आगामी आयोजन : कबीर, गुरु नानक को जानने, राजनीति और साहित्य, कला संस्कृति पर विमर्श का समय 

देश के बौद्धिक, अकादमिक जगत में संविधान, सामाजिक अधिकारों पर विमर्श के अलावा विश्व हिंदी दिवस की तैयारी, कबीर आंदोलन, गुरु नानक की यात्राएं, मिथकीय चरित्रों पर लिखे साहित्य से लेकर नेमीचंद जैन और अमृतलाल नागर के योगदान पर चर्चा होने वाली है। इसके अलावा भी बहुत कुछ है आगामी आयोजनों में, बता रहे हैं कमल चंद्रवंशी

पहले समाज, फिर राजनीति 

सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) ने दिल्ली में 31 अगस्त 2019 को “कॉन्सिट्यूशन ऑन यूनिवर्सल सोशल राइट्स” विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया है। इसमें देश के कई प्रतिष्ठित लोग शिरकत कर रहे हैं जिनमें प्रभात पटनायक और जयंती घोष, रोहित आजाद, दीपा सिन्हा समेत कई अन्य बौद्धिक और अकादमिक क्षेत्र के लोग शामिल हैं।

सीईएस ने अपनी अपील में संविधान में मिले सार्वभौम सामाजिक अधिकारों के लिए आगे आने के लिए समाज के हर वर्ग से इस अभियान और कार्यक्रम का हिस्सा बनने की बात कही है। अपील में कहा गया है कि हमारे संविधान ने मौलिक राजनीतिक अधिकारों की गारंटी दी है। लेकिन डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वयं कहा था कि बिना सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को दिए इस अधिकार के बहुत मायने नहीं हैं। सत्तर साल बाद हम ऐसे दौर में हैं जब “हाई ग्रोथ” और “विकास” के बावजूद भारत आय के मामले में विश्व में दूसरा सबसे असमान देश है। बाजार की शक्तियों के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे बुनियादी मसले गौण हो गए हैं। संस्था का कहना है कि क्या आज हम ऐसे ठोस लोकतंत्र की कल्पना कर सकते हैं जो इसकी परिभाषा को भी व्यापक बनाए और इसके प्रत्येक नागरिक को सार्वभौमिक आर्थिक और सामाजिक अधिकार दे सके? जाहिर है इसके लिए समाज के हर शख्स को एक होना होगा।

इस कार्यक्रम को सीईएस ने रोसा लक्समबर्ग स्टिफ्टंग (आरएलएस) के सहयोग से आयोजित किया है। कार्यक्रम दोपहर बाद 3 बजे इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, 8, नेल्सन मंडेला रोड बसंत कुंज में है। बता दें कि आरएलएस मूल रूप से जर्मनी की प्रतिष्ठित संस्था है जो जनतांत्रिक हकों की लड़ाई और संघर्ष को सामने लाने का प्रमुख प्लेटफार्म मुहैया कराती है। विश्व के 25 देशों में इसकी शाखाएं हैं। इसके केंद्र  तीसरी दुनिया के मुल्क हैं जिनमें एक भारत भी है। यहां इसका कार्यालय वर्ष 2010 से काम कर रहा है।

गुरु नानक देव को कैसे देखता है हिंदी अकादमिक जगत

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में कांगड़ा स्थित देहरा परिसर में “गुरु नानक देव का जीवन और उनके विचारों का समाज पर प्रभाव” विषय को लेकर 26-27 सितंबर 2019 को राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया है। संयोजक प्रोफेसर सतीश गंजू ने बताया कि यह कार्यक्रम हिमाचल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सहयोग से किया जा रहा है। केंद्रीय विश्वविद्यालय में परिसर देहरा सप्तसिंधु परिसर के नाम से जाना जाता है।

गुरु नानक देव

इस साल गुरु नानक देव की 550वीं जयंती मनाई जा रही है। आयोजकों का मानना है कि गुरु नानक देव उस दशगुरु परंपरा के उन्नायक थे जिसने भारत के मध्यकालीन इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीगुरुग्रंथ साहिब इसी परंपरा की देन हैं जिसने भारतीय चिंतन में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। जाहिर है ऐसे में गुरु नानक देव के विचार और उनकी परंपरा के विभिन्न पक्षों को समझना समाज और शिक्षा के लिए स्वाभाविक है।

