‘बहिष्कृत भारत’ : ब्राह्मणवाद-मनुवाद को आंबेडकर की निर्णायक चुनौती

डॉ. आंबेडकर ने 3 अप्रैल, 1927 को मराठी पाक्षिक ‘बहिष्कृत भारत’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके जरिए उन्होंने ब्राह्मणवाद व मनुवाद को निर्णायक चुनौती दी थी। इसके संपादकीय लेखों की विवेचना प्रस्तुत कर रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

‘मूकनायक’ के प्रकाशन की सौवीं वर्षगांठ के मौके पर हम याद कर रहे हैं डॉ. आंबेडकर के पत्रकार व्यक्तित्व को। उनकी पत्रकारिता का काल 1920 से 1956 तक विस्तारित है। मसलन,मूकनायकका पहला अंक उन्होंने 31 जनवरी, 1920 को निकाला, जबकि अंतिम अखबारप्रबुद्ध भारतका पहला अंक 4 फरवरी, 1956 को प्रकाशित हुआ। 

इस अवसर पर हम डॉ. आंबेडकर के पत्रकार व्यक्तित्व पर विशेष श्रृंखला के तहत उन लेखों का प्रकाशन करेंगे, जो उनकी पत्रकारिता पर केंद्रित होंगे। साथ ही,  जो उनके पत्रकारिता के मानदंडों, मूल्यों और उसकी वैचारिकी से अवगत कराएंगे। इसकी शुरुआत हम 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर कर रहे हैं। आज पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ का लेख, जिसमें वे बता रहे हैं डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रकाशित मराठी पाक्षिक ‘बहिष्कृत भारत’ के बारे में


‘बहिष्कृत भारत’ के संपादकीय लेखों की विवेचना

  • सिद्धार्थ

सन् 1920 के जुलाई महीन के अंत में अपने अध्ययन को आगे जारी रखने के लिए डॉ. आंबेडकर लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स एडं पोलिटिकल साइंस संस्था में अध्ययन शुरू किया। उन्होंने बैरिस्टरी का अध्ययन ‘ग्रेज इन’ में शुरू किया। यद्यपि डॉ. आंबेडकर विदेशों में अध्ययन कर रहे थे, फिर भी वे भारत में रहने वाले अपने सहयोगियों का बराबर मार्गदर्शन करते थे। इस दौरान उनके द्वारा लिखे पत्रों से अछूतोद्धार के बारे में उनके मन की बेचैनी का पता चलता है। उन्होंने अढ़ाई साल में ही एम.एस-सी और डी.एस-सी दोनों पदवियां (डिग्रियां) प्राप्त कर लीं। इसी बीच उन्होंने जर्मनी में भी प्रवास किया। वहां बोन विश्वविद्यालय में तीन माह तक संस्कृत का अभ्यास करते रहे। लंदन के अध्ययन के इस प्रवास के दौरान ही उन्होंने विद्यार्थियों की एक संस्था की सभा में ‘रिस्पांसिबिलिटिज ऑफ ए रिस्पांसिबल गवर्नमेंट इन इंडिया’ विषय पर एक विचारोत्तेजक लेख प्रस्तुत किया। इस लेख के बारे में प्रो. हेराल्ड लास्की ने कहा कि ‘इस लेख में प्रकट किए गए डॉ. आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप के हैं।’ खराब आर्थिक हालातों के बीच अप्रैल 1923 में वे मुंबई पहुंचे। उन्होंने अपना शोध-प्रबंध का पुनर्लेखन कर भेज दिया और उन्हें लंदन विश्वविद्यालय ने ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की उपाधि से सम्मानित किया।(वसंत मून, पृ. 23-24) भारत लौटने पर सन् 1923 के जुलाई महीने में उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। 

