मेरा जीवन, मेरा संघर्ष : आनंद तेलतुंबड़े

मैं हमेशा सोचता था कि हमारे पास वह सब क्यों नहीं है जो दूसरों के पास है – अच्छा घर, गाएं, मुर्गियां और वे सब चीज़ें जो एक ग्रामीण बालक को आकर्षित करती हैं। इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए मैंने पढ़ाई और सामाजिक कार्य, दोनों में गंभीर रूचि लेनी शुरू कर दी। फ्रेंच समाजशास्त्री, रोलां लाॅरदिन्वा से बातचीत में आनंद तेलतुंबड‍़े

गत 14 अप्रैल, 2020 को प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े ने भीमा-कोरेगांव मामले में उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इस मामले को लेकर देश-विदेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में हम यहां रोलां लाउदिन्वा द्वारा तेलतुंबड़े के एक लम्बे साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। फ्रेंच सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च (सीएनआरएस) में समाजशास्त्री, रोलां लाॅरदिन्वा ने तेलतुंबड़े से यह साक्षात्कार 15 नवम्बर, 2013 को आईआईटी, खड़गपुर में लिया था। तेलतुंबड़े ने इस साक्षात्कार के लिप्यंतरण का पुनर्विलोकन और संपादन जनवरी, 2019 में ईमेल पत्राचार के जरिए किया। यह साक्षात्कार सर्वप्रथम अंग्रेजी में एसएएमएजे (साउथ एशिया मल्टी डिसीप्लिनरी अकेडमिक जर्नल) में ‘ग्लिम्सेस इन्टू द लाइफ ऑफ़ एन इंजिनियर, स्कॉलर एंड पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था

‘मेरे माता-पिता भूमिहीन थे’

मैं महाराष्ट्र के यवतमाल जिले (अमरावती संभाग) के एक दूर-दराज के गांव से हूं। मेरा गांव नागपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर तेलंगाना राज्य की सीमा पर है। यवतमाल जिले में सिंचाई सुविधाओं का नितांत अभाव है और वहां के अधिकांश रहवासी भूमिहीन हैं। यह जिला किसानों की आत्महत्याओं के लिए कुख्यात है। मेरे माता-पिता भी भूमिहीन थे। संयोगवश, मैं अपने स्कूली जीवन में बहुत अच्छा विद्यार्थी था। उस समय इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में दाखिला लेना प्रतिष्ठा की बात समझी जाती थी। केवल मेधावी विद्यार्थी ही इंजीनियर बनने की सोच सकते थे। मैं भी मेधावी था और इसलिए मैं भी एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुँच गया। मेरे जिले से इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने वाले चुनिन्दा विद्यार्थियों में से मैं एक था। हम नौ भाई-बहन थे। मैं सबसे बड़ा था। मेरे भाई-बहन उच्च शिक्षित नहीं हैं। मुझे और मेरी बहनों को छोड़ कर, अधिकांश मेट्रिक तक ही शिक्षित हैं. हमारे गाँव के आसपास, कोयले की खदानें हैं। मेरे सभी भाई इन्हीं खदानों में काम करते हैं।   

मैंने सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई अपने गाँव के स्कूल में की और 10वीं की तालुका मुख्यालय के हाईस्कूल से। उस समय दसवीं के बाद आपको प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लेना होता था। इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती होने के दो तरीके थे। पहला, प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में दो साल पढ़ाई करने के बाद और दूसरा, साइंस कॉलेज की पहले साल की परीक्षा पास करने के बाद। दसवीं पास करने के बाद मुझे प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लेना था और फिर बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा पास करनी थी। इसके बाद ही मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकता था। 

एक अन्य विकल्प था उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करना अर्थात 11वीं कक्षा उत्तीर्ण करना। परन्तु मेरे स्कूल में 11वीं क्लास नहीं थी इसलिए यह विकल्प मेरे लिए बंद था। ग्यारहवीं कक्षा पास करने के बाद विद्यार्थी बीएससी प्रथम वर्ष में दाखिला ले सकते थे और फिर उनके विषयों के आधार पर इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज में जा सकते थे। अगर उनके विषय भौतिकी, रसायनशास्त्र और गणित होते थे तो वे इंजीनियरिंग कॉलेज में जा सकते थे और अगर जीव विज्ञान और पादपशास्त्र, तो मेडिकल कॉलेज में। मेरे समय में यही व्यवस्था थी। मेरे प्री-यूनिवर्सिटी पास करने के बाद इसे बदल दिया गया। 

युवा आनंद तेलतुंबड़े अपनी बेटियों प्राची और रश्मि के साथ

मैंने नागपुर के विश्वेश्वरैय्या रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (जो अब विश्वेश्वरय्या नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग है) से इंजीनियरिंग पास की। वह पांच वर्षीय एकीकृत पाठ्यक्रम था। अब यह चार साल का हो गया है, जिसमें 12वीं कक्षा पास करने के बाद दाखिला मिलता है। मैंने प्री-यूनिवर्सिटी पास करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए आवेदन दिया और मेरे अंकों के आधार पर मुझे दाखिला मिल गया। प्री-यूनिवर्सिटी पास करने वाले केवल दो विद्यार्थी कॉलेज में प्रवेश पा सके थे क्योंकि प्री-यूनिवर्सिटी और 11वीं बोर्ड की परीक्षाओं के स्तर में काफी अंतर था। प्री-यूनिवर्सिटी स्तर पर काफी छंटनी हो जाया करती थी क्योंकि बहुत कम विद्यार्थी यह परीक्षा पास कर पाते थे। इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में दाखिला पाने वालों में से केवल दो प्री-यूनिवर्सिटी उत्तीर्ण थे जबकि अन्य सभी 11वीं कक्षा पास कर वहां पहुंचे थे। 

“मुझे नहीं पता था कि इंजीनियरिंग क्या होती है”

