पेरियार मेरे जीवन में

तमिलनाडु के पेरियारवादी और द्रविड़ साप्ताहिक सांस्कृतिक पत्रिका कात्तारू के प्रकाशक थमरई कन्नन बता रहे हैं कि पेरियार के शिक्षाओं का वे अपने जीवन में अनुपालन कैसे कर रहे हैं। वे मानते हैं कि वैकल्पिक संस्कृति को अपनाने के पेरियार के आह्वान को स्वीकार कर ही हम अपनी प्रगति की राह प्रशस्त कर सकते हैं

आज भारत में जो भी भेदभाव और सामाजिक अन्याय हम देख रहे हैं, उसकी जड़ें हिन्दू धर्म में हैं। पेरियार और आंबेडकर दोनों की यह दृढ़ मान्यता थी कि सभी सामाजिक निष्ठुरताओं और निर्दयताओं के लिए हिन्दू धर्म ज़िम्मेदार है। हिन्दू धर्म के उन्मूलन को पेरियार अपना परम कर्त्तव्य मानते थे। आंबेडकर ने कहा था, “मैं हिन्दू के रूप में जन्मा हूँ परन्तु मैं हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं”। वर्ष 1956 में आंबेडकर ने अपने एक लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को अंगीकार कर लिया था।

परंतु मेरी मान्यता है कि ईसाई या बौद्ध धर्म अथवा इस्लाम को अपनाकर हम हिन्दू धर्म के उन्मूलन का अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते। हमारे सभी त्यौहारों, रस्मो-रिवाजों और अनुष्ठानों का स्रोत हिन्दू धर्म है। हमारे पारिवारिक रिश्तों, जातियों, उत्सवों और संस्कारों पर हिन्दू धर्म हावी है। इसलिए पेरियार का विचार था कि हम एक वैज्ञानिक वैकल्पिक संस्कृति अपनाएं, जो हिन्दू संस्कृति का स्थान ले। यह लंबी प्रक्रिया होगी और इस दौरान हम अनुपयोगी और अप्रासंगिक चीजों को त्याग सकते हैं। पेरियारवादी होने के नाते मेरा यह कर्तव्य है कि मैं पेरियार के विचारों को अमल में लाऊँ और उन्होंने जिस वैकल्पिक संस्कृति का प्रस्ताव किया था उसका समाज में प्रचार-प्रसार करूं। 

मेरे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में पेरियार के विचारों का कार्यान्वयन

कथनी से करनी हमेशा ज्यादा प्रभावी होती है। मैंने अपना जीवन एक पेरियारवादी के तौर पर जीने का निर्णय लिया। मैं बचपन से ही पेरियार की विचारधारा से परिचित था और इसलिए मैंने अंतर्धार्मिक विवाह करना तय किया। मेरी पत्नी का परिवार भी पेरियारवादी है और वे भी चाहते थे कि उनकी लड़की किसी दूसरी जाति के लड़के से विवाह करे। मेरी पत्नी न तो मंगलसूत्र पहनती है, न गहने और ना ही बिंदी लगाती है। वह परिधानों में अंतर नहीं करती है। 

टी. थमरई कन्नन व उनकी पत्नी

पेरियार का कहना था कि विवाह की संस्था एक पाखंड और मिथ्या है। वे यह भी कहते थे कि अगर कोई व्यक्ति विवाह करना ही चाहता है तो उसे अंतरजातीय विवाह करना चाहिए। इसलिए मैंने एक दूसरी जाति की लड़की से शादी की और हमारा विवाह रजिस्ट्रार के कार्यालय में हमारे मित्रों की उपस्थिति में हुआ। हाँ, हम दोनों ने ही अपने-अपने अभिभावकों को हमारे विवाह की सूचना दी थी (उनकी अनुमति नहीं ली थी)। हमने उनसे कहा था कि अगर उन्हें समय मिले तो वे हमारे विवाह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित हैं। हमने एक-दूसरे को माला पहनायी, परंतु मैंने अपनी पत्नी को मंगलसूत्र नहीं पहनाया। हमने किसी पंचांग से अपने विवाह के लिए शुभ दिन या शुभ मुहुर्त का पता नहीं लगाया। चूंकि मेरी ससुराल वाले भी पेरियारवादी हैं, इसलिए हमें यह सब करने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

पेरियार की यह मान्यता भी थी कि संतानोत्पत्ति पुरूषों और महिलाओं दोनों के लिए एक बोझ है। इसलिए हमदोनों ने तय किया कि हमारे बच्चे नहीं होंगे। यह निर्णय करना अधिकांश पेरियारवादियों के लिए बहुत कठिन होता है। हमारे दांपत्य जीवन को अब बीस वर्ष हो गए हैं और मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि इस निर्णय से हमदोनों बहुत खुश हैं। इस प्रकार मेरे व्यक्तिगत जीवन में मेरे सारे निर्णय पेरियार की विचारधारा के अनुरूप होते हैं और इसमें मेरी पत्नी की भी बराबर की भूमिका है। 