परिसंवाद के कुछ उप विषय इस तरह हैं- गुरु नानक देव के काल की सामाजिक और सांस्कृतिक अवस्था, गुरु नानक देव की यात्राओं का उद्देश्य और प्रभाव, भारत में विदेशी शासन से मुक्ति के आंदोलन में दश-गुरु परंपरा का योगदान, गुरु नानक देव की वाणी में खालसा पंथ के सृजन के बीज, सप्त सिंधु क्षेत्र, पश्चिमोत्तर भारत में मतांतरण रोकने में दश गुरु परंपरा का योगदान, गुरु नानक देव में ब्रह्म का स्वरूप, नानकवाणी में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा और गुरु नानक देव की हिमाचल प्रदेश की यात्राएं और उनका मूल्यांकन। जम्मू कश्मीर, लद्दाख, गिलगित और वालिस्तान में गुरु नानक देव की यात्राओँ का मूल्यांकन. जपजी साहब-एक मूल्याकंन, सिद्धगोष्ठी- एक मूल्यांकन और संस्कृत साहित्य में गुरु नानक देव का विवेचन।

संबंधित पूर्ण शोधपत्र 30 अगस्त 2019 तक satishganjoo@hotmail.com  पर भेजे जा सकते हैं। शोधपत्र में संदर्भ का उल्लेख करते समय लेखक का नाम, पुस्तक का नाम, प्रकाशक, वर्ष और पेज संख्या जरूर लिखें। संयोजक प्रोफेसर सतीश गंजू का मोबाइल नंबर 7289991959 और 8894446159 हैं। देहरा धर्मशाला-जालंधर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित नगर है। ये व्यास नदी के किनारे है और शिवालिक की पहाड़ियों में बसा है। देहरा कांगड़ा जिले की तहसील है।

मिथकीय चरित्रों पर साहित्य

हिंदी साहित्य में मिथकीय रचनाओं के कई ऐतिहासिक और दिलचस्प प्रयोग होते रहे हैं। इसी विषय को लेकर कुछ शोधछात्र एक पुस्तक लाने की तैयारी में है जिसके लिए शिक्षक समुदाय और छात्रों से शोध पत्र आमंत्रित किए गए हैं।  आयोजन से जुड़े शोध छात्रों का मानना है कि भारतीय साहित्य में कुछ मिथकीय चरित्र हमेशा ही रचनाकारों की रचनाओं के विषय बने हैं, जिनमें राम, शिव, कृष्ण, हनुमान, कर्ण आदि महत्वपूर्ण है। मिथक बनने की लम्बी प्रक्रियाओं में लोक मानस जितना सहायक रहा है उतना ही योगदान साहित्य सृजन की श्रृंखलाओं का भी रहा है। यह श्रृंखलाएँ विशिष्ट पात्र को लेकर संस्कृत से लेकर आधुनिक भारतीय भाषाओं तक दृष्टिगोचर होती है। इन मिथकीय चरित्रों में जिन चरित्रों ने लेखकों को आकृष्ट किया उनमें राम तथा कृष्ण महत्वपूर्ण है। उप-विषय हैं- पद्य रचनाओं में मिथकों का विश्लेषणात्मक अध्ययन- राम आधारित काव्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन है जिनमें रामचरितमानस- तुलसीदास, रामचंद्रिका- केशवदास, बरवै रामायण- तुलसीदास, अष्टयाम- नाभादास, भँवरगीत- नंददास,साकेत- मैथिलीशरण गुप्त, राम की शक्ति पूजा- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘, अग्निलीक- भारत भूषण अग्रवाल आदि।

हालांकि प्रश्न यह उठता है कि भारतीय संस्कृति में वर्चस्ववाद के प्रतीक मिथकों पर पहले भी बहुत काम हो चुका है। इन्हें मजबूत बनाने के लिए अनेक लेखक, कवि, फिल्मकार सक्रिय रहे हैं। ऐसे में यह पुस्तक नया क्या प्रस्तुत करने वाली है?

दूसरी ओर बहुसंख्यक भारतीय समा ज को समतामूल दृष्टि देने वाले मिथक महिषासुर, शंबूक, एकलव्य, बर्बरीक, हिडिंबा आदि उपेक्षित हैं। क्या यह बेहतर नहीं होता कि नई पीढी अपनी उर्जा इन मिथकों के कथ्य को सामने लाने में लगाती? 