मैं अपने जीवन में पहली बार नागपुर जैसे बड़े शहर जा रहा था। मेरे जैसे गांव के रहने वाले, जिसका कोई रिश्तेदार नागपुर में नहीं था, के लिए आना ही बहुत कठिन काम था। मैंने पहली बार अपने तालुक से बाहर कदम रखा था। मेरी समस्याएं इसलिए और बढ़ गयीं क्योंकि मैंने हॉस्टल में कमरे के लिए आवेदन नहीं किया। मुझे तो यह भी नहीं मालूम था कि इंजीनियरिंग कॉलेज कैसा होता है. मैंने रिक्शावाले से इंजीनियरिंग कॉलेज चलने के लिए कहा। उसने मुझे एक पॉलिटेक्निक कॉलेज के सामने छोड़ दिया. मैंने फॉर्म भरा और लाइन में लग गया. काउंटर पर पहुँचने के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि मैं एक पॉलिटेक्निक कॉलेज में था. मैं वहां से वापस लौटा और फिर मैंने एक साइंस कॉलेज का फॉर्म भरा। कुछ दिन तक मैं एक परिवार के साथ रहा, जो मेरे मित्र के रिश्तेदार थे। मुझे पता ही नहीं था कि मुझे अलग से हॉस्टल का फॉर्म भरना होगा। कक्षाएं शुरू हो जाने के बाद मुझे यह पता चला परन्तु तब तक हॉस्टल में जगह ही नहीं बची थी। मैं तो यह मानकर चल रहा था कि जब कॉलेज ने मुझे दाखिला दिया है तो वह मुझे रहने के लिए हॉस्टल में कमरा भी दे ही देगा। इस गलती के कारण मुझे तीन-चार महीने बहुत कष्ट भोगना पड़ा। फिर मुझे हॉस्टल में जगह मिल गई। इसके पहले, मैंने मेरे एक सहपाठी के साथ मिलकर कॉलेज से काफी दूर एक कमरा किराये पर लिया। मैं वहां से कॉलेज तक की दूरी – जो 5-6 किलोमीटर रही होगी – पैदल ही तय करता था। मेरे पास पैसे बिलकुल नहीं थे और आज भी जब मुझे याद आता है कि कैसे मुझे आधा पेट खाकर दिन काटने पड़ते थे तो मैं कांप उठता हूँ। हॉस्टल में कमरा मिलने के बाद मेरी मुसीबतें कुछ कम हुईं। मुझे स्कूल से ही वजीफे मिलते रहे थे। वजीफों से खर्च की काफी हद तक पूर्ति हो जाती थी, परन्तु फिर भी मेरे माता-पिता को भी कुछ धन तो खर्च करना ही पड़ता था। वे किसी तरह मेरे लिए पैसे का इंतजाम करते थे। मुझे आज भी यह समझ में नहीं आता कि वे कैसे यह करते थे। वे मजदूर थे और उन्हें दस लोगों के परिवार का पेट पालना होता था। मेरे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च तो था ही। कुछ समय बाद मैंने छात्र राजनीति में भाग लेना शुरू कर दिया और कई आंदोलनों में भाग लिया। यह सिलसिला मेरी पांच साल के इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान और उसके बाद भी जारी रहा। 

“मेरे पिता चाहते थे कि मैं कोई नौकरी कर लूं”

इंजीनियरिंग पास करने के तुरंत बाद मुझे कैंपस प्लेसमेंट के जरिए एक नौकरी मिल गई, परन्तु मैं उसे ज्वाइन नहीं कर सका क्योंकि मैं बीमार पड़ गया था। परीक्षा के समय ही मुझे हेपेटाइटिस हो गया था। इसके अलावा, नौकरी करने की मेरी कोई ख़ास इच्छा भी नहीं थी। मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन करना चाहता था। मैंने आवेदन किया और मुझे आईआईटी, कानपुर में दाखिला मिल गया। मैने दाखिला तो ले लिया परन्तु फीस और अन्य ज़रूरी खर्चों के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने अपने माता-पिता को पैसे भेजने के लिए लिखा, परन्तु उनकी ओर से कोई जवाब ही नहीं आया। अंततः मुझे घर वापस लौटना पड़ा। वहां जाकर मुझे पता चला कि मेरे माता-पिता कंगाल हो चुके थे। इस उम्मीद में कि इंजीनियरिंग पास करने के तुरंत बाद मैं कोई नौकरी पकड़ लूँगा, उन्होंने भारी कर्ज ले लिया था। इस बीच, मेरे पिता ने मजदूरी छोड़ दी थी और वे एक दुकानदार के एजेंट के रूप में घर-घर जाकर कपड़े बेचने लगे थे। इसके साथ ही, वे कुछ और छोटे-मोटे व्यवसाय भी करते थे। गाँव के लोगों के लिए इंजीनियर बहुत बड़ा आदमी था और मेरे पिता को उम्मीद थी कि इंजीनियरिंग पास करते ही मेरी नौकरी लग जाएगी और फिर घर में पैसा ही पैसा होगा। जब मैंने आईआईटी, कानपुर में पढ़ने की इच्छा जाहिर की तो केवल मेरी मां ने मेरा साथ दिया। मुझे वज़ीफ़ा भी मिलने वाला था, जो उस समय 400 रुपये प्रति माह था। इससे मेरी शिक्षा का अधिकांश खर्च चल जाता। परन्तु मैं मेरे परिवार के हालात समझ सकता था। इसी मुद्दे पर एक दिन घर में विवाद हुआ, जिसके बाद मैंने तय किया कि मैं कानपुर नहीं जाऊंगा। मैं अपनी मामी के घर चला गया। उनके पति पूर्वी महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के वाडसा में नौकरी करते थे। मेरी मामी ने मुझे माजिवाडा (ठाणे) में रहने वाले उनके एक मित्र के नाम मेरा परिचय देते हुए एक पत्र दिया। उसे लेकर मैं बम्बई रवाना हो गया। माजिवाडा के आसपास बहुत सी इंजीनियरिंग कम्पनियां थीं। मैं उनमें से किसी में भी घुस जाता और मेरी मार्कशीट देखकर मुझे तुरंत नौकरी मिल जाती। परन्तु मेरा दिमाग इतना अस्थिर था कि मैं किसी भी नौकरी में चंद दिनों से अधिक नहीं टिक पाता था। 

“काम मिलने में मुझे कभी परेशानी नहीं हुई”

मैंने 10-11 महीने तक उस [बंबई] क्षेत्र की कई कंपनियों में काम किया। इनमें से एक थी ब्लू स्टार नाम की कम्पनी जो एयरकंडीशनर बनाती थी। उन दिनों नौकरी पाने का मेरा तरीका बहुत आसान था। मैं चौकीदार को पटा कर अन्दर घुस जाता और जो भी दिखता उससे कहता कि मुझे नौकरी की बहुत सख्त ज़रुरत है। उन दिनों दुनिया इतनी बुरी नहीं थी और कोई न कोई मुझे भर्ती करने वाले अधिकारी के पास ले ही जाता। फिर मेरे नंबर देखकर मुझे इंजीनियरिंग विभाग के मुखिया के पास पहुंचा दिया जाता। ब्लू स्टार के इंजीनियरिंग विभाग के मुखिया ने मेरे मार्कशीटें देखते ही कहा, ‘अरे वाह, तुम तो बहुत होशियार हो’। और मुझे अगले दिन से काम पर आने के लिए कह दिया।

आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी के खिलाफ भारत के बाहर भी हुए विरोध प्रदर्शन

