बहुत याद आएंगे बौद्ध-आंबेडकरवादी वैचारिकी के चितेरे शांति स्वरूप बौद्ध

सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध ने बौद्ध साहित्य व आंबेडकरवादी वैचारिकी पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन उस समय शुरू किया जब किसी ने इस दिशा में सोचा भी नहीं था। उन्होंने उत्तर भारत में एक विशाल पाठक वर्ग भी तैयार किया। कोरोना के कारण बीते 6 जून को उनका निधन हो गया। उन्हें याद कर रहे हैं नवल किशोर कुमार

बीते 6 जून, 2020 को हिंदी राज्यों के बहुजन उस समय स्तब्ध रह गए जब सोशल मीडिया के जरिए शांति स्वरूप बौद्ध के निधन की सूचना उन्हें मिली। सोशल मीडिया पर उन्हें याद करते हुए लोगों ने उन्हें बहुजनों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक वैचारिकी को अपने हाथों से स्थापित करने वाले महान योद्धा बताया। 

सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध का व्यक्तित्व था ही ऐसा कि जो भी उनसे मिलता उनका मुरीद हो जाता। अनेक युवा लेखक-लेखिकाओं ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए लिखा कि उनके लिए वे किताबों के प्रकाशक से अधिक एक अभिभावक थे। वे हर रचना को पढ़ते, बहुजन साहित्य की कसौटियों पर परखते और फिर प्रकाशित करवाते। करीब पैंतालीस वर्षों के लंबे अरसे में उन्होंने सैकड़ों लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित कर बहुजनों को यह अहसास कराया कि वे बेआवाज नहीं हैं।

शांति स्वरूप बौद्ध का जन्म 2 अक्टूबर, 1948 को पुरानी दिल्ली के एक जाटव परिवार में हुआ था। इस परिवार का डॉ. आंबेडकर से प्रारंभ से ही जुड़ाव था। उनके पिता 1965-67 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष थे। स्वयं शांति स्वरूप बौद्ध भी 1970 में पार्टी की दिल्ली इकाई के महासचिव थे। 

शांति स्वरूप बौद्ध (2 अक्टूबर, 1948 – 6 जून, 2020)

आंबेडकरवादी व बौद्ध धर्मावलम्बी शांति स्वरूप बौद्ध ओजस्वी वक्ता भी थे। वे गूढ़ विषयों के लेखक के अलावा बहुजनों के प्रति प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। उन्होंने बहुजनों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए राजपत्रित अधिकारी की नौकरी छोड़ दी थी।

दरअसल, शांति स्वरूप बौद्ध जी ने जिन दिनों बहुजनों के संघर्ष को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था उस समय उनकी राह में बहुतेरी चुनौतियां थीं। उन दिनों बहुजन समाज इतना जागरूक नहीं था। शिक्षा की कमी इसकी एक बड़ी वजह तो थी ही इसके अलावा शोषक व सामंती वर्ग का कब्जा समाज के हर क्षेत्र में था। उस समय कोई सोच भी नहीं सकता था कि कोई ऐसा प्रकाशन संस्थान हो सकता है जो बहुजनों के विचारों, साहित्य और इतिहास आदि को बिना किसी द्विजवादी कांट-छांट के प्रकाशित करे।  उन दिनों न तो न्यूज चैनल थे और ना ही सोशल मीडिया। विचारों के आदान-प्रदान के लिए लोग पारंपरिक अखबारों, पत्रिकाओं व किताबों पर आश्रित थे। 

ऐसे विषम समय में 1975 में शांति स्वरूप बौद्ध ने सम्यक प्रकाशन की स्थापना की। वर्ष् 1997 से नियमित प्रकाशन प्रारंभ हुआ और सम्यक प्रकाशन की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अब तक एक हजार से ज्यादा किताबों का प्रकाशन किया जा चुका है। इस प्रक्रिया में शांति स्वरुप बौद्ध ने करीब तीन सौ से अधिक लेखकों को अपने प्रकाशन के साथ जोड़ा और उत्तर भारत में आंबेडकवादी वैचारिकी को आगे बढ़ाया।

शांति स्वरूप बौद्ध के निधन पर कनाडा के टोरंटो में रहने वाले उनके मित्र व डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल मिशन के अध्यक्ष प्रो. अरूण गौतम ने अपने शोक संदेश में कहा है कि बौद्ध जी एक प्रतिबद्ध बहुजन नायक थे जिन्होंने बिना किसी राग-द्वेष के बहुजन-मूलनिवासी महानायकों की जीवनियों, उनसे जुड़े विचारों और इतिहास का प्रकाशन किया। वे आजीवन इसी काम में लगे रहे ताकि समाज के शोषित और उपेक्षित वर्ग तक बदलाव की बयार पहुंचे, वे जागरूक हों और आगे बढ़कर अपने अधिकार हासिल करें। उन्होंने कहा कि सम्यक प्रकाशन ने देश के दमित, वंचित और शोषित तबके और महिलाओं को एक वैकल्पिक मीडिया दिया और बहुजनों व मूलनिवासियों की पहचान स्थापित करने में महती भूमिका अदा की। 

युवा दलित लेखिका डॉ. पूनम तूषामड़ और उनके पति डाॅ. गुलाब सिंह भी प्रो. अरूण गौतम की तरह शांति स्वरूप बौद्ध को बहुजन जगत के एक ध्रुवतारे के समान मानते हैं जिसने बहुजनों को अंधेरे में वह दिशा दिखलाई जिस ओर चलकर डॉ. आंबेडकर के सपनों के उस समाज को साकार किया जा सकता है, जिसकी बुनियाद समता और बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित हो।

डॉ. तूषामड़ मानती हैं कि शांति स्वरूप बौद्ध कभी किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करते थे। यहां तक कि नये प्रकाशकों को भी वे खूब प्रमोट करते थे। नये लेखकों के विचारों को भी सुनते और महत्व देते थे। डॉ. तूषामड़ के मुताबिक सामान्य तौर पर प्रकाशकों ने यह चलन बना रखा है कि नये लेखकों की किताबों के प्रकाशन के लिए लेखकों से ही पैसा लेते हैं। शांति स्वरूप बौद्ध ऐसा नहीं करते थे। वे बहुजन लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं रखते थे। 

बहरहाल, शांति स्वरूप बौद्ध दिल्ली में होने वाले बहुजन आयोजनों की शान हुआ करते थे। वे जब कहते कि “हम आंबेडकरवादी हैं, यह सीना फौलादी है” तब पूरा सभागार एक ऊर्जा से भर जाता था। अब इस तरह के अहसास से बहुजन समाज वंचित हो गया है। लेकिन यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उन जैसे लोगों के विचार कभी नहीं मरते। वे हमेशा लोगों के मन में विद्यमान रहते हैं।

(संपादन : अनिल/अमरीश)

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  1. omprakash kashyap Reply
  2. Dr Sanjay Gajbhiye Reply

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