बौद्ध-विरासत की कब्र पर बनेगा राम जन्मभूमि मंदिर?

राजन कुमार बता रहे हैं कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिए चल रहे समतलीकरण के दौरान जो पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, उन्हें लेकर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने यूनेस्को से इस स्थल पर खुदाई कराने की मांग भी की है

देश में लॉकडाउन के चौथे चरण में निर्माण कार्य हेतु मिली कुछ छूट से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो गया है। मंदिर निर्माण के लिए चल रहे समतलीकरण कार्य के दौरान पुरातात्विक महत्व की काफी प्राचीन प्रतिमाएं मिली हैं, जिससे एक बार फिर चर्चाओं का माहौल गर्म हो गया है।

दरअसल, मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाए गए ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के पदाधिकारियों समेत कुछ लोग जहां इसे 2000 साल पुराना और विक्रमादित्य के शासनकाल के मंदिर का अवशेष बता रहे हैं। इस संबंध में ट्रस्ट के आधिकारिक ट्वीटर हैंडलर से संदेश भी जारी किया गया है। ट्रस्ट का कहना है कि जो पुरावशेष मिले हैं उनमें कलश, पुष्प और आमलक के अलावा कई खंडित प्रतिमाएं शामिल हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि खुदाई के दौरान 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तम्भ, 6 रेड सैंडस्टोन के स्तम्भ सहित 5 फ़ीट का एक शिवलिंग भी प्राप्त हुआ है। 

वहीं कुछ का कहना है ये सम्राट अशोक के शासनकाल में बने बौद्ध मंदिरों के अवशेष हैं। सोशल मीडिया में अब इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि जो पुरावशेष मिले हैं वे हिंदू मंदिर से जुड़े हैं या फिर बौद्ध मंदिर से।

इस बीच सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने कहा है कि यह सब एक प्रोपगेंडा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि एएसआई के सबूतों से यह साबित नहीं होता है कि 13वीं शताब्दी में वहां कोई मंदिर था। जिलानी ने कहा कि ये मूर्तियां राम मंदिर का अवशेष नहीं हैं।

दूसरी ओर सोशल मीडिया से लेकर आमजन तक में पुरावशेषों के संबंध में तरह-तरह की बयानबाजी जारी है। ट्वीटर पर हैशटैग बौद्धस्थल अयोध्या ट्रेंड किया और अनेक लोगों ने यूनेस्को से रामजन्मभूमि परिसर की निष्पक्ष खुदाई की मांग की है। सोशल मीडिया में अनेक लोगों का दावा है कि पुरावशेष सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान में बने बौद्ध मंदिरों का है और राम मंदिर ट्रस्ट जिसे शिवलिंग बता रहा है वह अशोक स्तंभ हैं।

बौद्ध पुरावशेषों को हिंदू मंदिर अवशेष बताने का आरोप

अनेक इतिहासकारों एवं बौद्ध धर्मावलंबियों ने अयोध्या के विवादित स्थल से पहले भी प्राप्त हो चुके पुरावशेषों को बौद्ध धर्म से जुड़े अशोक कालीन अवशेष बता चुके हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों ने राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोगों पर बौद्ध पुरावशेषों को हिंदू मंदिर अवशेष बताने का आरोप लगाते रहे हैं।

समतलीकरण के दौरान प्राप्त पुरावशेष (साभार : श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट)

ज्ञात हो कि अयोध्या के ही रहने वाले विनीत कुमार मौर्य ने वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि विवादित स्थल के नीचे मिले पुरावशेष बौद्ध धर्म से जुड़े हैं और अशोक कालीन हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद विनीत कुमार मौर्य को धर्म की ठेकेदारी करने वाले अनेक सवर्ण लोगों द्वारा जान से मारने की धमकी भी मिली थी।

दिसंबर 2018 में फारवर्ड प्रेस संवाददाता को दिए एक इंटरव्यू में विनीत कुमार मौर्य ने बताया था, “मेरा घर विवादास्पद परिसर की बाउंड्री से थोड़ी दूरी पर है। हमेशा आना-जाना लगा रहता है। हाईकोर्ट के आदेश पर वर्ष 2002 में जब विवादास्पद परिसर का समतलीकरण किया जा रहा था, तब काम करने वालों में ट्रैक्टर चालक के रूप में मैं भी था। खुदाई के दौरान सर्वे रिपोर्ट जो जापान की कंपनी टोजो-विकास इंटरनेशनल व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मिलकर तैयार किया, उन्हें अनौपचारिक तौर पर तब तथागत (भगवान बुद्ध) से जुड़े अशोक काल का माना गया। लेकिन, समाज में सौहार्द्र नहीं बिगड़े, यह कहकर इसे उजागर नहीं किया गया। खुदाई के लिए 150 गड्ढों की खुदाई का ले-आउट तैयार किया गया था लेकिन 50 गड्ढों की खुदाई करके ही खुदाई का काम रोक दिया गया।” 

