दलित-पिछड़ों को सत्ता से दूर रखने की कोशिश में योगी, कर रहे हिंदू-मुसलमान की राजनीति

अनुराग मोदी बता रहे हैं कि यूपी में योगी सरकार एक खास धर्म के लोगों को इसलिए निशाना बना रही है क्योंकि वह 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित कर लेना चाहती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे गुजरात में मोदी-शाह की जोड़ी ने किया था

उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ा खतरा दलित-पिछड़े और मुसलमानों के गठजोड़ से है। वो यह जानती है कि वो इस गठबंधन के आगे हमेशा मात खाते आई है। इसलिए उसने इस गठबंधन को तोड़ने की शुरुवात कर दी है। वो सबसे पहले मुसलमान को इस गठबंधन से अलग करना चाहती है। इसके लिए उसने उत्तर प्रदेश में सीएए और एनआरसी के विरोध में उठ खड़े हुए जनांदोलन को हिंसक करार देकर उसे एक बेहतर मौके के रूप में भुनाने का काम किया। और इस बहाने जहाँ उसने एक तरफ मुसलमानों को कुचलने का काम किया, वही दूसरी तरफ हिंदू-मुसलमान के बीच एक ऐसी नफरत की एक ऐसी दीवार खड़ी करने के कोशिश की जो कभी तोड़ी ना जा सके। 

सीएए-एनआरसी के विरोध के शुरुआती दौर में मीडिया में उत्तर प्रदेश से ज्यादातर पुलिस और सरकार द्वारा पेश की गई जानकारी और खबरों से ऐसा लग रहा था कि एक धर्म विशेष के लोगों ने हिंसा का तांडव मचाया और सरकार ने जो कुछ किया वो करना जरुरी था। क्योंकि, राज्य में कही भी हिंसा होती है, तो उसके खिलाफ उचित, निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और संविधान सम्मत कार्यवाही करना राज्य का कर्तव्य और जवाबदेही है। 

मगर पहले तो मुख्यमंत्री द्वारा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण कार्रवाई करने की बजाय खुलेआम बदला लेने की धमकी दी गई। अब जब लोग कुछ बोलने की हिम्मत कर रहे हैं और सच्चाई सामने आ रही है। पुलिस द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की खबरें नेशनल मीडिया के एक हिस्से में छन-छन कर आ रही हैं, उसने इस सवाल को और गहरा कर दिया है कि प्रदेश की भाजपा सरकार न्यायपूर्ण कार्यवाही कर रही है या कार्रवाई के नाम पर वर्ष 2022 में होने वाले प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले मुस्लिम मतदाताओं को बाकियों से अलग-थलग करके पेश करना चाहती है? और, यह भी कि उनके साथ खड़े हर व्यक्ति को हिंसक और देशद्रोही बताकर बदनाम करना चाहती है? अब तो सरकार ने इसमें पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) का नाम भी शामिल कर दिया है! 

लखनऊ में सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रही भीड़ के खिलाफ कार्रवाई करती उत्तर प्रदेश पुलिस

यूपी पुलिस ने किस तरह से मुसलमानों को निशाना बनाया है, हम इसकी एक बानगी देखते हैं। जैसे घटना वाले दिन 20 दिसंबर, 2019 को पूरा समय अपने सरकारी दफ्तर में बैठकर काम कर रहे मुजफ्फरनगर के सेवायोजन कार्यालय में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत फारुक के घर में रात को पुलिस घुसी और उनके घर में तोड़फोड़ कर उन्हें और उनके लड़के को बेतहाशा पीटा और पकड़कर जेल में डाल दिया। एक और घटना में पुलिस ने अपने पिता को इलाज के लिए ले जाते बेटे को पकड़कर पीटा और उन्हें जेल में डाल दिया। पुलिस ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसकर ग्रेनेड फेंके, हॉस्टल में आंसू गैस के गोले फोड़ वहां पढ़ाई कर रहे छात्रों की हड्डी तोड़ी गई।

पुलिस का आतंक प्रांत के अनेक शहरों में दिखा। मसलन जिस गोरखपुर से मुख्यमंत्री आते हैं वहां के मुस्लिम आज भी पुलिस कार्यवाही से डरे और सहमे हुए हैं। वहां रात को बाजार में जाकर लोगो की बंद दुकानों के बाहर रखे समान और गाड़ियों में तोड़फोड़ की। धर्म के आधार पर गंदी-गंदी गालियाँ दे पाकिस्तान जाने को कहा गया। नाबालिगों को लॉकअप में बंद कर मारा गया। जो समाजिक कार्यकर्त्ता शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, उनके उपर देशद्रोह, बलवा, लूट जैसी संगीन धाराएं लगाकर उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। आज भी सही-सही नहीं मालूम कि कितनों को पुलिस की गोली लगी और उसमें कितने मारे गए और कितने अपने इलाज के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं।

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लोग पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ आवाज ना उठा पाएं, इसलिए उनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने के नाम पर सारे नियम, कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ताक में रखकर लाखों-करोड़ों रुपए की वसूली का नोटिस भेजा जा रहा है, या उनके फोटो सार्वजनिक जगह पर चस्पा कर दिए गए हैं। इस क्रम में सम्भल में प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई को देखा जा सकता है। 

