सीएए लागू हुआ तो विदशों में भी खत्म हो सकती है भारतीयों की नागरिकता : प्रकाश आंबेडकर

प्रकाश आंबेडकर के अनुसार सीएए-एनपीआर-एनआरसी आरएसएस के मूल वैदिक मनुवादी दर्शनशास्त्र को भारत में पुनः स्थापित करने का ज़रिया हैं। यदि भारत में यह दमनकारी कानून लागू हुआ तो विश्व समुदाय के बीच नागरिकता के सवाल पर नकारात्मक संदेश जाएगा। संभव है कि दूसरे देशों में रहने वाले भारतीयों को मिलने वाले अधिकार छीने लिए जाएं

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), नेशनल राजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप (एनआरसी) और नेशनल पॉपुलेशन राजिस्ट्रेशन (एनपीआर) का भारतीय जनता पर क्या असर पड़ेगा? क्या इससे देश के वंचित तबके के लोग भी प्रभावित होंगे? उनकी नागरिकता भी छीन ली लाएगी? इन सवालों को लेकर फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने वंचित बहुजन अघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित स्वरूप

प्रकाश जी, आज कई मामले सुर्खियों में हैं। इनमें नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), नेशनल राजिस्टर ऑफ सिटीजन्श (एनआरसी), नेशनल पॉपुलेशन राजिस्ट्रेशन (एनपीआर) तक शामिल हैं। आप की प्रतिक्रिया क्या है?

देखिए, सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर बातचीत की शुरूआत करें तो आपको यह जानना चाहिए कि यह केंद्र सरकार की कोई पहली पहल नहीं है। आसाम में 1951 में पहली बार जनगणना और एनपीआर दोनों एक साथ कराया गया था। तभी से जनगणना और एनपीआर बनाने का काम एक साथ चल रहा है। जस्टिस रंजन गोगोई जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस थे, आसाम के केसों की सुनवाई के दौरान 1951 में हुए जनगणना और एनपीआर दोनों को खारिज कर दिया था। अब दुबारा एनआरसी कराने का फैसला सुनाया गया है। मेरा यह मानना है कि अब जब दुबारा एनआरसी/एनपीआर हो तो उसका एक निश्चित प्रारूप होना चाहिए। एनपीआर से तात्पर्य यह है कि जनसंख्या कितनी है। अब मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि एनपीआर और जनगणना में फर्क क्या है? मोटे तौर पर अगर मुझे जनगणना और एनपीआर में फर्क दिखाई देता है, तो वह है जनगणना में जाति संबंधित आंकड़ों का नहीं होना। हो सकता है कि एनपीआर में जाति से संबंधित आंकड़े मिलें।

पूर्ववर्ती सरकारों का यह एक सोच-समझकर लिया गया निर्णय था कि समाज में जातिगत भेदभाव न बढ़े, इसके लिए जातिगत जनगणना न हो। इसलिए उनकी एक नीति रही कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के अलावा धार्मिक अल्पसंख्यकों की ही पृथक रूप से गणना हो। इस प्रकार कह सकते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों ने जातिगत भेदभाव को मिटाने की कोशिशें की। ऐसी उनकी विचारधारा के स्तर पर रही।

फिलहाल वर्तमान सरकार भी यही कह रही है कि हम पिछली सरकारों के कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रहे हैं। एक तरह से बात उनकी सही भी है क्योंकि कांग्रेस ने इसको लेकर अपनी कोई पॉलिसी नहीं बनायी। अब आरएसएस-भाजपा अधूरे एजेंडों को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि एक बात तो यह भी है कि अभी भी वे स्पष्ट नहीं हैं कि एनपीआर के जरिए वे किस तरह की सूचनाएं चाहते हैं। 

सरकार का कहना है कि एनपीआर जगनणना का पहला स्टेप है। इस क्रम में वे घर-घर जाकर सर्वे करेंगे।