मैंने इस कंपनी में मन लगाकर काम किया. अपनी पहल पर मैंने इंजीनियरिंग विभाग के मुखिया से कहा कि मैं घरेलू उपयोग के लिए वाटर कूलर की डिज़ाइन बनाना चाहते हूँ। उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया और मुझे हर तरह की मदद का आश्वासन भी दिया। मैंने अकेले ही एक छोटे से वाटर कूलर की डिज़ाइन को तैयार करना शुरू किया। इसका आकार मिटटी के मटके के बराबर होना था। उन दिनों भारत में अधिकांश लोग पानी को ठंडा रखने के लिए मटकों का इस्तेमाल करते थे। डिज़ाइन तैयार हो जाने के बाद मैंने उन चीज़ों की सूची बनाई जो कूलर का प्रोटोटाइप बनाने के लिए मुझे चाहिए थीं। उनमें से कुछ चीज़ें उपलब्ध नहीं थीं और इसलिए सूची में कुछ परिवर्तन करने पड़े। फिर मैं तकनीशियनों और श्रमिकों – जिनमें से अधिकांश मेरी ही उम्र के थे – के साथ प्रोटोटाइप तैयार करने में जुट गया। वे लोग घंटों मेरे साथ काम करते, यद्यपि कंपनी ने उन्हें ऐसा करने को नहीं कहा था। इस दौर में मैंने बहुत कुछ सीखा। मुझे यह समझ में आया कि लोग और विशेषकर श्रमजीवी वर्ग के सदस्य आपस में किस तरह व्यवहार करते हैं। जहां तक मुझे याद है, मैंने तीन-चार महीने में प्रोटोटाइप तैयार कर लिया। मुझे आश्वासन दिया गया था कि इस काम के बदले मेरा वेतन बढ़ाया जाएगा। परन्तु जब वेतन वृद्धि का समय आया तब इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख अपना वायदा नहीं निभा पाए। मैं सीधे कंपनी के प्रेसिडेंट के पास गया, उनसे जमकर लड़ा और नौकरी छोड़ दी। और एक बार फिर मैंने नौकरी की तलाश में एक कंपनी से दूसरी कंपनी के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। ब्लू स्टार के अलावा, किसी भी दूसरी कंपनी में मैंने 15-20 दिन से अधिक नौकरी नहीं की। उस समय मेरे मति अत्यंत अस्थिर थी। मैं बहुत थोड़े पैसों में अपना गुज़ारा करता था। मैं एक परिवार के साथ रहता था। वे लोग बहुत स्नेही परन्तु अत्यंत गरीब थे। एक छोटी सी झुग्गी उनका घर थी और मुझे बरामदे में एक खटिया सोने के लिए दे दी गई थी। खटिया में खटमल ही खटमल थे।

फिर मुझे माझगाँव डॉक लिमिटेड में ग्रेजुएट इंजीनियर ट्रेनी के पद पर नौकरी लग गई। उन दिनों इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर सीधे नौकरी में आने वालों को इसी पद पर नियुक्त किया जाता था। इस नौकरी में मुझे वरिष्ठ इंजीनियरों के साथ मिल कर कई जिम्मेदारियां निभाने का मौका मिला। मुझसे एक बांड भरवाया गया था जिसके अंतर्गत मुझे कम से कम से कम तीन साल तक कंपनी की नौकरी नहीं छोड़नी थी। यद्यपि नौकरी अच्छी थी, परन्तु बम्बई में रहने की अपनी कठिनाईयां थीं। मैंने पहले से कई नौकरियों के लिए आवेदन दे रखा था। मैंने जहाँ भी आवेदन किया था, वहां से मुझे नौकरी ज्वाइन करने के पत्र मिलने लगे। इसी क्रम में मुझे इंडियन ऑयल कार्पोरेशन में नियुक्ति मिल गई। इंडियन ऑयल उस समय बहुत अच्छा नियोक्ता समझा जाता था। वहां वेतन तो अच्छा था ही, वेतन की लगभग डेढ़ गुना राशि बोनस के रूप में मिलती थी। मैंने माझगांव डॉक की नौकरी छोड़कर बिहार में इंडियन ऑयल की बरौनी रिफाइनरी में बतौर इंजीनियर नौकरी ज्वाइन कर ली। माझगांव डॉक ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया। वे चाहते थे कि मैं उनकी बांड की राशि जमा करूं। मैं सीधा-सादा था और कानूनी पचड़ों में फँसना नहीं चाहता था। मैंने किसी तरह पैसे जमा कर बांड की राशि का भुगतान कर दिया और इंडियन ऑयल में नौकरी जारी रखी। वहां मैं सीनियर इंजीनियर के पद तक पहुँच गया। 

सन् 1980 में मैं आईआईएम, अहमदाबाद चला गया। मुझे बताया गया कि लिखित परीक्षा में मेरा प्रदर्शन इतना अच्छा था कि मैं तीनों आईआईएम में एमबीए (पीजीडीएम) और पीएचडी (फ़ेलोशिप) पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए चुन लिया गया था। अंततः मैंने आईआईएम,अहमदबाद से एमबीए किया। पाठ्यक्रम के दूसरे साल में मुझे मेरे प्रोफेसरों की कृपा से कई कंपनियों में कंसल्टेंसी का काम मिल गया जिससे मुझे आमदनी भी हुई। चूँकि मैं इंडियन ऑयल में सेवारत था, इसलिए मैं कैंपस प्लेसमेंट में भाग नहीं ले सकता था। परन्तु कुछ निजी कम्पनियों ने व्यक्तिगत तौर पर मुझसे संपर्क कर मेरा साक्षात्कार लिया। इनमें से एक कंपनी, जिसे उसके मालिक चलाते थे, ने मुझे नौकरी देने का प्रस्ताव किया। प्रस्ताव बहुत आकर्षक था और वेतन इतना था जितना कैंपस में किसी और को ऑफर नहीं किया गया था। मैंने जोखिम उठाने का निर्णय लिया और इंडियन ऑयल छोड़कर खंडेलवाल समूह में नौकरी कर ली। इस समूह का मुख्यालय बम्बई में था। मेरा काम कंपनी के मालिक को सलाह देना था। वे धन निवेश करने के अवसर की तलाश में थे। वहां काम शुरू करने के बाद मुझे अहसास हुआ कि कंपनी का दृष्टिकोण पेशेवराना नहीं था। कंपनी के मालिक से मेरे अच्छे सम्बन्ध थे, परन्तु वे अचानक चल बसे। मैंने तय किया कि अब मुझे वहां नहीं रुकना चाहिए और मैं कोई दूसरे काम की तलाश करने लगा। सौभाग्य से कुछ ही समय बाद मुझे एक मौका मिल गया और मैं भारत पेट्रोलियम, जो कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी थी, में मैनेजर के पद पर नियुक्त हो गया।

