आर्टिकल 15 : हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा

लेखक आतिफ रब्बानी बता रहे हैं कि ‘आर्टिकल 15’ फिल्म के निर्देशक अनुभव सिन्हा ने समाज की सच्चाईयों को प्रस्तुत किया है। वे यह भी कहते हैं कि जातिवाद और अन्य सामाजिक विसंगतियों के खात्मे के लिए वंचितों को ही आगे आना होगा

ओमप्रकाश वाल्‍मीकि की कविता का अंश है – “’जाति’ आदिम सभ्यता का/ नुकीला औज़ार है/ जो सड़क चलते आदमी को/ कर देता है छलनी..”। बीते शुक्रवार को रिलीज़ हुई फिल्म ‘आर्टिकल 15’ में जाति के इसी नुकीलेपन को दिखाने की कोशिश की गई है। फ़िल्म भारतीय समाज में मौजूद जातिगत विषमता, भेदभाव और बहिष्करण का दस्तावेज़ है। ऐसे समय में जब कला और साहित्य मर्मज्ञ, ख़ास तौर पर परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स से जुड़े कलाकार-फिल्मकार जाति के प्रश्न पर चुप्पी साध लेते हों; तो ऐसे दौर में जाति के प्रश्न को मुख्य धारा में ला खड़ा करना यक़ीनन दुस्साहस है। फिल्मसाज़ अनुभव सिन्हा ऐसे दुस्साहसपूर्ण तजुर्बे किया करते हैं, उनकी पिछली फिल्म ‘मुल्क’ भी इसी दायरे में आती है।

फ़िल्म की शुरुआत में दो गीत हैं—पहला गीत बाक़ायदा स्क्रीन पर परफ़ॉर्म होते हुए दिखाया गया है; और दूसरा बैकग्राउंड में। पहले गीत के बोल भोजपुरी में हैं: “कहब तो लग जाई धक से/ कहब तो लग जाई धक से/ बड़े-बड़े लोगन के बंगला दो बंगला/ और भईया एसी अलग से, अलग से।” ध्यान रहे कि भारत में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है—प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी और अन्य के द्वारा वर्ल्ड इनैक्वैलिटी लैब की रिपोर्ट इसी असमानता को रेखांकित करती है। गीत गांव-गिरांव के दलित-दमित लोगों की आकांक्षाओं, दुख, विषाद और संघर्ष को बयान करता है।

वहीं, दूसरा गीत बॉब डिलन—जिनको तीन साल पहले साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला है—का ‘ब्लोइंग इन द विंड है। यह गीत नेपथ्य में बजता है। गीत मानवाधिकार की पैरवी, युद्ध एवं युद्धोन्माद का विरोध और संघर्ष का आह्वान करता है। गीत में एक जगह कहा गया है कि “आख़िर कितने कान होने चाहिए यह सुनने के लिए कि लोग रो रहे हैं, या कितनी लाशें और लगेंगी, ये जानने के लिए कि बहुत से लोग मर गए हैं?” यह सत्य है कि हमारे आस-पास जातिगत भेदभाव होता रहता है। पायल ताडवी और रोहित वेमुला जैसे ‘इग्निटेड माइंड्स’ की सांस्थानिक हत्या होती रहती है। दलितों को गाय के नाम पर; आदिवासियों को विकास के नाम पर आए दिन निशाना बनाया जा रहा है। हम खामोशी की लबादा ओढ़े रहते हैं। फिल्म में रोहित वेमुला की आख़िरी चिट्ठी को भी उद्धृत किया गया है।

आर्टिकल 15 फिल्म के एक दृश्य में आयुष्मान खुराना व अन्य कलाकार

फिल्म का मुख्य किरदार अयान रंजन एक युवा आईपीएस ऑफिसर है जिसे आयुष्मान खुराना निभाते हैं। युवा ऑफिसर की नयी-नयी तैनाती—जो उसका प्रवीक्षाधीन कालावधि है—उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ ग्रामीण इलाक़े में होती है। जिस दिन यह युवा अफसर अपने इलाक़े में पहुंचता है उसी रात दो दलित बच्चियों का बलात्कार कर पेड़ पर लटका दिया गया होता है; और तीसरी बच्ची गुमशुदा हो जाती है। शहर और विदेश में पले-बढ़े-पढ़े उच्च-मध्यम वर्गीय आयुष्मान खुराना को ग्रामीण भारत की ज़मीनी हक़ीक़त से साबक़ा पड़ता है।  इस प्रकार उसको पहला ‘कल्चरल शॉक’ लगता है। यह सीन सिनेमा में बैठे दर्शकों को भी अंदर से झिंझोड़ देता है।

