सुन्हेर सिंह ताराम और डॉ. मोतीरावन कंगाली के नाम पर पुरस्कार की घोषण

बीते 7 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र के कचारगढ़ में गोंडवाना दर्शन के संपादक और गोंडी भाषा के अध्येता सुन्हेर सिंह ताराम को उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर याद किया गया। इस मौके पर विभिन्न राज्यों से गोंडी भाषा के बुद्धिजीवी जुटे। शताली शेडमाके की रिपोर्ट 

गोंडी भाषा और उसके साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को डॉ. मोतीरावन कंगाली  (2 फरवरी, 1949 – 30 अक्टूबर, 2015) साहित्य सम्मान तथा गोंडी भाषा में निर्भीक पत्रकारिता के क्षेत्र में सुन्हेर सिंह ताराम  (4 अप्रैल, 1942 – 7 नवंबर, 2018) सम्मान दिया जाएगा। इस आशय की घोषणा आदिवासी भाषा विकास केंद्र, धनेंगांव (कचारगढ़, महराष्ट्र) की संचालक उषाकिरण आत्राम ने बीते 7 नवंबर 2019 को की। यह मौका था गोंडी भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के अध्येता सुन्हेर सिंह ताराम की प्रथम पुण्यतिथि समारोह का।

इस मौके पर विभिन्न राज्यों से आये गोंड समुदाय के बुद्धिजीवी एकजुट हुए और ताराम जी की समाधि पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद साहित्य सरिता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रारंभिक संबोधन ताराम जी की पत्नी व आदिवासी भाषा विकास केंद्र की संचालक उषाकिरण आत्राम ने किया। उन्होंने सुन्हेर सिंह ताराम के जीवन के विविध पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। इसमें ताराम जी द्वारा किए गए सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यों एवं 32 वर्ष तक गोंडवाना दर्शन पत्रिका के प्रकाशन के संबंध में अनुभव शामिल रहे।

कार्यक्रम का उद्घाटन लखनसिंह कटरेजी ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने भाषा और साहित्य पर अपने विचार प्रस्तूत किया तथा तारामजी के कार्य के प्रति सम्मान प्रकट किया। वहीं मुख्य अतिथि मानिकराव गेडाम ने कहा कि तारामजी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। गोंडी साहित्य व संस्कृति को लेकर शोध करते थे और शोधोपरांत अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर उसे जन-जन तक पहुंचाते थे। उन्होंने कहा कि ताराम जी एक विचारवान, निस्वार्थ और निर्भीक भाव से पत्रकारिता करते थे। यही उनकी खासियत थी। 

सुन्हेर सिंह ताराम की प्रथम जयंती पर महाराष्ट्र के कचारगढ़ में उनकी समाधि स्थल पर गोंडी भाषा के अध्येतागण

गोंडी समाज की प्रख्यात समाजसेविका समाजसेविका हिरासनबाई उईके ने अपनी बात रखते हुए कहा कि तारामजी ने 18 साहित्य सम्मेलनों का आयोजन किया। उनका मकसद यही होता कि गोंडी संस्कृति, साहित्य और परंपराओं के बारे में गोंड समुदाय के लोगों को तो जानकारी मिले ही, दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं के लोगों को भी जानकारी मिले। वे मानते थे कि ऐसा करना कोइतूर समाज की पंरपराओं को बचाये रखने के लिए आवश्यक है। उन्होंने वही लिखा जो अपनी आंखों से देखा और अनुभव किया। वे आम लोगों से सरोकार रखने वाले पत्रकार और समाजसेवी थे। हिरासनबाई उईके ने कहा कि  ताराम जी के कारण ही मुझे अपने समाज के लोगों के लिए काम करने की प्रेरणा मिली।

एक अन्य वक्ता रेखा जुमनाके ने कहा कि तारामजीने 14 राज्यों में गोंडवाना दर्शन का प्रचार-प्रसार किया। यह एक तरह से भारत के विभिन्न राज्यों में रह रहे गोंड समुदायों के बीच एका स्थापित करने का उनका प्रयास था।

गोंडी भाषा, साहित्य और परंपराओं के दो महान अध्येता : डॉ. मोतीरावन कंगाली और सुन्हेर सिंह ताराम

अपने अध्यक्षीय संबोधन में गोंडवाना साहित्यकार एल.बी. कोर्राम ने कहा कि जब द स्टोरी ऑफ गोंडवाना नामक किताब हमारे सामने आयी तब कचारगढ़ के बारे में जानकारी सामने  आयी। इस किताब से प्रेरणा लेकर हम पांच दोस्त जिनमें सुन्हेर सिंह ताराम भी शामिल थे, 40 साल पहले कचारगढ़ आये थे। तब हमलोगों ने यहां जात्रा (धार्मिक उत्सव) की शुरुआत की। अब यह इतना लोकप्रिय हो चुका है कि अब इस आयोजन में लाखों की संख्या में लोग जुटते हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। जब हमलोगों ने कचारगढ़ को खोज निकाला तब इस बारे में तारामजी, कंगाली जी उसपर लिखते रहे। कचारगढ़ के बारे में गोंडवाना दर्शन  में लेख प्रकाशित हुए और लोगों तक जानकारी पहुंची। धीरे-धीरे लोग जागरूक हुए और आना शुरू किया। 

कोर्राम ने कहा कि सुन्हेर सिंह ताराम सचमुच गोंडवाना रत्न थे। गोंडवाना के विकास को लेकर कार्यों के कारण ही वर्ष 2010 में रायपुर में उन्हें गोंडवाना रत्न की उपाधि दी गयी। 

इस मौके पर दामोदर नेवारे, नथ्थूजी उईके, कवि रमेश शर्मा, रमेश कासा, प्रकाश सलाम, गीता सलाम, अर्चना सयाम, कवि शशि तिवारी, कवि पंचे, युवराज गंगाराम, मानिकराव गेडाम, किरण मोरे, इंद्रा बोपचे आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन संतोष कुंजाम ने किया।   

(टिप्पणी : लेखिका सुन्हेर सिंह ताराम की बेटी हैं)

(कॉपी संपादन : नवल)


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