इन सभी शैक्षिक उपलब्धियां उनके लिए निजी हितों की पूर्ति या पदवी पाने का साधन नहीं थी। उनकी मुख्य चिंता यह थी कि इस देश के एक-तिहाई आबादी वाले अछूतों-बहिष्कृतों का भविष्य क्या होगा? क्या उन्हें इस देश में मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक प्राप्त होगा? क्या बहिष्कृतों को भारतीय समाज समानता का हक प्रदान करेगा? और इसके लिए बहिष्कृतों को क्या करना होगा? इसी उधेड़बुन के बीच उन्होंने एक ऐसी संस्था की स्थापना का निर्णय लिया, जो बहिष्कृतों के व्यापक हितों के लिए संघर्ष करे। इस हेतु 20 जुलाई, 1924 को ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ स्थापित की गई। डॉ. आंबेडकर कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष चुने गए। (धनंजय कीर, पृ. 53-54) 

इस समिति के माध्यम से डॉ. आंबेडकर ने बहिष्कृतों की मुक्ति की परियोजना को पूरा करने में जुट गए। सन् 1927 का वर्ष डॉ. आंबेडकर के जीवन को निर्णायक मोड़ देने वाला वर्ष रहा। वर्ष का प्रारंभ उन्होंने कोरेगांव ( कोरेगांव-भीमा) के युद्ध स्मारक की यात्रा से प्रारंभ की और पेशवाओं का धूल चटा देने वाले महार योद्धाओं की वीरता को सलाम किया। इसी क्र्रम में उन्होंने 3 अप्रैल, 1927 को ‘बहिष्कृत भारत’ नामक मराठी पाक्षिक निकाला। यह वही वर्ष था जब उन्होंने महाड़ सत्याग्रह शुरू किया और 25 दिसंबर, 1927 को मनुस्मृति का दहन किया। इसी वर्ष डॉ. आंबेडकर को बंबई विधान परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया। इस प्रकार यह वर्ष डॉ. आंबेडकर के लिए निर्णायक संघर्ष के उदघोष का था। 

‘बहिष्कृत भारत’ के पहले अंक का मास्ट हेड

उन्होंने असमानता के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक रूपों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष छेड़ दिया था। जिसके चलते उनके ऊपर आलोचकों के तीखे हमले होने लगे। द्विज पत्र-पत्रिकाओं ने उनके ऊपर अनर्गल आरोपों की झड़ी लगा दी। अपना मत प्रतिपादित करने और विरोधियों के मतों का तथ्यपरक और तार्किक, लेकिन पुरजोर तरीके से खंडन करने के लिए डॉ. आंबेडकर को अपने समाचार-पत्र की जरूरत शिद्दत से महसूस होने लगी। ‘बहिष्कृत भारत’ उनकी इसी जरूरत की पूर्ति का साधन बना।

इस संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के जीवनीकार धनंजय कीर लिखते हैं कि “बहिष्कृत भारत नाम कितना मार्मिक और समर्पक [सार्थक] है। दो शब्दों में दो भारत!, बहिष्कृत है, लेकिन भारत! भारत है लेकिन बहिष्कृत है! बहिष्कृत भारत के माध्यम से आंबेडकर ने स्वजनों को सलाह देना देना और आलोचकों पर हमला करना शुरू किया। उन्होंने तिलक की भांति सिंह गर्जना की- ‘ पुनश्य हरि ॐ।” पहली गर्जना ‘मूकनायक’ द्वारा की जा चुकी थी। मूकनायक के बंद होने के करीब 4 वर्षों के अंतराल पर शुरू हुआ ‘बहिष्कृत भारत’ करीब 2 वर्षों तक निरंतर प्रकाशित होता रहा। इसका अंतिम अंक 15 नवंबर, 1929 को निकला। कई बार अंक नहीं निकल पाए, तो संयुक्त अंक भी प्रकाशित हुए। अपने अन्य कामों का भार संभालते हुए डॉ. आंबेडकर इस पत्र का बहुतायत भाग स्वयं लिखते थे। अकेले ही 24-24 कॉलम की सामग्री स्वयं लिखने का चमत्कार उन्हें ही करना पड़ा। (वसंत मून, पृ. 40)। असल बात यह थी कि अन्य समाचार पत्रों के संपादकों से बहिष्कृत भारत का संपादन निराला था। यह पैसा कमाने का व्यवसाय न होकर जनजागृति के लिए था। अविरल निष्ठा और पूरी दक्षता के साथ सारी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बाबा साहब तीन साल तक अखबार का यह जंजाल चलाते रहे। (वही)