इस सब पुलिस ज्यादतियो के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की बजाय, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने तो आन्दोलनकारियों को और खुली धमकी दी। उन्होंने कहा कि हमने नकारात्मक लोगो को चिन्हित कर लिया है। अगर वो सुधरेंगे तो ठीक है नहीं तो स्वाभाविक रूप से जहाँ की यात्रा करना है वहां की यात्रा करवा दी जाएगी। सनद रहे कि मुख्यमंत्री बनने के पहले वे ना सिर्फ दंगे फैलाने के आरोपी रहे हैं, बल्कि खुलेआम हिंसा की वकालत करते रहे हैं। 

योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

दरअसल, 2022 में अपनी हुकूमत बचाए रखने के लिए आदित्यनाथ सरकारी मशीनरी खासकर पुलिसिया तंत्र का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश ने राम मंदिर आन्दोलन से लेकर जाट आरक्षण आन्दोलन और हाल ही में गौ-रक्षा के नाम पर हिंसक भीड़ के कारनामे देखे हैं। लेकिन, कभी इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई नहीं हुई कि आंदोलनकारियों को सार्वजनिक संपत्ति की क्षतिपूर्ति वसूली के नोटिस दिए गए हों। पिछले साल लगभग गो-रक्षा के नामपर हुई हिंसा में बुलंदशहर में पुलिस थाने में आग लगा दी गई, वहां खड़े अनेक वाहन जला दिए गए, पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी गई। इस मामले में बड़े दबाव और मीडिया में हल्ला-हंगामा के बाद लम्बे समय में आरोपी गिरफ्तार हुए थे, लेकिन अब तो उनकी जमानत भी हो गई। इस हिंसा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ मौन रहे। ना किसी को धमकी दी गई, ना हिंसा को कोई नाम दिया गया, ना सार्वजनिक संपत्ति के हरजाने के नोटिस दिए गए। इस हिंसा में सत्ताधारी दल की विचाराधारा से जुड़े लोग आरोपी जो थे। सुबोध कुमार का परिवार अकेले ही न्याय की गुहार लगाता रहा। इसी तरह मई 2017 में सहारनपुर में ठाकुर और दलित लोगों के बीच हुए झगड़े में एसएसपी के ऑफिस में तोड़फोड़ की गई, पुलिस चौकी और वाहन में आग लगा दी गई और 20 निजी वाहन आग के हवाले कर दिए गए। इस तरह की और भी घटनाएँ हैं। 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो 2002 में वहां हुई सांप्रदायिक हिंसा में एक हजार के लगभग लोग मारे गए थे और अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ था। वहां पुलिस ने दंगाइयों का साथ दिया और सेना को तुरंत शहर में नहीं आने दिया गया। सेना शहर में जाने के लिए अहमदाबाद हवाई अड्डे पर गाड़ियों का इन्तजार करती रही और गुजरात हिंसा की आग में जलता रहा है। यह कहना था उस समय के सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन का। इस दंगे के पीड़ित आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं। इस हिंसा में हुई सार्वजानिक और निजी संपत्ति की भरपाई दंगाईयों से करने की बात तो छोड़ ही दें। 

उपरोक्त उदाहरणों से यह साफ़ है कि किस तरह से गुजरात के तर्ज पर उत्तर प्रदेश में एक धर्म विशेष के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। असल में, 1980 में गुजरात में खाम, क्षत्रिय, दलित, आदिवासी और मुस्लिम को एक साथ लाकर, इस 56 प्रतिशत मतदातों के दम पर कांग्रेस ने लम्बे समय तक संघ और भाजपा को सत्ता से दूर रखा। लेकिन मोदी-शाह ने 2002 में हिंदू-मुसलमानों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया था। यही वजह है कि वहां आज भी भाजपा की सत्ता कायम है।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ एक प्रदर्शन के दौरान लाठी बरसाते यूपी पुलिस के जवान

इसी तरह से, उत्तर प्रदेश में भी दलित, मुस्लिम और कुछ पिछड़े वर्ग के मतदाता एक होकर पिछले चुनाव तक भाजपा को सत्ता से बाहर रखते आए हैं। प्रमाण यह कि वर्ष 2002 में, भाजपा सूबे की सत्ता से बाहर हुई, तो 2017 में वापस सत्ता पर काबिज हुई। वैसे भी, वह 1997 से 2002 तक पहली बार पूरे पांच साल सत्ता में रही थी। दलित, मुस्लिम और कुछ पिछड़े वर्ग का यह राजनीतिक गठबंधन दुबारा ना बना पाए और भाजपा से सत्ता ना छिन जाए इसके लिए जरूरी है कि वहां मुस्लिम अलग-थलग हो जाएं और मतदाता धर्म के नाम पर ना सिर्फ बंटा रहे, बल्कि गुजरात की ही तरह उनके बीच खाई और गहरी हो।

कहना गैर वाजिब नहीं कि भाजपा को यदि 2022 में सत्ता बचानी है तो उसे 2017 वाला प्रदर्शन दुहराना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो उसका सीधा असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी होगा। और हाल के दिनाें में जिस तरह से बाकी राज्यों के नतीजे भाजपा के खिलाफ जा रहे हैं, उसे देखते हुए अगले चुनाव में उत्तर प्रदेश में भी कुछ भी हो सकता है। वैसे भी, अगर कांग्रेस का पुराना रिकॉर्ड छोड़ दे, तो वहां कोई भी पार्टी लगातार दो बार सत्ता में नहीं आई है।

यही डर योगी सरकार को सता रही है और इसलिए उसकी हालिया कार्रवाईयों में 2022 के विधानसभा चुनाव की आहट साफ़-साफ़ सुनाई दे रही है! 

(संपादन : सिद्धार्थ/नवल)

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