जैसे ही हम अपने ज़ेहन में ‘हम’ और ‘वे’ को लाते हैं उसी वक़्त हम सामाजिक बहिष्करण की चालू प्रथा का हिस्सा बन जाते हैं। फिल्म में ‘हम-वे’ के द्वैत को भली-भांति दिखाया गया है कि कैसे व्यवस्था में विभेदकारी प्रवृतियाँ मजबूती के साथ अपनी जगह बनाए हुए है। हम का मतलब है कि सुविधा-सम्पन्न उच्च-जातीय शिक्षित पुरुष और वे से मतलब है हाशिये के लोग। यही हाशिये के लोग हमेशा आदान के छोर पर होते हैं।

बलात्कारियों में आयुष्मान का जाट बॉडीगार्ड और ब्राह्मण थानाद्यक्ष भी शामिल रहते हैं। पूरा प्रशासन तंत्र उस केस को रफा-दफा करने लग जाता है। बच्चियों की हत्या में उनके पिता को ही फंसा दिया जाता है। फिल्म अनुसूचित जाति के लोगों की संघर्षों की दास्तान है।

‘आर्टिकल 15’ के एक दृश्य में मृत दोनों दलित लड़कियों के पिता एवं गायब दलित लड़की की बहन

फिल्म में बिंबों व प्रतीकों का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। फिल्म देखते वक़्त तुलसी राम की आत्मकथ्य ‘मुर्दहिया’ और शरण कुमार लिंबाले की कहानी ‘दलित ब्राह्मण’ का अनायास स्मरण हो आता है। फिल्म लेखक गौरव सोलंकी ने अच्छी कहानी बुनी है। पटकथा और डायलाग प्रभावशाली हैं, ज़हन में नक़्श हो जाने लायक़। एक डायलॉग है – “हम कभी सर्वजन और कभी बहुजन लेकिन जन कभी नहीं बन पाते।” मौजूद अस्मितावादी राजनीति पर यह सशक्त कटाक्ष है। आमतौर पर हिन्दी पट्टी, और ख़ासतौर पर उत्तरप्रदेश में, अस्मिता की राजनीति परवान चढ़ी और इसकी राजनीति करने वालों के हाथ में दो-ढाई दशक तक सत्ता भी हाथ में रही। फिर भी अपेक्षित सामाजिक परिवर्तन न हो सका, अलबत्ता दलित-पिछड़े समूहों का राजनैतिक सशक्तिकरण होने का ‘साइलेंट रेवोल्यूशन’ ज़रूर बरपा हुआ है—यह भी कोई कम नहीं है।

सच है कि यह कलाकार के अपने विवेक और समझदारी पर निर्भर होता है कि वह समाज कि किस सच्चाई को अपने फ़न या कलाकृति में दिखाना पसंद करता है—यह उसका अपना विशेषाधिकार है। फिर भी, फिल्म देखकर ऐसा लगता है कि जाति ग्रामीण समस्या ही हो। जबकि सच्चाई इसके इतर है—शहरों में छुआछूत, भेदभाव मौजूद है। अंतर बस इतना है कि इसकी अभिव्यक्ति की शक्ल दूसरी है। इंडिया ह्यूमन डिवेलपमेंट सर्वे के आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्र का हर चार भारतीयों में से एक अपने घरों में किसी न किसी रूप में छूआछूत का पालन करता है।

आर्टिकल 15 फिल्म के निर्देशक अनुभव सिन्हा

फिल्म से यह भी एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दलितों-दमितों को उच्च जाति से आने वाला उद्धारक चाहिए जो उनकी समस्याओं का निदान करे। प्रताप भानु मेहता ने अपनी किताब ‘बर्डेन ऑफ़ डेमोक्रेसी’ में बड़ी मार्के की बात कही है कि उच्च जाति से आने वाले सुधारक/ उद्धारक इसलिये कोशिश करते हैं कि हिंदूइज़्म का ‘संतुलन’ कायम रहे। जबकि दलित-दमित समुदाय के सुधारक मुक्ति के लिए कोशिश करते हैं। हालांकि भीम आर्मी के जरिए यह संदेश देने की थोड़ी कोशिश हुई है कि दलित समाज का उद्धार अपने ही हाथों से होगा। जैसे एक जगह अयान की गर्लफ्रेंड कहती है, “हमें हीरो नहीं चाहिए, बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का इंतज़ार न करें”। यानी समाज से ही नेता निकले। उसे किसी मसीहा की ज़रूरत दरकार नहीं। हाशिए का समुदाय अपना कांटा खुद निकालेगा। राहत इंदौरी ने कहा है-

(कॉपी संपादन : नवल)


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