राजा ढाले का निधन, जे.वी. पवार सहित अनेक ने दी श्रद्धांजलि 

वर्ष 1972 में महाराष्ट्र में गठित दलित पैंथर्स के संस्थापकों में से एक थे राजा ढाले। 1977 में दलित पैंथर्स के भंग होने के बाद भी राजा ढाले दलितों के अधिकारों के लिए तथा उनके  ऊपर होने वाले अत्याचार-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते रहे

दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक राजा ढाले का निधन आज 16 जुलाई 2019 को हो गया। वे समर्पित आंबेडकरवादी कार्यकर्ता, विचारक और साहित्यकार थे। नामदेव ढसाल, जे.वी. पवार, अरूण कांबले आदि के साथ मिलकर राजा ढाले ने दलित पैंथर्स का गठन किया था। परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार 78 वर्षीय राजा ढाले पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। आज सुबह वे मुंबई के विक्रोली स्थित अपने घर में फर्श पर गिर पड़े। परिजन उन्हें स्थानीय अस्पताल ले गए, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों के मुताबिक राजा ढाले की अंत्येष्टि कल मुंबई के दादर चैत्यभूमि में की जाएगी। 

अब मैं अकेला हो गया हूं :  जे. वी. पवार

राजा ढाले के निधन की खबर से देश भर के दलित-बहुजनों में शोक की लहर दौड़ गयी है। उनके परम मित्र व दलित पैंथर के सह-संस्थापक में से एक जे. वी. पवार ने फारवर्ड प्रेस के साथ बातचीत में उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि “राजा ढाले के साथ मेरी 40 साल से ज्यादा की दोस्ती थी। उनके जैसा दोस्त खोकर अब मैं अकेला हो गया हूं। वह सच्चे आंबेडकरवादी थे। वे अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ तो लड़ते ही थे, साथ ही दलितों-अछूतों के मामले में दोहरा मापदंड अपनाने वाले मार्क्सवादियों के खिलाफ संघर्ष किया। वह समाज के आदमी थे और हमेशा समाज के रहे। कभी भी सरकार से कुछ नहीं लिया। राजा ढाले दलितों के अधिकारों लेकर सरकार से हमेशा संघर्ष करते रहे। उन्होंने महाराष्ट्र और देश के दलितों को अत्याचार के खिलाफ़ लड़ना सिखाया। अपने बहादुर साथी कमी मुझे हमेशा खलेगी।”

राजा ढाले (20 सितंबर 1940 – 16 जुलाई 2019)

समझौतावादी नहीं थे राजा ढाले : मोहनदास नैमिशराय

दलित साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार मोहनदास नैमिश्यराय ने अपने शोक संदेश में कहा है कि “ मुंबई जाने पर मेरा अक्सर राजा ढाले के यहां रुकना होता था। आंदोलन चलाने का जो तेवर, ताकत और जुझारुपन उनमें था, वह बहुत कम लोगों में देखने मिलता है। वे अपने विमर्शों के जरिए दलित स्त्रियों के साथ होने वाले यौन हिंसा को लेकर लगातार समाज के सवर्णवादी ढांचे पर चोट करते रहे। पिछले 10 वर्षों से उनका बाहर निकलना कम हो गया था, लेकिन वे रूके नहीं थे। घर पर रहकर ही लगातार लिख रहे थे। उन्होंने ‘धम्मलिपि’ नामक एक पत्रिका निकाली और उसका संपादन किया। अभी पिछले ही वर्ष उन्होंने एक पुस्तकालय की शुरुआत की थी। राजा ढाले अपने विचारों के प्रति दृढ रहे। उन्होंने कभी किसी से समझौता नहीं  किया। उनके छोड़े हुए कामों को हम सब साथियों का आगे ले जाना चाहिए। मेरी ओर से उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।”   

राजा ढाले ने बताया राष्ट्रीय ध्वज से अधिक दलित स्त्री के देह पर वस्त्र महत्वपूर्ण : शेखर

मराठी लेखक शेखर ने अपने शोक संदोश में कहा कि “राजा ढाले की विशेषता यही थी कि वह दलितों के हक-हुकूक को लेकर हमेशा अग्रणी पंक्ति में रहे। इस देश के दलित उनके इस वक्तव्य को कभी नहीं भूलेंगे कि यदि किसी दलित स्त्री को नंगा किया जा रहा है तो राष्ट्रीय ध्वज से ज्यादा ज़रूरी उस स्त्री का शरीर ढ़ंकना है। दलित स्त्री की आबरू राष्ट्रीय परचम से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वर्ष 1974 में पूना से प्रकाशित  दलित पैंथर की मराठी सप्ताहिक पत्रिका ‘साधना’ के एक लेख उन्होंने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के बजाय काला स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया। वे दलित अस्मिता और अधिकारों पर अपनी बात रखने से कभी नहीं डरते थे। ऐसे थे राजा ढाले। उन्हें श्रद्धांजलि।”

(कॉपी संपादन : नवल/सिद्धार्थ)


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