बहरहाल, पुस्तक के संपादकों ने बताया कि विषय से संबंधित आलेख 2000 से 3000 शब्दसीमा में होने चाहिए। इसकी अंतिम तिथि 31 अगस्त 2019 है जो आयोजकों के मुताबिक बढ़ाई जा रही है। शोधपत्र Rahul.best9222@gmail.com  पर भेजे जा सकते हैं। राहुल प्रसाद और रजत शर्मा से 9429282064, 8368048147, 9582749094 या 9340980829 नंबरों पर फोन से ज्यादा जानकारी ली जा सकती है।

भक्ति आंदोलन और कबीर

दिल्ली विश्वविद्यालय के एआरएसडी कालेज धौला कुआँ ने यूजीसी के सहयोग से 19-20 सितंबर को भक्ति आंदोलन और कबीर विषयक दिन का राष्ट्रीय सेमिनार रखा है। आयोजकों के मुताबिक पिछले साल भले ही कबीर 500 वीं पुण्यतिथि खासी धूमधाम से मनाई गई लेकिन यह भी अनुभव किया कि कबीर काव्य के कुछ पहलुओं पर अभी भी बात करने की ज़रूरत है। वैसे भी कबीर जैसे विराट काव्य व्यक्तित्व में बहुत कुछ ऐसा है जिस पर निरंतर चर्चा आयोजित करने की ज़रूरत है। कबीर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ सामाजिक रुढ़ियों का भंजन किया, आध्यात्मिकता के दरवाजे सब के लिए खोल दिए बल्कि भक्ति और ईश्वर की उपासना के माध्यम से धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक परिवर्तन का एक प्रवाहमान आंदोलन खड़ा कर दिया जिसने भारतीय समाज को सदियों तक आंदोलित रखा। अलौकिकता के शून्य में अटके और अवरुद्ध हुए भक्ति और धर्म-दर्शन को लौकिक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए उन्होंने उसे जनतांत्रिक रूप दिया। इस तरह शास्त्रीयता के कैदखाने में निबद्ध भक्ति और ज्ञान को सर्वजन सुलभ बना दिया। जो आगे चलकर विभिन्न भक्ति काव्यधाराओं में प्रवाहित हुआ और भक्ति आन्दोलन के नाम से जाना गया। भक्ति आन्दोलन अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक परिस्थितियों की अनिवार्य देन था। वह युग जीवन की ऐतिहासिक मांग बन कर आया। इस तथ्य का अनुमान महज इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने न सिर्फ अपने समय की राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक जड़ता को तोड़ा बल्कि चली आती हुई सांस्कृतिक धारा के साथ विजेताओं की नयी संस्कृति को घुलाते-मिलाते हुए पहली बार जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण से निरपेक्ष एक मानव धर्म तथा एक मानव संस्कृति की परिकल्पना सामने रखी। भक्ति आन्दोलन ने जन सामान्य को सम्मानपूर्वक जीने के रास्ता दिखाया, आत्म गौरव का भाव जगाया, जीवन के प्रति सकारात्मक आस्थापूर्ण दृष्टिकोण विकसित किया और समस्त मानव के समान अधिकारों की उद्घोषणा की।

कबीर की पोंटिंग

इस तरह धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संधि-बिंदु पर खड़े कबीर ने मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। भक्ति आन्दोलन के व्यापक पटल पर कबीर का मूल्यांकन करने और उनके योगदान को रेखांकित करने के लिए हमें कबीर के जीवन और काव्य को बहुत नजदीक से देखना–परखना पड़ेगा। 

आयोजकों के मुताबिक प्रपत्र के लिए संभावित मुख्य विषय निम्नलिखित हो सकते हैं- भक्ति आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भक्ति आन्दोलन और हिंदी भक्ति काव्य, भक्ति आन्दोलन का दार्शनिक परिप्रेक्ष्य,  भक्ति आन्दोलन राजनैतिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, भक्ति आन्दोलन का अखिल भारतीय स्वरूप, किन्ही दो भारतीय भाषाओँ के भक्ति आन्दोलन से प्रभावित काव्य का तुलनात्मक अध्ययन, तुलसी/ सूर/ मीरा/ रैदास/ और भक्ति आन्दोलन, भक्ति काव्य की ऐतिहासिकता, तुलसी/ सूर/ मीरा/ रैदास/ के काव्य में मौजूद ऐतिहासिक सन्दर्भ, हिंदी साहित्य का इतिहास और भक्ति काव्य, हिंदी नवजागरण और भक्ति आन्दोलन, समकालीन विमर्श और भक्ति आन्दोलन (किसी एक विमर्श के सन्दर्भ में), समकालीन विमर्श और भक्ति साहित्य (किसी एक विमर्श के सन्दर्भ में), एकेश्वरवाद और कबीर काव्य, भक्ति और ज्ञान का स्वरूप और कबीर, कबीर काव्य और भक्ति आन्दोलन। 

