कोरोना काल में आर्थिक चुनौतियां और लोकतंत्र का चारणकाल

ओमप्रकाश कश्यप बता रहे हैं कि कैसे नरेंद्र मोदी के छह वर्षों के अब तक के कार्यकाल में संघ और सरकार की कोशिश वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर ऐसे अधिकारियों को लाने की रही है, जो द्विजों के सांस्कृतिक एजेंडे के हिसाब से काम कर सकें। उन्हीं के बल पर वह समाज का तेजी से ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही है

बहसतलब

बीते 12 मई, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम अपने संबोधन में साफ कर दिया है कि कोरोना के मद्देनजर राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन खत्म नहीं होने जा रहा है। उन्होंने इसके चौथे चरण की घोषणा कर दी है। इसके लिए नये नियमों की औपचारिक घोषणा आगामी 18 मई को की जाएगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना के मद्देनजर 20 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। उन्होंने “आत्मनिर्भर भारत” बनाने का आह्वान किया है। उन्होंने यह भी कहा है कि“आत्मनिर्भर भारत के पांच स्तंभ होंगे। इनमें सबसे पहले उन्होंने इकॉनमी यानी अर्थव्यवस्था की बात कही है। उनके मुताबिक भारत को“क्वांटम जंप” करने वाली अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है। उन्‍होंने कहा कि दुनियाभर में यह बात आम है कि 21वीं सदी भारत की है।

खैर, प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बात का खुलासा नहीं किया है कि जिस 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा उन्होंने की है, उसमें देश के किसानों और मजदूरों की कितनी हिस्सेदारी होगी। अलबत्ता उन्होंने यह जरूर कहा है कि इसके संबंध में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आने वाले दिनों में करेंगी। लेकिन फिलहाल सबसे अधिक भयावह स्थिति खेतिहर किसानों व मजदूरों की है।

असल में मोदी सरकार ऐसा रथ है जिसका रथवान आगे बैठा है और घोड़े पीछे जुते हुए हैं। रथवान के हाथों में दिखावटी बागडोर है जिससे वह जनता को भुलावे में रख सके। असली बागडोर अदृश्य शक्तियों के हाथों में है। ये अदृश्य शक्तियां कुछ और नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके अनुषंगी संगठन हैं। जनता को भरमाए रखने के लिए मोदीजी डोर हिला-हिलाकर आगे बढ़ने का दिखावा करते हैं। नए-नए नारे देते हैं। मगर अदृश्य शक्तियों द्वारा नियंत्रित घोड़े पीछे की ओर दौड़ते चले जाते हैं। रथ को पीछे ले जाने में लगी शक्तियां सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं। मोदी जी अच्छी तरह जानते हैं कि जनता ने भले ही उन्हें संसद में दो बार पूर्ण बहुमत के साथ भेजा हो, मगर उन्हें उस पद के लिए आगे करने वाली ताकतें वही हैं। उनके लिए मोदीजी की हैसियत बेहतरीन मुखौटे जितनी ही है।

मजदूरों का सवाल अब भी अनुत्तरित

वे शक्तियां देश को पीछे क्यों ले जाना चाहती हैं? उत्तर अजाना नहीं है। असल में संघ जिस वर्ग की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है, उसे लगता है कि आजादी के बाद उसने पाने से अधिक गंवाया है। संवैधानिक भारत वह भारत नहीं है, जिसे वह पाना चाहता था। जिन लोगों की मानसिकता का वह प्रतिनिधित्व करता है, उनके लिए वर्णाश्रम धर्म द्वारा निर्मित पुरानी व्यवस्था ही श्रेष्ठतम थी। उसमें बगैर कुछ किए ब्राह्मण पृथ्वी की समस्त संपदा का स्वामी कहलाता था। क्षत्रिय उन सुख-संसाधनों का संरक्षक था, इसलिए भोग और वैभव में लगभग बराबर का हिस्सेदार था। वैश्यों के लिए धन ही राष्ट्र था। राजसत्ता चाहे जिसके अधिकार में जाए, उनका‘राष्ट्र’ उनकी तिजोरी में कैद रहता था। मुगल हों या अंग्रेज, वे हमेशा दौलत समेटने में लगे रहे।

