आरएसएस के नए हनुमान चिराग पासवान के निशाने पर नीतीश

भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री व दलित नेता रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान बिहार के पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने आरएसएस का आसरा लिया है। उनके पहले नीतीश कुमार और स्वयं रामविलास पासवान ने भी संघ का दामन थामा है। यह अलग बात है कि इन दोनों ने स्वयं को हनुमान घोषित नहीं किया। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

पहले की तरह, यह बिहार विधानसभा चुनाव भी कई मिथकों को तोड़ने वाला साबित होगा। मसलन, जिस कांग्रेस को पराजित कर और जिस भाजपा के सहयोग से लालू प्रसाद 1990 में मुख्यमंत्री बने थे, वे दोनों अब नई भूमिकाओं में हैं। राजद के साथ महागठबंधन में कांग्रेस दूसरा सबसे बड़ा घटक दल है। वहीं भाजपा, लालू प्रसाद की पार्टी के खिलाफ है और इस चुनाव में एक नयी परिपाटी डाल रही है। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की भाजपा बराबर की हिस्सेदार है। जदयू 122 और भाजपा 121 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं केंद्र में भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बिहार में भले ही एनडीए का हिस्सा नहीं है लेकिन चिराग पासवान स्वयं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बता रहे हैं।

दरअसल, चिराग ने स्वयं को नरेंद्र मोदी का हनुमान बेवजह नहीं बताया है। लोजपा ने जदयू के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल रखा है। महत्वपूर्ण यह है कि उसने अपने टिकट पर भाजपा के कद्दावर नेताओं राजेंद्र सिंह, रामेश्वर चौरसिया, उषा विद्यार्थी आदि को उम्मीदवार बनाया है। कई भाजपा नेताओं जैसे पार्टी के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव और बिहार चुनाव के लिए खास तौर पर तैनात किए गए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अलावा राज्य के भाजपा नेताओं ने चिराग पासवान की पार्टी को ‘वोटकटवा’ कहा है।

चिराग ने स्वयं को नरेंद्र मोदी का हनुमान कहकर अपने विरोधियों को फिलहाल खामोश कर दिया है। सोलह अक्तूबर को जारी अपने एक बयान में उन्होंने कहा कि वे नरेंद्र मोदी के हनुमान हैं और उनकी तस्वीर अपने दिल में रखते हैं। इसके पहले, भाजपा नेताओं ने कहा था कि लोजपा को मोदी की तस्वीर का उपयोग करने की इजाजत नहीं है। 

लोजपा नेता चिराग पासवान व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

बिहार के राजनीतिक इतिहास पर गौर करें तो हम पाते हैं कि लोजपा का शीर्ष नेतृत्व कभी एक विचारधारा के साथ नहीं रहा। इस पार्टी के संस्थापक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को राजनीतिक विश्लेषक  ‘मौसम विज्ञानी’ कहते थे। रामविलास पासवान ने जनता दल के विखंडन के बाद लोजपा नाम से अपनी पृथक पार्टी बनाई थी। पहले नीतीश कुमार जनता दल से अलग हुए और 1995 के विधानसभा चुनाव में समता पार्टी बनाकर लालू प्रसाद के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे। चुनाव में पराजय के बाद नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी का नाम और विचारधारा दोनों बदल डाली। उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया तथा अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री पद धारण किया। तब तक शरद यादव और जार्ज फर्नांडीस भी जनता दल से अलग होकर जदयू में शरीक हो गए।

अब बारी रामविलास पासवान की थी। बिहार में लालू प्रसाद अपना एकछत्र राज्य कायम करने में कामयाब हो चुके थे। सूबाई राजनीति में रामविलास पासवान के सामने लालू प्रसाद के सहयोगी के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा नीतीश कुमार और शरद यादव की तरह बढ़ चुकी थी। उन्होंने अपनी पार्टी का गठन किया और पाला बदलकर भाजपा के साथ चले गए।