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मूकनायक का संपादन के करने के बाद भी औपचारिक तौर संपादक के रूप में डॉ. आंबेडकर का नाम प्रकाशित नहीं होता था, लेकिन ‘बहिष्कृत भारत’ संपादक  के रूप में उनका नाम प्रकाशित होता था। ‘बहिष्कृत भारत’ में ‘मूकनायक’ के प्रवेशांक की संपादकीय को शब्दश: पुनर्प्रकाशित किया गया है। (श्यौराज सिंह बेचैन, बहिष्कृत भारत, प्रस्तावना, पृ. 15) ‘बहिष्कृत भारत’ के 33 अग्रलेख और 150 स्फुट लेख उपलब्ध हैं। ( वही) हिंदी में प्रभाकर गजभिये के संपादन में प्रकाशित ‘बहिष्कृत भारत’ के संपादकीय में कुल 33 संपादकीय (अग्रलेख) मौजूद हैं। (सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली)। श्यौराज सिंह बेचैन के संपादन में प्रकाशित ‘बहिष्कृत भारत’ में कुल 16 लेखों को संग्रहित किया गया है। (गौतम बुक सेंटर, दिल्ली)। 

20 मार्च, 1927 को डॉ. आंबेडकर ने महाड़ के चावदार तालाब से दो घूंट पानी पीकर ब्राह्मणवाद के हजारों वर्षों के कानून को तोड़ा था और ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी। महाड़ सत्याग्रह का डॉ. आंबेडकर के जीवन और दलित आंदोलन के इतिहास में अहम भूमिका है। ‘बहिष्कृत भारत’ की शुरूआती तीन संपादकीय महाड़ सत्याग्रह पर केंद्रित हैं। जिसके शीर्षक इस प्रकाश हैं- ‘महाड़ का धर्मसंग्राम और सवर्ण हिंदुओं की ज़िम्मेदारी’, ‘महाड़ का धर्मसंग्राम तथा अंग्रेज सरकार का उत्तरदायित्व’ और ‘महाड़ का धर्मसंग्राम तथा अछूतों की जिम्मेदारी’। महाड़ धर्मसंग्राम और सवर्ण हिंदुओं की जिम्मेदारी में वे विस्तार से हिंदू धर्म के घोषित आदर्श सिंद्धांतों का विवेचन करते हुए बताते हैं कि कैसे हिंदू अपने व्यवहार में इसका पालन नहीं करते हैं और कैसे हिंदुओं ने चावदार तालाब पर गए लोगों के साथ क्रूरतापूर्ण हिंसा की। यह संपादकीय 22 अप्रैल, 1927 को लिखी गई। इसी संपादकीय में उनका वह बहुचर्चित और बार-बार उद्धृत वाक्य भी है, जिसमें वे लिखते हैं कि “हमें इतना ही बताना है कि आज तक हम महात्मा गांधी के कथनानुसार यह मान रहे थे कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर बड़ा कलंक है, परंतु अब हम हमारा विचार बदल चुका है। हम अब मान रहे हैं कि अस्पृश्यता हमारे ही शरीर का कलंक है। हम जब तक यह मानते थे कि यह हिंदू धर्म पर कलंक है, तब तक उस कलंक को हटाने का काम हमने तुम पर सौंप रखा था। परंतु यह कलंक हम पर है, इसका अहसास होने पर इस कलंक को धोने का पवित्र कार्य हमने अपने हाथों में लिया है। इस कार्य की पूर्ण सफलता हेतु हममे से कुछ लोगों को अपनी जान की बाजी भी लगानी पड़ी, तो हम पीछे नहीं हटेंगे।तुमने तालाब ( चावदार तालाब) को शुद्ध कर हमारी अपवित्रता को सिद्ध करने का नीचतम प्रयत्न किया है।” (बहिष्कृत भारत, सम्यक, पृ.28-29) 

डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाएं व उनकी तस्वीर

इतना ही नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अहिंसा में विश्वास रखने वाले आंबेड़कर इस संपादकीय के अंत में यह भी लिखते हैं कि “इस स्वजन उद्धार में तथा स्वउद्धार के महत [अत्यंत महत्वपूर्ण] कार्य में विजय प्राप्ति के लिए रक्तपात न हो, यही हमारी प्रबल इच्छा है। परंतु ब्राह्मणवाद ग्रस्त लोगों के दुराग्रह से यदि रक्तपात प्रसंग उत्पन्न हुआ, तब हम पीछे नहीं हटेंगे। इसकी जवाबदारी हम पर नहीं होगी, उनको यह बात अवश्य याद रखनी चाहिए ( वही) 

6 मई, 1927 को महाड़ सत्याग्रह पर लिखी गई संपादकीय ‘ महाड़ का धर्मसंग्राम तथा अंग्रेज सरकार’ का उत्तरदायित्व में उन्होंने रूढ़ि एवं परंपरा पोषित ब्राह्मणवादी कानून और ब्रिटिश कानून की तुलना की। इसके मुताबिक, ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए कानूनों एवं नियमों का पालन करते हुए ही अछूत चावदार तालाब में पानी पीने गए थे। यह उनके अधिकार का प्रश्न था, लेकिन ब्राह्मणवादियों ने उनके कानूनी अधिकार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और उनके ऊपर हमला बोल दिया। इस पूरे संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ब्राह्मणवादियों के साथ ब्रिटिश सरकार की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि वह अस्पृश्य़ों के अधिकारों की रक्षा करने आगे नहीं आई और सवर्णों को गुंडागर्दी करने का अवसर मिल गया। इस संदर्भ में संपादकीय में वे लिखते हैं कि “महाड़ में सवर्णों की जिस गुंडागर्दी तथा अन्याय अत्याचार को अछूतों ने सहन किया, वह बस इसी आशा पर कि सरकार उन्हें उचित संरक्षण देगी, परंतु यह आशा बेकार साबित हुई।…अंत में सरकार को ऐसे समय में सवर्णों को नाराज नहीं करना चाहिए, यह सोचकर यदि अस्पृश्यों को मदद करने में टाल-मटोल की गई, तो सरकार को लकवा मार जाएगा तथा शासन व्यवस्था पंगु बन जायेगी।” ( वही, पृ. 39-40) 

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महाड़ संबंधी तीसरी संपादकीय अछूत कहे जाने वाले समुदाय को संबोधित है। यह संपादकीय 20 मई, 1927 को लिखी गई। संपादकीय की शुरूआत इन पंक्तियों से होती है- “पिछले दो अंकों में महाड के पानी प्रकरण के संदर्भ में सवर्ण हिंदुओं तथा सरकार का क्या कर्तव्य है? हमने इसका विवेचन किया है। आज हमने तय किया है कि हमारे अछूत बंधुओं का क्या करना चाहिए? ( वही, पृ.41) वे आगे विस्तार से वर्णन करते हैं कि कैसे महाड प्रकरण से यह साबित होता है कि हिंदू धर्म अछूतों को अपवित्र मानता है। फिर विस्तार से पवित्रता और अपवित्रता के  मूल वजहों की विवेचना करते हैं और इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि अस्पृश्यता इसलिए भी कायम है और चली आ रही है, क्योंकि अस्पृश्य कहे जाने वाले लोग भी इसे स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं- “अस्पृश्यता की रूढ़ि चालू रहने का मुख्य कारण यह है कि इस रूढ़ि पर अछूत लोगों ने कभी संदेह नहीं किया, यदि उन्होंने संदेह और एतराज किया होता, तब सवर्ण लोगों ने अस्पृश्यता संबंधी अपने विचार कब के बदल दिए होते।” (वही, पृ. 44)