पूर्ण शोध पत्र भेजने करने की अंतिम तिथि 10 सितंबर 2019 है जो mishraarvind247@gmail.com पर भेजा जा सकता है। शोधपत्र अंग्रेज़ी या हिन्दी किसी भी माध्यम में हो सकता है। शब्द सीमा अधिकतम 4000 से 6000 होनी चाहिए। लेखक और सह-लेखक की संख्या दो से अधिक नही होने चाहिए। कार्यक्रम के संयोजक दीपांकर को 9990179780 और सदस्य डॉ. अरविंद कुमार मिश्र को 9311558473 नंबरों पर अधिक जानकारी के लिए संपर्क किया जा सकता है। आयोजन समिति में अजीत कुमार, डॉ. श्रीधरम, डॉ. विकास कुमार भी हैं।

जनजातीय साहित्य पर संजा का लोकोत्सव 14 से

उज्जैन के जाने माने संजा लोकोत्सव 2019 में इस बार 14-15 सितंबर 2019 को लोक और जनजातीय साहित्य एवं संस्कृति और हिंदी: सरोकार और संवेदनाएँ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी हो रही है। हालांकि इसके बाद भी कार्यक्रमों का सिलसिला 22 सितंबर तक चलता रहेगा। इसे संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, नागपुर, संस्कृति संचालनालय और मध्यप्रदेश सरकार के सौजन्य से सम्पन्न किया जा रहा है। आयोजकों ने बताया कि इस संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रख्यात मनीषी, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, समाजसेवी, विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, शोधकर्ता विशिष्ट व्याख्यान, शोध व आलेख प्रस्तुति देंगे और संवाद करेंगे।

शोध आलेख लोक भाषा मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, मारवाड़ी, हाड़ौती, अवधी, ब्रजी, कौरवी, मैथिली, भोजपुरी, हरियाणवी, हिमाचली, डोगरी, कश्मीरी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, ओड़िया, कोंकणी, बांग्ला, असमिया, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, तुळु, पूर्वोत्तर भारत आदि सहित देश-देशान्तर के विविध लोकांचलों के लोक साहित्य, लोक संस्कृति और परंपराओं को केंद्र में रख कर तैयार किए जा सकते हैं।

इसी प्रकार विविध जनजातीय समुदायों, यथा भील, भिलाला, बारेला, संथाल, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, लेपचा, भूटिया, थारू, बोडो, गारो, खासी, नागा, कूकी, पारधी, गरासिया, मीणा, उरांव, बिरहोर, सहरिया, कोरकू, बैगा, परधान, मारिया, उरांव, अबूझमाड़िया, टोडा, कुरुम्बा आदि सहित देश-देशान्तर के मौखिक साहित्य, लोक संस्कृति और परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में आलेख तैयार किए जा सकते हैं।

जनजातीय साहित्य के सरोकार और संवेदनाओं में लोक एवं जनजातीय नाट्य, नृत्य और संगीत रूप की सरोकार और संवेदनाएँ, लोक एवं जनजातीय चित्र, शिल्प और अन्य कलाभिव्यक्तियों के अलावा जनजातीय भाषाओं व्याकरणिक और भाषावैज्ञानिक अध्ययन रखे जा सकते हैं।

विस्तृत शोध पत्र/ शोध सार ईमेल द्वारा 13 सितंबर 2019 तक प्रेषित किये जा सकते हैं। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा का मोबाइल नंबर 9826047765 है। शोध पत्र shailendrakumarsharma66@gmail.com  और  कुमार किशन, सचिव, प्रतिकल्पा को pratikalpaujjain@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं। संगोष्ठी सत्र मध्यप्रदेश सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान, भरतपुरी, देवास रोड, उज्जैन में है। किसी भी तरह की विस्तारपूर्ण जानकारी के लिए शैलेंद्र कुमार और कुमार किशन को संपर्क किया जा सकता है। 