आजादी के बाद संविधान लागू होने से इन वर्गों के विशेषाधिकार जाते रहे। पुरानी व्यवस्था में शूद्रों को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। भरण-पोषण लायक मामूली वृत्तिका पर वे शीर्षस्थ वर्गों के वैभव-विलास के लिए खटते रहते थे। नई व्यवस्था में यह संभव नहीं रहा। सर्वाधिक नुकसान ब्राह्मणों का हुआ। क्योंकि ज्ञान का क्षेत्र जिसपर कभी उसका एकाधिकार था, वह उससे छिन गया। पढ़े-लिखे शूद-अतिशूद्र सरकारी नौकरियों में आने लगे। यह सब संविधान की मदद से हुआ था, इसलिए ‘अपनी सरकार’ आते ही, वे संविधान की आलोचना में जुट गए। बीते छह वर्षों में उनकी पूरी कोशिश संविधान को कमजोर करने, उसके श्रेष्ठत्व को खारिज कर, काल्पनिक अतीत का महिमामंडन करने की रही है। वे उस संस्कृति की वापसी चाहते हैं, जो उन्हें अंतहीन अधिकार देती थी। बाजारवादी अर्थतंत्र में सिर्फ धर्म-संस्कृति के नाम पर जनता को भरमाए रखना संभव नहीं है। इसलिए वे इन दोनों का राष्ट्रवादी कोलाज बनाकर पेश करते हैं।

इस्लाम को भारतीय संस्कृति पर सबसे बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके दो कारण हैं। पहला इस्लाम जातिभेद नहीं करता। दूसरा उसका एकेश्वरवाद। इस्लाम की ये दोनों विशेषताएं हिंदू धर्म तथा उसकी सामाजिक व्यवस्था पर भारी पड़ती हैं। यहां आपत्ति की गुंजाइश है। कहा जा सकता है कि भारतीय उपनिषदों में, जो इस्लाम की उत्पत्ति से बहुत पहले रचे जा चुके थे, एकेश्वरवाद छाया हुआ है। बात ठीक है। किंतु समानांतर सच यह भी है कि शंकराचार्य से पहले किसी ने भी उपनिषदों के एकेश्वरवाद को गंभीरता से नहीं लिया था—

‘शंकर का अद्वैतवाद निस्संदेह भारतीय था, किंतु उस समय के मुसलमान सूफियों के अद्वैतवाद के साथ उसमें गहरी समानता थी। कम से कम शंकर से पहले भारत में किसी ने भी अद्वैतवाद को इस तरह का रूप न दिया था। इस्लाम के कठोर एकेश्वरवाद और शंकर के अद्वैतवाद में भी थोड़ी-सी समानता अवश्य है।’[1]

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शंकराचार्य का ‘वेदांत दर्शन’ मठों में कैद होकर रह गया। शंकराचार्य के शिष्यों ने उन्हें शिव का अवतार घोषित कर दिया। उन्हें चमत्कारी और दिव्यात्मा सिद्ध करने के लिए ‘शंकर विजय’ और ‘शंकर दिग्विजय’ जैसे ग्रंथों की रचना की गई। मगर ‘अद्वैतवाद’ जिसे उनकी मौलिक देन माना जाता है, को जनसमाज में लोकप्रिय बनाने की कोशिश कभी नहीं की। वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘सर्वखल्विदं ब्रह्म’; यानी ‘कण-कण ब्रह्म-स्वरूप’ मान लेने से जन्मना जातिभेद का आधार समाप्त हो जाएगा। मूर्तिपूजा बेमानी हो जाएगी और देश-भर में फैले लाखों मंदिरों, तथा वहां मौजूद मूर्तियों पर संकट उत्पन्न हो जाएगा। उस अवस्था में अद्वैत दर्शन का कोई भी गंभीर, गैर-ब्राह्मण अध्येता शंकर-पीठ का आचार्य बनने की दावेदारी पेश कर सकता है। साफ है कि ब्राह्मणों को धर्म-दर्शन से ज्यादा अपने जातीय हितों की चिंता रही है। जब भी जाति और धर्म में से किसी एक को चुनने का अवसर आया है, उन्होंने हमेशा जाति की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

समाज के चौथे वर्ग में दलित और पिछड़ी जातियां आती हैं। हिंदू वर्ण-व्यवस्था के अनुसार वे शूद्र व अतिशूद्र हैं। लेकिन इस वर्ग को शूद्र कोई नहीं कहता। अतीत का महिमामंडन करने वाले, रामराज्य को आदर्श बताने वाले भी पिछड़ी जातियों को शूद्र कहकर संबोधित करने से कतराते हैं। स्वयं ये जातियां भी अपनी स्वतंत्र पहचान से संतुष्ट रहती हैं। आखिर क्यों? क्या ऊंची जातियों को लगता है कि शूद्र कह देने से वे नाराज हो जाएंगी? नहीं, असली कारण यह है कि शूद्र कहते ही कुल हिंदुओं का 85 प्रतिशत तथा भारत की जनसंख्या का 65 प्रतिशत हिस्सा एकल पहचान के दायरे में आ जाता है। जो लोकतंत्र में बड़ी शक्ति बन सकता है। शूद्र जातियां खुद को कभी संगठित ताकत के रूप में न देखें, इसीलिए उन्हें अलग-अलग जातियों में बांट दिया गया है। ‘हिंदू चर्मकार जाति’, ‘हिंदू वाल्मीकि जाति’, ‘हिंदू खटीक जाति’ जैसी पुस्तकें दिखाती हैं कि आज जाति वर्ण से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अपना उद्गम खोजने की चाहत रखने वाली प्रत्येक जाति को ब्राह्मण ग्रंथों का सहारा लेना पड़ता है। उस समय महाकाव्य और पुराण, जिनका महत्त्व अच्छी गल्पकथाओं से ज्यादा नहीं है—मानक-ग्रंथों का काम करते हैं। दूसरे शब्दों में इस तरह की पुस्तकें ब्राह्मणवाद के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती हैं।