डॉ. आंबेडकर अपने अछूत भाईयों को सलाह देते हुए कहते हैं- “अत: हमारी अछूत भाईयों को सलाह है कि उन्होंने महाड में जो कार्य किया, वैसा ही कार्य उनके द्वारा सब तरफ प्रारंभ किए जाएं। बिना मुकाबले के कुछ काम नहीं होगा।” ( वही, पृ. 45) आंबेडकर अच्छी तरह वाकिफ हैं कि अछूतपन को मिटाने के लिए अछूतों द्वारा किए जाने वाले संघर्ष का तीखा प्रतिकार सवर्ण करेंगे। इस संंदर्भ में वे लिखते हैं कि “हमने जो प्रतिकार का मार्ग बताया है, वह सही है, किंतु कठिन है। यह बात हम जानते हैं। परंतु हमारे प्रतिकार करने पर सवर्ण लोग उसे प्रत्युत्तर देंगे, इसलिए हमारे अछूत बंधुूओं को डरना नहीं चाहिए। यदि वे प्रतिकार करेंगे, तब उनका प्रतिकार करने को हमें भी तत्पर रहना चाहिए। उसके बगैर बात बनने वाली नहीं है। हमारे अस्पृश्य बंधुओं को इस कार्य में अपना पराक्रम दिखाना चाहिए।” (वही, पृ. 49) इस संपादकीय के अंत में अछूतों का आह्वान करते हुए वे लिखते हैं- “अत: समस्त अछूतों में से, जिन्हें हम कौन हैं? हमारा अस्तित्व कैसे है? अगर इसकी पहचान हो गई है, तब उनको अपने कुल में जो दाग लगा है, उसे धोकर मिटाने के लिए उनको इस धर्मयुद्ध में छलांग लगानी चाहिए तथा अछूत भाईयों के कुलोद्धार व मानवीय धर्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।” ( वही, पृ. 50)

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बहिष्कृत भारत की पांचवीं संपादकीय ‘अस्पृश्यता निवारण : बच्चों का खेल’ अस्पृश्यता के प्रश्न का ऐतिहासिक विवेचन करती है और अन्य धर्मों एवं समुदायों में इसकी उपस्थिति के स्वरूप का विस्तृत विवेचन करती है। इसी संपादकीय में डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश सत्ता और ब्राह्मणी सत्ता को हिंदू जनता के शरीर पर लगे दो जोंकों की तरह प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा- “हमारे मतानुसार ब्रिटिश सत्ता तथा ब्राह्मणी सत्ता हिंदू जनता के शरीर लगे दो जोंक हैं, तथा ये बिना रूके भारतीय जनता का खून पी रहे हैं। अंग्रेजी सत्ता ने लोगों को देह से गुलाम बनाया है, तो ब्राह्मणी सत्ता ने जनता की आत्मा (दिमाग) को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी सत्ता ने भारत की संपत्ति की शोषण किया है, तो ब्राह्मणी सत्ता ने स्वाभिमान जैसी मन की संपत्ति का हरण किया है।” (वही, पृ. 33) 

बहिष्कृत भारत की आठवीं संपादकीय में ‘हमारे आलोचक’ में डॉ. आंबेडकर ने ‘बहिष्कृत भारत’ समाचार-पत्र की आलोचना करने वालों को जवाब दिया है। यह संपादकीय उन्होंने 29 जुलाई, 1927 को लिखी। संपादकीय की शुरूआत में वे लिखते हैं कि “बहिष्कृत भारत की नीति की अनेक तरह की आलोचना की जाती है। इस सबका उत्तर देना तथा सबका समाधान करना हमारे लिए संभव नहीं है। हमें यह अच्छी तरह ज्ञात है। तथापि हमारे आलोचकों में जो प्रमाणिक आलोचक हैं तथा उन्हें हमारी नीतियों के संदर्भ में जो भ्रम हुआ है, उनके लिए हम अपनी नीतियों के संदर्भ में स्पष्टीकरण देना चाहेंगे।”( वही, पृ.24) 

डॉ. आंबेडकर ने विस्तार से इस संपादकीय में ‘बहिष्कृत भारत’ की वैचारिकी को प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही वे  उन लोगों का चेतावनी भी देते हैं, जो बहिष्कृत समाज के आंदोलन को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। वे लिखते हैं- “दूसरे मुद्दों (विषयों) की आलोचना करना या आंबेडकर को धराशायी करने का प्रयत्न करना अथवा ‘बहिष्कृत भारत’ के विरोध में निंदासत्र( आलोचना-सभा) चलाकर हमारा पक्ष या हमारे आंदोलन को नेस्तनाबूद करना संभव नहीं है। हमारे आलोचकों को इस बात को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। अस्पृश्य वर्ग में दरार डालकर हमारे आंदोलन को कमजोर करने का कोई भी दांव-पेंच सफल नहीं होगा। अस्पृश्यता निवारण के संदर्भ में बहानेबाजी करने वालों को हम कोई छूट नहीं देते, इसी कारण हमारे उच्च वर्गीय आलोचकों का हमारे प्रति आक्रोश है। इस बात को हम अच्छी तरह पहचनाते हैं।” ( वही, पृ.81) 

