संघ-भाजपा को जेएनयू और सामाजिक विज्ञानों से नफरत क्यों है?

कांचा आइलैया शेफर्ड बता रहे हैं कि क्यों संघ-भाजपा जेएनयू जैसे समाज-विज्ञान के उच्च शिक्षा संस्थाओं का विनाश करना चाहते हैं, उनका यह भी कहना है कि जिस दिन विश्वविद्यालय ढह जाएंगे, उसी दिन देश में प्रजातंत्र, अर्थव्यवस्था और आधुनिक सामाजिक प्रणाली के ढहने की शुरुआत भी हो जाएगी. हम मध्यकाल में वापस चले जाएंगे

पिछले दिनों नकाबपोश हमलावरों को जेएनयू में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश करने दिया गया. उनके हमले में कई विद्यार्थी और शिक्षक घायल हुए. इस घटना ने भाजपा के शासनकाल के एक नए अध्याय की शुरूआत की. यह सरकार शायद जेएनयू और कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में ताले डलवाना चाहती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को ऐसे विश्वविद्यालय कतई रास नहीं आ रहे हैं जिनमें सामाजिक विज्ञानों का गंभीर पठन-पाठन होता है.

इस हमले में विश्वविद्यालय विद्यार्थी संघ की अध्यक्ष आइशी घोष और कुछ शिक्षकों समेत लगभग 35 लोग घायल हुए. दर्जनों हथियारबंद नकाबपोशों का जेएनयू में घुसना और वहां तांडव मचाना, विश्वविद्यालयों में बाहुबल के इस्तेमाल की शुरुआत है. यही वे विश्वविद्यालय हैं जो नए ज्ञान के सृजन के ज़रिए भारत के लोगों के जीवन में परिवर्तन लाना चाहते हैं. इसके विपरीत, कुछ अन्य लोग हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं और वह भी ऐसे मुस्लिम देशों की राह पर चल कर जिन्होंने सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे किसी गंभीर तार्किक विमर्श की इजाजत नहीं दी, जो पारंपरिक आस्थाओं को चुनौती देता हो और मानव जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता की बात करता हो.

प्रजातंत्र के एक राजनैतिक प्रणाली के रूप में उभरने के पहले तक पूरी दुनिया में विश्वविद्यालय, शैक्षणिक ढांचे का हिस्सा नहीं थे. जनाधिकारों, चुनाव, आधुनिक बाज़ार व नए सांस्कृतिक मंच, दुनिया को विश्वविद्यालयों की ही देन हैं. विश्वविद्यालयों ने दुनिया के विविध निवासियों के ज्ञान के संसाधनों का संश्लेषण किया. 

जेएनयू में हमले के खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व करतीं जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आईशी घोष

भारत में विश्वविद्यालयों में गंभीर शिक्षण, तुलनात्मक रूप से काफी देर से शुरू हुआ. यहाँ के विश्वविद्यालय अब तक ज्ञान के उन स्रोतों को नहीं पकड़ सके हैं जो आदिवासियों, दलितों, ओबीसी और उच्च-शूद्र कृषक समुदायों के जीवन के विभिन्न पहलुओं में बिखरे पड़े हैं. अब तक हमारे विश्वविद्यालयों में शोध पश्चिमी ज्ञान या पौराणिकी पर केन्द्रित रहा है. परन्तु जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में उत्पादक जातियों के विद्यार्थियों के प्रवेश से इस स्थिति में बदलाव अपेक्षित है.  

