जनपद से महाजनपद 

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं बुद्ध के समकालीन भारत के 16 महाजनपदों के बारे में। इस क्रम में उन्होंने सिंधु घाटी नगरीय सभ्यता के खात्मे के बाद फिर से बसने वाली नगरीय सभ्यता के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी वर्णन किया है 

जन-विकल्प

उपनिषदों पर बात करते हुए हमने छोटे-छोटे गणराज्यों की बात की है। इन गणराज्यों को जनपद भी कहा जाता था। ये जनपद एक खास इलाके के छोटे-छोटे ग्रामों के समुच्चय होते थे। कृषि और हस्तकलाओं के विस्तार के साथ नगर-संस्कृति का एक बार फिर उदय होने लगा था। ऐसा प्रतीत होता है, हड़प्पा कालीन गलतियों से लोगों ने सीख ली थी। वनों, ग्रामों और नगरों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक अन्तर्सम्बन्ध बनाये रखने की पूरी कोशिश की गयी थी। उपनिषदों ने विचारों और चेतना का एक नया व्योम सृजित किया था, जिसमें मनुष्य की गरिमा को केंद्र में रखा गया था। इस दौर में  शारीरिक श्रम पर मानसिक श्रम की महत्ता कुछ कम की गयी थी। ऐसा शायद चिंतन के क्षेत्र में पुरोहितों के कमजोर पड़ने और अन्य लोगों, जिनमें राजन्य और वणिक तबके के लोग थे, के मजबूत होने के कारण हुए थे। गैर-पुरोहित तबकों का ज्ञान के क्षेत्र में स्थान बढ़ता जा रहा था। 

जैसा कि बता चुका हूं, जनपदों के मुखिया राजन्य प्रायः  खत्तिय, यानि खेतिहर कृषक समूह के होते थे। मिथिला के राजा जनक जब हल चला रहे थे, तभी नवजात सीता उन्हें मिली थी। अर्थ यह हुआ कि राजन्य सगुन के तौर पर ही सही, लेकिन कृषि कार्य करते थे। यह उनकी उस कृषि परंपरा का प्रतिपालन था, जो उनके पुरखे  करते थे,और जिन से अभी उनका संबंध बना हुआ था। गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोदन भी शाक्य बहुल कपिलवस्तु जनपद के राजा थे, और अनुमान है, उनकी स्थिति भी एक श्रेष्ठ-रैयत से अधिक की नहीं रही होगी। दरअसल ये जनपद कृषि अर्थव्यवस्था के एक वृहद् संगठित रूप थे। इनके मूल में कबीलाई संस्कृति थी। एक जनपद दूसरे जनपद से प्रायः झगड़ते भी रह्ते थे और उनके बीच  हिंसक संघर्ष भी होते रह्ते थे। यह अलग बात है कि ये संघर्ष अब गायों को लेकर नहीं, सिंचाई के जल को लेकर अधिक होते थे। शाक्यों और कोलिय जनपद के लोगों के ऐसे संघर्षों के उल्लेख मिलते हैं। 

बुद्ध की प्रतिमा

धीरे-धीरे कुछ जनपदों को जोड़ या संघटित कर महाजनपद बनाये गए। इस तरह जन से जनपद और फिर महाजनपद बने। जनपदों की राजधानियां होती थी। लेकिन ये राजधानियां नगर स्थित थीं, इसके बारे में ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। संभव है कुछ जनपदों की राजधानी नगर में हो, लेकिन सभी जनपदों की राजधानियां  अथवा राज-निवास नगर में ही थे, ऐसा कहना मुश्किल है। लेकिन जब महाजनपद बने, तो उनकी राजधानियां नगर केंद्रित हुए। ये नगर मुख्यतः शिल्पियों के केंद्र होते थे। उन्नत कृषि-काल में हाट, मेले और बाजार विनिमय के अड्डे होते थे। ये नगर इन्ही हाट-बाजार-मेलों का एक स्थायी हो गया रूप था। कुशल-हुनरमंद शिल्पी गांव से उठ कर इन नगरों में आ जाते थे। यहां उनके उत्पादन की अच्छी कीमत मिलती थी, क्योंकि विनिमय का यहां बड़ा मंच था। 

