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जाति आखिर जाए कैसे?

जाति मूलत: द्विज वर्ग के हितों की सुरक्षा हेतु निर्मित असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था है। उसके चलते ही संभव हुआ कि पंडित जी के घर “पंडित” जन्म लेने लगे। यदि सबकुछ बिना हाथ-पैर हिलाए-डुलाए मिलता है तो देह को कष्ट क्यों दिया जाए! इससे अध्ययन-मनन का सिलसिला “राम-राम” जपने; तथा कर्मकांड तक सिमट गया। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

लेख श्रृंखला : जाति का दंश और मुक्ति की परियोजना 

एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में भारत में जाति सिर्फ अपना रूप बदल रही है। निर्जात (बिना जाति का) होने की कोई प्रक्रिया कहीं से चलती नहीं दिखती। आप किसी के बारे में कह सकते हैं कि वह आधुनिक है, उत्तर आधुनिक है- लेकिन यह नहीं कह सकते कि उसकी कोई जाति नहीं है! यह एक भयावह त्रासदी है। क्या हो जाति से मुक्ति की परियोजना? एक लेखक, एक समाजकर्मी कैसे करे जाति से संघर्ष? इन्हीं सवालों पर केन्द्रित हैं फारवर्ड प्रेस की लेख श्रृंखला “जाति का दंश और मुक्ति की परियोजना”। इस कड़ी में आज पढें ओमप्रकाश कश्यप को

भारतीय समाज, विशेषकर हिंदुओं में जाति के प्रश्न बहुत पुराने हैं। अनेक विद्वानों ने जाति को भारतीय समाज का कलंक माना है। जातीय उत्पीड़न के शिकार समाज के दो-तिहाई से अधिक लोग, निरंतर इसकी जकड़ से बाहर आने को छटपटाते रहे हैं। परंतु रुचि और योग्यता के अनुसार रोजगार न चुन पाने की विवशता, अर्थव्यवस्था का सामंती स्वरूप तथा बौद्धिक दासता की मनःस्थिति, उन्हें बार-बार कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व स्वीकारने को बाध्य करती रही है। भारतीय हिंदू समाज में जाति-विधान इतना ज्यादा प्रभावशाली है कि सिख, इस्लाम और ईसाई धर्म, जिनमें जाति के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं हैइसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं। 

जाति इंसान की नैसर्गिक स्वतंत्रता की अवरोधक है। वह तय करती है कि फलां शिशु ‘पंडित’ के घर जन्मा है, इसलिए उसमें जन्मजात पांडित्य है। जो क्षत्रिय की संतान है, उसमें जन्मजात शौर्य भरा होता है। शूद्र, जो समाज की संपूर्ण उत्पादकता की जिम्मेदारी संभालता है, जिसने महीन रेशमी मलमल से लेकर शानदार, नक्काशीदार इमारतें, पुल, बांध वगैरह सब बनाए हैं, उसे  सामान्य बुद्धि-विवेक से भी वंचित मान लिया जाता है। उसका काम बताया जाता हैविप्र वर्ग की सेवा करना, उनकी चाकरी करते हुए जीवन बिताना। यह थोपी हुई दासता है, जिसे हिंदू धर्म सदियों से संरक्षित करता आया है। 

क्या जाति  केवल अर्थव्यवस्था की देन है?