हम नालंदा को भारत का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय मानते हैं. परन्तु वह आज के आधुनिक विश्वविद्यालयों से इन अर्थों में भिन्न था कि वहां न तो मानव जीवन के सभी क्षेत्रों से संबंधित धर्मनिरपेक्ष विचारों का संश्लेषण होता था और ना ही उन्हें युवा शिक्षित व्यक्तियों को संप्रेषित किया जाता था. देश के पहले आधुनिक विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास की स्थापना 1857 में मद्रास में हुई थी. इस प्रकार, भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा का इतिहास केवल 163 वर्ष पुराना है. परन्तु अब तक विश्वविद्यालयों का ढांचा मूलतः ब्राह्मणवादी रहा है और वे देशज ज्ञान के वाहक नहीं बन सके हैं. यह स्थिति अब धीरे-धीरे बदल रही है. 

आज भारत में 689 विश्वविद्यालय हैं. आरएसएस और भाजपा इस तथ्य से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि देश के विश्वविद्यालयों में जेएनयू सर्वश्रेष्ठ है. सामाजिक विज्ञानों के अध्यन-अध्यापन में जेएनयू की उत्कृष्टता जग-जाहिर है. यद्यपि इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1970 के दशक की शुरुआत में हुई थी, परन्तु इस अल्पावधि में भी उसने अनेक उत्कृष्ट समाजविज्ञानियों, नेताओं और नौकरशाहों को गढ़ा. संघ-भाजपा का मानना है कि चूँकि यह विश्वविद्यालय गुणात्मक शिक्षा – विशेषकर सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में – प्रदान करता है इसलिए यह खतरनाक है और इसलिए वे इसे कम्युनिस्ट या कम्युनिस्टों का विश्वविद्यालय कहते हैं.  

सामाजिक विज्ञान में रूचि रखने वाला देश का शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी होगा जो जेएनयू में पढना नहीं चाहता होगा. मैंने भी इस विश्वविद्यालय में भर्ती होने का असफल प्रयास किया था.   

मैं सन् 1976 में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में एमए अंतिम वर्ष का छात्र था. उस समय, एमफिल और पीएचडी करने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए जेएनयू में प्रवेश पाना सबसे बड़ा सपना हुआ करता था. मेरा भी यही सपना था और इसे पूरा करने के लिए मैंने कर्ज लिया और अपने जीवन में पहली बार दिल्ली पहुंचा. मुझे इसके लिए जितना प्रयास करना पड़ा उतना शायद उच्च-मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों को ऑक्सफ़ोर्ड या हार्वर्ड में दाखिला लेने के लिए भी नहीं पड़ता. परन्तु मैं वहां प्रवेश नहीं पा सका. मुझे ऐसा लगा कि मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ खो दिया है. आज भी देश का कोई ऐसा विश्वविद्यालय नहीं हैं, जहाँ विद्यार्थियों को उस तरह का गंभीर अध्ययन करने, बहसों में भाग लेने और पूरी दुनिया के विद्वानों के संपर्क में आने का मौका मिलता हो, जो उन्हें जेएनयू में आसानी से मिल जाता है. 

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संघ-भाजपा मानते हैं कि जेएनयू एक कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय है, जो धर्मों, विशेषकर हिन्दू धर्म, के ग्रंथों में संचित ज्ञान को तनिक भी महत्ता नहीं देता. और इस विश्वविद्यालय की सामाजिक विज्ञानों के अध्यन-अध्यापन की संस्कृति उनके लिए एक बड़ा खतरा है. मध्यपूर्व के इस्लामिक देशों के कई मुस्लिम नेता भी विश्वविद्यालयों के बारे में ठीक यही सोचते हैं और इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके देशों में ऐसा कोई विश्वविद्यालय न हो जो धर्म की चहारदीवारी को पार कर, सामाजिक प्रणालियों का अध्ययन करे. मध्यपूर्व के कई मुस्लिम नेता यह भी मानते हैं कि सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन. कम्युनिस्ट विचारधारा को प्रोत्साहित करता है.  