सोलहवीं संपादकीय ‘बहिष्कृत भारत’ के एक वर्ष पूरा होने पर लिखी गई है। इसमें विस्तार से उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ समाचार-पत्र के उद्देश्यों, उपलब्धियों और चुनौतियों की चर्चा की है। ‘बहिष्कृत भारत’ की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि “बहिष्कृत भारत महाऱाष्ट्र के हिंदू समाज में एक प्रकार का तूफान ला दिया है। यह बात बताने की विशेष आवश्यकता नहीं है। फिर भी ऐसे तूफान में अपने पास पर्याप्त साहित्य है या नहीं? इसकी पूरी जांच किए बगैर इस साप्ताहिक के नायकत्व का काम इस संपादक को आखिर किस तरह अपने हाथ में लेना है?”( वही, पृ.144) 

इस उपलब्धि के साथ ही वे ‘बहिष्कृत भारत’ के संकटों की भी चर्चा करते हुए लिखते हैं कि “बहिष्कृत भारत की वर्तमान अवस्था अत्यन्त दयनीय है, यह बताते हुए संपादक को बहुत कष्ट हो रहा है। जमा खर्च का हिसाब करने पर आज की तिथि तक बहिष्कृत भारत पर 500 रुपए का कर्ज हो गया है। दरअसल बहिष्कृत भारत की यह सोचनीय स्थिति नहीं होनी चाहिए थी। किसी भी समाचार-पत्र का संपादक, प्रबंधक तथा काम करने वाला चपरासी आदि के वेतन की समस्या रहती है। बड़े-बड़े सामाजिक कार्य करने के पवित्र उद्देश्य से स्थापित यह साप्ताहिक भी उक्त समस्या से छुटकारा नहीं पा सकता। परंतु बहिष्कृत भारत क्या अपवाद कहा जाएगा? बहिष्कृत भारत के संपादक तथा व्यवस्थापक ने वर्ष भर जो कष्ट सहा तथा परिश्रम किया, उसके बदले उन्हें एक पैसा भी नहीं दिया गया। छपाई और डाक खर्च के सिवाय बहिष्कृत भारत के और दो खर्च थे, उनमें एक कार्यालय का किराया तथा दूसरा चपरासी का वेतन था। परंतु, दोनों का खर्च इतना कम था वह चर्चा करने लायक नहीं है। कार्यालय का पूरे वर्ष का किराया 205 रुपए 8 आने तथा चपरासी का वेतन 98 रुपए हुए। बहिष्कृत भारत जैसा मितव्ययता( किफायत) वाला कोई समाचार-पत्र महाराष्ट्र में दूसरा नहीं होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। इतना सब होते हुए भी बहिष्कृत भारत पर एक वर्ष के अंदर 500 रुपए का कर्ज हो गया है। यदि यही परिस्थिति रही, तो फिर प्रति वर्ष पहाड़ बढ़ते ही जाएगा तथा फिर ‘बहिष्कृत भारत’ को बंद करना पड़ेगा। इस घाटे की भरपाई करने के लिए हमें हमेशा के लिए कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी।” ( वही, पृ. 144-145) 

