‘मैं सुप्रीम कोर्ट से सहमत हूं; आरक्षण का लाभ एससी, एसटी और ओबीसी के गरीबों को मिलना चाहिए’

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. ईश्वरैया, उच्चतम न्यायालय के उस हालिया फैसले से पूर्णतः सहमत हैं जिसमें उसने आंध्रप्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में स्कूल शिक्षकों के शतप्रतिशत पदों को आदिवासियों के लिए आरक्षित करने के सरकार के निर्णय को रद्द कर दिया। ईश्वरैया का कहना है कि आबादी के किसी भी हिस्से को 100 प्रतिशत आरक्षण देना आंबेडकर द्वारा रचित संविधान की इस मूल भावना के खिलाफ है कि योग्यता को समुचित महत्व मिलना चाहिए

आंध्रप्रदेश सरकार ने सन् 2000 में राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में स्कूल शिक्षकों के सभी पदों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित कर दिया। इस निर्णय को चेब्रोलू लीला प्रसाद राव बनाम आंध्रप्रदेश राज्य प्रकरण में चुनौती दी गई। राज्य सरकार का तर्क था कि अनुसूचित क्षेत्रों में राज्य के अधीन सभी पद एसटी को ही मिलने चाहिए। सरकार के लिए इस तथ्य का कोई महत्व नहीं था कि इन पदों पर नियुक्ति के लिए बड़ी संख्या में सर्वथा योग्य अनुसूचित जाति (एससी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार उपलब्ध थे. याचिकाकर्ता चेब्रोलू लीला प्रसाद स्वयं ओबीसी हैं। जब वे 20 बरस के थे तब उन्होंने राज्य के एक अनुसूचित क्षेत्र, जहां वे रहते थे, में शिक्षक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन दिया। परन्तु उनकी उम्मीदवारी पर विचार ही नहीं किया गया क्योंकि वे एसटी वर्ग के नहीं थे। यही हश्र एससी, ओबीसी व आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के अन्य मेधावी व योग्य उम्मीदवारों का भी हुआ। याचिकाकर्ता ने जो अनेक तर्क दिए उनमें से एक यह था कि एससी व ओबीसी, पांचवीं अनुसूची के इलाकों में लम्बे समय से निवासरत हैं। उन्हें इन इलाकों में संपत्ति खरीदने का अधिकार तक नहीं है, परन्तु इसके बावजूद भी वे किसी तरह अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 371 (घ), एसटी की तरह उन्हें भी स्थानीय शिक्षण संस्थाओं में भर्ती और स्थानीय सार्वजनिक संस्थानों में नियुक्ति में गैर-रहवासियों पर प्राथमिकता का अधिकार देता है। अतः स्थानीय स्कूलों में इन वर्गों के योग्य उम्मीदवारों को नियुक्ति से वंचित रखना इस अनुच्छेद का उल्लंघन है।

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