इस नौकरी में मेरा वेतन पिछली नौकरी से बहुत कम था, परन्तु मैंने फिर भी यह नौकरी करना इसलिए मंज़ूर किया ताकि मुझे मेरी रूचि के अन्य काम करने और लोगों से जुड़ने का समय मिल सके। यह 1983 की बात है। मैंने भारत पेट्रोलियम में विभिन्न पदों पर काम किया। सन् 2003 में जब मैंने कंपनी को अलविदा कहा तब मैं कार्यकारी निदेशक था। भारत सरकार द्वारा नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ अपनाने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों, जिनके पास ढेर सारी पूँजी थी, ने निजी क्षेत्र के साथ मिलकर कई संयुक्त उपक्रम (जॉइंट वेंचर) शुरू किये। इसका मुख्य कारण यह था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विपरीत, ये संयुक्त उपक्रम भारत सरकार के विनियमों से बंधे नहीं रहते थे। इनमें से अधिकांश टांय-टांय फिस्स हो गए और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा इनमें निवेश किये गए करोड़ों रुपए डूब गए। परन्तु यह जानकारी आम लोगों तक पहुँचने नहीं दी गई। सरकार ने शेष जॉइंट वेंचर कम्पनियों को डूबने से बचाने के लिए उनके नए मुखिया नियुक्त करने का निर्णय लिया। मुझे भी इस काम के लिए चुन लिया गया। मुझे एक कंपनी का प्रबंध निदेशक (एमडी) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया गया। इस कंपनी के अधीन पांच जॉइंट वेंचर कंपनियां थीं। इन कंपनियों के बिज़नेस मॉडल में गंभीर कमियां थीं, परन्तु मुझे उम्मीद थी कि मैं उन्हें संभाल सकूंगा। इस प्रकार मैंने 2003 में पेट्रोनेट इंडिया लिमिटेड में काम शुरू किया। जल्दी ही, कंपनी के अधीन संयुक्त उपक्रमों में हितों का टकराव होने लगा। स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती गई और अंततः 2010 में मैंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

आंबेडकर जयंती, 2019 के मौके पर आनंद तेलतुंबड़े बेंगलुरू के डॉ. बी. आर. आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान

भारत पेट्रोनेट में काम करते हुए मैंने मैनेजमेंट में पीएचडी की। मेरा काम सार्वजनिक प्रणालियों की समस्याओं को ‘साइबरनेटिक्स’ (इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और मशीनों में सूचना के आदान-प्रदान और मनुष्य के मस्तिष्क और तन्त्रिका तन्त्र में सूचनाओं के प्रेषण का तुलनात्मक अध्ययन) के माध्यम से समझना था। अतः मेरे लिए मैनेजमेंट में पीएचडी करने का कोई कारण नहीं था या फिर उपयोगिता नहीं थी। परन्तु शायद मैंने यह इसलिए किया क्योंकि मेरे दिमाग में कहीं ना कहीं यह था कि मुझे पीएचडी करना है। इससे यह अवश्य हुआ कि अकादमिक क्षेत्र में मेरी वापसी हो गई। मैंने कई शोधप्रबंध लिखे, उन्हें अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में पढ़ा और उन्हें जर्नलों में प्रकाशित भी करवाया। मेरी मातृ संस्था आईआईएम, अहमदबाद के कई मित्रवत प्राध्यापकों की मदद से मुझे अतिथि प्राध्यापक बतौर पढ़ाने और व्याख्यान देने के अवसर भी मिले। इनमें से एक प्राध्यापक आईआईटी, खड़गपुर के बिज़नेस स्कूल में डीन के रूप में नियुक्त हो गए और उन्होंने प्रबंधन को इस बात के लिए राजी कर लिया कि मुझे वहां अध्यापक बतौर काम करने के लिए आमंत्रित किया जाये। मैंने यह तय किया था कि अब मैं कोई नौकरी नहीं करूंगा और लेखन पर ध्यान दूंगा। परन्तु मैं इस प्रेमपूर्ण निमंत्रण को ठुकरा न सका और 2010 में मैंने आईआईटी, खड़गपुर में अपना पदभार ग्रहण कर लिया।

“मेरा जन्म स्थान आंबेडकरवाद का गढ़ था” 

जिस इलाके में मेरा जन्म हुआ, वह आंबेडकर के आन्दोलन का गढ़ था। उस दौर में आंबेडकर का उस इलाके में गहरा प्रभाव था। परन्तु मजे की बात यह है कि आंबेडकर से जुड़े किस्से-कहानियां तो प्रचलित थे परन्तु उनके बारे में पढ़ने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था। स्कूल के पाठ्य पुस्तक में आंबेडकर की बचपन की स्मृतियों पर एक पाठ अवश्य था, परन्तु आंबेडकर के क्या विचार थे, वे लोगों को क्या शिक्षा देते थे, उन्होंने क्या किया था, यह सब जानने का कोई तरीका नहीं था। केवल लोककथाएं थीं, जिनमें मेरी कतई रूचि नहीं थी। 

आंबेडकर के बारे में जानने का मौका मुझे तब मिला जब मैं नागपुर पहुंचा। वहां के साइंस कॉलेज के हॉस्टल में दाखिला मिलने के बाद मुझे विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में जाने का समय मिलना लगा। वहां आंबेडकर के बारे में और उनके द्वारा लिखित बहुत सी किताबें थीं। मैंने तय किया कि मैं उन सब को पढूंगा। क्लास समाप्त होते ही मैं एक शब्दकोष लेकर लाइब्रेरी की ओर कूच कर जाता था और वहां तब तक आंबेडकर के बारे में पढ़ता रहता था जब तक कि लाइब्रेरी बंद होने का समय न हो जाता। इन कारण मैं रात के भोजन के समय हॉस्टल नहीं पहुँच पाता था और मुझे सड़क किनारे ठेलों पर कुछ खाकर काम चलाना पड़ता था। पढ़ते समय मैं विस्तृत नोट्स बनाता था और हॉस्टल वापस लौट कर उन पर चिंतन-मनन करता था। 

आगे चल कर धीरे-धीरे आंबेडकर पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं, परन्तु वे पुरानी पुस्तकों से बेहतर नहीं थीं। अब ऐसी पुस्तकें उपलब्ध हैं जो आंबेडकर के विचारों के शोधपूर्ण अध्ययन पर आधारित होने का दावा करतीं हैं। उनकी अनेक जीवनियां भी उपलब्ध हैं। यह सिलसिला सन 1960 के दशक के अंत में शुरू हुआ। इसके पीछे कई कारक थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था दलित स्नातकों की पहली पीढ़ी का विश्वविद्यालयों से बाहर आकर यह पाना कि उनके लिए दुनिया कितनी अंधेरी थी। उन्होंने अमरीका के ब्लैक लिटरेचर आन्दोलन से प्रेरणा लेकर इन परिस्तिथियों से अपनी असहजता को अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। इससे साहित्य की एक नयी धारा का जन्म हुआ और इससे निकलीं आंबेडकर पर कई किताबें। इसी समय दलित पैंथर का उदय हुआ और इसके सदस्य, जिनमें से अधिकांश शिक्षित बेरोजगार दलित युवक थे, ने भी लेखन शुरू कर दिया। यह वह दौर था जब पूरी दुनिया में विद्यार्थी व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलनरत थे। दलित पैंथर, अमरीका के ब्लैक पैंथर्स से प्रेरित था। यद्यपि दलित पैंथर का जीवनकाल बहुत छोटा था, परन्तु उसने देश पर जबरदस्त प्रभाव डाला। उसके कारण दलित देश के राष्ट्रीय एजेंडा पर आ गए। धीरे-धीरे आंबेडकर एक नायक के रूप में उभरने लगे। यद्यपि आंबेडकर पर दलितों ने एकाधिकार कर लिया परन्तु उन्हें नायक का दर्जा दिए जाने से समाज में चेतना जागी और आंबेडकर के विचारों का अध्ययन और उनके उपर साहित्य का सृजन का दौर शुरू हुआ। 

