भारत रत्न से बड़े आदिवासियों के सुन्हेर, गोंडवाना दर्शन को पहुंचाया राष्ट्रीय फलक पर

आगामी 7 नवंबर को महाराष्ट्र के कचारगढ़ के सकाली में सुन्हेर सिंह ताराम की पहली पुण्यतिथि मनाए जाने की तैयारी चल रही है। उनका जीवन गोंड संस्कृति और गोंडी भाषा को समर्पित था। यही वजह रही कि गोंडवाना वासी उन्हें अपना रत्न मानते हैं। कमल चंद्रवंशी की रिपोर्ट

भारत रत्न सबका है, लेकिन अतिशयोक्ति नहीं कि आदिवासी समाज के लिए गोंडवाना रत्न ‘भारत रत्न’ से बड़ा सम्मान है। इस सम्मान से सम्मानित सुन्हेर सिंह ताराम (4 अप्रैल, 1942 – 7 नवंबर 2018) ‘गोंडवाना दर्शन’ मासिक पत्रिका के संस्थापक-संपादक रहे। इस प्रसिद्ध लोक भाषाविद् और संस्कृतिकर्मी की पहली पुण्यतिथि के मौके पर 7 नवंबर 2019 को आदिवासी भाषा संशोधन केंद्र, कचारगढ़ में ‘गोंडवाना दर्शन व साहित्य’ पर विशेष परिचर्चा आयोजित की गई है। इस परिचर्चा का उद्घाटन संस्कृति मंडल, मुंबई से जुड़े लखन सिंह कटरे करेंगे। अध्यक्षता गोंडी साहित्यिक सभा, राजनांदगांव से संबद्ध भरतलाल कोरामजी करेंगे। जबकि विशेष अतिथि के तौर पुष्पाताई तिलगाम (छिंदवाडा) होंगी। कार्यक्रम में रामनाथ ओईमा (इलाहाबाद) भी भाग लेंगे।

परिचर्चा में मध्य प्रदेश की जानी मानी समाज सेविका हिरासन उईके, प्राध्यापक रेखाताई जुमनाके (वर्धा), नसिब कुसरे (गोंडी पुनेम अभ्यासक, भोपाल), माजी प्राचार्य  मानिकरावजी गेडाम, (गोंदिया), मनिरावण दुगा, गोंडी शब्दकोश रचनाकार (गढ़चिरौली), रमाताई टेकाम (बालाघाट, मध्य प्रदेश) आदि भी शामिल होंगे। 

बता दें कि सुन्हेर सिंह ताराम का पिछले साल यानी 7 नवंबर 2018 को निधन हुआ था। वह गोंडवाना की अति प्राचीन भाषा, साहित्य, संस्कृति और इतिहास के अध्येता थे। उन्होंने ‘गोंडवाना दर्शन’ मासिक पत्रिका का 32 साल तक संपादन किया था।

सुन्हेर सिंह ताराम (4 अप्रैल, 1942 – 7 नवंबर 2018)

उनकी जीवन साथी ऊषा किरण आत्राम, जो स्वयं भी गोंडी भाषा व संस्कृति की अध्येता हैं, का कहना है कि उनको (सुन्हेरजी) जिंदगी में रचनात्मक काम करने थे। ऐसा सोचकर उन्होंने अधिकारी पद से त्याग-पत्र दे दिया और दिल्ली चले गए। वहां पर पीएचडी करने और पत्रकारिता की परीक्षा पास करने के बाद पूरे भारत में घूमते रहे। आदिवासियों की बोली, भाषा और उनकी सामाजिक व्यवस्था को देखते-समझते रहे। वे समाज के सभी लोगों जैसे कि भुमका (पुरोहित), गवठीया (मध्यम जोत वाले किसान), जमींदार और समाज-सेवकों से मिलते रहे और जानकारी लेते रहे। उन्होंने उन स्थलों को खोजा, जो गोंडी धर्म और संस्कृति से जुड़े थे। उन्होंने इन सभी को कलमबद्ध किया और अपनी पत्रिका के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया। उनकी विशेष दिलचस्पी गोटुल में थी, जहां पारंपरिक शिक्षा दी जाती है। गोंडी भाषा और परंपरा के प्रति वे इस हद तक समर्पित थे कि उन्हें घर-परिवार की चिंता नहीं रहती। उन्हें अपने चैन और सुख की कोई लालसा नहीं थी।”