उपनिषद-काल का अंत होते-होते महाजनपद संघटित होने लगे थे। बुद्ध के समय तक अनेक महाजनपद थे, जिनमें कम से कम एक विज्जी में अब तक पुरानी गणराज्य व्यवस्था  काम कर रही थी। इसलिए यह गणराज्य बुद्ध सहित अनेक विचारकों को प्रिय थे। अधिकतर महाजनपदों में वंशानुक्रम वाली राजतंत्रीय व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। अब ये राजतंत्रीय महाजनपद और उनके  शासक कृषि-संस्कृति से दूर होने लगे थे। धीरे-धीरे इन शासकों का एक नया संवर्ग बन गया। लेकिन इसकी फिर एक नयी कहानी होती है, जिसकी चर्चा यहां विषयांतर होगा। बुद्ध के समय तक उत्तर भारत में सोलह की संख्या में महाजनपद बन गए थे। पालि ग्रन्थ ‘दीघनिकाय’ के अनुसार ‘यो इमेसं सोळसन्नं महाजनपदानं ..’।  इनके नाम जान लेना जरुरी है। महाजनपदों की सूची यह है – 

  1. अंग – इसकी राजधानी चंपा थी। संभवतः यह आधुनिक बिहार का भागलपुर है। बिहार का भागलपुर और मुंगेर का इलाका अंग कहा जाता था। इसी इलाके की बोली को अंगिका कहा जाता है। महाभारत में अंग -देश का जिक्र है। पौराणिक धनुर्धर कर्ण यहीं का राजा बतलाया गया है। ‘अंगुत्तरनिकाय’ के अनुसार अंग अथवा अंगानं भी गणराज्य था, लेकिन मगध के राजा ने युद्ध कर इसे जीत लिया और अपने में मिला लिया। तब से यह अंगमागध कहा जाने लगा। बुद्ध चंपा नगरी में जाते थे और उनका एक वर्षावास वहां गुजरा था। 

2 . मगध – इसकी राजधानी गिरिव्रज थी, जो अब राजगीर है। आज का पटना, नालंदा, नवादा, गया, जहानाबाद, अरवल और औरंगाबाद जिले मगध में शामिल थे। यहां की बोली मागधी या मगही है। कालांतर ने इसी मगध ने अन्य महाजनपदों को आत्मसात कर एक साम्राज्य की स्थापना की, जिस से महाजनपदीय-काल का अंत हो गया।

बिहार के नालंदा जिले के राजगीर में घोड़ाकटोरा झील के बीच स्थापित बुद्ध की नवनिर्मित विशाल प्रतिमा

  1. वज्जि – मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर और पूरा मिथिलांचल वज्जि देश था, जिसकी राजधानी वैशाली थी। वज्जिका यहां की बोली थी। यहीं लिच्छवियों का गणतंत्र था। आज के जनतंत्र से इस की तुलना नहीं की जानी चाहिए। लिच्छवियों के श्रेष्ठ लोग ही सभासद होते थे और उनकी परिषद् राजा का चुनाव करती थी। वोट को शलाका कहा जाता था। जिन्हें वोट देने के अधिकार थे, वे शलाका-पुरुष कहलाते  थे। बुद्ध लिच्छवियों से बहुत प्रभावित थे। अंबपाली इन लिच्छवियों के कुल से ही थी। 
  2. मल्ल – कुशावती इसकी राजधानी थी। यह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के आस-पास था। बुद्ध को मल्लों से भी बहुत लगाव  था। ऐसा प्रतीत होता है वज्जि की तरह मल्ल में भी गणतंत्र था। लेकिन पावा और कुशीनारा के मल्ल आपस में लड़ते रहते थे और इसी फूट के कारण इनका गणराज्य विनष्ट हो गया। बुद्ध इसी क्षेत्र के पावा में चुन्द के यहां भोजन कर बीमार हुए और  कुछ आगे जाकर कुशीनारा में उनका निधन हो गया।
  3. काशी – राजधानी वाराणसी थी। संभवतः यह महाजनपद आकार  में बड़ा था। सारनाथ इसी जनपद में अवस्थित था, जहां बुद्ध ने व्यवस्थित रूप से अपने विचारों (धम्म ) की उपदेसना की थी। काशी के राजाओं को ब्रह्मदत्त कहा जाता था. जातक-कथा में ब्रह्मदत्त और बंदरों के राजा को लेकर एक दिलचस्प कथा है। जातक के अनुसार ब्रह्मदत्त आदर्श राजा था। 

