सीनियर बघेल के किन विचारों से छलनी हो रहा छत्तीसगढ़ के ब्राह्मणों का ब्राह्मणवाद?

छत्तीसगढ़ के ब्राह्मण समाज के लोगों ने भूपेश बघेल सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसके लिए वे उनके पिता नंदकुमार बघेल को माध्यम बना रहे हैं। उनका कहना है कि नंदकुमार बघेल के विचारों से उनका ब्राह्मणवाद छलनी हो रहा है। बता रहे हैं गोल्डी एम. जॉर्ज

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक घटना घटी, जिसपर स्थानीय मीडिया ने कुछ टीका-टिप्पणी कर छोड़ दिया मानों यह कोई सामान्य घटना हो। दरअसल हुआ यह कि 15 मार्च, 2020 को रायपुर के समाहरणालय परिसर में सर्व ब्राह्मण समाज ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। इसके साथ ही प्रदेश के पहले ओबीसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ ब्राह्मण जाति के लोगों ने मोर्चा खोलते हुए उन्हें प्रत्यक्ष चुनौती दी कि वे (मुख्यमंत्री) इस मामले में संज्ञान लें और इसमें अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज कराएं। अन्यथा ब्राह्मण समाज अदालत की शरण लेगा।

ध्यातव्य है कि 1 नवंबर, 2000 को मध्य प्रदेश से अलग कर छत्तीसगढ़ प्रदेश का गठन एक आदिवासी-मूलनिवासी राज्य के रूप में हुआ था। जनसंख्या के आधार पर देखें तो यहां सबसे अधिक ओबीसी वर्ग के लोग हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार इनकी आबादी पूरे प्रदेश की आबादी का लगभग 47 फ़ीसदी हैं। लेकिन कई ओबीसी संगठनों ने 52 फ़ीसदी का दावा भी किया है। इसके अलावा प्रदेश में 32 फ़ीसदी आदिवासी, व 11 फ़ीसदी दलित हैं। साथ ही 3 फ़ीसदी धार्मिक अल्पसंख्यक भी हैं। यदि समाजिक संगठनों के बयानों को यदि आधार माने तो कुल आबादी की लगभग 98 फ़ीसदी आबादी मूलनिवासियों व बहुजनों की है।

पिछले 20 वर्षों में यह पहली दफा है जब आबादी में सबसे बड़ी भागीदारी रखने वाले तबके ओबीसी वर्ग का कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बना है इसके पूर्व भाजपा के 15 वर्ष के कार्यकाल में डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री रहे, जो ठाकुर यानी राजपूत जाति के हैं। सूबे में साहू समाज के नेता शत्रुघ्न साहू का कहना है कि रमन सिंह के कार्यकाल में सभी प्रमुख मंत्रालयों, विभागों आयोगों आदि में ओबीसी वर्ग के अलावा एससी-एसटी के लोगो की भी काफी उपेक्षा हुई, और जनसंख्या के अनुपात में शासन व्यवस्था में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करने में भाजपा सरकार विफल रही। इसके अलावा रमन सिंह सरकार ने दलितों और आदिवासियों के हितों की भी घोर उपेक्षा की। यहां तक कि उन्हें राज्य में मिलने वाले आरक्षण में भी कटौती की।

भूपेश बघेल, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

बताते चले कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय अनुसूचित जाति वर्ग को 16 फ़ीसदी आरक्षण मिलती थी, जिसे पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने घटाकर पहले 9 फ़ीसदी किया और बाद में कड़े विरोध के बाद 3 फीसदी बढ़ाकर 12 फ़ीसदी किया। लेकिन 15 अगस्त 2019 को मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे बढ़ाकर 13 फ़ीसदी कर दिया है। साथ ही उन्होंनेओबीसी को 27 फ़ीसदी जबकि आदिवासियों के लिए 32 फ़ीसदी आरक्षण बढ़ा दी। इस प्रकार छत्तीसगढ़ में कुल 72 फ़ीसदी आरक्षित वर्ग है और यदि 10 फ़ीसदी आर्थिक कमजोर वर्ग को इसमें जोड़ दिया जाय तो छत्तीसगढ़ देश में सबसे अधिक आरक्षण प्रदान करने वाला पहला प्रदेश बन चुका है। 

कहना अतिश्योक्ति नहीं कि सूबे के मूलनिवासी व बहुजन पूर्ववर्ती सरकार द्वारा उपेक्षा के तमाम कारणों से आक्रोशित थे और 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस में विश्वास जताया और रमन सिंह की सरकार का पटापेक्ष हुआ। तदुपरांत कांग्रेस ने भी सामाजिक समीकरण को देखते हुए ओबीसी वर्ग के भूपेश बघेल को सूबे की बागडोर दी।