नेमीचंद्र जैन जनशतवार्षिकी

सुप्रसिद्ध कवि, समालोचक, नाट्य-समीक्षक, पत्रकार नेमीचंद्र की याद में आयोजित जनशतवार्षिकी कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी ने शुक्रवार 30 अगस्त को दिल्ली के रविंद्र भवन सभागार में एक दिन का परिसंवाद कार्यक्रम आयोजित किया है। उद्घाटन सत्र में रश्मि वाजपेयी, माधव कौशिक, नंद किशोर आचार्य, ज्योतिष जोशी और अन्य विद्वान शिरकत करेंगे।

पहले सत्र में नाट्यालोचन और संस्कृति विमर्श होगा जिसमें हृषिकेश सुलभ, अनूप सेठी, कीर्ति जैन आलेख का पाठ करेंगे जबकि सत्र की अध्यक्षता देवेंद्र राज अंकुर करेंगे। दूसरे सत्र में काव्यावदान और काव्यचिंतन पर चर्चा होगी। इसमें ध्रुव शुक्ल, ओम निश्चल, हेमंत शेष अपने विचार रखेंगे। शाम को आखिरी सत्र में काव्यालोचन और साक्षात्कार होगा। सत्यदेव त्रिपाठी, प्रभात रंजन और पल्लव इसमें मुख्य वक्ता होंगे।  कार्यक्रम के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए अकादेमी के आफिस 011 23385626/ 27/ 28 पर संपर्क किया जा सकता है। अकादेमी का ईमेल पता है- secretary@sahitya-akademi.gov.in

अमृतलाल नागर का योगदान

हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विज्ञान लखनऊ विश्वविद्यालय और हिंदुस्तानी अकागमी प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में 31 अगस्त को मालनीय नगर लखनऊ में अमृतलाल नागर (1916-1990) के साहित्य के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर राष्ट्रीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। ‘मानस का हंस’, ‘अमृत और विष’, ‘खंजन नयन’ जैसी कृतियों के लेखक नागर का साहित्य में उल्लेखनीय योगदान रहा है। उन्हें 1981 में पद्मभूषण पुरस्कार प्रदान किया गया था।

गोष्ठी के आयोजक प्रोफेसर योगेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि उद्घाटन सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सूरज बहादुर थापा कार्यक्रम में मुख्य वक्ता होंगे। प्रो. सदानंद गुप्त और कुलपति सुरेंद्र प्रताप सिंह, हिंदुस्तानी अकादमी प्रयागराज के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. उदय प्रताप सिंह भी कार्यक्रम में अमृतनागर के रचना संसार पर विचार प्रकट करेंगे। पहले अकादमिक सत्र में महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रोफेसर अवधेश कुमार शुक्ल के अलावा स्थानीय प्रोफेसर कैलास देवी सिंह और हरिशंकर मिश्र प्रमुख वक्ता होंगे। इसी सत्र में शोध पत्रों के वाचन का भी कार्यक्रम होगा। दूसरे अकादमिक सत्र में कोलकाता के प्रो. प्रेमशंकर त्रिपाठी के अलावा लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रो. फाजिल हासमी, रश्मि कुमार और प्रो. पवन अग्रवाल विचार रखेंगे। 

कार्यक्रम में शोध पत्र शामिल करने के लिए 30 अगस्त तक अपना पूर्ण शोध पत्र yp.hindi.indology@gmail.com पर भेज सकते हैं। शिक्षक और छात्र दोनों वर्ग के लिए पंजीकरण शुल्क 500 रुपए रखा गया है। अधिक जानकारी के लिए प्रोफेसर योगेंद्र को 9419514942 और पवन अग्रवाल के 9450511639 पर संपर्क किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन

दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के हिंदी परिप्रेक्ष्य को लेकर अगले साल 9 से 11 जनवरी को होने वाले आयोजन के लिए भाषा, साहित्य और अनुवाद पर 1 सितंबर 2019 को शोध सारांश और 30 सितंबर पूर्ण शोधपत्र/ आलेख आमंत्रित किए हैं। इस कार्यक्रम को न्यूयार्क यूनिवर्सिटी दक्षिण एशिया भाषा कार्यक्रम और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के हिंदू-उर्दू भाषा कार्यक्रम के सहयोग से किया जा रहा है।

इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. बाबली मोइत्रा सराफ के मुताबिक, यह कार्यक्रम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को वैश्विक स्तर पर ले जाएगा। इस आयोजन की सलाहकार समिति में उनके अलावा न्यूयार्क यूनिवर्सिटी केंद्र की प्रोफेसर गेब्रिएला मिक इलिएवा और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राकेश रंजन भी हैं। अनुवाद अध्ययन केंद्र की डॉक्टर रेखा सेठी और डॉ. विनीता सिन्हा कार्यक्रम के शैक्षणिक संयोजक है। इस बारे में किसी भी तरह के पत्राचार के लिए ihcipcollege@ip.du.ac.in पर संपर्क किया जा सकता है।

हिंदी, सिंधी, मराठी में काफी कुछ साझा 

हिंदी, सिंधी और मराठी के भाषा, साहित्य और संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन को लेकर मानव संसाधन मंत्रालय के सहयोग से मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय मंबई ने 18 सितंबर 2019 को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। इसके आयोजन मे राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद भी मदद कर रहा है।

संगोष्ठी संयोजक डॉ. रवींद्र कात्यायन ने बताया कि इस संगोष्ठी के लिए शिक्षकों और छात्रों से 15 सितंबर तक शोध आलेख मंगाए गए हैं। 

तीनों भाषाओँ के साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के अलावा बहुसंस्कृतिवाद और भारतीय साहित्य, सांस्कृतिक भिन्नताएं, साहित्यिक विधाएं और सांस्कृतिक परिदृश्य, अध्ययन की नई दिशाएं, भारतीय बनाम विदेशी संस्कृति जैसे विषयों पर शोध आलेख लिखे जा सकते हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की कुलगुरु शशिकला वंजारी करेंगी। शोधपत्र 4ichss@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं। अन्य जानकारी के लिए संगोष्ठी संयोजक को 9324389238 पर संपर्क किया जा सकता है।

मंगलम स्वामीनाथन पुरस्कार

प्राख्यात पत्रकार डॉ. मंगलम स्वामीनाथन की याद में डॉ मंगलम स्वामीनाथन फाउंडेशन ने पहली बार पत्रकारिता पुरस्कार के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की हैं। पुरस्कार के पांच वर्गों में एक-एक लाख रुपये की धनराशि और प्रशस्ति पत्र दिए जाएंगे। दिल्ली में 29 नवंबर को मंगलम स्वामीनाथन की 55वीं जयंती पर फाउंडेशन से आयोजन रखा है जिसमें ये पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा कला संस्कृति साहित्य, साइंस रिपोर्टिंग, सामाजिक कार्यों के लिए भी ये पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। इस पुरस्कार की खास बात ये भी होगी इसमें मेडिकल माफिया के भंडाफोड़ करने जैसे सामाजिक कल्याण से जुड़ी पत्रकारिता करने वालों को नामित किया जा सकता है। पुरस्कार का निर्णय विशेषज्ञों की एक समिति करेगी। पुरस्कार के आवेदन और प्रविष्टियां 30 सितंबर 2019 तक मांगी गई हैं। पुरस्कारों की घोषणा नवंबर के पहले हफ्ते में की जा सकती है।

बता दें कि डॉ. मंगलम स्वामीनाथन तमिलनाडु में जन्मी थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा चेन्नई और फिर दिल्ली में हुई थी। पीएचडी के साथ ही वह इतिहास और अंग्रेजी से डबल एम.ए. थीं। 1985 में उन्होंने प्रोव मैगजीन से अपना कैरियर शुरू किया था। वह प्रेस इंस्टिस्यूट ऑफ इंडिया, समाचार एजेंसी यूएनआई और न्यूज टाइम्स में काम कर चुकी थीं। 52 साल में जब उनका असामयिक निधन हुआ तब उस समय वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) से जुड़ी थीं।  फाउंडेशन अब डॉ. मंगलम के सरोकारों को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

पुरस्कार के लिए संबंधित विस्तृत जानकारी और प्रारूप भरने के लिए http://www.msfoundation.in  पर जाएं। अधिक जानकारी के लिए फाउंडेशन के ईमेल- drmsfoundation@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। फाउंडेशन का पता है- 227 मालवा सिंह ब्लाक, एशियाड विलेज, नई दिल्ली, 110049।  

(संपादन : नवल)


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