दलित और पिछड़ी जातियां जातिवाद थोपने के लिए मनुस्मृति की आलोचना करती हैं। जबकि ब्राह्मणवादियों की दृष्टि में मनुस्मृति, जो इन जातियों को शूद्र की एकल पहचान देती है—इन दिनों अप्रासंगिक ग्रंथ है। इसलिए ब्राह्मणेत्तर जातियां जब भी मनुस्मृति को निशाना बनाती हैं, वे प्रायः चुप्पी साधे रहते हैं। इसके कई कारण हैं। पहला, पिछले सौ-सवा सौ वर्षों में मनुस्मृति पर अनगिनत हमले होने से वह काफी बदनाम चुकी है। दूसरे जनसाधारण में वह कभी लोकप्रिय नहीं रही। तीसरे विधि-संहिता होने के कारण उसपर होने वाला हमला केवल जाति-विरोध तक सीमित होकर रह जाता है; और हिंदू धर्म जो जातिवाद को प्रश्रय देता है, वह आलोचना से लगभग अछूता रह जाता है। चौथी और महत्त्वपूर्ण बात, ब्राह्मणों का यह डर है कि ‘मनुस्मृति’ पर ज्यादा चर्चा होने से ये जातियां ‘शूद्र’ नामक एकल पहचान से जुड़ने लगेंगी, जो उनके लिए स्थायी नुकसान का कारण बन सकता है।

आरएसएस की समस्या है कि पिछली कुछ दशाब्दियों में शिक्षा का लाभ उठाकर शूद्रों के बीच एक बुद्धिजीवी वर्ग पैदा हो चुका है। लोकतंत्र ने उसे आत्मविश्वास दिया है। अपने सरोकारों और चिंतन के मामले में यह वर्ग पूरी तरह स्वतंत्र है। उसके प्रेरणास्रोत ज्योतिराव फुले, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और स्वामी अछूतानंद जैसे नेता हैं। मुख्यधारा के मीडिया में इस वर्ग के लिए अभिव्यक्ति के अवसर कम हैं तो उसने वैकल्पिक मीडिया, जिसे सोशल मीडिया कहने का चलन है—पर अपनी दमदार उपस्थिति बनाई हुई है। वह जाति से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर आने के लिए आवश्यक हो। जरूरत पड़ने पर वह न केवल सड़क पर उतरकर शूद्रों-अतिशूद्रों से सीधे संवाद कर सकता है, बल्कि जाति के नाम पर वोट मांगने वाले ‘अपने’ नेताओं की खिंचाई भी कर सकता है। यह वर्ग संघ की प्रत्येक गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखता है। खासकर जब वे दलितों और पिछड़े के हितैषी होने का दिखावा करते हैं।

हमने अपनी बात विकास से शुरू की थी। हमने यह भी कहा था कि सरकार ऐसा रथ है, जिसमें रथवान आगे बैठा नजर आता है, मगर पीछे जुते घोड़े रथ को लगातार विपरीत दिशा की ओर खींच रहे हैं। लेकिन समय तो हमेशा आगे बढ़ता है। आरएसएस या उसके अनुषंगी संगठन कुछ भी करें, वे वक्त की रफ्तार को नहीं रोक सकते। पिछले छह वर्षों में देश में पनपती सांप्रदायिकता, नोटबंदी, और अब कोरोना की मार तथा इनसे उत्पन्न मंदी, बेरोजगारी और अविश्वास के माहौल ने भारतीय समाज को इतना अस्थिर बना दिया है कि कोई भी बड़ा पूंजीपति देश में निवेश करने से कतराता है। हालात इतनी तेजी से बदले हैं कि यदि सरकार ने अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पूर्वाग्रह-मुक्त होकर, नीतिबद्ध तरीके से काम नहीं किया तो हालात देश को गृहयुद्ध तक ले जा सकते हैं।