जो बात संघ-भाजपा के नेता समझ नहीं पा रहे हैं वह यह है कि राष्ट्र का विचार; यह विचार कि मानव समाज को इस प्रकार संगठित किया जा सकता जिससे मनुष्यों को बेहतर जीवन जीने का मौका मिल सके, विश्वविद्यालयों की शिक्षा की ही देन है. मनुष्यों के जीवन स्तर को कैसे बेहतर किया जा सकता है, इस सम्बन्ध में गंभीर धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष अध्ययन विश्वविद्यालयों में ही हुए हैं.

संघ-भाजपा मानते हैं कि तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा पर्याप्त है क्योंकि जो लोग ऐसी शिक्षा प्राप्त करते हैं वे अपने धार्मिक आचरणों को यथावत रखते हैं और वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग मनुष्यों के संगठन पर विचार करने के लिए नहीं करते. यह सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन के कारण ही है कि विश्वविद्यालय इस संगठन के ढांचे को बदल सके हैं. सामाजिक विज्ञानों के गंभीर अध्ययन और शिक्षण के बिना, किसी भी राष्ट्र की राजनैतिक संस्थाओं, मीडिया के ढांचे और यहाँ तक कि चिकित्सा और इंजीनियरिंग संस्थाओं का विकास नहीं हो सकता था.   

जिन महान यूरोपीय चिंतकों के विचारों को हम आज सहज और स्वाभाविक मानते हैं, उनका विकास सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में तीखे विवादों से हुआ. उन्होंने धार्मिक शिक्षाओं, उत्पादन प्रणालियों और विभिन्न मानव विभूतियों के जीवन की ऐसी सकारात्मक व्याख्या की जो उस व्याख्या से एकदम अलग थी जो हमें धार्मिक ग्रंथों से प्राप्त हुई थी. इसे तथ्यवाद (पॉजिटिविज्म) कहा जाता है. उदाहरण के लिए, 19वीं सदी के एक प्रमुख चिन्तक जी.डब्ल्यू.एफ. हेगेल ने ईसा मसीह पर एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘द लाइफ ऑफ़ जीसस’. उन्होंने ईसा मसीह की शिक्षाओं से ऐसे निष्कर्ष निकाले जो शायद कोई अन्य धर्मशास्त्री निकाल सकता था.  

हेगेल के अनुसार, अंधी आस्था से परे हो विवेक और तर्क को अपने साथी बनाने का विचार ईसा मसीह ने प्रतिपादित किया था. वे ईसा ही थे जिन्होंने ईश्वर के साम्राज्य की आध्यात्मिक नागरिकता के विचार को प्रस्तुत किया. आत्मा – जो शरीर और गतिशील विश्व से भिन्न है –  का हेगेल का सिद्धांत ईसा मसीह की शिक्षाओं से ही लिया गया था. 

हेगेल, ईसा मसीह के इस कथन से बहुत महत्वपूर्ण सैद्धांतिक सबक सीखते हैं कि, “मनुष्य के रूप में मनुष्य केवल विषयासक्त प्राणी नहीं है; उसकी प्रकृति ऐसी नहीं है कि वह केवल आनंद देने वाले आवेगों तक स्वयं को सीमित रखे. उसकी आत्मा भी है, जो उसे एक तार्किक प्राणी होने के कारण, ईश्वरीय मूलतत्त्व  से विरासत में मिली है.” ईसा मसीह के इन्हीं विचारों के आधार पर हेगेल ने विवेक, आत्मा और द्वंद्ववाद सम्बन्धी अपने सिद्धांत विकसित किए. 

यह सही है कि भारतीय विश्वविद्यालयों से अब तक ऐसे गंभीर अध्येता नहीं निकले हैं जो भारतीय पौराणिक / धार्मिक ग्रंथों की पुनर्व्याख्या कर सकें. केवल डॉ. बी.आर. आंबेडकर ऐसा कर सके और उनके निष्कर्षों से संघ-भाजपा के नेता और अध्येता सहमत नहीं हैं. मनु के बारे में उनकी सोच और लेखन, संघ-भाजपा के नेताओं के सोच की विपरीत थी. प्राचीन भारत की ब्राह्मणवादी परंपरा के सम्बन्ध में इस तरह के निष्कर्ष पर कोई कम्युनिस्ट ब्राह्मण अध्येता भी आज तक नहीं पंहुचा है. विश्वविद्यालयों के सामाजिक विज्ञान विभागों से आंबेडकर जैसे कई अध्येता निकल सकते हैं, यह आशंका उन्हें परेशान कर रही है. 