लोजपा के लिए फरवरी, 2005 का विधानसभा चुनाव बहुत खास साबित हुआ। यह वह वर्ष था जब रामविलास पासवान ने अपनी पार्टी का दलितों की पार्टी का मुखौटा निकाल फेंका। उन्होंने अपनी पार्टी में अगड़ी जातियों के उन नेताओं को शामिल किया जो भाजपा, जदयू और राजद सभी से नाराज थे। साथ ही उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं का भी ध्यान रखा। अगड़ी जातियों के असंतुष्ट, मुसलमान और दलितों के समर्थन से इस चुनाव में लोजपा को 12.6 प्रतिशत वोट मिले। यह कांग्रेस को मिले 5 फीसदी वोटों से अधिक तो था ही, सीटों के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण था। इस विधानसभा चुनाव में लोजपा ने 178 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। अधिकांश उम्मीदवार राजद, भाजपा और जदयू के असंतुष्ट थे या वे लोग थे जिन्हें इन पार्टियों ने टिकिट नहीं दिया था। इस चुनाव में लोजपा के उम्मीदवार 29 सीटों पर विजयी रहे। जबकि राजद 75, भाजपा 37, कांग्रेस 10 और जदयू 55 सीटें जीतने में कामयाब रहीं। नतीजन रामविलास पासवान किंगमेकर की भूमिका में आ गए। वे एक दलित (अपने भाई) व एक मुसलमान को उप मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर अड़ गए। राजद के हाथ से बाजी निकल गयी। इसके बाद अक्टूबर, 2005 में दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और 15 साल से चले आ रहे लालू राज का समापन हुआ।

दरअसल, रामविलास पासवान द्वारा बिहार में दलित पार्टी के गठन की पृष्ठभूमि बेहद दिलचस्प है। इसका विस्तृत विश्लेषण सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार ने ‘बिहार की चुनावी राजनीति : जाति वर्ग का समीकरण (1990-2015)’ शीर्षक अपनी पुस्तक में किया है। उनके मुताबिक, बिहार के दलित मतों में बिखराव 1995 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद से बहुत साफ-साफ देखा जा सकता है। मसलन 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी को 31 फीसदी दलितों ने वोट किया तो भाजपा को 28 फीसदी ने। वहीं वर्ष 1998 में यह हिस्सेदारी क्रमश: 32 व 22 रही। लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान के साथ आने के बाद भाजपा को मिलने वाले दलित वोटों में जबरदस्त इजाफा हुआ। भाजपा गठबंधन को 44 फीसदी व लालू प्रसाद की पार्टी राजद को 39 फीसदी दलित वोट मिले। भाजपा गठबंधन के लिहाज से बात करें तो यह दोगुनी वृद्धि थी। इस चुनाव के बाद एनडीए में रामविलास पासवान की जगह बन गयी और बिहार की राजनीति में भी। कोई भी गठबंधन उन्हें हाशिए पर रखकर आगे नहीं बढ़ सकता था। 

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उनके महत्व को स्वीकारते हुए राजद व कांग्रेस ने 2004 लोकसभा चुनाव में लोजपा को भी अपने गठबंधन में शामिल किया और एनडीए को करारी मात दी। लेकिन 2005 के फरवरी माह में हुए विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने खुद को एनडीए और यूपीए दोनों से अलग कर लिया। यह रामविलास पासवान का  लिटमस टेस्ट था जिसका एक बार परिणाम उनके पक्ष में गया तो दूसरी बार यानी अक्टूबर, 2005 में उन्हें निराशा मिली। परंतु यह प्रयोग असफल प्रयोग नहीं हुआ। 

वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में दलितों का मत विभाजन

जातिराजद गठबंधनराजग (एनडीए) गठबंधनकांग्रेसअन्य दल
पासवान5521816
अन्य दलित जातियां1635544

स्रोत : ‘बिहार की चुनावी राजनीति : जाति वर्ग का समीकरण (1990-2015)’, संजय कुमार

वहीं वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में लोजपा और राजद के बीच गठबंधन था। कांग्रेस यह समझ चुकी थी कि लालू प्रसाद के दिन लद गए हैं, लिहाजा उसने खुद को गठबंधन से अलग रखा। इस चुनाव में दलित मतों का बंटवारा दलितों के बीच उसकी उपस्थिति को स्पष्ट करता है। यह इसके बावजूद कि इस चुनाव में राजद-लोजपा को करारी मात मिली तथा भाजपा-जदयू को आशा से अधिक सफलता।  

बहरहाल, चिराग पासवान अपने पिता की राह पर चल रहे हैं। यह विधानसभा चुनाव भी उनके लिए लिटमस टेस्ट ही है। ठीक वैसे ही जैसे फरवरी, 2005 में रामविलास पासवान ने खुद को अगड़ी जातियों व दलित वोटारों के सहारे आजमाया था। बस एक अंतर है। तब रामविलास पासवान ने खुद को किसी का हनुमान घोषित नहीं किया था!

(संपादन : अनिल/अमरीश)


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