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  1. वत्स – पालि साहित्य में इसे वंस कहा गया है। इसकी राजधानी कौशाम्बी  थी। इलाहबाद के इर्द-गिर्द यह जनपद था। यहीं के राजा उदयन और उज्जैन के राजा चंडप्रद्योत के संघर्ष की कहानी प्रसिद्ध है। कथा के अंत में चंडप्रद्योत की बेटी वासवदत्ता और उदयन की प्रेमकथा भी दिलचस्प है। 

नक्शे में बुद्धकालीन भारत के सभी सोलह महाजनपद

  1. कोसल – . श्रावस्ती इसकी राजधानी थी, जो अचिरवती नदी के किनारे अवस्थित थी। अवध का यह इलाका आजकल फ़ैजाबाद कहा जाता है। बुद्ध के समय यहां का राजा प्रसेनजित बुद्ध से प्रभावित और उनका शिष्य था। बुद्ध यहां प्रायः जाते थे। प्रसेनजित ने उनके लिए जेतवन विहार बनवाया था, जिसका पाली साहित्य  में बहुत बार उल्लेख है। यह पूरब में सदानीरा या गंडक और पश्चिम में पांचाल को छूता था। सरयू नदी इसके बीच से होकर गुजरती थी। यदि यही कोसल रामायण कथा का कोसलपुर या साकेत है, तो यह भी ध्यातव्य है कि बुद्ध के समय तक किसी राम की चर्चा नहीं मिलती। 
  2. चेदि – गंगा और नर्मदा के बीच यह बुंदेलखंड का इलाका था, इसकी राजधानी सोत्थिवति या स्वस्तिवति थी। इसे पालि साहित्य में चेती कहा गया है।
  1. पांचाल – अहिच्छत्र या कम्पिल इसकी राजधानी थी। आधुनिक बरेली, बदायूं और फर्रुखाबाद के इलाके इसके अंतर्गत आते थे। ऋग्वेद में जिस पंचजन या पंचकृष्टं की चर्चा है और जिसमें यदु, तुर्वशु, अनु, द्रुह्य और पुरु आते हैं, संभवतः यह इलाका सांस्कृतिक रूप से उसी से जुड़ा है। लेकिन यास्क कहते हैं पंचजन का अर्थ गंधर्व, पितर, देव्, असुर और राक्षस हैं। महाभारत में पांचालदेश की विस्तृत चर्चा है।  
  2. शूरसेन – यहां की राजधानी मथुरा थी। उसके इर्द -गिर्द के इलाके इस महाजनपद से जुड़े थे। उत्तरी भारत का यह प्रमुख जनपद था। ब्रजमंडल इसी क्षेत्र में अवस्थित है। 
  3. कुरु – इंद्रप्रस्थ  इसकी राजधानी थी। यह आधुनिक  दिल्ली और हरियाणा के इलाकों से जुड़ कर बना हुआ था। महाभारत के अनुसार कुरु पौराणिक राजा ययाति का पांच पुत्रों में एक पुत्र है। महाभारत कुरु वंश और राज्य के अंतर्संघर्षों की ही कहानी है। लेकिन बुद्ध के समय यहां कौरव्य नामक राजा था। यहां बुद्ध का आना हुआ था। उन्होंने किसी पेड़ के नीचे प्रवचन दिया था।  
  4. गांधार – आधुनिक पाकिस्तान का रावलपिंडी और पेशावर का इलाका। राजधानी तक्षशिला थी। 
  5. अवंतिका – अवन्ति या अवंतिका के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक सम्पदा के लिए हमेशा याद किया जाता है। यह मालवा का इलाका था। उत्तरी भाग की राजधानी महिष्मति और दक्खिनी भाग की उज्जयिनी या उज्जैन थी। कालिदास ने अपने काव्य द्वारा उज्जयिनी को अमर कर दिया है। क्षिप्रा नदी के तट पर अवस्थित यह नगरी अपने विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। यह नगर विशाला, अमरावती आदि के नाम से भी जाना जाता है।
  6. मत्स्य – विराटनगर राजधानी थी( आधुनिक जयपुर के इर्द-गिर्द का इलाका( 
  1. अश्मक – इसकी राजधानी पोटली थी( गोदावरी नदी इससे होकर गुजरती है, ऐसा वर्णन है। यह विंध्य पर्वत के दक्षिण में स्थित था, जो अब महाराष्ट्र प्रान्त में है। इसकी सीमा अवन्ति को छूती  थी। इसे अस्सक भी कहा जाता है। 
  1. कम्बोज – कम्बोज का मतलब होता है कम्बलों का उपयोग करने वाला। इसकी  सीमायें गांधार से जुडी हुई थीं। राजौरी-हज़ारा का इलाका था यह। हाटक इसकी राजधानी थी।