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इन आर्थिक कठिनाईयों और चुनौतियों के बीच ‘बहिष्कृत भारत’ ने एक वर्ष की और यात्रा संपन्न की। ‘बहिष्कृत भारत’ की अंतिम संपादकीय डॉ. आंबेडकर ने ‘पुणे का पार्वती सत्याग्रह’ शीर्षक से लिखा, जो 15 नवंबर, 1929 को लिखा। इस अंतिम संपादकीय में डॉ. आंबेडकर ने कांग्रेस की स्वराज के प्रति मांग के संदर्भ में बहिष्कृतों के रूख के संदर्भ में सलाह देते हुए लिखा कि “हमें हमारे अधिकार दो, तभी हम स्वराज की मांग का समर्थन करेंगे” इसी नीति का पालन मुसलमान कर रहे हैं, तब  फिर अछूतों को इस नीति का पालन क्यों नहीं करना चाहिए? हमारे मतानुसार “स्वराज प्राप्ति तक तुम ठहरो” यह कहने वाला व्यक्ति या तो भोला-भाला होना चाहिए या फिर अपना काम निकालने वाला होना चाहिए या फिर यह सब सुनने वाला मूर्ख होना चाहिए। हम अपने अछूत बंधुओं को बताना चाहते हैं कि उन्हें समय न गंवाते हुए अपने अधिकार प्राप्ति के काम में लग जाना चाहिए। इसके लिए कमर कसकर पूरी तैयारी के साथ विरोधियों से मुकाबला करने को तत्पर रहना चाहिए।” (वही, पृ.254)

‘बहिष्कृत भारत’ अखबार के बंद होने के कारणों की विवेचना करते हुए वसंत मून लिखते हैं कि ‘बहिष्कृत भारत’ अखबार निकालने में आर्थिक अड़चन बहुत बढ़ गई थी। डॉ. साहब ने जनता से निधि की याचना की। लेकिन मदद के लिए कोई अग्रसर नहीं हुआ। 29 जून, 1928 को आंबेडकर के नेतृत्व तथा मार्गदर्शन में ‘समता’ नामक पाक्षिक प्रारंभ हुआ। ‘बहिष्कृत भारत’ के दूसरे वर्ष का पहला अंक 19 नवंबर, 1928 को निकला। फिर आगे चलकर एक शुक्रवार को ‘समता’ का अंक प्रकाशित होता था, तो दूसरे शुक्रवार को बहिष्कृत भारत। यह प्रयोग कुछ महीनों तक चला, मगर 19 नवंबर, 1929 को ‘बहिष्कृत भारत का अंतिम अंक प्रकाशित कर फिर इस अखबार को बंद कर देना पड़ा।” (वसंत मून, पृ. 54)

भले ही ‘मूकनायक’ के बाद ‘बहिष्कृत भारत’ भी बंद हो गया, लेकिन आंबेडकर की पत्रकारिता की यात्रा ‘समता’ (29 जून, 1928), ‘जनता’ (24 नवंबर, 1930)  से होते हुए ‘प्रबुद्ध भारत’ (4 फरवरी 1956) तक आजीवन जारी रही, लेकिन कभी उन्होंने खुद द्वारा तय पत्रकारिता के मानदंड़ों के साथ समझौता नहीं किया।

संदर्भ :

  1. मनु की विक्षिप्तता के विरुद्ध, चयन एवं प्रस्तुति : शर्मिला रेगे, अनुवाद: डॉ. अनुपमा गुप्ता, मार्जिनालाइज्ड,2019
  2. मूकनायक’, डॉ. बी. आर. आंबेडकर, अनुवाद, विनय कुमार वासनिक, सम्यक प्रकाशन, 2019, 
  3. बाबासाहेब, डॉ. आंबेडकर, संपूर्ण वांग्मय,  डॉ. आंबेडकर शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली 
  4. डॉ. आंबेडकर प्रबुद्ध भारत की ओर, गेल ओमवेट, पेंगुइन बुक्स, नई दिल्ली, 2005
  5. डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर जीवनचरित, धनंजय कीर, पापुलर प्रकाशन, मुबई, 2018
  6. बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की संघर्ष-यात्रा एवं संदेश, डॉ.म.ला. शहारे, डॉ. नलिनी अनिल, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014
  7. डॉ. बाबा साहब, आंबेडकर, वसंत मून, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नई दिल्ली,1991
  8. मूकनायक’, डॉ. आंबेडकर, अनुवाद तथा संपादन, डॉ. श्यौराज सिंह बैचैन, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली, 2019
  9. ‘बहिष्कृत भारत’ में प्रकाशित, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के संपादकीय. अनुवादक, प्रभाकर गजभिये, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017

(संपादन : नवल)

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  1. Haridayal Dongre Reply

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