चंद्रशेखर को मिला प्रकाश आंबेडकर का साथ; दंगों के लिए दलित जिम्मेदार नहीं

प्रकाश आंबेडकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को दिल्ली में हो रहे दंगे के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। राजधानी दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि इन दोनों को अपने इस आपराधिक कृत्य की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और देशवासियों से माफी मांगनी चाहिए

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), नेशनल पापुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के खिलाफ आंदोलन चला रहे भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को डॉ. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर का साथ मिला है। नई दिल्ली के वुमेन प्रेस क्लब सभागार में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में आंबेडकर ने कहा कि यह बात पूरी तरह गलत है कि दिल्ली में हो रहे दंगे में दलितों की भागीदारी है। यह एक तरह की साजिश है जिसका मकसद सीएए-एनपीआर-एनआरसी जैसे काले कानून के खिलाफ देश भर में दलित-बहुजनों की बीच बन रही एका को तोड़ना है।

प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि सीएए-एनपीआर-एनआरसी के खिलाफ पूरे देश में अभियान चलाने की योजना है। इसे “सेव नेशन-सेव कंस्टीटयूशन” यानी “राष्ट्र बचाओ-संविधान बचाओ” नाम दिया गया है। इसके तहत आगामी 4 मार्च, 2020 से पूरे देश में अभियान शुरू होगा, जिसका नेतृत्व वह स्वयं करेंगे। इसके लिए एक टीम का गठन किया गया है जो इस पूरे अभियान का संचालन करेगी। इसमें नीतिशा खलखो, अधिवक्ता सुजीत सम्राट, काशीनाथ साह, अधिवक्ता रईस खान और अजय राय शामिल हैं।

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते प्रकाश आंबेडकर व अन्य

आंबेडकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को दिल्ली में हो रहे दंगे के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि इन दोनों को अपने इस आपराधिक कृत्य की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और देशवासियों से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार लोक-लाज भी भूल गई है। जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रवास के दौरान ही दंगों को अंजाम दिया गया, वह दरअसल बहुत खतरनाक है। मोदी हुकूमत विश्व समुदाय को यह संदेश देना चाहती है कि चाहे कुछ भी हो, वह अपने विभाजनकारी एजेंडों को लागू करेगी। आंबेडकर ने विश्व के अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि वे भी अपने-अपने स्तर से भारत सरकार पर दबाव बनाएं कि वह दंगों को बंद कराए तथा देश को धर्म के आधार पर बांटने वाले काले कानून सीएए को वापस ले।

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उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में सरकार हर व्यवस्था को तबाह कर देना चाहती है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस. मुरलीधर का रातोंरात स्थानांतरण किए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि मोदी हुकूमत वह सारे हथकंडे अपना रही जो संविधान विरोधी हैं। उन्होंने कहा कि इसी देश में चंद्रशेखर जो सीएए-एनपीआर-एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे हैं, उनके खिलाफ रासुका लगाकर जेल भेज दिया जाता है और दूसरी तरफ रामप्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा जैसे लोग हैं जो सरेआम लोगों को उन्मादी बना रहे हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई तक नहीं होती। दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस. मुरलीधर ने उनके खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया तो सरकार उनका स्थानांतरण ही करवा दिया।

आंबेडकर ने कहा कि मोदी हुकूमत द्वारा बनाया गया सीएए कानून ही गलत है। यह कानून पहले से था और इसके सेक्शन चार और पांच में इसके प्रावधान थे कि यदि विश्व के किसी हिस्से में भारतीय मूल के नागरिकों का उत्पीड़न होता है तो उन्हें भारत सरकार नागरिकता देगी और पुनर्वासित करेगी। लेकिन मोदी सरकार ने इसमें एक अलग से संशोधन कर इसे न केवल तीन देशों (अफगानिस्तान,,पाकिस्तान और बांग्लादेश) तक सीमित कर दिया, बल्कि इसमें से मुसलमानों को अलग कर दिया।

आंबेडकर ने कहा कि दिल्ली में हो रहे दंगे दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इसके लिए दलित समाज के वाल्मीकि समुदाय के लोगों व भीम आर्मी को जिम्मेदार ठहराना गलत है। हालांकि यह सही है कि करीब पांच वर्ष पहले आरएसएस ने वाल्मीकि समाज के बीच अपनी पैठ बनाई थी और उनका अपने एजेंडों को लागू करने के लिए इस्तेमाल भी किया। परंतु, वाल्मीकि समाज के लोगों ने पहले ही आरएसएस से खुद को अलग कर लिया था। वहीं भीम आर्मी को दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना पूरी तरह गलत है। 

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षिका नीतिशा खलखो ने कहा कि यह पहला मौका नहीं है जब आदिवासियों से उनके मूलनिवासी होने का सबूत मांगा जा रहा है। जॉन हॉफमैन व आर्थर वैन एमिलिन ने अपनी किताब “इनसाइक्लोपीडिया ऑफ मुंडारिका” में इसका जिक्र किया है कि जब कोलकाता हाईकोर्ट में मुंडाओं से मूलनिवासी होने का सबूत मांगा गया तब आदिवासियों ने अपने पुरखों की याद मे गाड़े गए पत्थलगड़ी के पत्थरों को अदालत में पेश किए। खलखो ने कहा कि आज भी बड़ी संख्या में आदिवासी हैं जिनके पास कोई दस्तावेज़ नहीं है, जिसके आधार पर वे अपनी नागरिकता साबित कर सकें।

संवाददाता सम्मेलन को अधिवक्ता सुजीत सम्राट, काशीनाथ साह, अधिवक्ता रईस खान और अजय राय ने भी संबोधित किया।

(संपादन: गोल्डी)

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