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पेरियार एवं आंबेडकर की किताबों को लेकर जब सरकार से भिड़े ललई सिंह यादव

सिद्धार्थ बता रहे हैं पेरियार ललई सिंह यादव के अदम्य साहस के बारे में, जिसके बूते उन्होंने उत्तर भारत में राम को खारिज करने वाली पेरियार की किताब सच्ची रामायण को प्रकाशित किया। बाद में जब सरकार ने किताब को प्रतिबंधित किया तब उन्होंने सरकार को अदालत में घसीटा और मात दी

वह वर्ष 1968 का समय था। तब पूरे उत्तर भारत में कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि हिंदुओं के आराध्य राम के खिलाफ कोई किताब भी प्रकाशित हो सकती है। और यदि प्रकाशित हुई तो उसका हश्र क्या होगा। लेकिन यह हुआ और वह भी उसी उत्तर प्रदेश में जहां के अयोध्या के बारे में रामायण में उद्धृत है कि वह राम का राज्य था। नामुमकिन लगने वाले इस सच को सच साबित किया था ललई सिंह यादव ( 1 सितंबर, 1911 – 7 फरवरी, 1993) ने। उन्होंने ई.वी.रामासामी पेरियार की किताब सच्ची रामायण का 1968 में प्रकाशन किया। बाद में उन्होंने आंबेडकर की किताब ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन’ का भी प्रकाशन किया। इन दोनों किताबों को लेकर तत्कालीन राज्य सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया लेकिन दाेनों मामलों में उसे हार का सामना करना पड़ा था। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ उनके अदम्य साहस का ही परिणाम रहा कि उन्हें पेरियार की उपाधि की मिली।

 

दरअसल, जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवम्बर, 1890 ) ने भारत की बहुजन जनता की दासता और असहनीय दुखों के लिए भट्ट-सेठों को जिम्मेदार माना था, जिन्हें उन्होंने आर्य-मनुवादी कहा। देश की बहुजन आबादी शूद्रों( पिछड़ों), अतिशूद्रों ( दलितों) और महिलाओं की आाजादी  के लिए उन्होंने भट्ट-सेठों के वर्चस्व की विचारधारा मनुवाद से मुक्ति का आह्वान किया। फुले को गुरू मानते हुए डॉ. आंबेडकर ने भारत की बहुजन जनता के शोषण-उत्पीड़न की देशज व्यवस्था को ब्राह्मणवाद नाम दिया और स्वतंत्रता, समता, बंधुता और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण लिए इसके पूर्ण विनाश को जरूरी ठहराया। कमोवेश यही काम भारत के सुदूर दक्षिण में ई.वी. रामासामी पेरियार ने किया। उन्होंने उत्तर भारतीय आर्य-ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती देते हुए इनके वर्चस्व से बहुजनों की मुक्ति के लिए आजीवन संघर्ष किया। जोतिराव फुले जहां मराठी में लिखते थे, वहीं आंबेडकर अंग्रेजी और मराठी दोनों में लिखते थे। पेरियार मूलत: तमिल में लिखते थे, लेकिन उनके लेखन का अंग्रेजी में अनुवाद उसी समय होने लगा था। तथ्यों को देखें तो फुले की रचनाएं मराठी में तो उपलब्ध थीं, लेकिन अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं थीं, जबकि पेरियार और आंबेडकर की रचनाएं अंग्रेजी में उपलब्ध थीं।

ललई सिंह यादव ( 1 सितंबर, 1911 – 7 फरवरी, 1993)

जब महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बहुजन नवजागरण की लहर चल रही थी, तो देश अन्य हिस्सों में भी बहुजन उभार दिखाई दे रहा था, भले वह उतना व्यापक  न रहा हो। उत्तर भारत में बहुजन नवजगारण के पुरोधा के रूप में अछूतानंद, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद और पेरियार ललई सिंह यादव जैसे लोग समाने आए। उत्तर भारत के बहुजन नवजागरण के इन पुरोधाओं में पेरियार ललई सिंह यादव की अहम भूमिका है।