“मैं बदलाव लाने का दूसरा तरीका ढूंढ रहा था”

स्कूल के दिनों से ही मैं अकादमिक क्षेत्र में अच्छे से अच्छा करने के साथ-साथ, सामाजिक क्षेत्र में भी रूचि लेता था। ये दोनों गतिविधियां समांतर रूप से चलती रहीं। इसकी शुरुआत गाँव से ही हो गई थी। जब मैं बच्चा था तब मुझे यह समझ नहीं आता था कि क्या कारण है कि कुछ लोगों के पास बड़ा घर, ज़मीन, मवेशी व बहुत कुछ और भी है, परन्तु मेरे माता-पिता के जैसे लोगों के पास कुछ भी नहीं है। मैं देखता था कि मेरे माता-पिता कमरतोड़ मेहनत करते हैं और कुछ लोग आराम फरमाते रहते हैं। अन्य लोगों को यह स्वाभाविक लगता था परन्तु मैं इससे असहज महसूस करता था। मैं हमेशा सोचता था कि हमारे पास वह सब क्यों नहीं है जो दूसरों के पास है – अच्छा घर, गाएं, मुर्गियां और वे सब चीज़ें जो एक ग्रामीण बालक को आकर्षित करती हैं। इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए मैंने पढ़ाई और सामाजिक कार्य, दोनों में गंभीर रूचि लेनी शुरू कर दी। आंबेडकर के बारे में कहा जाता था कि वे बहुत बड़े विद्वान थे। इसने भी मुझे प्रेरित किया। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया वैसे-वैसे सामाजिक कार्यों में मेरी रूचि बढ़ती गई। वह मेरा समांतर करियर बन गया।  

एक घटना ने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। तीसरी कक्षा की परीक्षा में अच्छे नंबर लाने पर मुझे पुरस्कार बतौर जोसफ स्टालिन की एक लघु जीवनी मिली। यह किताब मुझे गहरे तक छू गई। मुझे लगा कि उसमें मेरे मन में घुमड़ रहे कई प्रश्नों के उत्तर हैं। मुझे लगा कि साम्यवाद ही एकमात्र सही रास्ता है। उसी समय, आम चुनाव हुए। मैंने स्कूल के अपने मित्रों को इकठ्ठा किया और हमलोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन में नारों से गांव की दीवारें रंग दीं। हमने उसका इतना प्रचार किया कि उसे हमारे गाँव से उम्मीद से कहीं ज्यादा वोट मिले। और यह सब मैंने अपने मन से किया, किसी के कहने पर नहीं। उस समय मैं बच्चा था, शायद 10 साल का। मैं अपने जीवन में कभी किसी राजनैतिक दल का न तो सदस्य रहा और ना ही आंबेडकरवादी पार्टियों सहित किसी भी पार्टी से मेरा कोई जुड़ाव रहा है। 

मेरे मन में उठ रहे प्रश्नों पर मैं जितना विचार करता गया, मेरा यह विश्वास उतना ही पक्का होता चला गया कि वर्तमान ढांचे के रहते कोई क्रन्तिकारी परिवर्तन संभव ही नहीं है। मैं चीजों को बदलने के दूसरे रास्तों पर काम कर रहा था। स्कूल के दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी मेरी आदर्श थी और उसमें और दलितों की रिपब्लिकन पार्टी में मुझे कोई टकराव या विरोधाभास नज़र नहीं आता था। परन्तु कॉलेज में पहुंचने के बाद छात्रसंघ चुनावों को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से मेरा टकराव हुआ। और तब मुझे समझ में आया कि उन लोगों की सोच मुझसे एकदम अलग थी। मैं क्रन्तिकारी बदलाव लाना चाहता था जबकि उनकी दिलचस्पी केवल चुनावों में थी। वे चाहते थे कि मैं पार्टी का सदस्य बन जाऊं, परन्तु मुझे ऐसा करने का कोई कारण नज़र नहीं आता था।  

“दलित होने का अर्थ”

उस समय दलित होने का एक विशिष्ट अर्थ था। दलित समुदाय में जन्म लेने वालों के बारे में यह मान कर चला जाता था कि वे आंबेडकरवादी होंगे। आंबेडकरवाद भी एक तरह की जाति बन गया था। विचारधारा के आधार पर कम्युनिस्ट बनने के बहुत पहले मैं जन्म के आधार पर आंबेडकरवादी बन गया था। चूंकि उस समय आंबेडकर के बारे में पढ़ने के लिए कुछ था नहीं, इसलिए विचारधारा के आधार पर आंबेडकरवादी बनने का कोई प्रश्न ही नहीं था। जैसा कि मैंने पहले बताया, मुझे कुछ पुस्तकों के जरिए कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में पता चला। मुझे नहीं लगता कि मेरे अध्यापकों ने जो पुस्तक मुझे इनाम बतौर दी थी, उन्होंने वह कुछ सोच-समझ कर खरीदी होगी। मुझे लगता है कि उन्होंने वानी (नजदीकी शहर) की किताबों की छोटी से दुकान में जो भी पुस्तक उनके बजट में आ रही होगी, वह खरीद ली होगी। निश्चय ही उन्हें यह पता नहीं था कि वह पुस्तक किस बारे में है। इस छोटी सी पुस्तक ने मार्क्स, लेनिन, समाजवाद और सोवियत क्रांति से मेरा परिचय करवाया। बचपन में मुझे किताबों की दुकान से जो भी किताब हाथ लगती, उसे मैं शुरू से आखिर तक पढ़ डालता था। 

नागपुर में पहले इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस और फिर इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्ययन के दौरान मैंने आंबेडकर को पढ़ा और मैं उनकी सोच और उनके संघर्षों का कायल हो गया। मुझे लगा कि दमनकारी जाति व्यवस्था के विरुद्ध आंबेडकर ने जो संघर्ष किया वह बहुत महत्वपूर्ण और मूलभूत था, परन्तु उसे मार्क्स के वर्ग संघर्ष के व्यापक ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए था। मुझे आंबेडकर और मार्क्स में कोई विरोधाभास नज़र नहीं आता था। किशोर वय में ही मेरी यह मान्यता बन गई थी और आगे चल कर जो अनुभव मुझे हुए, उससे यह और पक्की हो गई। दुर्भाग्यवश, आज आंबेडकरवादियों और कम्युनिस्टों – दोनों के शिविरों में ऐसे बहुत कम लोग हैं, जो मेरी इस मान्यता से सहमत हैं। बहरहाल, उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि तथाकथित आंबेडकरवादी नेता, साम्यवादियों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहे थे और इस बहाने रिपब्लिकन पार्टी को तोड़ने का षड़यंत्र रच रहे थे। 