यहां मेरा सवाल है कि क्या जनगणना में घर-घर जाकर सर्वे नहीं होता था? ब्रिटिशों ने जो जनगणना करवाया था, वह भी घर-घर जाकर किया गया था। बाद में 1947 में जब देश आजाद हुआ और 1951 में जब जनगणना हुई तब भी घर-घर जाकर सर्वे ही किया गया था। ऐसा ही 1961 से लेकर 2011 तक हुआ। तब इसमें फर्क क्या है? यह तो कम-से-कम [वर्तमान] सरकार को लोगों को बताना चाहिए। आप [सरकार] यह कह रही हैं,कि  हम एनपीआर से एनआरसी की ओर बढ़ रहे हैं। यह बात सही है। आप [सरकार] एनआरसी में क्या पूछना चाह रहे हैं? 

दरअसल, आप [सरकार] एनआरसी के जरिए यह पूछना चाह रही है कि आपके [नागरिकों के] माता-पिता का जन्मस्थान, जन्मतिथि क्या है। ये जानकारियां सरकार को जुबानी नहीं चाहिए। इसके लिए दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। सरकार यहीं तक नहीं रूक रही है। वह कह रही है कि अगर किसी के पास यदि दस्तावेज नहीं है तो डिटेंशन सेंटर में जाना होगा।असल में इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने कोई कानून बनाया ही नहीं है। 

सरकार यह भी कह रही है कि अगर किसी के पास नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं है तो उसे देश निकाला नहीं दिया जाएगा। लेकिन वह मुसलमानों को इससे अलग रख रही है।         

असल सवाल इस कानून के संदर्भ में यह है कि सरकार के अनुसार जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बसे हैं, उनके लिए उसने यह कानून बनाया है, लेकिन जिनकी नागरिकता छीनी जाएगी, उनका जन्म ही यहीं हुआ है, उनके माता-पिता का भी जन्म हुआ है। सिर्फ उनके पास दस्तावेज नहीं है। यह क्या बात हुई। 

यह भी पढ़ें : बसपा व बामसेफ आंबेडकरवादी नहीं; जातिगत जनगणना समय की मांग : प्रकाश आंबेडकर

देखिए, केंद्र सरकार बुनियादी बदलाव करने जा रही है। संविधान में दो तरीके से नागरिकता दिए जाने का उद्धरण है। एक तो जन्म के आधार पर। यदि 1950 के बाद आपका जन्म हुआ है तो आप जन्मजात नागरिक हैं। दूसरा, अगर आपके माता-पिता भारत से हैं, 1947 से लेकर 1950 तक कहीं बाहर रहें, किसी वजह से नहीं आ सके, उनको नागरिकता चाहिए तो उन्हें भी नागरिकता मिलेगी। तीसरी बात जो बाकी के नागरिकता हैं, उनके बारे में संविधान ने कहा है कि यह पार्लियामेंट को अधिकार है कि समय-परिस्थिति के अनुरूप उनके लिए कानून बनाए। पार्लियामेंट ने 1955 में कानून बनाकर प्रावधान किया कि अगर किसी को भारतीय नागरिकता चाहिए तो वह अर्जी करे। अर्जी करने के बाद उसको लिमिटेड नागरिकता मिल सकती है। जिन्हें पूर्ण नागरिकता का अधिकार चाहिए, उन्हें सेक्शन-6 के अंतर्गत अर्जी करनी होगी। एक बार यदि पूर्ण नागरिकता मिल गई तो राजनीतिक अधिकार भी मिल जाते हैं। वह पोलिटिकल प्रोसेस में हिस्सा ले सकता है। अगर उसे सेक्शन-5 के अंतर्गत नागरिकता मिली है तो उसे राजनीतिक अधिकार छोड़कर सभी तरह के अधिकार मिलते हैं। यहां अब मैं बताना चाहता हूं कि एक और कानून है, जिसकी देश में कोई चर्चा नहीं है, वह है रेसिप्रोसिटी एक्ट, 1943। कई लोगों ने इसके बारे में सुना भी नहीं है, अध्ययन भी नहीं किया है, और इस सरकार ने भी नहीं किया है। मान लो पाकिस्तान में रहने के लिए यदि कोई भारतीय आवेदन करता है तो क्या उसके पास ऐसा कोई कानून है? जहां तक मेरी जानकारी है, ऐसा उनके पास कोई कानून नहीं है। जबकि भारत में रेसिप्रोसिटी एक्ट है। इसके मुताबिक अगर कोई भारतीय नागरिक किसी दूसरे देश में जा रहा है, वह दूसरा देश उसको जो अधिकार देगा, वे ही अधिकार भारत सरकार वहां के नागरिकों को दे सकती है। अब ऐसा है कि मान लो कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के कानून में भारत के किसी नागरिक को नागरिकता देने की कोई प्रक्रिया अथवा कानूनी व्यवस्था ही नहीं है तो आप इन देशों के लोगों को नागरिकता कैसे दे सकते हैं। 

