‘दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास’ अब तेलुगू में भी, हैदराबाद बुक ट्रस्ट की पहल

आगामी 14 व 15 मार्च को क्रमश: विशाखापट्टनम व हैदराबाद में ज. वि. पवार द्वारा लिखित पुस्तक “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” के तेलुगू रूपांतरण का विमोचन होगा। पवार कहते हैं कि दलित पैंथर के आंदोलन के बारे में देशभर के लोग जानें और संगठित होकर संघर्ष करें। यही उनके लेखन का उद्देश्य रहा है।

सन् 1972 में शुरू हुआ दलित पैंथर आंदोलन हालांकि महज पांच वर्ष ही चला, लेकिन इसका प्रभाव आज भी न केवल महाराष्ट्र में बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे दलित आंदोलनों पर देखा जा सकता है। इस क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। यही वजह रही कि पहले मराठी में ज. वि. पवार द्वारा लिखे गए आधिकारिक इतिहास को फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2017 में अंग्रेजी और फिर 2019 में हिंदी में प्रकाशित किया गया। अब इसका तेलुगू अनुवाद भी हैदराबाद बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित हो गया है। इसका लोकार्पण आगामी 14 मार्च को विशाखापट्टनम व 15 मार्च को हैदराबाद में होगा। इस अवसर पर मैगसेसे पुरस्कार विजेता और सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक बिजवाड़ा विल्सन के अलावा लेखक व दलित पैंथर के सह-संस्थापक ज. वि. पवार भी उपस्थित रहेंगे।

इस आशय की जानकारी हैदराबाद बुक ट्रस्ट की गीता रामास्वामी ने दी। उन्होंने कहा कि जिस आंदोलन ने आंबेडकर के परिनिर्वाण के उपरांत दलित आंदोलनों की दशा और दिशा बदल दी, उसका आधिकारिक इतिहास तेलुगू में प्रकाशित कर हम गर्व की अनुभूति करते हैं। यह हमारे लिए खास अवसर है और इसकी वजह यह भी है कि आज भी देश भर में दलित उत्पीड़न की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ ही रही हैं। ऐसे में दलित पैंथर का आधिकारिक इतिहास लोगों को संगठित होकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेगा।

देशभर में जाए दलित पैंथर का संदेश : पवार

वहीं “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” के लेखक ज. वि. पवार ने फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में कहा कि “इस किताब का तेलुगू अनुवाद प्रकाशित होने से मुझे खुशी मिल रही है। दरअसल, इस इतिहास को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य यही था कि इस आंदोलन के बारे में देश भर के लोग जानें। यह इसलिए भी जरूरी है कि देश में हालात सुधरे नहीं हैं, बल्कि बदतर ही हुए हैं। ऐसे में इस आंदोलन को जानने-समझने से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी।” पवार ने यह भी जानकारी दी कि इसका अनुवाद तमिल, पंजाबी, बांग्ला और गुजराती भाषा में इसका अनुवाद भी जल्द प्रकाशित होगा।

ज. वि. पवार, गीता रामास्वामी व बिजवाड़ा विल्सन

एक नजर में दलित पैंथर आंदोलन  

भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मूल बुनियाद जाति आधारित भेदभाव है। यह भेदभाव संसाधनों पर अधिकार से लेकर सामाजिक हैसियत तक अमल में लाया जाता रहा है। जब कभी कोई ऐसी पहल हुई जिससे विभाजनकारी सामाजिक व्यवस्था पर आघात हो, उसे या तो दबा दिया गया या फिर उसका नामोनिशान खत्म कर दिया गया। यह सब कालांतर से चला आ रहा है और इस संदर्भ में यह कहना गैरवाजिब नहीं कि भारत का एक इतिहास सामाजिक दमन-उत्पीड़न की घटनाओं से रक्तरंजित इतिहास भी रहा है। लेकिन, इसी भारत में संघर्ष व प्रति संघर्ष का लंबा इतिहास भी है, जिसे जान-बूझकर लिखा नहीं गया।

दलित पैंथर भी इसी संघर्ष-प्रति संघर्ष का परिणाम था, जिसका गठन ज. वि. पवार व उनके कवि मित्र नामदेव ढसाल ने 1972 में किया था। यह वह दौर था जब महाराष्ट्र के अखबार दलित उत्पीड़न की खबरों से अटे पड़े रहते थे। माहौल ऐसा था कि कहीं कोई आशा की किरण नहीं दिखती थी। क्य दलित केवल उत्पीड़ित होने के लिए ही जन्म लेते हैं? क्या उन्हें मानवोचित व्यवहार का अधिकार तक नहीं है? ऐसे कई सवाल थे जो उस समय ज. वि. पवार, नामदेव ढसाल और उनके साथियों के जेहन में उमड़ रहे थे।

दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास के तेलुगू संस्करण व हिंदी संस्करण का कवर पृष्ठ

इस आंदोलन की अवधि हालांकि केवल पांच वर्ष रही और 1977 में इसके भंग की आधिकारिक घोषणा भी हो गई। परंतु, इस अल्पावधि में भी दलित पैंथरों ने लड़ने का गजब का जज्बा दिखाया। इस दौरान दलित पैंथर के सदस्यों ने दलित उत्पीड़न के मामलों को लेकर सशक्त आंदोलन खड़ा। दलित पैंथर के अदम्य साहस को तब पूरे महाराष्ट्र में स्वीकृति मिली। इसकी वजह यह भी रही कि उनके आदोलन केवल दलित उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन तक सीमित नहीं रहे। भूमि संघर्ष के सवाल से लेकर सामाजिक अस्मिता की लड़ाई भी दलित पैंथर ने आगे बढ़कर लड़ी। यही वजह रही कि तब दलित पैंथर राजनीतिक दलों की आंखों में कांटों की तरह चुभने लगा था। इनमें कांग्रेस,जनसंघ और शिवसेना शामित तो थे ही, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को भी यह आंदोलन नागवार गुजर रहा था।

आधिकारिक इतिहास क्यों?

दरअसल, ज. वि. पवार के पास आधिकारिक इतिहास लिखने का कारण भी है और वह अधिकार भी जिसके बूते इस किताब को उन्होंने आधिकारिक इतिहास की संज्ञा दी है। कारणों की बात करें तो सबसे अहम यह कि आज भी दलित आंदोलनों की दशा-दिशा किसी निश्चित दिशा में अग्रसर नहीं है, भटकाव का शिकार है। दूसरा अहम कारण यह कि दलितों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। रही अधिकार की बात तो ज. वि. पवार इस आंदोलन की रीढ़ थे। फिर चाहे वह कार्यक्रमों की प्लानिंग हो या फिर नीतियों का निर्धारण हो,अखबारों के दफ्तरों में जा-जाकर प्रेस विज्ञप्तियां पहुंचाना, पवार सारे काम पूरी लगन से करते थे। वे स्वयं संस्थापक महासचिव भी थे।

(संपादन : गोल्डी)

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