कुछ देर के लिए यदि जाति और वर्ण व्यवस्था को कार्य-विभाजन की बेहतरीन पद्धति मान लिया जाए तो उन्हें अर्थशास्त्र का विषय होना चाहिए था। धर्म और संस्कृति का नहीं। यदि यह कहा जाए कि प्राचीन भारत में सभी कुछ इतना धर्ममय था…. कि “अर्थशास्त्र” में अर्थनीति, राजनीति, व्यवहारशास्त्र आदि सबकुछ शामिल हैतो भी जाति की संकल्पना के करीब तीन हजार वर्षों में उसपर कभी तो अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए था? ठीक वैसे ही जैसे यूनान में हुआ था। प्लेटो ने मनुष्यों को स्वर्ण, रजत, लौह और पीतल वर्गों में बांटा था। इसके लिए उसने किसी “परमपुरुष” की परिकल्पना नहीं की थी। प्लेटो के कार्य-विभाजन का आधार मनुष्य के सामान्य गुण एवं प्रवृत्तियां थीं। फिर भी अरस्तु को वह जमा नहीं। उसने यह कहकर कि मानव-व्यक्तित्व जटिल रचना है, उसका इस तरह सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिएआधी शताब्दी से भी कम समय में अपने गुरु द्वारा किए गए वर्गीकरण को नकार दिया था। यही नहीं, जापान, कोरिया, चीन, स्पेन, फ्रांस वगैरह जिन-जिन देशों में इस तरह का वर्गीकरण था, समय रहते उन्होंने उस कुप्रथा पर विचार किया। समय रहते उससे मुक्ति भी पा ली। परंतु, भारत में ऐसा नहीं हुआ। इसलिए नहीं हुआ क्योंकि यहां जाति को हिंदू धर्म के रूप में मजबूत सुरक्षा-कवच प्राप्त था। 

मुंबई में सड़क किनारे बुद्ध और डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें बेचता एक नवयुवक

जाति मूलत: द्विज वर्ग के हितों की सुरक्षा हेतु निर्मित असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था है। उसके चलते ही संभव हुआ कि पंडित जी के घर “पंडित” जन्म लेने लगे। यदि सबकुछ बिना हाथ-पैर हिलाए-डुलाए मिलता है तो देह को कष्ट क्यों दिया जाए! इससे अध्ययन-मनन का सिलसिला “राम-राम” जपने; तथा कर्मकांड तक सिमट गया। लोग सोलह पृष्ठ की पंजिका पढ़कर “पंडित जी” कहलाने लगे। बिना “सत्य” और “सत्यनारायण” वाली “सत्यनारायण की कथा”, घर-घर बंचवाई जाने लगी। पुराकथाओं की आड़ में ब्राह्मणवाद को थोपा गया और उसके माध्यम से जाति को इंसान की पहचान बना दी गयी।

जानते सब थे कि जन्म-आधारित वर्गीकरण मनुष्य के मूल स्वभाव के विरुद्ध है। दो व्यक्ति कभी भी पूरी तरह से एक हो ही नहीं सकते। इसलिए किसी एक की परिस्थितियों पर विचार कर हू-ब-हू वही निर्णय दूसरे के लिए नहीं लिया जा सकता। चूंकि यह मनुष्य की प्रवृत्ति के विरुद्ध है, समाजीकरण की धारा के विरुद्ध है, इसलिए व्यक्ति केवल परंपराएं ढोता रहा। समाज जड़, लोग यथास्थितिवादी बनते गए। जाति ने लोगों से उनका विवेक व चयन का अधिकार छीनकर उन्हें एक नशा थमा दिया। बिना कुछ किए-धरे खास होने का नशा। जाति-आधारित विभाजन की खूबी है कि उसमें हर कोई खास होता है। ऐसी खासियत जिसमें उसका अपना कोई योगदान नहीं होता। जातीय पायदान पर अपने से नीचे किसी कम खास की उपस्थिति मानकर मन को तसल्ली देने लगता है। दूसरा चाहे उसका विरोध करे, फिर भी वह खुद को ‘अपनी पीठ खुद थपथपाने से रोक नहीं पाता। चूंकि जाति व्यवस्था पर उसका जोर नहीं चलता, इसलिए जिस जाति-वर्ग में वह जन्म लेता है, उसे अपनी नियति मान जीवन-भर अपने व्यक्तित्व पर लादे रहता है। इससे नियतिवाद को बढ़ावा मिलता है, जो परिवर्तनकामी आंदोलनों की आंच पर राख डालते रहने का काम करता है।

