कटघरे में आरक्षण : दलित, आदिवासी और ओबीसी के साथ हकमारी

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण के सन्दर्भ में दिए गए फैसले का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दुष्प्रभाव समाज के कमजोर और उपेक्षित वर्गों के ऊपर सीधे तौर पर पड़ेगा। यह फैसला संविधान की मूल भावना का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन करता है। ओमप्रकाश कश्यप का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने बीते 7 फरवरी, 2020 को पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित एक मामले में सुनवाई के दौरान आरक्षण पर सवाल खड़ा किया। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण, उनका मौलिक अधिकार नहीं है। साथ कोर्ट ने अपने फैसले में आरक्षण पर भी सवाल खड़ा किया कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य इसे देने के लिए बाध्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एल. नागेश्वर राव व न्यायाधीश हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उत्तराखंड के पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट में सहायक अभियंता पद पर पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में एक याचिका की सुनवाई में की।

जाहिर तौर पर सुप्रीम कोर्ट की उपरोक्त टिप्पणी विचारणीय है, क्योंकि देश की शीर्षतम अदालत ने समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण हेतु संवैधानिक व्यवस्था मानने के बजाए, राज्य के विवेक का विषय मान लिया है। परिणामस्वरूप, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलने वाले आरक्षण के आगे भी सवालिया निशान लग जाता है। 

चूंकि मामला उत्तराखंड का है, अतएव उचित होगा कि वहां के सामाजिक समीकरण की एक समीक्षा ली जाएं। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा ओबीसी की संख्या, राज्य की कुल जनसंख्या का क्रमशः 18.76%, 2.90% तथा 18.3% है। तदनुसार सरकार ने नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की है। 30 अगस्त 2001 की अधिसूचना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में क्रमशः 19%, 4% तथा 14% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 23 जुलाई, 2016 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार उत्तराखंड में आरक्षित वर्गों के लगभग 9000 पद लंबे समय से रिक्त है। इन रिक्त पदों पर भर्ती की मांग को लेकर 22 जुलाई, 2016 को, प्रदेश के आरक्षित श्रेणी के युवाओं ने देहरादून में प्रदर्शन भी किया था। इस दौरान आंदोलनकारियों का आरोप था कि उच्चतम न्यायालय के 2006 के फैसले के बावजूद सरकार उपर्युक्त रिक्त पदों पर भर्ती को लंबित रखा है।

जस्टिस एल. नागेश्वर राव व जस्टिस हेमंत गुप्ता

इस बीच उत्तराखंड सरकार ने पूर्व के सभी संबंधित आदेशों को खारिज करते हुए 5 सितंबर, 2012 को आदेश दिया था कि राज्य में आगे की सभी भर्तियां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले आरक्षण के बगैर होगी। इस आदेश को सहायक बिक्री कर आयुक्त ज्ञानचंद (जो कि अनुसूचित जाति से हैं) ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के फैसलों, “इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार” तथा “जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता” आदि का हवाला देते हुए बताया कि संविधान का अनुच्छेद 16(4), दुर्बल वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण के औचित्य का समर्थनकारी प्रावधान है। इसी आधार पर उसने दिनांक 5 सिंतबर, 2012 के सरकार के आदेश को खारिज कर दिया था।

बता दें कि उच्चतम न्यायालय ने “इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार” प्रकरण में दिनांक 16 नवंबर, 1992 के अपने फैसले में आरक्षण के औचित्य की विस्तृत समीक्षा की थी। उस आदेश में भारतीय संविधान की मूल भावना “समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व” समाहित थी। पुनश्चः 19 अक्टूबर, 2006 को उच्चतम न्यायालय ने “एम. नागराज बनाम भारत सरकार” मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 16(4-ए) सरकारी नौकरियों में उपेक्षित वर्गों को आरक्षण के पक्ष में सक्षम प्रावधान हैं, लेकिन इन अनुच्छेदों के तहत सरकार को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि सरकार चाहे तो वह अपने विवेक के आधार पर इस संबंध में आवश्यक कानून बना सकती है। इसके लिए उसे अनुच्छेद 335 का संज्ञान लेते हुए संबंधित वर्ग के पिछड़ेपन तथा सार्वजनिक रोजगार से संबंधित मात्रात्मक आंकड़े जुटाने होंगे जो उन नौकरियों में उसका अपर्याप्त प्रतिनिधित्व सिद्ध करते हों।

सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली

गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों की संख्या के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया गया था। उसकी रिपोर्ट में भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के कर्मचारियों की संख्या कम पाई गई थी। उस रिपोर्ट की प्रति आरक्षित श्रेणी के प्रतिवादी की ओर से उच्चतम न्यायालय के समक्ष पेश की गई थी। परंतु उच्चतम न्यायालय ने सरकारी वकील के इस कथन पर भरोसा करना न्यायसंगत माना कि उत्तराखंड सरकार मानती है कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग के कर्मचारियों को आरक्षण देना उसका संवैधानिक दायित्व नहीं है, इसलिए उसने 5 सिंतबर, 2012 के आदेश द्वारा सरकारी नौकरियों में आरक्षण न देने का निर्णय लिया है। न्यायालय के अनुसार आरक्षण के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 16(4-ए)  हालांकि स्वयं-सिद्ध प्रकृति के हैं, लेकिन वे सरकार के विवेक के अधीन हैं। मसलन, अनुच्छेद 16(4) के मुताबिक इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। परंतु, यह अनुच्छेद राज्य सरकार को सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए बाध्य नहीं कर सकती हैं। इसीलिए सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है।

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प्रतिवादियों के वकीलों ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष तर्क दिया था कि कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण देना उत्तराखंड सरकार की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है। मात्रात्मक आंकड़ों के आधार पर आरक्षित वर्गों का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होने के बाद ही, सरकार उन वर्गों को आरक्षण का लाभ देने से इन्कार कर सकती है। इसपर उच्चतम न्यायालय का कहना था कि चूंकि उत्तराखंड सरकार 5 सितंबर 2012 सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण न देने का निर्णय ले चुकी है, और यह पूर्वस्थापित है कि सरकार को आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकताइसलिए उच्च न्यायालय का इस आदेश को खारिज करने का फैसला कानून-सम्मत नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने यह भी जोड़ दिया कि पदोन्नति में आरक्षण की दावेदारी में प्रतिवादियों का कोई मौलिक अधिकार शामिल नहीं है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में देश को “स्वयंप्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य” बनाने, “सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित” करने तथा “अवसर की समानता प्रदान” करने का संकल्प लिया गया है। बावजूद इसके कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक न्याय आज भी मरीचिका जैसा है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार देश में ओबीसी कुल जनसंख्या का लगभग 52% है। उनके लिए मात्र 27% आरक्षण का प्रावधान है। आरक्षण लागू होने के 28 वर्ष बाद भी आज ग्रुप-ए और ग्रुप-बी की नौकरियों में ओबीसी का अनुपात 27% के बजाय, लगभग 10.57% पर अटका हुआ है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर वर्गों की हिस्सेदारी तो और भी दयनीय है। जून 2019 में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक आलेख के अनुसार भारत के प्रमुख 40 विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कुल संख्या का 6% से भी कम आरक्षित वर्ग से है।

ऐसे में उच्चतम न्यायालय का उपरोक्त टिप्पणी भारत के “कल्याण राज्य” की अवधारणा पर ही सवाल खड़े करता है। आरक्षण को यदि सरकारों के विवेक का विषय बना दिया गया तो उसे राजनीतिक दलों का चुनावी एजेंडा बनते देर न लगेगी। इसका नुकसान देश के साथ-साथ, समाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से कमजोर लोगों को ही उठाना पड़ेगा। सामाजिक वैमनस्य बढ़ेगा और ऊंच-नीच की खाई उत्तरोत्तर गहरी होती जाएगी। यह भी याद रखना चाहिए कि संविधान के इन्हीं प्रावधानों के अंतर्गत वर्तमान सरकार ने 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया था। इसके लिए उसे संविधान में संशोधन भी करना पड़ा था। इसलिए समाज के उन वर्गों के विकास के लिए जो न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी अत्यंत पिछड़े हुए हैंआरक्षण देना उसका नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है। अत: सरकार को चाहिए कि हालात की समीक्षा करते हुए तत्काल आवश्यक कदम उठाए, जिससे वह “सबका साथ-सबका विकास” के अपने संकल्प पर खरी उतर सके।

(संपादन: गोल्डी/नवल)

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