मेरे कॉलेज के दिनों में देश भर में कई आमूल परिवर्तनवादी राजनैतिक संगठन उभरे, परन्तु मैं उनमें से किसी से भी नहीं जुड़ा। सन 1969 में बंगाल के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र विद्रोह हुआ। हम सब बहुत खुश थे कि देश में क्रांति की संभावनाएं बन रहीं हैं। हॉस्टलों में नक्सलबाड़ी के घटनाक्रम पर लम्बी चर्चाएं होती थीं। हमें पता चला कि बंगाल और कई अन्य राज्यों के इंजीनियरिंग कॉलेजों के कैंपस नक्सलबाड़ी से शुरू हुए आन्दोलन के प्रभाव में आ गए थे। नागपुर के सबसे नज़दीक क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज, जो वारंगल में था, इस आन्दोलन से प्रेरित विद्यार्थियों की गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन गया। परन्तु नागपुर में हम विद्यार्थी उस सीमा तक नहीं गए। नक्सलबाड़ी आन्दोलन को क्रूरतापूर्वक कुचल दिया गया। दिलचस्प यह है कि यह काम कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली सरकार ने किया। 

“मुझे जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा”

कई लोगों को यह सुनकर आश्चर्य हो सकता है, परन्तु यह सच है कि मुझे जातिगत भेदभाव का सामना न के बराबर करना पड़ा। देश के अधिकांश गांवों की तरह, हमारे गांव में भी अलग-अलग जातियों के लोग अलग-अलग रहते थे। अछूत प्रथा थी, परन्तु वह सभी लोगों को सहज स्वीकार्य थी और उसे सामान्य माना जाता था। छुआछूत के विरुद्ध दलितों में आक्रोश उत्पन्न होना शुरू ही हुआ था और इससे कुछ बदला नहीं था। दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने से उनमें अपनी बात खुलकर सामने रखने का साहस पैदा हुआ था। व्यक्तिगत तौर पर मुझे पूरे गांव के लोग एक अलग ही निगाह से देखते थे। स्कूल में मेरे शानदार प्रदर्शन के कारण मैं पूरे गांव का लाडला था। 

उस समय कक्षा चार और सात की परीक्षाएं पंचायत स्तर पर आयोजित होती थीं। स्कूलों में इन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने की होड़ होती थी। हर गांव के लोग चाहते थे कि उनके गांव का विद्यार्थी परीक्षा में प्रथम आये। मेरे बारे में मशहूर था कि परीक्षा में मुझे कोई पीछे छोड़ ही नहीं सकता। मुझे हमेशा शतप्रतिशत अंक मिलते थे। इसलिए गांव के लोगों के लिए मैं बहुत कीमती था। गांव में सभी लोग अछूत प्रथा का पालन करते थे, परन्तु मुझे नहीं लगता कि जाति के आधार पर कोई भेदभाव होता था। हमारे शिक्षक गैर-दलित थे, परन्तु वे सभी विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए अपने घर बुलाते थे। मुझे नहीं लगता कि बचपन में मुझे किसी प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ा हो। 

जब मैं तालुका स्तर के स्कूल में गया, तब भी मुझे याद नहीं कि मेरे साथ जाति के आधार पर कोई भेदभाव हुआ हो। वह एक प्रतिष्ठित हाईस्कूल था, जिसमें केवल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता था। स्कूल में ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के धनी परिवारों के छात्रों का वर्चस्व था। मैंने कक्षा आठ में वहां दाखिला लिया था। वहां हर क्लास के विद्यार्थियों को पांच समूहों में बांटा जाता था और हर समूह का नेता, सबसे अधिक अंक हासिल करने वाला विद्यार्थी होता था। मुझे सबसे बड़े समूह, जिसमें नव-प्रविष्ट विद्यार्थी थे और जिनमें से अधिकांश गांवों से थे, का नेता बनाया गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि सबसे पहली परीक्षा में ही मैं प्रथम आया। स्कूल में पहली बार गांव से आया कोई विद्यार्थी अव्वल आया था। इसके पहले तक पहले नंबर पर या तो ब्राह्मण विद्यार्थी आते थे या धनी परिवारों के वे विद्यार्थी जो निजी ट्यूशन लेते थे। मेरा काम था मेरे समूह के विद्यार्थियों को शिक्षकों द्वारा दिए गए काम को जांचना और अपने कमज़ोर साथियों को पढ़ाना। मुझे यह समझ में आ गया था कि शिक्षक अच्छे विद्यार्थियों का पक्ष लेते हैं। और ऐसे विद्यार्थियों में से अधिकांश उनसे ट्यूशन लेते थे। परन्तु दूसरों की तरह मैं इसके लिए जातिगत भेदभाव को दोषी ठहराना नहीं चाहता। जाति और वर्ग काफी हद तक एक-दूसरे के पूरक हैं। उतनी कम आयु में भी मुझे यह समझ थी कि कुछ चीज़ें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं और मैं उन्हें बदल नहीं सकता। तो फिर क्यों न मैं अपने अच्छे प्रदर्शन से उनपर जीत हासिल करूं? मेरे मामले में तो इसने काम किया। ऐसा नहीं था कि मुझे परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा, परन्तु यह भी सही है कि अध्यापक मुझे नज़रअंदाज़ नहीं कर सके। 

मेरी कक्षा के आम विद्यार्थी भेदभाव के शिकार थे, परन्तु यह भेदभाव बहुत स्पष्ट नज़र नहीं आता था। ऐसे विद्यार्थियों पर अध्यापक ध्यान नहीं देते थे और उन्हें नीची निगाहों से देखते थे। वे विद्यार्थी एक तरह से सबसे निचले स्तर के माने जाते थे। परन्तु ऐसा सब जगह होता है। मैंने जब इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में दाखिला लिया तब भी मैंने अपने जाति प्रमाणपत्र का उपयोग नहीं किया, क्योंकि उसकी ज़रुरत ही नहीं थी। मेरे सरनेम से यह पता नहीं चलता था कि मैं दलित हूँ और ना ही मेरा नाम एससी विद्यार्थियों की सूची में था। मेरे निकट के मित्रों में से अधिकांश ब्राह्मण थे। इस तरह, स्कूल और साइंस कॉलेज, दोनों में मुझ पर कोई लेबल चस्पा नहीं किया गया।

“मैं आंबेडकर की जाति महार से हूँ”

मैं आंबेडकर की जाति महार से हूँ. इंजीनियरिंग कॉलेज में एक नेता-नुमा दलित छात्र, जो मेरा सीनियर था, आंबेडकर के नाम पर एक संस्था बनाना चाहता था। यद्यपि मैं दलित विद्यार्थियों के साथ खूब उठता-बैठता था और उनकी चर्चाओं में रूचि भी लेता था, परन्तु उन्हें यह पक्का पता नहीं था कि मेरी जाति क्या है। नेताजी भी मेरी जाति के बारे में यकीनी तौर पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। अंत में मुझे ही उन्हें बताना पड़ा कि मैं उनमें से एक हूं। कैंपस में मुझे सभी जानते थे। मैं विद्यार्थियों के जिमखाना के चुनाव रिकॉर्ड अंतर से जीतता था और मेरे सहपाठियों के लिए उन विषयों की ट्युटोरिअल क्लासें भी चलाता था जो विषय कठिन माने जाते थे। कुल मिलाकर, मैं कैंपस में खासा लोकप्रिय था और विद्यार्थी मुझे बहुत पसंद करते थे।