पेरियार ललई सिंह यादव ने बहुजन नवजागरण के राष्ट्रीय नायकों ई.वी. रामासामी पेरियार और डॉ. आंबेडकर की रचनाओं से उत्तर भारत को परिचित कराने का बीड़ा उठाया। पेरियार की सच्ची रामायण 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसका जिक्र पेरियार की पत्रिका ‘कुदी अरासू’ (गणतंत्र) के 16 दिसंबर 1944 के अंक में किया गया है। इसका अंग्रेजी अनुवाद द्रविड़ कषगम पब्लिकेशन्स ने ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ नाम से 1959 में प्रकाशित किया गया। इसका हिंदी  अनुवाद ललई सिंह 1968 में ‘सच्ची रामायण’ नाम से कराया। इसका अनुवाद राम आधार ने किया था। 9 दिसंबर, 1969 को उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’’को ज़ब्त कर लिया था, तथा इसके प्रकाशक पर मुक़दमा कर दिया था। सरकार ने आरोप लगाया कि यह किताबों हिंदुओं की भावनाओं को आहत करती है। ललई सिंह ने जब्ती के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वहाँ एडवोकेट बनवारी लाल यादव ने ‘सच्ची रामायण’ के पक्ष में जबरदस्त पैरवी की। फलतः 19 जनवरी 1971 को जस्टिस ए. कीर्ति ने जब्ती का आदेश निरस्त करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी जब्तशुदा पुस्तकें वापिस करे और वादी ललई सिंह को तीन सौ रुपए खर्च दे।  इस तरह वे हाईकोर्ट में मुकदमा जीत गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। उत्तर प्रदेश सरकार ने सच्ची रामायण पर यह आरोप लगाया- “यह पुस्तक पवित्रता को दूषित करने तथा अपमानजनक होने के कारण आपत्तिजनक है। भारत के नागरिकों के एक वर्ग- हिन्दुओं के धर्म और उनकी धार्मिक भावनाओं को अपमानित करते हुए जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने की मंशा है। अतः इसका प्रकाशन धारा 295 एआईपीसी के तहत दंडनीय है।’” ( पेरियार, 2020, पृ.182) राज्य सरकार के अधिवक्ता ने यह भी कहा कि चूंकि ‘इस विवादित पुस्तक के लेखक ने कठोर शब्दों में श्री राम जैसे महान अवतारों की निंदा की है और सीता तथा जनक की छवि को तिरस्कारपूर्वक धूमिल किया है, इसीलिए यह पुस्तक इन समस्त दैवीय महाकाव्यात्मक चरित्रों की आराधना या पूजा करने वाले विशाल हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं पर अनुचित प्रहार करती है। लेखक का यह कार्य  निंदनीय है।’ (पेरियार, 2020, पृ. 183) 

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यह मुकदमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दृष्टि से एक ऐतिहासिक मुकदमा साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार मानते हुए कहा कि आखिर एक मुक्त गणराज्य में सभी मौलिक अधिकार मौलिक होते हैं, सिर्फ राष्ट्रीय आपातकाल के समय को छोड़कर।” ( वही, पृ.185) अदालत ने यह भी कहा कि ““बोलने की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता एक लंबे अरसे से स्थापित  बुनियादी सिद्धांत है जो कि संविधान द्वारा सुरक्षित अधिकार हैं।” ( वही, पृ.188) अदालत ने कहने के अधिकार के संदर्भ में वाल्तेयर के प्रसिद्ध कथन को उद्धृत किया- ““तुम जो कहते हो, मैं उसे अस्वीकार करता हूं, परन्तु तुम्हारे यह कहने के अधिकार की रक्षा, मैं अंतिम श्वास तक करूंगा।” (वाल्तेयर, एस. जी.टालंटयर, द फ्रेंड्स ऑफ़ वाल्तेयर, 1907)। अंत में 16 सिंतबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट  ने अपना निर्णय सुनयाा, जिसमें ललई सिंह यादव को जीत मिली और सच्ची रामाणय पर से उत्तर प्रदेश सरकार को प्रतिबद्ध हटाना पड़ा।   

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई तीन जजों की खंडपीठ ने की। खंडपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर थे तथा दो अन्य  न्यायमूर्ति पी .एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली थे। 

ललई सिंह यादव की अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्धता और जुझारू व्यक्तित्व का पता इससे भी चलता है कि वे करीब 7 वर्षों तक वे हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पेरियार की सच्ची रामायण को प्रतिबंध से मुक्त कराने के लिए मुकदमा लड़ते रहे। इस सारे संघर्ष का उद्देश्य पेरियार के विचारों से हिंदी समाज को परिचित करना था।

