सजीव उपन्यास के रूप में बहुजन नायक शंकर सिंह का जिंदगीनामा

यह बहुजनों की बोलचाल की भाषा मे रचा गया कथानक है, जो अपनी पूरी सहजता के साथ उपस्थित रहता है। यह एक ग्रामीण पृष्ठभूमि के पिछड़े वर्ग के साधारण सामाजिक कार्यकर्ता की असाधारण कहानी की सहजतम अभिव्यक्ति है, जिसमें शब्दाडंबर नहीं है। बता रहे हैं एस. आर. मेहरा

आमतौर पर उत्तर भारत के जातिवादी समाज में कठपुतलियां बनाना और चलाना निम्नस्तरीय काम माना जाता है। इनको को स्वतः ही निम्न समुदाय में परिगणित कर लिया जाता है। भंवर मेघवंशी द्वरा लिखित ‘कितनी कठपुतलियाँ’ उपन्यास इस टैबू को तोड़ने का भी काम करता है कि कठपुतलियां चलाना कोई साधारण काम या भाषण फेंकना नहीं है। इसके लिए सिद्धहस्तता आवश्यक है, जो किसी भी समुदाय या जाति का मानव कर सकता है। राजनैतिक, सामाजिक कार्यक्रमों में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले लोक कलाकारों को जनता का मनोरंजन करनेवाला माना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जन-आंदोलनों में सांस्कृतिक उपकरणों का योगदान अलहदा होता है। ये वस्तुतः आंदोलनकारी ही होते हैं, क्योंकि बिना आंदोलन का हिस्सा हुए ना गीत गाये जा सकते हैं और ना ही नारे गढ़े जा सकते हैं। 

इस उपन्यास में कई कठिन, तीखी और तंज लहजे वाली बातें लेखक कठपुतलियों के माध्यम से कहलवाता है। इसमें कठपुतलियां कभी व्यंग्य रूप में तो कभी दर्शनशास्त्र की बाते करती हैं। कठपुतलियां कहती हैं कि हमारे पास पेट है, पर भूख नहीं। अन्यथा हमने भी काफी पहले भूख से प्राण त्याग दिए होते। पाठक स्तब्ध रह जाते हैं कि कितनी दृढ़ व गूढ़ बातें बहुत ही सरल लहजे में कठपुतलियां बेबाकी से कह जाती हैं।  

आदिवासी समुदाय में मौजूद गरीबी और दारुण भूख का चित्र भी बार बार ध्यान खींचता है। सारे अभावों के बावजूद भी आदिवासी लोगों की ईमानदार खुद्दार ज़िंदगी का सजीव चित्रण भी इस उपन्यास की एक खासियत है।

समीक्षित पुस्तक ‘कितनी कठपुतलियाँ’  का कवर पृष्ठ

अब तक यह देखा गया है कि लोग कठपुतलियों को चलाते हैं, पर ‘कितनी कठपुतलियाँ’ उपन्यास की कठपुतलियां लोगों को चलाती परिलक्षित होती हैं। वे पूरे उपन्यास का नरेशन करती है। ज़िंदा लोगों, असली घटनाओं की हकीकत को लिखना और लोगों को नामज़द करते हुए लिखने का जोख़िम लेखक ने उठाया है। हालांकि लेखक ने खुद भी इसे ज़िंदा उपन्यास कहा है। वैसे तो इसे जीवनी कहा जाता तो भी उपयुक्त ही था। 

लेखक ने यह भी स्वीकार किया कि इस उपन्यास में काल्पनिकता का अभाव दिखेगा, क्योंकि उपन्यास के नायक शंकर सिंह की ज़िंदगी इतनी विविध आयामी और बहुरंगी है कि उसमें कल्पना के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। इसे पढ़ते हुए बरबस ही महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की के कालजयी उपन्यास ‘मां’ की याद आ जाती है। साधारण जन-सामान्य की भाषा को इसकी साहित्यिक कमजोरी भी कहा जा सकता है और ताकत भी, क्योंकि एक नया पाठक वर्ग उभर रहा है जो क्लिष्ट शब्दावली और विकट शैली से अपरिचित है। अगर कोई पाठक इसमें साहित्य का सौंदर्य शास्त्र व शिल्प ढूंढने की कोशिश करेगा तो उसे निराश होना पड़ेगा।

यह बहुजनों की बोलचाल की भाषा मे रचा गया कथानक है, जो अपनी पूरी सहजता के साथ उपस्थित रहता है। यह एक ग्रामीण पृष्ठभूमि के पिछड़े वर्ग के साधारण सामाजिक कार्यकर्ता की असाधारण कहानी की सहजतम अभिव्यक्ति है, जिसमें शब्दाडंबर नहीं है। कर्म का ताप है, जिसके सामने सिद्धांत फीके दिखते हैं। जो लोग सामाजिक बदलाव के कार्य को कुलीन, अभिजात्य, सवर्ण समुदाय की भलमनसाहत और त्याग के रूप में प्रस्तुत करते हैं, उनके लिए यह उपन्यास एक सबक है ।

उपन्यास का नायक शंकर सिंह हजारों लोगों के लिए किसी मास्टर ऑफ सोशल वर्क की जीवंत यूनिवर्सिटी बन जाता है। ऐसी किताबें समाज शास्त्र के पाठ्यक्रमों के हिस्सा बननी चाहिए और हर राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता को इसे पढ़ना चाहिये, ताकि वे बदलाव के कामों के असली अर्थ को समझ सकें।

‘कितनी कठपुतलियाँ’ पढ़ते हुए पाठक इस कहानी के साथ एकाकार भी हो जाता है। वह भूख, गरीबी व अभावों को देख आक्रोशित होता है तो व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों के विरुद्ध नारे लगाने के लिए उसकी भी मुट्ठियाँ भिच जाती है। इस उपन्यास में जन-आंदोलनों में लगने वाले नारों, गाये जाने वाले गीतों, नाटकों, कविता कहानियों व दृष्टांतो की भी भरमार है। ये सब अपनी सहजता से आते हैं। कहीं भी जबरन ठूंसे हुए नहीं लगते हैं। लेखक ने इन गीतों, नाटकों व नारों के मूल लेखकों का नामोल्लेख करके अपनी बौद्धिक ईमानदारी को भी बरकरार रखा है। जो हिन्दी भाषी लोग हैं, उनके लिए इन देशज शब्दों को समझ पाना कभी-कभार कठिन हो सकता है। परंतु, उपन्यास की निरंतरता इससे बाधित नहीं होती है।

इस उपन्यास के ज़रिए जानने के हक़ के आंदोलन और उसके अगुआ रहे अरुणा रॉय, शंकर सिंह ,निखिल डे और उनके साथियों के सामूहिक काम की भी झलक मिल जाती है। सामाजिक कामों में सामूहिकता की जरूरत भी यह किताब स्थापित करती है। यह उपन्यास सूचना का अधिकार आंदोलन के पूरे संघर्ष का साक्ष्य है। लेखक भंवर मेघवंशी का पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता होना और उपन्यास में वर्णित मजदूर किसान शक्ति संगठन का फुल टाइमर होना भी इसे प्रामाणिक बनाता है। 

बहुजन समाज मे पैदा हो कर उसी के लिए जीवन लगा देने वाले शंकर सिंह जैसे समाजकर्मियों को बतौर नायक स्थापित करने का यह श्लाघनीय काम बहुजन चिंतक भंवर मेघवंशी ने किया है। यह काबिलेतारीफ है ।

यह उपन्यास वर्तमान के सापेक्ष है। हम देख रहें हैं कि किस प्रकार लोकतंत्र मात्र कुछेक स्वघोषित विश्व-नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है। भारत की एक बड़ी जनसंख्या आज भी भुखमरी की शिकार है। मीडिया आम बुनियादी खबरों को जमीन में गाड़ चुकी हैं,बड़ी-बड़ी स्वायत्त और संवैधानिक संस्थाओं को अंगुलियों पर विभिन्न कलाओं और मनमोहक अंदाज में नचाया जा रहा है। 

समीक्षित पुस्तक : कितनी कठपुतलियाॅं

लेखक : भंवर मेघवंशी

प्रकाशक : रिखिया प्रकाशन, भीलवाड़ा

मूल्य : 295 रुपए

पुस्तक प्राप्ति के लिए संपर्क : 9649399527

(संपादन : नवल/अमरीश)


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