प्रकाश आंबेडकर सीएए-एनपीआर-एनआरसी के विरोध एक सभा को संबोधित करते हुए

अब सरकार सीएए में संशोधन कर कह रही है कि वह उन्हें (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दुओं को) बेदखल कर रहे हैं। सवाल यहां यह है कि जब खुली व्यवस्था आपके पास थी, सेक्शन-5 के अंतर्गत आप नागरिकता दे सकते हो, सामान्य नागरिकता दे सकते हैं। हालांकि पोलिटिकल राइट्स उन्हें नहीं मिलेंगे, क्योंकि नेचुलराइज नहीं होता है और नेचुलराइज होगा तभी उसको पोलिटिकल राइट मिलेंगे। 

दूसरी बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था बनी हुई है, जिसका भारत भी अनुपालन करता है और उसने [भारत सरकार] लिखित रूप से माना है कि हम इनके [शरणार्थियों] साथ इंसानियत की व्यवस्था करेंगे। जबकि आपके यहां इंसानियत की व्यवस्था करने का कानून ही नहीं बना है। आसाम में तो जिनकी नागरिकता छीनी गयी है, उनमें से कई लोगों को आपने कहा कि ये पाकिस्तानी हैं, उनको तो आपने डिटेंशन सेंटर और डिटेंशन कैम्प में रखा हुआ है। डिटेंशन सेंटर और डिटेंशन कैम्प दोनों एक दूसरे से अलग है। डिटेंशन कैम्प का मतलब ये है कि उनको सरकार ने डम्प किया हुआ है। डिटेंशन सेंटर का मतलब है, उनको तुमने इंसानियत का अधिकार भी नहीं दिया है। आपका वो कानून कहां बना, ये एक बात है। 

दूसरी बात बांग्लादेश यह कह रहा है कि भारत सरकार जिन्हें बांग्लादेशी कह [वापस] भेजना चाहती है, वह उन्हें पहले साबित करे। उसके बिना हम उन्हें वापस नहीं लेंगे। इसका मतलब है कि सब यहीं रहेंगे। अगर वे वहीं रहेंगे तो आपकी क्या प्रक्रिया है, इनकी भारतीयकरण का। जैसे अमेरिका में है कि बाहर से आए लोगों को “वर्क परमिट” मिलता है, उसके बाद एक निश्चित समय तक रहना होता है। फिर इसके बाद में दूसरी प्रक्रियाएं अपनायी जाती हैं। तदुपरांत किसी को “ग्रीन कार्ड” मिलता है। फिर ग्रीन कार्ड के बाद, उनके जो बच्चे हैं, उनको वहां की नागरिकता मिलती है। क्या आपने [सरकार ने] ऐसा कानून बनाया है?