छह वर्षों के अब तक के कार्यकाल में संघ और सरकार की कोशिश वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर ऐसे अधिकारियों को लाने की रही है, जो उसके सांस्कृतिक एजेंडे के हिसाब से काम कर सकें। उन्हीं के बल पर वह समाज का तेजी से ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही है। अपनी महीन चालों से उसने विपक्ष को लगभग धराशायी कर दिया है। मगर विकास और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उसके पास न कोई नीति है, न ही नीति-निर्माता। कारण है कि वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में आर्थिक नीतियों में समयानुसार संशोधन या लचीलापन लाने के लिए जो प्रतिभा और साहस चाहिए, सरकार के प्रशासनिक ढांचे में उसका अभाव है।

भाजपा सरकार के आने के बाद से ही संघ की नीतियों में आस्था तथा जाति को अधिकारी की विशिष्ट योग्यता के रूप में देखा जाता है। ऐसे अधिकारी हिंदुत्व और सांप्रदायिक एजेंडे को लागू करने में तो अपनी विशेषता दर्शा सकते हैं, मगर बाकी मामलों में मौलिक करने में उन्हें बहुत परेशानी होती है। कार्मिक, लोक-शिकायत और पेंशन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2019 में पीएमओ साहित केंद्रीय विभागों में कुल 89 शीर्ष आईएएस अधिकारी हैं और इनमें केवल एक अनुसूचित जाति का और 3 अनुसूचित जनजाति के थे। अन्यपिछड़ा वर्ग का कोई भी अधिकारी उनमें नहीं था। संयुक्त सचिव स्तर के कुल 275 पदों में से, अनुसूचित जाति के 13 (4.73 प्रतिशत), अनुसूचित जनजाति के 9(3.27 प्रतिशत) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के 19(6.90 प्रतिशत) अधिकारी थे।[2] इस तरह 15-20 प्रतिशत सवर्ण जातियां सचिव स्तर के 95.51 प्रतिशत तथा संयुक्त सचिव स्तर के 80.10 प्रतिशत पदों पर कब्जा जमाए हुए थे। जातीय प्राथमिकता के आधार शीर्ष पदों पर पहुंचे अधिकारी निश्चित तौर पर जातिवाद को ही बढ़ावा देंगे। ऐसे अधिकारियों का मूल एजेंडा विकास हो ही नहीं सकता। वे यह भी सोच सकते हैं कि जैसे वर्णाश्रम व्यवस्था में धनार्जन की जिम्मेदारी वैश्यों की थी, वैसे ही आर्थिक गतिविधियों का संचालन पूंजीपतियों और व्यापारियों का काम है। इसलिए हम देखते हैं कि मोदी सरकार के आने के बाद से विनिवेश में तेजी आई है।

बहरहाल, अधिकारी भी जानते हैं कि उनकी नियुक्ति के पीछे उनकी बुद्धिमत्ता, योग्यता और अनुभव से ज्यादा योगदान उनकी जाति का है। यानी उन्हें जो मिला है, उसमें आज के कायदे-कानूनों से ज्यादा वर्णाश्रम व्यवस्था का योगदान है। फिर भी होना तो यह चाहिए कि अपनी हितरक्षक सरकार की सफलता हेतु वे अधिकाधिक काम करें, ताकि उसे चुनना जनता की मजबूरी बन जाए। परंतु जातिवादी मानस रचना के अनुसार उन्हें सदैव सुरक्षित घेरे की तलाश रहती है, जो उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने से रोकती है। ऐसे अधिकारी योजना आयोग को नीति आयोग में बदलने से बड़ा सुझाव दे ही नहीं सकते। इसलिए यदि सरकार अपने बचे हुए कार्यकाल में सचमुच कुछ बेहतर करना चाहती है तो उच्चतम पदों पर सामाजिक विविधता के नियम को लागू करना चाहिए। उससे जमे-जमाए अधिकारियों की चुनौती बढ़ेगी। आरक्षित वर्गों से आए अधिकारी खुद को ‘सिद्ध’ करने के लिए अपना श्रेष्ठतम देने का प्रयत्न करेंगे। वहीं सामान्य वर्ग के अधिकारियों को लगेगा कि उनका उस पद पर बने रहना केवल योग्यता के भरोसे संभव है। इसलिए वे भी अपने सुरक्षित दायरे से बाहर निकलकर फैसले लेने लगेंगे।

(संपादन : नवल)

[1] सुंदरलाल, भारत में अंग्रेजी राज, पहली जिल्द, ओंकार प्रेस, इलाहाबाद, 1938 पृष्ठ-93

[2] https://theprint.in/india/governance/of-89-secretaries-in-modi-govt-there-are-just-3-sts-1-dalit-and-no-obcs/271543/

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