रॉय की कोर्ट-कचहरी का अंत नहीं हुआ। संपत्ति में एक तिहाई हिस्सा मेरी रॉय की माँ का था, जो उनके जीवन काल तक ही रह सकता था। 1988 में जिला अदालत से लेकर केरल उच्च न्यायालय (1994) तक के चक्कर लगाती रही। जिस भाई के खिलाफ़ मुक़दमेबाज़ी करनी पड़ी, उसने (उसकी कम्पनी) 1984 में ही संपत्ति बैंक को गिरवी रख कर कर्ज़ उठा लिया था। ज़मीन का बंटवारा होने लगा, तो स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर ज़मीन का कब्ज़ा लेने के नोटिस और धमकियां देने लगा। 2000 में अपनी मां की मृत्यु के बाद, उन्होंने अंतिम निर्णय के लिए कोट्टायम उप-अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला आठ साल तक जारी रहा, जिसके बाद 2009 में डिक्री अनुपालन की याचिका दायर करने के बाद ही संपत्ति मेरी रॉय को मिल पाई। दरअसल संविधान में कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार के बावजूद, धर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है। साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में ही सालों लटके रहते हैं। मेंरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है।

(कॉपी संपादन : नवल)

[1] मेरी रॉय बनाम केरल राज्य, एआईआर 1986 सुप्रीम कोर्ट 1011

[2] सोलोमा बनाम मुथिया, 1974 भाग 1 मद्रास लॉ जर्नल 5

[3] डी. चेल्लिया बनाम जी. ललिताबाई, एआईआर 1978 मद्रास 66

[4] एआइआर 1957 त्रावनकोर और कोचीन उच्च न्यायालय

[5] वी.एम. मैथयू बनाम एलिसवा (1988 (1) केएलटी 310(खंडपीठ) और जोसफ बनाम मेरी (1988 (2) केएलटी 27 (खंडपीठ)

 


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