आत्राम बताती हैं कि “वर्ष 1983 में सुन्हेर सिंह ताराम ने खुद के दम पर ‘गोंडवाना सगा’ और 1985 से ‘गोंडवाना दर्शन’ मासिक पत्रिका की शुरुआत की। इन पत्रिकाओं के माध्यम से पूरे भारत में गोंडी भाषा, इतिहास, साहित्य, संस्कृति, समाज, जीवन आदि विविध विषयों पर आलेख व शोध प्रकाशित करते रहे। उनके इस प्रयास के कारण गोंडवाना के इलाकों में अपनी भाषा और परंपरा के प्रति लोग सचेत हुए। वहीं अन्य प्रदेशों में लोगों ने गोंडी भाषा, साहित्य और परंपराओं को जाना-समझा। वह आदिवासियों की अति प्राचीन भाषाओं को जिंदा रखना चाहते थे। इसलिए, इन भाषाओं के लोक-साहित्य लोक-गीत, लोक-कहानी, इतिहास और धर्म-संस्कृति आदि पर चर्चाओं का आयोजन करते रहे। उनके जीवन का उद्देश्य केवल यही रहा कि कैसे आदिवासियों की भाषा और उनकी संस्कृति की रक्षा हो सके।

यह भी पढ़ें : गोंडवाना रत्न सुन्हेरसिंह ताराम : गोंडी भाषा और साहित्य का दीपक जलाने वाले कर्मनिष्ठ समाज-सेवक

आत्राम बताती हैं कि “उन्होंने (सुन्हेर सिंह ताराम) चालीस साल समाज की निस्वार्थ भाव से सेवा की। इन सालों की साहित्य यात्रा दुःखदायी, कष्टदायी, संघर्षमय व पीड़ादायक रही। उनका जीवन मार्ग कांटों से भरा था। इस दौरान उन्होंने 18 गोंडी साहित्य सम्मेलन और 100 से ज्यादा सेमिनार आयोजित किए। इन सब का लेखा-जोखा लिखने की वह तैयारी कर रहे थे। लेकिन इस बारे में लिखना आधा छूट गया और वह इसी दौरान दुनिया से विदा हो गए।”

सुन्हेर सिंह ताराम के जीवन के बारे में ताराम काफी कुछ नहीं लिख सके। उनकी पत्नी उषाकिरण आत्राम बताती हैं कि उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसमें शिक्षा के प्रति झुकाव नहीं था। उनके परिजन उन्हें पढ़ने नहीं देना चाहते थे। पढ़ने के लिए वे अपने घर से भाग गए। उन्होंने बगीचों में और खेतों में काम किया। साथ ही वह कपड़े भी प्रेस किया करते। इन कामों से उन्हें एक रुपए मजदूरी मिलती। बाद में उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर भी अपने लिए भोजन और पढ़ाई आदि का खर्च निकाला। 

आत्राम के मुताबिक सुन्हेर सिंह ताराम ने लाइब्रेरी में चौकीदारी की। इसके पीछे उनका उद्देश्य यह रहा कि वे किताबें पढ़ सकें। साथ ही कुछ पैसे भी मिल जाते। अपने बारे में एक नोट में ताराम जी ने लिखा है –

“बाहर रहकर मैं किसी तरह ग्रेजुएट हो गया। फिर एक लाइब्रेरी में चौकीदारी करता था, क्योंकि यहां पढ़ने के लिए किताबें मिल जाती थीं। गर्मी के छुट्टी में और दीपावली की छुट्टी में चचेरे भाई घर जाते थे। खुशी मना कर वापस आते थे। लेकिन मैं छुट्टी में ढिमर (मछुआरे) लोगों के साथ के साथ आलू भट्टे (आलू पकाने की एक विधि) लगाता था। मजदूरी के पैसे से किताब-कॉपी लेता था। ऐसे करते-करते मैं मैट्रिक प्रथम श्रेणी से पास हो गया था। बाद में पिताजी ने पढ़ने के का विरोध किया, लेकिन मैं पढ़ने गया। ग्रंथालय में चौकीदारी करके डिग्री पास की और समाज कल्याण विभाग में प्रखंड ऑफिसर बन गया।” 


