फारवर्ड प्रेस की वे किताबें, जिन्हें 2019 में पाठकों का बेहद प्यार मिला 

सिद्धार्थ बता रहे है की किस तरह 2019  में फारवर्ड प्रेस ने दलित-बहुजन समाज के लिए बौद्धिक पूंजी का निर्माण करने में कारगर कदम उठाया और इस संदर्भ में जिन किताबो का प्रकाशन हुआ, उस पर पाठकों ने कैसी सार्थक प्रतिक्रिया जताई

जहां एक ओर बौद्धिक पूंजी वर्चस्व का माध्यम होती है, वहीं दूसरी ओर यह उसी वर्चस्व को तोड़ने और समता आधारित न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करने का भी सबसे बड़ा उपकरण होती है। फारवर्ड प्रेस का मूल उद्देश्य दलित-बहुजन समाज के लिए बौद्धिक पूंजी का निर्माण करना है। यह कार्य हम अपने वेब और किताबों के माध्मय से करते आ रहें हैं।

2019 में हमारी चार किताबों –जाति का विनाश, दलित पैंथर: एक आधिकारिक इतिहास, मदर इंडिया और आरएसएस और बहुजन चिंतन  को पाठकों का बेहद प्यार मिला। जाति का विनाश  सितंबर 2019 में तीसरी बार पुनर्मुद्रित हुई। दलित पैंथर (अंग्रेजी) का दूसरा संस्करण आया और साल बीतते दलित पैंथर  का हिंदी संस्करण भी प्रकाशित हुआ, जिसका हिंदी पाठकों का लंबे समय से इंतजार था। जनवरी 2019 में प्रकाशित मदर इंडिया  को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया और सितंबर 2019 में ही इसका पुनर्मुद्रण हुआ। इसी वर्ष में आरएसएस और बहुजन चिंतन  भी प्रकाशित हुआ, जो धीरे-धीरे पाठकों के बीच जगह बनाने लगी है।

डॉ. आंबेडकर की कालजयी और बहुचर्चित कृति जाति के विनाश का फारवर्ड प्रेस ने संदर्भयुक्त संस्करण पहली बार जून 2018 में प्रकाशित किया था। इस किताब को देश के कोने-कोने से सराहना मिली। यह 2019 में पुनर्मुद्रित हुई। भारतीय समाज को समझने और बदलने की चाह रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह किताब सबसे बुनियादी किताबों में एक है।

डॉ. आंबेडकर के सपनों को जमीन पर उतारने के लिए 1972 में दलित पैंथर नामक संगठन का जन्म हुआ। आजादी के बाद यह दलितों के आक्रोश, प्रतिवाद और प्रतिरोध को अभिव्यक्ति देने वाला अब तक का यह सबसे महत्वपूर्ण संगठन रहा है। दलित पैंथर ने अपने पांच वर्षों के अल्प जीवन-काल ( 1972-77) में ही पूरा भारत – विशेषकर महाराष्ट्र  में खलबली मचा दी। इसके दो संस्थापकों में से एक जे. वी. पवार ने इस आंदोलन का एक प्रमाणिक इतिहास मराठी भाषा में लिखा। हमने इसका पहले अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और फिर हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित किया। द वायर ने इस किताब के बारे में बिल्कुल ठीक लिखा है कि यह किताब इस आंदोलन की आत्मकथा है।

जिन किताबों ने भारतीय समाज की सच्चाईयों को उघाड़कर रख दिया, उसमें सबसे महत्वपूर्ण किताब कैथरिन मेयो द्वारा 1927 में लिखी मदर इंडिया  है। इस किताब प्रकाशित होते ही भारतीय समाज में खलबली मच गई। मोहनदास नैमिशराय ने इस किताब के बारे में लिखा है कि यह किताब बताती है कि भारतवासी अपने ही भाई-बंधुओं और महिलाओं के साथ कैसा बुरा बर्ताव करते हैं और एक आम भारतीय का जीवन कितने दु:खों से भरा हुआ है। इतिहास के इस महत्वपूर्ण दस्तावेज का हिंदी में अनुवाद कंवल भारती ने किया।

यह किताब न केवल अतीत के भारत बल्कि वर्तमान भारत को समझने और एक बेहतर भारत का निर्माण करने के लिए एक जरूरी दस्तावीज भी है। यह भारत को समझने और बदलने के पाठ्यक्रम का एक जरूरी हिस्सा है।

आरएसएस के अधिकांश उदारवादी और वामपंथी आलोचक उसे मुसलमानों एवं ईसाईयों के दुश्मन के रूप में चित्रित करते रहे हैं और यह सच भी है। लेकिन आरएसएस जितना मुसलमानों-ईसाईयों के लिए खतरनाक उतना ही, उससे कई गुना वह दलित-बहुजनों के लिए खतरनाक है। इस विषय पर बहुत कम किताबें मिलती हैं। कंवल भारती की किताब आरएसएस और बहुजन चिंतन  इस कमी को बखूबी पूरा करती है। डॉ. आंबेडकर के नजरिए से आरएसएस को समझने के लिए यह एक बहुत जरूरी किताब है।

पाठकों ने इन सभी किताबों को विषय-वस्तु के साथ-साथ इनकी प्रस्तुति के लिए भी सराहा। अनुवादित किताबों के अनुवाद की पाठकों ने प्रशंसा की। सौंदर्य-बोध की दृष्टि से भी इन किताबों ने पाठकों को अपनी ओर आकर्षित किया।

फारवर्ड प्रेस को उम्मीद है कि सन् 2020 में भी हमारी किताबों को पाठकों का प्यार मिलेगा। हमारी कोशिश है कि हम सन् 2020 में ऐसी किताबें प्रस्तुत करें, जो पाठकों की संवेदना और चेतना को विस्तार और गहराई प्रदान करें। हम आप से वादा करते हैं कि हम दलित-बहुजन समाज और अन्य सीमांकित समुदाय तथा प्रगतिशील व्यक्तियों के लिए बौद्धिक पूंजी के निर्माण के संकल्प में जी-जान से जुटे रहेंगे

( संपादन-अनिल / गोल्डी)


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