सच तो यह है कि ये कानूनी प्रावधान नहीं होने की वजह से इनके डिटेंशन कैम्प को हिटलर के डिटेंशन कैम्प से लिंक किये जाते हैं, जिसकी निंदा आज दुनियाभर के लोग कर रहे हैं।

डिटेंशन कैम्पों में लोगों के मरने की सूचनाएं भी सामने आई हैं।

देखिए, यहां जो हिन्दू नेशनलिस्ट हैं, वे इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। मेरा उनसे पहला सवाल है कि क्या आपके रिश्तेदार यूरोप में, स्कैंडिनेवियन देशों [स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड व डेनमार्क आदि] में या इंग्लैंड में हैं? अगर हैं, तो आप एक सवाल अपने आपसे पूछिए। क्या वे वहां के नागरिक हैं या वे वहां इमिग्रेंट (अप्रवासी) हैं। अगर नागरिक हैं तो कोई तकलीफ नहीं। अगर वे सिर्फ वहां अप्रवासी मजदूर की हैसियत से गए हैं तो वे केवल अप्रवासी मजदूर ही हैं। इमिग्रेंट लेबरर को यूनाइटेड नेशन के माध्यम से एक दर्जा हासिल है। इस संबंध में एक अंतरराष्ट्रीय कानून भी है, जिसमें इंडिया भी सिगनेटरी है। अगर आप अपने यहां के इमिग्रेंट के साथ इंसानियत की तरह बर्ताव नहीं करते, आपका बर्ताव हिटलर के डिटेंशन कैम्प की तरह है, तो क्या जिस देश में आपके रिश्तेदार हैं, उनको रखा जाए या उनको वहां से भगा दिया जाए? आपका [सरकार] व्यवहार हिटलर के जैसा है। फासीवादी आपकी मानसिकता है। इसलिए अनुमान यह लगाया जाएगा कि आपके रिश्तेदारी की प्रवृति भी फासीवादी है और इसलिए उनको वहां की सरकार नोटिस देकर डिपोर्ट यानी अपने देश से बाहर निकाल सकती है।

यदि ऐसा हुआ तो यह विश्व स्तर पर बड़ा सवाल बनेगा क्योंकि आज विश्व भर में भारतीय नागरिक बसे हैं। आज वे जो मोदी-मोदी करके घूम रहे हैं, उनके परिवारों की अगर जानकारी मैं निकालूं और अगर वे डिटेंशन सेंटर व डिटेंशन कैम्प के समर्थक हैं जो कि हिटलर और मुसोलिनी की मानसिकता है। यदि यही जानकारी संबंधित देशों को चिट्ठी भेज दिया जाये कि ये फासीवादी समर्थक हैं और मानवता के दुश्मन हैं तो उन्हें बाहर निकाल दिया जा सकता है।

इसलिए ये जो हिन्दू धार्मिक मानसिकता के राष्ट्रवादी हैं, वे इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाह रहे हैं, मैं उन्हें आगाह कर रहा हूं। हिन्दू राष्ट्र बनाना या ना बनाना, वह एक अलग मसला है। आपको जिस मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वह खतरनाक है। इसको ऐसे समझिए कि नागरिकता से संबंधित आपके पास दस्तावेज नहीं है तो आप अवैध अप्रवासी कहलाने जा रहे हैं। दस्तावेज हैं तो आप इस देश के नागरिक हैं। इसमें धर्म की कोई बात नहीं है, जाति की कोई बात नहीं है। हिन्दू व्यवस्था के बजाय मैं इसे यह कहूं कि जो पुरानी वैदिक व्यवस्था थी, उसमें शूद्र और अतिशूद्रों (अतिशूद्र यानी शेड्यूल कास्ट और शूद्र ओबीसी है) को ना पढ़ने का अधिकार दिया गया और ना सम्पत्ति रखने का। आज जो दस्तावेज सरकार मांग रही है, वह पढ़ने और जमीन से संबंधित है। जबकि इन दोनों से वे दो हजार वर्षों से बेदखल किए जाते रहे हैं।

अब यह साफ हो चुका है कि आरएसएस मूलरूप से वैदिक फिलासफी, मनुवादी फिलासफी मानती है। उनका मकसद देश में फिर से मनुवाद को स्थापित करना है। इस क्रम में वे जो  शूद्र व अतिशूद्र हैं, उन्हें इस देश की नागरिकता से वंचित करेंगे। कुछ जिनके पास नागरिकता के दस्तावेज होंगे, उन्हें रहने देंगे और जिनके पास नहीं होगा वे निकाल दिया जाएगा।

 (संपादन: गोल्डी/इमानुद्दीन)

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