उषाकिरण आत्राम बताती हैं कि “वर्ष 1981 में बनिया गांव में अखिल गोंडवाना महासभा बस्तर संभाग का तीन दिवसीय सम्मेलन हो रहा था। वहां पर लोगों से मिले। उन्होंने चांपा (छत्तीसगढ़) की लहर संस्था में एक महीने तक काम किया। कोलकाता के अधैन्दू चटर्जी, नई दिल्ली के नरेन्द्र, तेजप्रताप, लोकायन के राजगोपाल पी.व्ही. सबने एक सर्वोदय संस्था बनाने को कहा। सर्वोदय कार्यकर्ता सीताराम मसराम के साथ संस्था बनाई। एक साल काम किया, लेकिन उनकी विचारधारा के साथ सुन्हेर बहुत दिन नहीं चल सके। इसलिए, छोड़कर दिल्ली पढ़ने के लिए आए। दिल्ली में एक मित्र के यहां ठहरे और दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध करने इंडियन इन्सीट्यूट ऑफ सोशल साईंस में अध्ययन करने लगे। दिल्ली में लाइब्रेरी में पढ़ने जाने लगे। नागपुर में मोतीरावण कंगाली, शीतल मरकाम, बीएल कोर्राम, केबी मरस कोल्हे कुल पांच लोग बैठक करते और और कचारगढ़ गुफा की खोज पड़ताल में जुट गए। यह आदिवासी समाज के पूर्वजों का पवित्र स्थल है। यह मानकर कि देशभर के लोग आएंगे, यहां मेले का आयोजन किया गया। इस दौर में आदिवासी और क्षेत्रीय सामाजिक और सियासी हस्तियां एक साथ जमा हुईं।

वर्ष 2015 में गोंडवाना दर्शन रजत जयंती कार्यक्रम के मौके पर सुन्हेरसिंह ताराम का सम्मान करते छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह

आत्राम के मुताबिक, ताराम जी साहित्य को महत्वपूर्ण मानते थे। वे कहते थे कि जिस समाज का साहित्य होता है, वहां उसका दर्पण मौजूद होता है। साहित्य को लेकर उनकी प्रतिबद्धता ऐसी थी कि जब पत्रिका निकालने को उनके पास पैसे नहीं थे, तब उन्होंने बैल की एक जोड़ी बेचकर रखे गए पैसे को भी खर्च कर दिया। तब ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं थी कि जो पत्रिका की मदद मांगने के नाम पर ताने देते कि क्या करेगा पत्रिका निकालकर? कौन सा समाज का फायदा होगा? पत्रिका निकालना तुम्हारे जैसे लोगों के बूते से बाहर है। 

गोंडवानी दर्शन का सूत्रपात

परंतु, ताराम हार कहां मानने वाले थे। वे मन में पक्का भरोसा कर चुके थे, सो भोपाल से 19 दिसम्बर 1985 से पत्रिका निकालनी शुरू कर दी। जब पत्रिका छपी तो वह दिन, वीर नारायण सोना खान की पुण्यतिथि का था। राजोदिया धर्मशाला के सभागृह में कार्यक्रम हुआ। मुख्य अतिथि के तौर पर संगीत सम्राट चक्रधर सिंह पुर्रे, रायगढ़ राजा के बेटे भानुप्रताप सिंह शामिल हुए। इस मौके पर भानु प्रताप सिंह ने कवि आनंद धुर्वे, कोमलसिंह मरई (भोपाल), मोतीरावणा कंगाली (नागपुर), कल्याण सिंह वरखडे (गोंडी भाषा प्रचारक), रामनाथ ओईमा (इलाहाबाद), बल्लम सिंह केसर को सम्मानित किया था। 1987 में ‘गोंडवाना सगा’ नाम की पत्रिका का नाम बदलकर ‘गोंडवाना दर्शन’ हुआ। तब इसे भारत सरकार के अधीन संस्था आरएनआई (राजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स इन इंडिया) से पंजीकृत किया गया और तब से यह निर्बाध प्रकाशित होता रहा।

(संपादन : नवल/सिद्धार्थ)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply