आरएसएस के बारे में क्या थे डॉ. आंबेडकर के विचार, पढ़ें कंवल भारती की यह किताब

कंवल भारती द्वारा लिखित पुस्तक आरएसएस और बहुजन चिंतन का प्रकाशन फारवर्ड प्रेस द्वारा किया गया है। यह किताब आरएसएस की व्याख्या आंबेडकर के नजरिए से करती है। इस किताब को अमेजन के जरिए घर बैठे मंगाया जा सकता है

आरएसएस के अधिकांश उदारवादी और वामपंथी आलोचक उसे मुसलमानों एवं ईसाईयों के दुश्मन के रूप में चित्रित करते रहे हैं और यह सच भी है, लेकिन आरएसएस जितना मुसलमानों-ईसाईयों के लिए खतरनाक उतना ही, वह दलित-बहुजनों के लिए भी खतरनाक है। इस विषय पर बहुत कम किताबें मिलती हैं। कंवल भारती की  किताब आरएसएस और बहुजन चिंतन  इस कमी को बखूबी पूरा करती है। यह किताब बिक्री के लिए अमेजन पर उपलब्ध है। इस यहां क्लिक कर घर बैठे मंगाया जा सकता है।

चौदह अध्यायों में विभाजित यह किताब बहुत ही सरल शब्दों में आरएसएस के दलित-बहुजन विरोधी चरित्र को उजागर करती है, कोई व्यक्ति जो आरएसएस के असली चरित्र को समझकर उनके विचारों से संघर्ष करना चाहता हो, उसके लिए यह एक जरूरी किताब है। हिंदी में यह पहली किताब है, जो डॉ. आंबेडकर के नजरिए से आरएसएस के दलित-बहुजन विरोधी चरित्र को उजागर करती हैं। यह उन कार्यकर्ताओं के लिए लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक हथियार साबित होगी, जो हिंदू राष्ट्र-राज के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।

इसके लेखक कंवल भारती हैं जो प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक और महत्वपूर्ण लेखक हैं। उन्होंने डॉ. आंबेडकर: एक पुनर्मूल्यांकन, ‘दलित विमर्श की भूमिका’ राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर, ‘संत रैदार: एक विश्लेषण’ आदि महत्वपूर्ण किताबों का लेखन किया है। ‘मदर इंडिया’,  तथा ‘आंबेडकर और वाल्मीकि समाज’ जैसी महत्वपूर्ण किताबों का अनुवाद किया भी किया है।

कंवल भारती, लेखक

कंवल भारती की यह पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएसएस द्वारा  दलित-बहुजनों को बरगलाने और आंबेडकर ने नाम का उपयोग करके उन्हें भरमाने की साजिश की जा रही है। आज आरएसएस का शिकंजा पूरे देश में कसता जा रहा है। उसके निशाने पर लोकतंत्र और डाॅ. आंबेडकर द्वारा बनाया गया संविधान है। यह किताब संघ की उन चालों का पर्दाफाश करती है।

दरअसल, यह किताब बताती है कि जिस हिंदू धर्म पर आरएसएस के हिंदू राष्ट्र की पूरी अवधारणा टिकी है, उसके संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ने लिखा था, कि ‘हिन्दू धर्म एक ऐसी राजनैतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः प्रजातंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और/या नाजी विचारधारा जैसा ही है। अगर हिन्दू धर्म को खुली छूट मिल जाए-और हिन्दुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है-तो वह उन लोगों को आगे बढने ही नहीं देगा जो हिन्दू नहीं हैं या हिन्दू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दमित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है।” (सोर्स मटियरल आन डॉ. आंबेडकर, खण्ड 1, पृष्ठ 241, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)

इस हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राज को हर कीमत पर रोकने का आह्वान डॉ. आंबेडकर ने किया था। उन्होंने लिखा  है कि “अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (डॉ. आंबेडकर, पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338)

आज देश में हिंदू राज एक हकीकत बनता जा रहा है। असल में हिंदू राज का असली मतलब दलित-बहुजनों पर द्विजों के वर्चस्व की स्थापना है। ऐसे समय में हिंदू राज के संस्थापक-अगुवा आरएसएस के दलित-बहुजन विरोधी चरित्र को समझना बहुत जरूरी है।  कंवल भारती ने अपनी किताब आरएसएस और बहुजन चिंतन  में दलित-बहुजन नजरिए से आरएसएस के चरित्र को उजागर  किया है।

इसी वजह से प्रसिद्ध लेखक प्रेमकुमार मणि इस किताब को  दलित-पिछड़े तबकों से आए सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक जरूरी किताब बताते हैं। इस किताब की विशेषता बताते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक-लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े लिखते हैं कि “कंवल भारती ने आरएसएस के झूठ का पर्दाफाश करने के लिए अपने तर्कों को कुशलता पूर्वक प्रस्तुत करते हुए साबित किया है कि आरएसएस कितना दलित-विरोधी और आंबेडकर विरोधी है।” इतना ही नहीं वे यह भी लिखते हैं कि “मुझे उम्मीद है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसा कोई दलित नहीं होगा,जो आरएसएस और संघ परिवार के दलित-विरोधी और बड़े पैमाने पर जन-विरोधी छवि को पहचानने से इनकार करेगा।”

(संपादन : नवल)

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