जन्मना जाति महज एक ठप्पा

दरअसल, वर्ण-व्यवस्था धूर्त्त दिमागों की उपज है। यह मुट्ठी-भर सवर्णों को सत्ता-प्रतिष्ठानों का सर्वेसर्वा बना देती है। संख्याबल में कई गुना अधिक होने के बावजूद शेष बहुसंख्यक छोटी-छोटी जातियों में बंटकर अपनी प्रभावी शक्ति खो देता है। इन जातियों में स्वहितों की स्पर्धा बहुत होती है। परिणामस्वरूप उनकी शक्तियां एक-दूसरे से टकराकर जाया होती रहती हैं। चूंकि उत्पादन के संसाधनों पर अधिकांश अभिजन वर्ग का कब्ज़ा  होता है, इसलिए रोजी-रोटी की मजबूरियां भी गैर-अभिजन समाज को अभिजनों का आदेश मानने के लिए बाध्य करती हैं। धर्म और संस्कृति उसमें मददगार बनते हैं। अतः इस प्रश्न के उत्तर में कि जाति को विरोधों के बीच डटे रहने की खुराक कहां से मिलती है, या चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद वह जीवित क्यों है, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैधर्म और संस्कृति से। 

दलित उत्पीड़न व धर्म को दर्शाती एक भित्ति चित्र

जन्मना जाति इंसान का कुदरत के नाम पर लगाया गया ठप्पा है, जो इंसानियत का अवमूल्यन करता है। कहीं आने-जाने, पेशा बदल देने से व्यक्ति की जाति में कोई बदलाव नहीं आता। यानि जिस पेशागत आधार पर जाति की संकल्पना की गई थी, वह परंपरागत पेशा अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। फिर भी जाति है कि जाने का नाम ही नहीं लेती। कुछ विद्वान जाति के इसी जड़ता के कारण उसे पसंद करते हैं। उनमें प्रायः वही लोग थे, जो समाज के शीर्ष पर, समस्त संसाधनों पर कुंडली मारे नजर आते हैं।

ब्राह्मण धर्म को चुनौती 

समय-समय पर ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने जाति और जन्म के आधार पर पक्षपात करनेवालों को बुरी तरह से लताड़ा। समय-समय पर जाति-विरोधी आंदोलन भी चले। असल में जाति का विरोध, उसके जन्म जितना ही पुराना है। जाति प्रथा को मिटाने की पहल गौतम बुद्ध ने की थी। हालांकि जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए उन्होंने कोई आंदोलन नहीं चलाया था। केवल भिक्षुसंघ में अनेक जाति-वर्ग के लोगों को प्रवेश की अनुमति; तथा जाति के नाम पर भेदभाव न करने का उपदेश देकर, बराबरी का संदेश दिया था। 

जाति के खिलाफ कारगर प्रहार मध्यकाल में कबीर और रैदास आदि जनकवियों ने किया। वे समाज के निचले वर्गों से आए थे। जाति-आधारित ऊंच-नीच को वे समानताधारित समाज की स्थापना का अवरोधक मानते थे। जाति को मानव सभ्यता पर कलंक मानते हुए उन्होंने जन्म के आधार पर इंसान और इंसान में भेद करने वालों को धिक्कारा। सबसे अधिक तीखे शब्दों में कबीर ने उनकी आलोचना की‘जो तू बामन-बामनी जाया जाया, फिर आन बाट क्यों नहीं आया।’ 

पर जाति अब तक क्यों नहीं गयी?