कन्नन अपने पेरियारवादी साथियों के साथ

पेरियारवादी थोजहरगल (साथियों) और अन्यों के लिए 

मेरे हिसाब से पिछली 19 सदियों से हमारे जीवन में सबकुछ मनु की संहिता के आधार पर होता आ रहा है। हम किस स्थान पर जन्म लें, हमारा भोजन क्या हो, हम जीविकोपार्जन कैसे करें – यह सब मनु की संहिता निर्धारित करती है। इसलिए मैं अपने पेरियारवादी साथियों से कहता हूं कि वे अपने जन्मस्थान को छोड़कर दूसरी जातियों के लोगों के बीच जाकर रहें। हम पिछड़ी जातियों के पेरियारवादियों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अपनी जमीनें दलितों को सौंप दें। दलित पेरियारवादियों को हम ऐसी जगहों पर रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जहां दूसरी जातियों के लोग रहते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे क़दमों से ही अंततः जाति व्यवस्था का उन्मूलन होगा। विभिन्न धार्मिक संस्कारों व अनुष्ठानों के बारे में पेरियार क्या सोचते थे, आइए संक्षेप में इस पर विचार करते हैं। 

नामकरण : पेरियार का मानना था कि बच्चों को ऐसे नाम दिए जाने चाहिए, जिनसे उनके धर्म, जाति और लिंग का पता न लगे। इससे जातिगत और लैंगिक भेदभाव समाप्त करने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, उन्होंने बच्चों को रशिया, पुरतचिकोडी, पगुथारिवू, ग्वाथमन, समाधर्मम्, सीत्राआसू, मास्को इत्यादि जैसे नाम दिए थे। पेरियारवादी अपने बच्चों को करूनथिनई, थोसगर ईवीआर इत्यादि जैसे नाम देते हैं, जिनसे उनकी जाति का पता नहीं चलता। 

कर्णभेदन संस्कार : पेरियारवादियों का मानना है कि यह संस्कार जातिप्रथा को मजबूती देता है क्योंकि इस अनुष्ठान में बच्चे के मामा की प्रमुख भूमिका होती है। इसलिए हम पेरियारवादी साथियों को यही सलाह देते हैं कि वे इसका त्याग करें।

ऋतुसिद्धी संस्कार : यह संस्कार तब किया जाता है जब लड़कियों के मासिक धर्म की शुरूआत होती है। इसमें भी लड़की का मामा अनुष्ठान करता है। यह अनुष्ठान बच्चियों को नीचा दिखाता है और जाति प्रथा व पितृसत्ता को मजबूती देता है।

गृहप्रवेश : इस उत्सव में भी धर्म की अहम भूमिका होती है। इस अनुष्ठान को वास्तुशास्त्र के नाम पर पवित्र दर्जा दिया गया है। इसमें किसी ब्राह्मण को बुलाया जाता है, जो अविवेकपूर्ण, अवैज्ञानिक और अंधविश्वास पर आधारित अनुष्ठान करता है। हमने इस उत्सव का नाम बदल दिया है और हमारी सलाह यही होती है कि इसमें ब्राह्मणों को निमंत्रित करने की बजाय उन श्रमिकों को निमंत्रित करें, जिन्होंने मकान का निर्माण किया है और उन्हें भोजन कराकर व वस्त्रादि भेंट कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें।

अंतिम संस्कार : अंतिम संस्कार की जगह हम पेरियारवादी ‘पद थिरप्पू विज़्हा’ संस्कार करते हैं। सामान्यतः किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात, सम्बंधित संस्कार संपन्न करवाने के लिए ब्राह्मण परोहिथर को आमंत्रित किया जाता है। पेरियारवादियों को न तो ब्राह्मण परोहिथर की ज़रुरत होती है और ना वे कोई कर्मकांड (कारियम / सदन्गु) करते हैं। पेरियार के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ‘पद थिरप्पू विज़्हा’ का आयोजन किया जाना चाहिए। इसका अर्थ है एक ऐसी सभा या बैठक जिसमें मृतक की अच्छाईयों को याद किया जाए।

सार्वजनिक कब्रिस्तान / विद्युत शवदाह गृह : शव को ऐसे किसी ऐसे स्थान पर जलाया या गाड़ा नहीं जाना चाहिए जहाँ जातिगत भेदभाव होता हो। हमारी यह सलाह रहती है कि अंतिम संस्कार के लिए विद्युत शवदाह गृह का उपयोग किया जाये।  

पेरियार ने जिस ‘वैकल्पिक संस्कृति’ का प्रस्ताव किया था उसमें सभी हिन्दू संस्कारों / अनुष्ठानों के विकल्प हैं। ये विकल्प लचीले हैं और इनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किए जा सकते हैं।  