जब मैं इंजीनियरिंग के तीसरे साल में था, उस समय तक सामान्य छात्र राजनीति (अर्थात जिसमें सभी वर्गों के विद्यार्थी भाग लेते थे) में एक भी दलित नहीं था। मैं शायद ऐसा पहला दलित विद्यार्थी था, जिसने सामान्य राजनीति में अपनी पहचान बनाई। मैंने रिकॉर्ड मतों से चुनाव में जीत हासिल की। मेरे बारे में यह भी प्रसिद्ध था कि प्राचार्य मेरी बात सुनते हैं। प्राचार्य का पूरे कैंपस में जबरदस्त आतंक और दबदबा था और प्रोफेसर भी उनसे उलझने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। परन्तु जब भी विद्यार्थियों से सम्बंधित किसी मसले पर विचार होता, वे मुझे ज़रूर बुलवाते थे। और जो भी ऐसा मुद्दा उठाता था, उससे कहा जाता था कि वो मुझसे मिले। 

बहरहाल, वह लड़का चाहता था कि मैं उसके साथ मिलकर इस संस्था की नींव रखूं। उसे पता था कि केवल मैं ही विद्यार्थियों की उन समस्याओं का निदान आसानी से करवा सकता था, जिनमें कॉलेज प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होती। संस्था के गठन के उद्देश्य आदि के सम्बन्ध में जो मसविदा उसने तैयार किया था, उस पर मैंने कई पैने प्रश्न उठाये और मसविदे को छह बार संशोधित करवाया। इस प्रकार संस्था के गठन में विलंब हुआ। परन्तु, अंततः संस्था अस्तित्व में आई और उसका नाम रखा गया बाबासाहेब आंबेडकर इंजीनियर्स एसोसिएशन। आज उसे बाबासाहेब आंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ इंजीनियर्स कहा जाता है। मैं यह दावा तो नहीं करूंगा कि मैं इस संस्था का संस्थापक था, परन्तु हां, मैंने उसके गठन में उत्प्रेरक की महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उसका असली संस्थापक था वह लड़का, बी.एम. मेश्राम. वह इस संस्था का प्रथम अध्यक्ष था और मैं दूसरा। आज कुछ और ही लोग इस संस्था का संस्थापक होने का दावा कर रहे हैं। परन्तु शायद इस पृष्ठभूमि के बारे में कोई नहीं जानता।

“इस तरह काम करती है जाति”

कॉर्पोरेट दुनिया में जाति को लेकर अलग ही तरह के खेल खेले जाते हैं। भारत पेट्रोलियम में नौकरी के दौरान मैंने विवाह कर लिया। मेरी पत्नी डॉ. आंबेडकर की पोती हैं। विवाह के बाद से मेरी पहचान एक दलित के रूप में होने लगी। कंपनी के कुछ दलित कर्मचारियों ने एससी/एसटी एसोसिएशन बनाई थी, जिसका कुछ वर्षों तक मैं अध्यक्ष रहा। मैं उनमें सबसे वरिष्ठ था, इसलिए वे चाहते थे कि मैं संस्था को सम्हालूँ। शुरुआत में मैं हिचकिचा रहा था, क्योंकि मैं वर्ग-आधारित संगठनों से जुड़ा हुआ था और मैंने यह तय कर रखा था कि मैं जाति-आधारित राजनीति और समूहों से कोई वास्ता नहीं रखूँगा। परन्तु जब मैंने देखा कि कंपनी एससी/एसटी कर्मचारियों के मामले में अनिवार्य क़ानूनी प्रावधानों का पालन नहीं कर रही है तो मैंने संस्था का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। मैंने तय किया कि मैं इस संस्था को सामान्य श्रेणी के कर्मचारियों की यूनियनों से जोडूंगा। मैंने उन यूनियनों के नेताओं के साथ बैठकें कीं और उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि उन्हें एससी/एसटी कर्मचारियों के संघर्ष में उनका साथ क्यों देना चाहिए। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि एससी/एसटी यूनियन, प्रबंधन के विरुद्ध संघर्ष में सामान्य श्रेणी के कर्मचारियों की यूनियनों का साथ देगी। यह सब कंपनी के उच्च प्रबंधन को नागवार गुज़ारा क्योंकि मैं स्वयं वरिष्ठ प्रबंधकीय पद पर था। मेरा तबादला चेन्नई करने का निर्णय लिया गया। प्रबंधन को उम्मीद थी कि इससे मुझे सबक मिलेगा। परन्तु मैंने अपना सामान बाँधा और बिना कोई शिकायत किए चेन्नई रवाना हो गया।

चेन्नई पहुँचने के बाद मैंने न केवल अपनी गतिविधियों को जारी रखा, बल्कि उनका विस्तार करने के लिए स्पार्क्लेट नामक बुलेटिन का प्रकाशन भी शुरू किया। सामान्यतः होता यह था कि एससी/एसटी कर्मचारियों के संगठन, प्रबंधन के सामने विनयपूर्वक अपनी मांगें रखते थे और प्रबंधन उनकी मांगें मानकर उनका विश्वास हासिल कर लेता था, ताकि वह अपनी भेदभावपूर्ण नीतियां चलाता रहे। मुझे इस खेल के बारे में पता था और इसलिए मैंने प्रबंधन के साथ चर्चा का एक नया तरीका अपनाया और सामूहिक रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया विकसित की। कुछ क़ानूनी प्रावधानों के मामले में हमने कोई समझौता नहीं किया और हाईकोर्ट में प्रकरण दायर कर दिए। इन सब गतिविधियों के कारण मेरी पदोन्नति बाधित हुई परन्तु यह कीमत तो अदा करनी ही होती है। इसके लिए मेरी जाति को दोषी ठहराना आसान है, परन्तु मैं ऐसा नहीं करना चाहूंगा। होता यह था कि मुझे सबक सिखाने के लिए प्रबंधन किसी अक्षम और अयोग्य दलित अधिकारी को पदोन्नत कर देता था। कर्मचारियों और प्रबंधन की संयुक्त समितियों में दलित कर्मचारियों के प्रतिनिधि के रूप में मुझे नामित करने की बजाय किसी ऐसे दलित कर्मचारी को नामित कर दिया जाता था जो आसानी से झुकने को तैयार रहता था। दलितों के सन्दर्भ में यह रणनीति सभी प्रबंधनों द्वारा अपनाई जाती थी। राजनीति की तरह, कंपनियों में भी कुछ दलितों का ‘प्यादों’ की तरह इस्तेमाल किया जाता था। मेरे जैसे व्यक्ति – चाहे उसकी जाति जो भी हो – से सभी परहेज करते थे, क्योंकि हम हुक्म मानने वालों में नहीं थे। मेरे अनुभव और योग्यता को देखते हुए यह तय था कि मैं किसी अन्य के बहुत पहले कंपनी का अध्यक्ष बन जाता। परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