आंबेडकर, महात्मा गाँधी और वी.डी. सावरकर ने उन्हीं ग्रंथों का अध्ययन किया, परन्तु वे भिन्न-भिन्न निष्कर्षों पर पहुंचे. आंबेडकर के विपरीत, गाँधी और सावरकर समाज-विज्ञानी नहीं थे. गांधी ने अपने अध्ययन के आधार पर अहिंसा का वरण किया और सावरकर ने हिंसा का. दोनों जब लन्दन में कानून (राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र की नहीं)  की पढ़ाई कर रहे थे तब उनमें गंभीर मतभेद थे. 

संघ-भाजपा की एक चिंता यह भी है कि इन दिनों धनी परिवारों और उच्च जातियों के युवा उनकी विचारधारा के रक्षा करने के लिए सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन को और आकर्षित नहीं हो रहे हैं. नतीजा यह कि सामाजिक विज्ञानों के अध्येताओं में शूद्र / ओबीसी / दलित / आदिवासियों की बहुलता हो गयी है. उनको लगता है कि ये लोग अगर सामाजिक विज्ञानों और हिन्दू धर्मग्रंथों का गंभीर अध्ययन करेंगे तो कहीं वे उन्हीं निष्कर्षों पर न पहुँच जायें, जिन पर डॉ आंबेडकर पहुंचे थे. इसलिए, सामाजिक विज्ञानों में उच्च शिक्षा – विशेषकर जेएनयू जैसे गंभीर विश्वविद्यालयों में – का सत्यानाश करने पर वे आमादा हैं. 

मुस्लिम मुल्ला भी सामाजिक विज्ञानों के बारे में ऐसी ही सोच रखते हैं. उन्हें भी लगता है कि कुरान का विवेक और तर्क पर आधारित अध्ययन उनके लिए समस्याएं खड़ी कर देगा.  

परन्तु वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जब धार्मिक ग्रंथों का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से गंभीर अध्ययन किया जाएगा तब उससे कई नयी व्याख्याएं उभरेंगीं और इससे ‘सामाजिक विवेक’ का विकास होगा. यही सामाजिक विवेक, विज्ञान और तकनीकी की विकास की राह प्रशस्त करेगा. पश्चिम में भी बाइबिल और ईसाई धर्म के इतिहास का गंभीर अध्ययन हुआ, परन्तु उससे वहां ईसाई धर्म समाप्त नहीं हो गया.

जेएनयू के विद्यार्थियों और अध्यापकों पर हालिया सुनियोजित हमला, भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा की घड़ी के कांटों को उल्टा घुमाने का प्रयास है. संघ-भाजपा नेता यह मानते हैं कि विश्वविद्यालयों में जो कुछ होता है, उसका आम जनता के वोटों पर कोई असर नहीं पड़ता. परन्तु उन्हें यह याद रखना चाहिए की जिस दिन विश्वविद्यालय ढह जाएंगे, उसी दिन देश में प्रजातंत्र, अर्थव्यवस्था और आधुनिक सामाजिक प्रणाली के ढहने की शुरुआत भी हो जाएगी. हम मध्यकाल में वापस चले जाएंगे और शायद मध्य-पूर्व के कई देशों की तरह, हमें भी अधिनायकवादी शासन के अधीन जीना पड़ेगा. 

मूल रूप से अंग्रेजी में 11 जनवरी, 2020 को काउंटर करेंट वेबसाइट पर प्रकाशित

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/नवल) 

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