h n

क्या आरक्षण मौलिक अधिकार हैं? दो न्यायादेशों की कहानी

आरक्षण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश और टिप्पणियां, इसी अदालत के सन् 1975 के एक निर्णय की मूल आत्मा पर गहरी चोट हैं, बता रहे हैं अनिल वर्गीज

गत 7 फरवरी 2020 को उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की एक खंडपीठ ने उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर अपना निर्णय सुनाया। इस याचिका के माध्यम से राज्य सरकार ने अपने कुछ अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के कर्मचारियों द्वारा अपने विरुद्ध दायर एक मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती दी थी। राज्य की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 5 सितम्बर 2012 को यह निर्णय लिया कि राज्य के अधीन सेवाओं में एससी और एसटी (अनुसचित जनजाति) के उम्मीदवारों को आरक्षण नहीं दिया जाएगा। एससी कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया, जिस पर न्यायालय ने राज्य सरकार का निर्णय रद्द कर दिया। बाद में राज्य की भाजपा सरकार द्वारा उक्त निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने पर उच्च न्यायालय अपने पिछले निर्णय से पलट गया। उसने कहा कि सरकार के लिए एससी और एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देना ज़रूरी नहीं है, परन्तु यह आवश्यक है कि वह यह पता लगाने के लिए तथ्यों का संकलन करे कि क्या राज्य के अंतर्गत सेवाओं में एससी/एसटी का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है और उस आधार पर यह तय करे कि आरक्षण की ज़रुरत है अथवा नहीं। उच्च न्यायालय ने उक्त तथ्य संकलित करने के लिए राज्य सरकार को चार महीने का वक्त दिया। इसी अवधि में राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर यह तर्क दिया कि सार्वजनिक सेवाओं में भर्ती और पदोन्नति में आरक्षण, किसी का मूल अधिकार नहीं है और ना ही यह राज्य सरकार का संवैधानिक कर्त्तव्य है कि वह आरक्षण प्रदान करे। सरकार का यह तर्क भी था कि अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) केवल समर्थकारी प्रावधान हैं।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : क्या आरक्षण मौलिक अधिकार हैं? दो न्यायादेशों की कहानी

लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

संबंधित आलेख

पुस्तक समीक्षा : अशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत्र
पसमांदा विमर्श के समकालीन परिदृश्य में यह पुस्तक महज एक सामान्य अकादमिक अध्ययन या आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि पसमांदा आंदोलन के ऐतिहासिक...
राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक थे भिखारी ठाकुर : प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव
बीते 9 जुलाई को ऑनलाइन गोष्ठी में प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव ने निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया कि भिखारी ठाकुर समाज को सांस्कृतिक रूप से...
आदिवासी प्रश्न और मुख्यधारा के समाजशास्त्र की सीमाएं (संदर्भ : निर्मल कुमार बोस की पुस्तक ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’)
आदिवासियों या उनकी आर्थिक व्यवस्था को ‘पिछड़ा’ कहना या उनको ‘बैकवर्ड हिंदू’ कहना केवल एक वर्णनात्मक श्रेणी का प्रयोग नहीं है; इसका वास्तविक उद्देश्य...
ऐसे थे भिखारी ठाकुर और ऐसा था उनका प्रभाव
भोर होने से पहले भिखारी ठाकुर की नाच मंडली को गांव छोड़ना पड़ा। लेकिन नाच की आंच बहुत दिनों तक बनी रही। जवार की...
आज का समय, समाज और भिखारी ठाकुर
बुद्ध ने भी वर्णगत भेदभाव देखा और भोगा था, भिखारी ठाकुर ने भी देखा और भोगा था। इसीलिए भिखारी ठाकुर अपने व्यत्तिगत और जातिगत...