ललई सिंह यादव को पेरियार के विचारों से हिंदी भाषा-भाषी समाज को परिचित कराने के लिए अदालतों का चक्कर तो लगाना ही पड़ा, यही स्थिति डॉ. आंबेडकर की किताब  ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें के साथ भी हुई। यह पुस्तक डॉ. आंबेडकर द्वारा दिए गए भाषणों का संग्रह थी। जिसमें उन्होंने दलितों से हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने का आग्रह किया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस यह कहकर 1971 में प्रतिबंध लगा दिया कि यह किताब अशांति को बढ़ावा देती है और उच्च एवं निम्न जातियों के बीच नफरत और वैमनस्य को बढ़ावा देने के साथ-साथ हिन्दू धर्म का अपमान भी करती है। अदालत ने कहा कि यदि इस पुस्तक पर एक सरसरी नज़र भी डाली जाए तो यह पता चल जाता है कि इसमें से कई अंश तर्कसंगत आलोचना की कसौटी पर खरे उतरते हैं और जिस रूप में इन्हें प्रस्तुत किया गया है, उसके प्रति कोई भी सामान्य भावनाओं से लैस, विवेकी व्यक्ति द्वारा आपत्ति नहीं की जा सकती है। वे ( किताब के तर्क) महज़ उन कठोर नियमों की ओर इंगित करते हैं जो जाति – व्यवस्था के आधार पर निर्मित, एक अपरिवर्तनीय सामाजिक पदानुक्रम में निचली मानी जाने वाली जातियों पर थोपे गए थे और उन्हें अक्षम तथा अयोग्य बताया गया था। आलोचना के ये अंश उच्च जातियों का  निचली जातियों के प्रति अहंकार और उपेक्षा भाव को भी दर्शाते हैं। इस संदर्भ में, हम पुस्तक के उन अंशों में ऐसा कोई भी आपत्तिजनक उल्लेख नहीं पाते हैं जिसमें यह बताया गया हो कि हिंदू धर्म विकृत है, हिंदुओं में सहानुभूति, समानता और स्वतंत्रता का अभाव है, हिंदू धर्म में मानवता के लिए कोई जगह नहीं है और हिंदू धर्म में व्यक्ति की प्रगति असंभव है। तर्क प्रस्तुत करने के इस क्रम में इन बयानों को लेकर भी कोई घोर आपत्ति नहीं जताई जा सकती कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का आधार है, कि ब्राह्मणवाद “जन्म से हमारा दुश्मन है” और उसका उन्मूलन ज़रूरी है। ये कथन भी आपत्तिजनक नहीं कि उच्च जाति के हिंदू अभिमानी , स्वार्थी, पाखंडी और झूठे होते हैं तथा वे दूसरों का शोषण करते हैं, उनका मानसिक उत्पीड़न करते हैं और उनका तिरस्कार ​​करते हैं। इस वाक्य को लेकर विरोध किया गया है कि ‘वेदांत के सिद्धांत ”मानवता का उपहास ” करते हैं। लेकिन इस सन्दर्भ में इसे एक प्रगतिशील टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए है क्योंकि हिन्दू धर्म अनुसूचित जाति जैसे उत्पीड़ित तथा अभावग्रस्त लोगों को यह सिखाता है कि  वे अपने वर्तमान को सुधारने की बजाय अपने अगले जन्म में सौभाग्य की उम्मीद के साथ खुद को आश्वासन दें । अस्पृश्यता और जातिगत उत्पीड़न जैसी अवधारणाओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, लेखक ने टिप्पणी की है: “उनके साथ मत रहो, उनकी छाया हानिकारक है। ” इस प्रकार वे उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा अनुसूचित जातियों के प्रति अपनाए गए दृष्टिकोण से उलट दृष्टिकोट प्रस्तुत पेश करते हैं।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि पुस्तक का समग्र अध्ययन करने के बाद और इसके उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, हमें इस बात की संतुष्टि है कि जिन वाक्यांशों पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप है, उनमें से किसी को भी दंड संहिता की धारा 153 – ए या  295-ए के तहत दंडनीय नहीं माना जा सकता। पुस्तक की ज़ब्ती का विवादित आदेश पूरी तरह से अनुचित है और इसे लागू नहीं किया जा सकता।   

इस तरह डॉ. आंबेडकर की किताब ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन’ के संदर्भ में पेरियार ललई सिंह यादव की जीत हुई और उत्तर प्रदेश सरकार को मात खानी पड़ी।तथ्यों की विवेचना करने पर यह निष्कर्ष सामने आता है कि उत्तर भारत में डॉ. आंबेडकर और ई.वी. रामासामी पेरियार के विचारों और किताबों को लाने का बड़ा श्रेय ललई सिंह यादव को जाता है। उन्होंने इन बहुजन नायकों की किताबों का अनुवाद कराकर प्रकाशित तो किया ही, उनके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक वर्षों संघर्ष किया।

(संपादन : नवल)

लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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