यह खेल, जाति व्यवस्था पर होने वाले सामान्य घिसे-पिटे विमर्शों में कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। दरअसल, जाति व्यवस्था दोनों तरीकों से काम करती है। अगर आपकी पहचान दलित की है तो सामान्यतः आपको नुकसान होगा। परन्तु अगर व्यवस्था को लगता है कि दलित बतौर आप उसके लिए उपयोगी हैं तो वह आपको विशेष दर्जा देगी। दलित कर्मचारियों के सन्दर्भ में जब व्यवस्था उनके खिलाफ काम करती है तो यह जातिगत मुद्दा हो सकता है, परन्तु जब यह माना जाता है कि एससी कर्मचारी अन्यों के तुलना में अधिक दब्बू, अधिक आज्ञाकारी और सत्ताधारियों के प्रति अधिक वफादार होते हैं – जैसा कि राजनीति में है – तब यह निश्चित ही जातिगत मुद्दा न रह कर एक आम मुद्दा बन जाता है। 

वर्तमान जाति व्यवस्था काफी जटिल है और आरामकुर्सी पर बैठकर अपने टकसाली सिद्धांत और व्याख्याएं प्रस्तुत करने वाले विद्वतजन निश्चित रूप से उसके सही चरित्र को समझने में बाधक हैं। यह मुद्दा उतना सीधा-सरल नहीं है, जितना उसे बताया जाता है। अगर आप औसत बुद्धि और कार्यकुशलता वाले दलित कर्मचारी हैं तो इस बात की काफी संभावना है कि आप एक आज्ञाकारी मुलाजिम होंगे। अगर ऐसा है तो आपके साथ विशेष व्यवहार किया जाएगा। आपको दूसरों पर प्राथमिकता दी जाएगी, विशेषकर अधिक कार्यकुशल दलित कर्मचारियों पर। प्रबंधनों को ऐसे लोगों की दरकार होती है जो चुपचाप लीक पर चलते रहे; उन लोगों की नहीं जो प्रश्न उठाते हैं। उन्हें हां में हां मिलाने वाले कर्मचारियों की ज़रुरत इसलिए भी होती है ताकि वे जाति के आधार पर भेदभाव न करने की क़ानूनी ज़रुरत को पूरा कर सके। उन्हें ऐसे कर्मचारी चाहिए होते हैं जो बिना ना-नुकुर के उनकी बात मानते रहें। जातिगत भेदभाव में दरअसल और कई मुद्दे छुपे हुए होते हैं, जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। और ये केवल जाति से जुड़े नहीं होते, परन्तु भेदभाव में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आज के भारत में हमें जाति को इन सन्दर्भों में समझने की ज़रुरत है। परन्तु बौद्धिक जड़ता इस राह में बाधक है। अगर आप आत्मविश्वास से परिपूर्ण और योग्य दलित हैं तो इस बात की प्रबल संभावना है कि आप दूसरों के हाथों में खेलने को तैयार नहीं होंगे। ऐसे में भारतीय संस्थाओं में आपको नुकसान ही भोगना ही पड़ेगा। जब मुझे देश के ऐसे 20 शीर्ष लोगों में चुना गया, जिनका देश में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के विकास में योगदान था, तो मेरी ही कंपनी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। जब मुझे बॉम्बे सीआईओ क्लब ने ‘बेस्ट सीआईओ (चीफ इनफार्मेशन ऑफिसर)’ के पुरस्कार से नवाज़ा तो मेरी कंपनी के डायरेक्टर इतने चिढ़ गए कि उन्होंने मंच से ही घोषणा कर डाली कि कंपनी में सीआईओ का पद ही नहीं है! परन्तु किसी ने भी कभी यह नहीं कहा कि मैं नाकाबिल व्यक्ति हूँ, क्योंकि वह तथ्यों के एकदम खिलाफ होता। ऐसी परिस्थितियों में कार्यकुशल दलित कर्मचारी या तो प्रबंधन से समझौता कर लेते हैं या उनका मनोबल इतना टूट जाता है कि वे पूरी तरह से अकर्मण्य हो जाते हैं और इससे इस पूर्वाग्रह को बल मिलता है कि दलित कर्मचारी अयोग्य होते हैं। इस समस्या की मैंने आरक्षण के सन्दर्भ में व्याख्या की है। मैंने बताया है कि आरक्षण की व्यवस्था का मूल आधार  और औचित्य ही गलत और त्रुटिपूर्ण है और जिस ढंग से उसे लागू किया गया, उससे समस्या और बढ़ गई है। कुल मिलाकर, इस व्यवस्था से दलितों को नुकसान ही हुआ है।

“वे आरक्षण का फायदा लेते ही क्यों हैं?”

मैं नौकरियों के बाज़ार में पहली पीढी का दलित था। अगर आपके अभिवावक अशिक्षित थे और सरकारी नौकरी में नहीं थे, तो आप पहली पीढ़ी के दलित हैं। आज आईआईएम और आईआईटी में जो दलित लड़के-लड़कियां आ रहे हैं, उनमें से अधिकांश दूसरी या तीसरी पीढ़ी के दलित हैं। उनमें से अधिकतर अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं। अगर वे आरक्षण का लाभ लेते हैं तो उन्हें कलंकित किया जाता है। इन दिनों ओबीसी को भी आरक्षण मिलता है, परन्तु कलंकित केवल दलितों को किया जाता है।  

मुझे ऐसा लगता है कि आरक्षण से प्रतिष्ठित संस्थाओं में पढ़ने वाले दलित विद्यार्थियों को कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान होता है। मुझे आरक्षण व्यवस्था का विरोधी बताया जाता है परन्तु मैं जो कह रहा हूँ वह आरक्षण का विरोध नहीं है। मैं उसके पीछे की राजनीति का पर्दाफाश कर रहा हूँ। मैं यह बता रहा हूँ कि शासक वर्ग ने आरक्षण को किस प्रकार अपना हथियार बना लिया है, जिसका इस्तेमाल वह लोगों को बांटने और जातिगत चेतना को मज़बूत करने के लिए कर रहा है। मैं मानता हूँ कि आरक्षण सारी समस्याओं की अचूक दवा नहीं है। दलितों को राज्य से यह मांग करनी चाहिए कि सभी बच्चों को समान स्कूल प्रणाली के ज़रिए, घर के नज़दीक स्कूलों में गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। यह सुविधा 18 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों को उपलब्ध होना चाहिए। इसके बाद भी, स्नातक स्तर तक की शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए और इसे राज्य द्वारा उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। जब तक भारत में शिक्षा के अलग-अलग स्तर रहेंगे तब तक हम चाहे जितना आरक्षण दे दें, मूल समस्या सुलझने वाली नहीं है। एक समान गुणात्मक शिक्षा की व्यवस्था करने के बाद ही आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने का कोई अर्थ होगा।   

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)

About The Author

One Response

  1. Jite Reply

Reply