उपरोक्त महाजनपद जिस भौगोलिक क्षेत्र को घेरते हैं, उसमें वर्तमान भारत का उत्तरपूर्व तो क्या बंगाल भी अनुपस्थित है। फिर वर्तमान झारखंड से लेकर पूरा उत्कल  और दक्खिन के इलाके नहीं हैं। महाजनपदों के इसी दौर में तथागत बुद्ध का जन्म हुआ था। गिरिव्रज, वैशाली, वाराणसी, श्रावस्ती का चक्कर वह लगाते रहते थे। लेकिन पांचाल, गांधार  तक बुद्ध की यात्रा की कोई चर्चा बौद्ध साहित्य में नहीं मिलती। ऐसा लगता है, बुद्ध श्रावस्ती और इंद्रप्रस्थ से पश्चिम की ओर नहीं बढ़ सके थे। परिब्राजक के तौर पर अपने भ्रमण में बुद्ध ने रथ या घोड़े का कोई इस्तेमाल किया था, इसकी सूचना नहीं है। बावजूद इसके, अपने पैंतालीस वर्ष के निरंतर भ्रमण में उन्होंने कम यात्रा नहीं की थी।

इन महाजनपदों  के अध्ययन हमें इस निष्कर्ष तक पहुंचाते हैं कि पूरब की ओर अवस्थित जनपदों में आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता अधिक थी। इसका कारण संभवतः यह है कि मगध के दक्खिनी इलाके, जिसे आज झारखण्ड कहा जाता है, में धातु-निर्माण की प्रक्रिया तेज थी। इसी बीच लोहे का ईजाद हो गया था और ताम्र-कांस्य युग पीछे चला गया था। लोहे के उत्पादन ने कृषि के विकास को तीव्रतर कर दिया। लोहे के फाल खेतों की गहरी जुताई-गुड़ाई कर सकते थे। केवाल मिटटी में इस गुड़ाई का विशेष मतलब था। धान की फसल के उत्पादन  में उछाल आया। इससे दस्तकारी को भी बल मिला। क्योंकि अब अधिक लोगों का पेट पालना संभव हो गया था। साम्राज्यवादी अभियान, जो नन्द-मौर्यों के जमाने में आये, उसमें तो अभी बहुत देर थी, लेकिन एक महाजनपद और दूसरे महाजनपद में लड़ाई-झगडे शुरू हो गए थे। महाजनपदों के राजाओं ने पलटन बनाने आरम्भ कर दिए थे। ये पलटन जल्दी ही अनवरत चलने वाली लड़ाइयों में उपयोग होने वाले थे। इन महाजनपदों के बीच पहली बड़ी लड़ाई की सूचना हमें मगध से मिलती है, जब मगध के राजा अजातशत्रु ने लिच्छवियों के वज्जि गणराज्य पर आक्रमण कर दिया और उसका स्वतंत्र और गणतंत्रात्मक अस्तित्व  ख़त्म का दिया। इसकी प्रतिक्रिया उस ज़माने के कई दार्शनिकों पर पड़ी। इसकी विवेचना हम आगे करेंगे।

(कॉपी संपादन : नवल)


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