भारतीय राजनीति के इतिहास में यह भी पहली दफा हुआ है कि भारत में किसी मुख्यमंत्री के पिता के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग जाति विशेष के संगठनों द्वारा की गई हो। इसकी वजह क्या हो सकती है, पूछने पर एससी-एसटी-ओबीसी-माइनॉरिटी “संयुक्त मोर्चा” के अध्यक्षीय मंडल के अखिलेश एडगर बताते हैं कि “मुख्यमंत्री के पिता को निशाना बनाने से सीधा वार स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर ही होगा, इस बात को विरोध करने वाले अच्छे से जानते हैं। उनका उद्देश्य ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाले मुख्यमंत्री को कमज़ोर करना ही है।”

ब्राह्मण विरोधी है नंदकुमार बघेल : ममता शर्मा

प्रदर्शनकारियों ने भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाया है। प्रदर्शन को नेतृत्व कर रही ममता शर्मा के अनुसार नंदकुमार बघेल सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनल, और अन्य सार्वजनिक मंचाें के माध्यम से ब्राह्मण विरोधी धार्मिक, सामाजिक और जातिगत नफरत का प्रचार करते रहे हैं। स्थानीय मीडिया को दिए बयान में शर्मा ने कहा कि “बघेलअमर्यादित, बेलगाम भाषा, ब्राह्मण-विरोधी बातें कर रहे हैं। लगातार उनका यही कहना है कि, ब्राह्मण विदेशी हैं। इनको भगाना होगा।”

प्रदर्शनकारियों की मानें तो नंदकुमार बघेल देश की एकता और अखंडता के लिए के बड़ा खतरा हैं। वही दलित मुक्ति मोर्चा के सचिव पीतांबर निराला के अनुसार, “यह ब्राह्मणवादी मानसिकता का उत्पाद है कि जाति व्यवस्था का विरोध और समतामूलक समाज की स्थापना की बात करने वाले नंदकुमार बघेल को ही जातिवादी कहा जा रहा है। यह दलित बहुजनों को राजसत्ता में हिस्सेदारी के खिलाफ एक बड़ी साजिश है।”

क्या नंदकुमार बघेल द्वारा ब्राह्मणवादी मिथकों का विरोध अनुचित है?

नंदकुमार बघेल और ब्राह्मणों के बीच विवाद कोई नया विवाद नहीं है। सन् 2001 में बघेल ने “ब्राह्मण कुमार रावण को मत मारो” शीर्षक एक किताब लिखी, जो तुरंत ही विवादों के घेरे में आ गयी थी। बघेल के मुताबिक यह किताब कुत्सित ब्राह्म्णवादी विचारों का भंडाफोड करती है। इसमें मनुस्मृति के अलावा वाल्मिकी और तुलसीदास द्वारा रचित रामायण के संबंध में समीक्षात्मक टिप्पणियां हैं। साथ ही इसमें दक्षिण के महान दार्शनिक पेरियार के विचारों का उल्लेख है। इस प्रकार यह किताब रामायण की विभिन्न तरीके से समीक्षा करती है और लोगों को बताती है कि राम नाम का चरित्र दलितों, आदिवासियों और मूलनिवासियों पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए गढ़ा गया है। इस किताब को तत्कालीन अजित जोगी सरकार ने प्रतिबंधित किया था। तब नंदकुमार बघेल ने हाई कोर्ट में सरकार के फैसले को चुनौती दी। करीब 17 साल बाद वर्ष 2017 में हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया और सरकार के फैसले को बरकरार रखा। नतीजतन उनकी किताब “ब्राह्मण कुमार रावण को मत मारो” अभी तक प्रतिबंधित है। 

नंदकुमार बघेल, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता

 यह भी बताते चलें कि विगत एक दशक से नंदकुमार बघेल कई दलित,आदिवासी, ओबीसी संगठनों के साथ मिलकर महिषासुर, मर्दन और रावण वध का विरोध करते रहे हैं। विजयादशमी को वे शोक दिवस के रूप में मानते रहे हैं। उनका कहना है कि “हमें अपने असली इतिहास को नहीं छिपानी चाहिए। हमारे इतिहास को हमें ब्राह्मणवाद के चश्मे से देखने की आवश्यकता नहीं है। रावण और महिषासुर हमारे इतिहास के योद्धा हैं। इनका वध प्रदर्शन बहुजन मूलनिवासी संस्कृति का अपमान है।”

पिछले वर्ष 2019 में नंदकुमार बघेल ने दशहरे के दिन सार्वजनिक कार्यक्रम में रावण को महान पुरखा बताया। सर्व आदिवासी समाज व अन्य सामाजिक संगठनों के तत्वावधान में किए गए आंदोलन के कारण छत्तीसगढ़ के लगभग 500 गांवों में पिछले वर्ष दुर्गापूजा और दशहरा का आयोजन नहीं हुआ। एक कार्यक्रम में नंदकुमार बघेल ने रावण की पूजा के अलावा महिषासुर और मेघनाद का शहादत दिवस भी मनाया। वहां उनके आह्वान पर क्षेत्र के 124 गांवों में रावण वध का बहिष्कार किया गया।