जाति को सामाजिक असमानता एवं अंतर्द्वंद्वों का कारण मानते हुए विवेकानंद, दयानंद आदि ने भी उसकी आलोचना की। लेकिन उनकी दृष्टि में पेंच थी। वे मानते थे कि समानता का भाव हो, लेकिन वर्ण-व्यवस्था बनी रहे। वे चाहते थे कि कथित ऊंची जातियां अपने से निम्न जातियों के प्रति करुणा-भाव लाएं। ऊंच-नीच की भावना को मन से निकाल फैंकें। जाति-उन्मूलन का मसला उनके लिए शीर्षस्थ जातियों की अनुकंपा पर टिका, ऐच्छिक प्रश्न था। ‘ट्रस्टीशिप’ के सहारे गांधी जी ने जमींदारों और पूंजीपतियों से अपने संपत्ति अधिकार समाज के नाम कर देने का राग अलापा था। 

जाति विरोधी प्रयासों की असफलता के कुछ कारण एकदम साफ थे। जाति-समर्थक शक्तियों की प्रवृत्ति कछुए के समान होती है। प्रतिकूल हालात में वे अपने नख-दंतों को धर्म के कवच में ढांप लेती थीं। स्थितियां अनुकूल होते ही पुन: आक्रामक हो जाती थीं। जैसा 19वीं शताब्दी के भारत में हुआ। नई वैचारिक चेतना से लबरेज अंग्रेज व्यक्ति-स्वातंत्र्य एवं सामाजिक समानता के समर्थक थे। जाति को हिंदुओं का निजी मसला मानकर उन्होंने इसे छुआ तक नहीं, मगर कानून ऐसे बनाए जिनकी कसौटी पर ब्राह्मण-शूद्र सब बराबर थे। उनके शासनकाल में अछूतों और पिछड़ों को पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। उसके फलस्वरूप उन्हें अपने खोये आत्मविश्वास को वापस लाने में मदद मिली। अवसर प्रतिकूल देख जातिवाद समर्थक शक्तियां अपना सर छिपाने लगीं।

जाति हिंदू धर्म की मानस रचना है। उसका पूरा कारोबार धर्म के सहारे चलता है। हिंदू धर्म मजबूत, तो जाति मजबूत। धर्म कमजोर तो जाति-बंधन कमजोर। हालांकि आज भी ऐसे कूपमंडूक बड़ी संख्या में हैं जो जाति को हिंदू धर्म की विशिष्ट उपलब्धि मानकर उसे सुरक्षित रखना चाहते हैं। लेकिन दलितों को मंदिर की चौखट पर देख उन्हें अपना धर्म संकट में नजर आने लगता है। जाति की सुरक्षा के लिए वे ऐसी चालें चलते हैं, जिनसे बदलाव की सारी संभावनाओं पर पानी फिर जाता है। उनके प्रयास बहुत महीन, आसानी से समझ में न आनेवाले होते हैं।

जाति के खात्मे के लिए जाति बंधन तोड़ना जरूरी

निचली जातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए चल रहे आंदोलन भी सर्वथा निरापद नहीं हैं। कभी संगठन, कभी जातीय अस्मिता तो कभी जातीय हीनताबोध से उबरने के नाम पर, उन जाति-सूचक संज्ञाओं को नाम से जोड़ने का चलन बढ़ा है, जो कभी हेय मानी जाती थीं। जैसे ‘भंगी’ संबोधन कभी अपमानजनक समझा जाता था। आज इसे कुछ लोगों द्वारा, ‘टाइटल’ की तरह सगर्व इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तरह का जातिसूचक उपनाम लगाने वाले समाज के पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध किस्म के लोग हैं, जो शिक्षा, नौकरी या किसी और माध्यम से आत्मनिर्भरता हासिल कर चुके हैं। इससे क्या जाति-आधारित शोषण समाप्त हो चुका है? या उन्होंने जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव से समझौता कर लिया है।

दबी-कुचली जातियां पहले सरकार और शीर्षस्थ वर्गों से अपनी जरूरतों की भरपाई की उम्मीद करती थीं। दैन्य दिखाती थीं। उनसे विकास के समुचित अवसरों की मांग करती थीं। अब उन्हें लगता है कि दैन्य दिखाने, गिड़गिड़ाने की अपेक्षा संगठित संघर्ष द्वारा, अपने अधिकारों को ससम्मान प्राप्त किया जा सकता है। केवल आरक्षण जैसे कानूनी प्रावधान होने से भी समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है। इसलिए अब वे संसाधनों और अवसरों में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग करने लगे हैं।

