आर्यों से नहीं, आदिवासियों के पुरखों से जुड़ा है भीमबेटका, गोंडी अध्येता ने बताए कारण

भीमबेटका के संदर्भ में भ्रम फैलाया जा रहा है कि यह आर्यों के सनातन धर्म से जुड़ा एक धरोहर है, जबकि सच्चाई यह है कि यह गोंड आदिवासियों के संस्कृति और इतिहास का एक अभिन्न गढ़ है। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले में है भीमबेटका गुफा। यहां गुफा के अंदर सैंकड़ों शैलचित्र हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे 1990 में राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया था। उसके मुताबिक यह एक पुरापाषाणिक आवासीय स्थल है। लेकिन अब इसके बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है कि यहां पांडव आए थे। साथ ही यह भी कि इसका नाम महाभारत में उल्लेखित पांडव पुत्र भीम के नाम पर रखा गया है। गोंडी संस्कृत एवं भाषा की विशेषज्ञ उषाकिरण आत्राम इस दावे को खारिज करती हैं। उनके अनुसार, यह स्थल गोंड समाज के लोगों के पुरखों का है।

फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में आत्राम ने बताया कि भीमबेटका के संदर्भ में फैलाई जा रहे भ्रमों को सरकारी संरक्षण हासिल है। वहां जाने वाले पर्यटकों को भ्रामक जानकारियां दी जा रही हैं। उन्होंने बताया कि इस संबंध में एक चार सदस्यीय दल गोंड समाज की ओर से  गुफा में जाकर मुआयना किया। इस दल में उषाकिरण आत्राम के अलावा नंदकिशोर नैताम, सुजाता कुंजाम, ज्योती पदम भी शामिल हैं। आत्राम के मुताबिक गुफा में मौजूद गाइड ने बताया कि यह गुफा महाभारत कालीन है और इसका संबंध हिंदू धर्म से जुड़ा है।

भीमबेटका गुफा में बने शैलचित्र

गुफा में हैं मानवजीवन के विभिन्न गतिविधियों के चित्र

उषाकिरण आत्राम, गोंडी अध्येता

आत्राम ने बताया कि इस अति प्राचीन गुफा का दुर्लभ शैल के चित्र हैं जो कि पुरापाषाण काल के हैं। सफेद, लाल और पीले रंग के बने शैल चित्रों के जरिए उस समय की जीवनशैली का चित्रण किया गया है। इसमें पशुपालन, कृषि, शिकार, नृत्य आदि गतिविधियां शामिल हैं। इनके अलावा शैल चित्रों में हमारे टोटेम (गोत्र प्रतीक चिन्ह्) शेर, मोर, भैंस, गाय, बैल, मछली, कछुआ, तीर-धनुष, तलवार, सल्लागांगरा (माता-पिता का धार्मिक प्रतीक) आदि का भी चित्रण है। इनसे यह तो स्थापित होता ही है कि यह स्थल हमारे पुरखों का है जिन्होंने मानव सभ्यता की शुरूआत की। वहीं दूसरी ओर आर्य बिना किसी आधार के यह झूठ फैला रहे हैं कि भीमबेटका का संबंध हिंदू धर्म से है।  

यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में घोषित है भीमबेटका

बताते चलें कि वर्ष 2003 में यूनेस्को ने भीमबेटका को विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया। जिस रूप में यूनेस्को ने इसे मान्यता दी है, उसके मुताबिक यहां शैलचित्र भारत में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं। इस गुफा की खोज वर्ष 1957-58 में डाॅ. विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा की गई थी। यूनेस्को ने कहा है कि यह मध्य पाषाणकाल व नव पाषाणकाल के बीच का है। इसमें दर्शाए गए शैलचित्र मनुष्यों की जीवन शैली से संबंधित हैं।

पांडव पुत्र भीम के नाम पर नहीं है भीमबेटका का नाम

उषाकिरण आत्राम बताती हैं कि यह स्थान आदिवासी समुदाय के जल के देवता भीमाल पेन के नाम पर है। चूंकि आदिवासियों से जुड़े इतिहास और ऐतिहासिक स्थलों के बारे में पक्षपातपूर्ण तरीके से लिखा गया है, इसलिए यह आवश्यक है कि राज्य सरकार अपने तंत्र का उपयोग कर लोगों को सच्चाई से अवगत कराए। उन्होंने कहा कि इस गुफा में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे इसका संबंध महाभारत के पांडवों से होता हो। 

(संपादन: गोल्डी)

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