न्यायालय का फैसला और एएसआई का मत

ध्यातव्य है कि 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने (चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने) सर्वसम्मति से अपने एक ऐतिहासिक फैसले में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाया और विवादित ज़मीन को राम मंदिर पक्ष को देने का फैसला किया था। उक्त फैसले को जजों की सर्वसम्मति एवं न्याय, निष्पक्षता और अच्छे विवेक के हवाले से बताया गया, जो कुछ हद तक कानूनों का अपर्याप्त होना भी रेखांकित करता है, लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि फैसले के संदर्भ में संविधान पीठ के किस जज का क्या मत या विचार था, यह फैसले में नहीं बताया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ। 

अदालती कार्रवाई के दरमियान भी उठे थे सवाल

वहीं वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एएसआई से पूछा था कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर बनी थी या पहले कोई ढांचा था। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में नहीं बताया कि मंदिर गिरा कर मस्जिद बनाई गई थी या नहीं, लेकिन एएसआई ने कहा कि जमीन के नीचे पुरानी इमारतों के अवशेष मिलते हैं जो प्राचीन मंदिर के अवशेष जैसे प्रतीत होते हैं और इन अवशेषों के निर्माण का समय 10वीं से 12वीं सदी का लगता है।

सनद रहे कि 9 नवंबर, 2019 के फैसले के संदर्भ में भी एएसआई ने सुप्रीम कोर्ट में उपरोक्त कथन को ही दोहराया।

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हिंदू मंदिर या बौद्ध मंदिर?

एएसआई ने स्पष्ट नहीं बताया है कि विवादित जमीन से प्राप्त अवशेष हिंदू मंदिर से संबंधित हैं या बौद्ध मंदिर से। एएसआई पुरावशेषों को सिर्फ प्राचीन मंदिर का अवशेष कहता है। एएसआई के इन मतों को लेकर काफी विवाद भी हो चुका है। कई जानकारों-इतिहासकारों ने एएसआई पर धार्मिक खांचे से देखने का आरोप लगा चुके हैं। पूर्व एएसआई महानिदेशक बी.बी. लाल 1976 में राम जन्मभूमि से संबंधित अपनी बयानों को लेकर काफी विवादों में भी रहे हैं।

कई जानकारों और पुरातत्वविदों का कहना है कि यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि ये अवशेष हिंदू मंदिर के ही हैं, कुछ पुरातत्वविद यह भी कहते हैं कि वहां जैन या बौद्ध मंदिर होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा जारी पुरावशेषों में शिल्पांकन को ख्यात भाषाविद्-इतिहासविद् डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह बुद्धिज्म का पद्म-पदक बताते हैं एवं जिस अष्टकोणीय कला को लोग शिवलिंग बता रहे हैं उसे बुद्धिज्म का मनौती स्तूप बताते हैं। 

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह आगे ख्यात पुरातत्वविद् एवं पद्मश्री से सम्मानित दिलीप कुमार चक्रवर्ती के किताब “आर्कियोलॉजिकल ज्योग्राफी ऑफ दि गंगा प्लेन” का उल्लेख करते हैं, जिसमें लिखा है, “अयोध्या के सरयू तट पर नागेश्वरनाथ मंदिर में जो शिवलिंग स्थापित है, वह अशोक स्तंभ के शीर्ष पर मौजूद उल्टे कमल पर स्थापित है।”

वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश के बहराइच से भाजपा की तत्कालीन सांसद सावित्रीबाई फुले एवं केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले भी अयोध्या में बौद्ध मंदिर बनाने की मांग कर चुके हैं।

बहरहाल, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामला हमेशा से हिंदू बनाम मुस्लिम रहा है, इसलिए विवादित जमीन से प्राप्त पुरावशेषों को अनेक लोग हिंदू नजरिए से ही देखते हैं और उसके बौद्ध विरासत एवं कला को नजरंदाज कर देते हैं। लेकिन जब-जब अयोध्या की उक्त विवादित भूमि से पुरावशेष प्राप्त होते हैं तो उसके बौद्धकालीन होने का मामला तूल पकड़ता है, जो उस भूमि को बौद्ध-स्थल के रुप में भी रेखांकित करने की मांग करता है।

(संपादन : नवल)

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