जब मैंने पहली बार जगदेव प्रसाद को देखा

अमर शहीद जगदेव प्रसाद की जयंती के मौके पर उनसे जुड़ा संस्मरण बता रहे हैं बिहार विधानसभा के पूर्व सदस्य एन. के. नंदा। उनके मुताबिक, उन्होंने जगदेव बाबू एक बड़े राजनीतिज्ञ के अलावा प्रभावी व्यक्तित्व वाले सामाजिक सुधारक भी थे

अमर शहीद जगदेव प्रसाद ( 2 फरवरी, 1922 – 5 सितम्बर, 1974 ) पर विशेष

उन दिनों मेरी उमर करीब 23 वर्ष की रही होगी। राजनीति में मेरी सक्रियता संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़ाव के कारण पहले ही हो चुकी थी। लेकिन जगदेव प्रसाद को देखने और सुनने का वह पहला मौका था। वह भी उनकी हत्या के ठीक चार दिन पहले यानी 1 सितंबर 1974 को। वे हमारे इलाके में आए थे, एक जनसभा को संबोधित करने। हमारा इलाका मतलब पटना के दुल्हिन बाजार का इलाका। खूब भीड़ जुटी थी, जगदेव बाबू को देखने। ऐसा लग रहा था, मानों दुल्हिन बाजार में जन-सैलाब उमड़ गया हो।

जगदेव बाबू सांवले रंग के थे, लेकिन चेहरे पर तेज ऐसा कि देखने वाला एक नजर में ही प्रभावित हो जाए। उन्होंने धोती-कुरता और बंडी पहन रखा था। सभी लोगों को जगदेव बाबू के संबोधन का इंतजार था। जैसे-जैसे समय बढ़ता जा रहा था, लोगों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी।

बिहार की राजधानी पटना के दुल्हिन बाजार में स्थापित जगदेव प्रसाद की प्रतिमा

एक खास बात यह कि दुल्हिन बाजार जहां जगदेव बाबू की सभा आयोजित थी, उस इलाके में भले ही संख्या दलितों और पिछड़ों की अधिक है लेकिन दबदबा सामंती लोगों का ही था। इस लिहाज से दुल्हिन बाजार में सभा का आयोजन बहुत महत्वपूर्ण था। सभी को लग रहा था कि आज जगदेव बाबू के संबोधन में जरूर कोई खास बात होगी। इसकी वजह यह कि प्रदेश में सत्तासीन सरकार के खिलाफ विरोध तब गांवों तक में पहुंच चुका था। यही वजह रही कि सभा को लेकर स्थानीय प्रशासन भी अलर्ट था।

मेरे लिए यह पहला अनुभव था कि मेरे सामने एक जन-सैलाब था और हमारे प्रांत के शीर्ष नेताओं में से एक हमारे सामने थे। मैं तो यह मानता हूं कि जगदेव बाबू जितने बड़े राजनीतिज्ञ थे, उतने ही वे समाज सुधारक भी।

मंत्रिमंडल की बैठक में भाग लेते जगदेव प्रसाद, तस्वीर साभार : विद्युत प्रकाश सेनपति(जगदेव प्रसाद के बड़े बेटे)

खैर, जगदेव बाबू का संबोधन शुरू हुआ। उनके संबोधन की दो बातें अब भी मुझे याद है। शेष संभवत: इसलिए नहीं कि मेरी अपनी उम्र 68 वर्ष हो गई है। पहली बात तो यह कि वे ब्राह्मणवाद का विरोध करते थे। अपने भाषण में उन्होंने अपने हाथ की पांचों उंगलियों को दिखाते हुए कहा कि जो सबसे ऊपर है वह ब्राह्मण है, उसके बाद वाला क्षत्रिय और उसके बाद वाला वैश्य। सबसे नीचे शूद्र समाज है जिसके ऊपर सभी का बोझ है। तब जगदेव बाबू ने कहा था कि समय आ गया है कि अब हाथ को पलट दिया जाए। जो शूद्र है वह सबसे ऊपर हो। हमारी लड़ाई यही है। 

पटना के दुल्हिन बाजार में स्थापित जगदेव प्रसाद स्मारक

एक दूसरी बात जो जगदेव बाबू ने अपने ओजस्वी भाषण में कही, वह उन दिनों द्विज वर्ग को अंदर तक चुभती थी, कहना गैर वाजिब नहीं कि आज भी वे उसकी चुभन महसूस करते हैं। इसके पहले मैंने उनका नारा सुना था – ‘अबकी सावन भादो में, गोरी कलाइयां कादो में’। उनके इस नारे ने दलित-पिछड़े समाज के लोगों को झकझोर कर जगा दिया था। उस दिन अपने संबोधन में जगदेव बाबू ने कहा – एक कतार है। इस कतार में सबसे पहले ब्राह्मण है जो क्षत्रिय को जूता मारता है। क्षत्रिय वैश्य को जूता मारता है और वैश्य शूद्र को। लेकिन इस कतार को वृताकार बना देना चाहिए ताकि शूद्र ब्राह्मण को जूता मार सके। जिस दिन ऐसा हो गया, समाज बदल जाएगा। शोषण-उत्पीड़न सब खत्म हो जाएगा। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें एकजुट होना होगा और उनकी साजिशों को नाकामयाब करना होगा। यह लंबी लड़ाई है।

जैसा कि मैंने पहले बताया कि उन दिनों मेरी उमर कम थी और यह भी कि वह पहला मौका था अपने प्यारे नेता को देखने और सुनने का, मेरा मन रोमांचित हो गया था। आप इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि जब भी मैं उनके कहे शब्दों के बारे में सोचता हूं, मैं अपने अंदर एक ऊर्जा  महसूस करता हूं।

मुझे जगदेव बाबू की एक और बात अच्छी तरह से याद है। आप यह तो जानते ही हैं कि बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। लेकिन मैं आपको बताऊं कि बिहार में एकमात्र नेता जगदेव बाबू हुए जो अपनी सभाओं में रामायण की प्रतियां जलाते-जलवाते और लोगों से जनेऊ तोड़वाते थे।

यह उनका ही प्रभाव था कि मेरे पिता जगदीश महतो ने पूजा-पाठ छोड़ दिया। यह केवल मेरे पिता पर हुआ असर नहीं था। आज भी आप यदि मध्य बिहार के ग्रामीण इलाकों में जाएंगे तो आप पाएंगे कि हर गांव में दो-चार परिवारों के लोग ब्राह्मणों को अपने यहां किसी कार्यक्रम में नहीं बुलाते हैं। 

बहरहाल, मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने जगदेव बाबू को देखा, सुना और उनके विचारों पर अबतक अमल किया है। 

 (नवल किशोर कुमार से बातचीत के आधार पर)

(संपादन : नवल)

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