बाबरी मस्जिद मसले पर क्या होती डॉ. आंबेडकर की राय?

संजीव खुदशाह बता रहे हैं कि डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म को लोकतंत्र के लिए विसंगत बताया था। यदि आज वे होते तो बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत होते

यदि डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891-6 दिसंबर, 1956) होते तो बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से लेकर इस पर होने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपनी क्या राय देते ? इस तरह के सवाल मुझसे कई लोगों ने पूछा है।

ऐसी अपेक्षा दो कारणों से की जाती रही है। पहला यह कि वह एक बैरिस्टर थे साथ-साथ भारतीय संविधान सभा के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष भी थे और दूसरा कारण यह है कि वह एक विचारक थे उन्होंने सामाजिक मूल्यों और इतिहास को लेकर एक नए एंगल से वस्तुओं को देखने और समझने की कोशिश की थी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए 6 दिसंबर का दिन ही क्यों चुना गया?

एक सवाल और उठता है कि द्विजों ने बाबरी विध्वंस के लिए 6 दिसंबर का दिन ही क्यों चुना? जबकि यह सभी जानते हैं कि इसी दिन सन् 1956 में डॉ. आंबेडकर का महापरिनिर्वाण हुआ था।  इस संबंध में सत्याग्रह स्क्रोल में छपे दुष्यंत कुमार अपने “बाबरी मस्जिद को बीआर अंबेडकर की पुण्यतिथि पर ढहाना संयोग था या साज़िश?” शीर्षक लेख में जिक्र करते है। उनके मुताबिक, “इस मामले में दलित चिंतकों के विचार भी दलित नेताओं से भिन्न नहीं हैं. वे भी बाबरी मस्जिद विध्वंस को अंबेडकर की पुण्यतिथि से जोड़ कर देखते हैं( 

इसी लेख में ऑल इंडिया आंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, “हमारा यह विश्वास है कि अंबेडकर को नीचा दिखाने के लिए भाजपा और उनकी ब्रिगेड ने छह दिसंबर के दिन बाबरी मस्जिद गिराई थी। आडवाणी लंबे समय से सांसद रहे. वे जानते थे कि पुण्यतिथि पर बाबा साहब को श्रद्धांजलि देने जाना होता है। इसलिए हमारा मानना है कि बहुत सोच-समझकर छह दिसंबर का दिन चुना गया। मीडिया रिपोर्टों में छपा है कि विध्वंस से एक दिन पहले उन्होंने (कारसेवकों) अभ्यास किया था। मैं उस समय अख़बार चलाता था और मैंने इस बारे में लिखा था. सबको पता था कि यह होने वाला है।”

बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट अपने हालिया फैसले में यह स्वीकार किया है कि बाबरी मस्जिद बाबर के काल में बनाई गई। वह यह भी मानता है कि बाबरी मस्जिद के नीचे किसी प्रकार की गैर मुस्लिम चिन्ह नहीं पाया गये। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि बाबरी मस्जिद को तोड़ना गलत था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में कई टिप्पणीकारों का यह तर्क है कि इस फैसले को जन भावनाओं को ध्यान में रख कर दिया गया है। इसमें एक प्रकार से मस्जिद तोड़ने वालों को ही उस जमीन का मालिकाना हक दे दिया गया है।

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढांचे को तोड़ते हुए हिंदू संगठनों के सदस्य व डॉ. आंबेडकर की तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कट्टरपंथी द्विज नेता, जो शासन में मंत्री भी हैं, वह इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस फैसले का हर किसी को सम्मान करना चाहिए। ये वही नेता हैं जो सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर नारेबाजी कर रहे हैं। इस प्रकार उनका दोहरा चरित्र उजागर होता है।  

इस फैसले पर डॉक्टर अंबेडकर की क्या राय होती?

आंबेडकर कहते हैं, “यदि हिंदू राज अस्तित्व में आ गया तो निस्संदेह यह इस देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिन्दू क्या कहते हैं। हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के लिए खतरा है। इस लिहाज से यह लोकतंत्र के विपरीत है। हिंदू राज को हर हाल में रोका जाना चाहिए। हिंदुस्तान केवल हिंदुओं का है, यह विचार न केवल आक्रामक है, बल्कि अत्यंत ही बकवास है।” (BRAWS, 1990)


जाहिर है कि डॉ. आंबेडकर इस फैसले से आहत होते। वे भारत के राजनीतिक विकास के लिए हिंदू मुस्लिम एकता को जरूरी मानते थे और वह इस बात पर जोर देते थे कि हिंदू मुसलमान में सामंजस्य की विचारधारा होनी चाहिए। 

बहरहाल, कहना अतिश्योक्ति नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारत के धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंचा है। इससे मुसलमान आहत हैं और वे हिन्दू भी जो धर्मनिरपेक्ष संविधान में यकीन रखते हैं। इन परिस्थितियों में हमें एक बार फिर डॉ. अंबेडकर की ओर जाना पड़ेगा। उन‍की हिदायतों पर गौर करना पड़ेगा। वह जिस राजनीतिक विकास की बात कह रहे हैं उसको फिर से पढ़ना पड़ेगा। यह जरूरी इसलिए भी है ताकि भारत अविभाज्य एवं राजनीतिक रूप से स्थिर बना रहे।

संदर्भ :

B.R. Ambedkar: Writings and Speeches (1990A)“Pakistan or the Partition of India”, in Vol. 8, Education Department, Govt. of Maharashtra, Mumbai

(संपादन :गोल्डी/ नवल)


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