भारत में अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद, प्रौद्योगिकी के बाद जाति आज सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी उत्प्रेरक है। नई अर्थव्यवस्था मनुष्य को तकनीक के स्तर पर समृद्ध, किंतु मनोभौतिक स्तर पर बौद्धिक-विपन्न बना रही है। एक तरह से वह जीते-जागते मनुष्यों को मशीन में तब्दील कर रही है। जाति के पीछे कोई कल्याणकारी विचारधारा नहीं है। हो भी नहीं सकती। किंतु जाति के माध्यम से संघर्षरत आंदोलनकारियों को लगता है कि केवल संगठित प्रतिकार ही उन्हें समाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है। हालात को देखते हुए निचली जातियों ने इन दिनों खुद को वर्ग में ढालना आरंभ किया है, ब्राह्मणवादी ताकतें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आड़ में उनकी मेहनत पर पानी फेरने में लगी हैं। 

कुछ समाजविज्ञानी जाति के उभार से खिन्न हैं। वे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि जातिवादी आंदोलन देश को शताब्दियों पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा सोचने वालों में वही लोग हैं जिन्हें अस्मितावादी आंदोलनों से खतरा है। अपने जातीय अभिमान से मुक्त हुए बगैर वे लोग, जाति के सहारे संगठित होते युवाओं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नशे की ओर ले जाना चाहते हैं। जबकि जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को आज जाति ही, खुद को संगठित करने का सबसे कारगर उपाय लगता है। वे कांटे से कांटा निकालना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि विष से विष को मारा तो जा सकता है, देह को हृष्ट-पुष्ट नहीं बनाया जा सकता।

धर्म, जाति का सुरक्षा कवच है। जो लोग भारतीय समाज को एकजुट देखना चाहते हैं, उन्हें धर्म की संकल्पना में आमूल बदलाव करना पड़ेगा। यदि उन्हें लगता है कि हिंदू धर्म अपने वर्तमान स्वरूप में, लुंज-पुंज देवताओं की फौज के साथ रहे और जाति चली जाए, तो वे या तो बहुत भोले हैं; अथवा जाति-उन्मूलन के नाम पर बहुजनों को आगे भी धोखे में रखना चाहते हैं। सवर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अलग-अलग जातियों में बंटे होने के बावजूद, अवसर पड़ने पर संगठित वर्ग की तरह काम करते हैं। बहुजन राजनीति के पैरोकार इस तथ्य को बखूबी समझते हैं। उन्होंने जाति के औचित्य से जुड़े प्रश्न उठाना फिलहाल बंद कर दिया है। इसे जाति को शक्तिशाली वर्ग में ढालने की कवायद का हिस्सा मान सकते हैं। 

लंबे अर्से के बाद यह समझ लिया गया है कि लोकतंत्र राजनीतिक-आर्थिक सहभागिता, सामाजिक अन्याय को मिटाने वाले प्रमुख उपकरणों में से है। इससे समानता और स्वंत्रतता के उन लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव है, जो इंसानियत का अभीष्ट हैं। इस विभेदकारी समस्या के निदान के लिए शिक्षा तथा संसाधनों में साझेदारी की आवाज बुलंद की जा रही है। चूंकि इस बार जाति भी समानता के संघर्ष का एक हथियार है, इसलिए उससे सबसे अधिक तकलीफ़ उन लोगों को हो रही है, जो अभी तक जातीय स्तरीकरण की दृष्टि से लाभ की स्थिति में हैं। जिसका सहारा लेकर उन्होंने बहुसंख्यक समाज को अपना आश्रित बनाए रखा है। अपनी खीझ उतारने के लिए ऐसे ही लोग बहुजनों पर जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहते हैं।

(संपादन : गोल्डी/नवल)

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लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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