भविष्य की चुनौतियाँ :

तमिलनाडु और उत्तर भारतीय राज्यों में अंतरजातीय विवाह करने वाले युगलों की हत्या की घटनाएं होती रहतीं हैं। इन्हें ‘ऑनर किलिंग’ भी कहा जाता है। विभिन्न कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इन घटनाओं से निपटने के लिए विशेष कानून बनाने की मांग की है। परन्तु हत्या के लिए पहले से ही काफी कड़ी सजा, जिसमें मृत्युदंड भी शामिल है, का प्रावधान है। मेरी राय में ऐसी घटनाओं की संख्या में इसलिए वृद्धि हो रही है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया में सफल अंतरजातीय विवाहों की चर्चा नहीं होती और नकारात्मक घटनाओं को अनावश्यक महत्व देता है। उदाहरण के लिए, पेरियार द्रविदर कड़गम ने पिछले तीन वर्षों में तमिलनाडु में एक हज़ार से अधिक अंतरजातीय विवाह करवाए हैं। इसी अवधि में ऑनर किलिंग के 17 मामले दर्ज किये गए हैं। मीडिया को सफल अंतरजातीय विवाहों के बारे में चर्चा करनी चाहिए ताकि समाज में ऐसे विवाहों के सम्बन्ध में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सके। ऐसा करने से संबंधित प्रकाशन और संस्थान वैकल्पिक संस्कृति का प्रसार भी करेंगे।

‘मी टू’ आन्दोलन पर भी ध्यान दिए जाने की ज़रुरत हैं। महिलाओं को एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने में अक्सर धर्म की भी भूमिका रहती है। ऐसे धर्म पर न केवल महिलाओं बल्कि संपूर्ण मानवता को प्रश्न उठाने चाहिए। पेरियार के लिए नारीवाद का अर्थ था महिलाओं को एक वस्तु नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में देखना। उन्होंने कहा था कि महिलाओं को अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करना चाहिए। 

सामाजिक और धार्मिक निषेधों की अवहेलना करते हुए अर्थी को कंधा देतीं महिलाएं

तमिलनाडु में पिछले कुछ समय से दीवाली, विजयादशमी और अन्य हिन्दू त्योहारों को बौद्ध त्योहरों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कई उत्तर भारतीय राज्यों में गुम हाेते बौद्ध पहचान को फिर से जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं। परन्तु, मेरा मानना है कि इससे समाज में कोई प्रगतिशील परिवर्तन नहीं आएगा और ना ही हमारा सामाजिक दर्जा बेहतर होगा। जैसे, एक समय भगवा रंग को बौद्ध भिक्षुओं से जोड़ा जाता था. अब उसे आरएसएस से जोड़ा जाता है। पहले सफ़ेद रंग जैनियों की याद दिलाता है, पर अब ऐसा नहीं है। इसलिए अगर हम भगवा रंग या स्वास्तिक पर अपना दावा करेंगे तो इससे आरएसएस और भाजपा को फायदा ही होगा। यही बात खान-पान की आदतों के बारे में भी सही है। अब बीफ के सेवन को दलितों से जोड़ा जाता है जबकि पहले यह ब्राह्मणों का आहार था। इसी तरह ऋग्वेद  के अनुसार, सोमरस या सुरा का सेवन आर्य संस्कृति का भाग था। परन्तु आज के ब्राह्मण अपनी प्राचीन पहचान के इस हिस्से पर अपना दावा नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि शराब का सेवन अब किस संस्कृति का हिस्सा है। अगर हम अपनी पुरानी पहचानों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेंगे तो हम पीछे की ओर ही जाएंगे। इसके स्थान पर हमें उन तार्किक विचारों को अपनाना चाहिए जो हमें बुद्ध, आंबेडकर और पेरियार से विरासत में मिले हैं। प्राचीन त्योहारों को उनके मूल स्वरुप में मनाने पर अपने धन का अपव्यय करने की बजाय हमें मई दिवस, वैलेंटाइन्स डे और बुद्ध, आंबेडकर और पेरियार जैसे व्यक्तित्वों की जयंतियों को अपने त्योहार बनाने चाहिए।

पेरियार और आंबेडकर की विचारधाराओं को अपनाना आवश्यक 

आज हमारे लिए पहले से कहीं अधिक यह आवश्यक है कि हम पेरियार और आंबेडकर की शिक्षाओं को याद करें। उनकी विचारधारों को अपना कर ही हम उन प्रतिगामी ताकतों से संघर्ष कर सकते हैं जो आज राजनैतिक सत्ता पर काबिज़ हैं और हमारे जीवन के हर क्षेत्र को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहीं हैं।   

(कल्याविज़ी से बातचीत के आधार पर)

कल्याविज़ी

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)

About The Author

Reply