दलित-आदिवासियों-पिछडों का घोर अपमान

बीते 15 मार्च, 2020 को प्रदर्शन के दौरान नंदकुमार बघेल और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के ऊपर सवालों के अलावा ब्राह्मण संगठनों के प्रतिनिधियों ने आरक्षण पर सीधा हमला बोला। दलित, आदिवासियों, पिछड़ा वर्ग के लोगों के उपर अपनी टिप्पणी में प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहीं ममता शर्मा ने कहा कि “क्या आप [एससी, एसटी, ओबीसी] अपने ज्ञान के बलबूते [से] पहुंच रहे हैं क्या? आज आरक्षण वाला व्यक्ति ‘नॉन-डिसेर्विंग’ पुल गिरा देता है, पेशेंट [को] स्ट्रेचर [पर ही] मार देता है। आज स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने की बात होती, उसके [एससी, एसटी, ओबीसी] पास वो क्वालिटी भी नहीं होती, तो भी लोग उसको बर्दाश्त करते है कि चलो भई ‘आरक्षित कोटे’ से आता है। लेकिन ब्राह्मण तो पैदायशी ज्ञानी हैं।”

वहीं दलित नेता व पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान का मानना है कि नंदकुमार बघेल और भूपेश बघेल केवल माध्यम हैं। ब्राह्मण संगठन से जुड़े लोग इसके मार्फ़त दलित-आदिवासियों का अपमान करके अपने राजनीतिक वर्चस्व को बरकरार रखना चाहते हैं। वे समाज में घृणा फैला रहे हैं। उनके खिलाफ सरकार को दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। चौहान ने यह भी कहा कि नंदकुमार बघेल का न तो विचार नए हैं और न ही उनका अभियान। वे कई दशकों से अभियान चलाते आ रहे हैं। तब ये सारे ब्राह्मण कहां थे? 

संयुक्त मोर्चा के संयोजक रामकृष्ण जांगड़े ने कहा कि एससी, एसटी, ओबीसी पर ममता शर्मा द्वारा की गयी उपरोक्त टिप्पणी का विरोध करते हैं तथा इसे अपमानजनक बताते हैं। उन्होंने बताया कि, “छत्तीसगढ़ दलित-बहुजनों की भूमि है और 3 फ़ीसदी सवर्ण समाज के लोग ऐसा बयान दे रहे हैं, जैसे कि हमने उनसे कोई खैरात मांगी हो। इस तरह के अपमान को किसी भी कीमत पर नहीं सहा जाएगा और इसे पुलिस प्रशासन तुरंत संज्ञान में ले तथा त्वरित कार्रवाई करे। इनके खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करे।” जांगडे ने आगे कहा कि सम्पूर्ण देश मे आरक्षण विरोधियों का यही एक मात्र तर्क है कि इस वर्ग के डाक्टर, इंजीनियर, वकील, आदि नाकाबिल होते है। अब समय आ गया है कि इनके मिथ्या आरोपों का समुचित जवाब दिया जाय।

इस सन्दर्भ में ओबीसी नेता विष्णु बघेल का कहना है कि “यदि सदियों पुराने झूठ को कोई सच बोले तो उसमे क्या गलत है। इतिहासकारों ने यह साबित किया है कि आर्य भारत के मूलनिवासी नहीं हैं। वे बाहर से आए हैं।” 

युवा आदिवासी नेता खोमेंद्र नेताम मानते है कि सवाल कांग्रेस या भाजपा का नहीं है। उनके मुताबिक, “सवाल आदिवासी-मूलनिवासी द्वारा अपनी जमीन पर राज करने का है। इसमें बाहरी लोगों का क्या काम है।” 

ममता शर्मा व अन्य पर एफआईआर की मांग

ब्राह्मण संगठन के प्रदर्शन के एक पखवाड़े बाद उसका नेतृत्व करने वालों पर दलित-आदिवासी संगठनों ने सवाल खड़ा किया है। यह मामला तूल पकड़ रहा है और दलित-आदिवासी संगठनों में इस अपमान के खिलाफ ममता शर्मा व अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की चर्चा जोर पकड़ चुकी है। एससी/एसटी अत्याचार पर कानूनी विशेषज्ञ अधिवक्ता शोभाराम गिलहरे के अनुसार यह एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के धारा 3 (1)(x) के अंतर्गत प्रकरण बनेगा। आरक्षण पर सीधा हमला बोलने में भी भारतीय दंड सहिंता (भादंसा) के कई धारा भी शामिल हो सकते हैं.

बहरहाल, यह मामला अब आगे क्या मोड़ लेगा, इसका अनुमान लगाना अभी मुश्किल है। यह तो समय ही बताएगा कि 2-3 फ़ीसदी द्विज छत्तीसगढ़ के 97-98 फ़ीसदी आदिवासी, दलित, ओबीसी पर शिकंजा कसने में कामयाब होते हैं या मुंह की खाते हैं। फिलहाल भूपेश बघेल की कुर्सी सुरक्षित है और यह भी कि ब्राह्मणवादी उन्हें पग-पग पर चुनौती देते रहेंगे। 

(संपादन : नवल)

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