बिहार विधानसभा चुनाव : सामाजिक न्याय से तौबा!

1990 के बाद यह पहला मौका है जब लालू प्रसाद, शरद यादव और रामविलास पासवान चुनाव में अनुपस्थित हैं। लेकिन क्या यही वजह है जिसके कारण सामाजिक न्याय इस बार के विधानसभा चुनाव में हाशिए पर है? नवल किशोर कुमार का विश्लेषण

चुनाव आयोग द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव-2020 की औपचारिक घोषणा के साथ ही सियासी हलचल तेज हो चुकी है। गठबंधनों में उठापटक का दौर अभी तक जारी है। मसलन, बिहार में नीतीश कुमार नीत एनडीए गठबंधन से लोक जनशक्ति पार्टी अलग हो गयी है। लोजपा सांसद और संसदीय समिति के अध्यक्ष चिराग पासवान ने एलान कर दिया है कि वे केंद्र में एनडीए का हिस्सा बने रहेंगे लेकिन बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड का विरोध करेंगे। उनके इस निर्णय को बिहार में अब सियासी नारे में तब्दील किया जा चुका है। यह नारा है – “मोदी से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं”। उधर उपेंद्र कुशवाहा, जो हाल तक राजद नीत महागठबंधन का हिस्सा थे, बहुजन समाज पार्टी व एक अन्य नवजात दल के साथ गठबंधन बना चुके हैं। यह गठबंधन भी राज्य की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। इन सियासी हलचलों के बीच एक बात जो साफ-साफ नजर आ रही है वह यह है कि इस बार के चुनाव में सामाजिक न्याय कोई मुद्दा नहीं है। सबसे खास बात यह कि इस बार के चुनाव में सामाजिक न्याय के अग्रणी नेताओं में शुमार रहे लालू प्रसाद, शरद यादव और रामविलास पासवान अनुपस्थित रहेंगे। लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में जेल में हैं तथा शरद यादव व रामविलास पासवान स्वास्थ्य कारणों से चुनावी राजनीति से अलग हैं। 

सामाजिक न्याय की यह है प्रचलित परिभाषा 

असल में बिहार में सामाजिक न्याय की परिभाषा को सीमित कर दिया गया है। सामान्य तौर पर सामाजिक न्याय का मतलब वही है जो संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर ने बतलाया है। इससे तात्पर्य वंचित जातियों व समुदायों की समाज में समान भागीदारी सुनिश्चित करना है। 1990 में मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू होने के बाद सामाजिक न्याय महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने आया। इसके तहत सरकारी नौकिरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण शामिल था। आरंभिक दिनों में इस मुद्दे में भूमि सुधार के मसले भी शामिल थे, जिसका मकसद भूमिहीनों को वास व खेती हेतु जमीन उपलब्ध कराना था। 

पिछली बार भागवत की टिप्पणी रही महत्वपूर्ण

पूर्व के चुनावों पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि 1990 से लेकर हुए तमाम चुनावों में सामाजिक न्याय का मुद्दा अहम रहा। लगभग सभी चुनाव इसी मुद्दे को केंद्र में रखकर लड़े गए। पिछली बार, यानी 2015, में हुए विधानसभा चुनाव के समय यह मुद्दा अन्य सभी मुद्दों पर भारी पड़ा। हालांकि इसकी एक वजह यह भी रही कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने बयान में आरक्षण संबंधी कानून की समीक्षा करने की बात कही थी और उनके इसी बयान को आधार बनाते हुए लालू प्रसाद ने उन्हें आड़े हाथों लिया। 

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और चिराग पासवान

सनद रहे कि पिछली बार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार लालू प्रसाद के दायीं तरफ बगल में खड़े रहे और वह चुनाव लालू प्रसाद के नेतृत्व में लड़ा गया। यह इसके बावजूद कि उस चुनाव में महागठबंधन ने नीतीश कुमार को अपना चेहरा माना था। तब कांग्रेस के साथ मिलकर राजद व जदयू ने भाजपा के साठ सीटों पर समेट दिया था। लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से नाता तोड़कर रातोंरात भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बना ली। अब परिणाम सामने है। नीतीश कुमार इस बार भाजपा के साथ एनडीए गठबंधन में हैं। 

सामाजिक न्याय का मुद्दा पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में महत्वपूर्ण मुद्दा रहा। राजद की ओर से तेजस्वी यादव ने आरक्षण की सीमा 70 फीसदी तक बढ़ाने, क्रीमीलेयर के खात्मे और जातिगत जनगणना के सवाल खड़े किए। वहीं दूसरी ओर एनडीए की ओर से भी इन सवालों को लेकर तेजस्वी यादव को घेरने की सफल कोशिश की गई। परंतु, इस बार कोई भी दल सामाजिक न्याय के इन सवालों को लेकर मुखर नहीं है।

नीतीश कुमार का सामाजिक न्याय लालू से अलहदा

एक मुद्दे के रूप में सामाजिक न्याय 2005 तक महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहा। लेकिन इस मुद्दे को दोयम दर्जे का मुद्दा बनाने में नीतीश कुमार सफल रहे और उन्होंने अधोसंरचना विकास, भ्रष्टाचार व विधि-व्यवस्था को सामने रखकर लालू प्रसाद को मात दी। अपने करीब 15 वर्षों के कार्यकाल के दौरान नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय की एक नयी अवधारणा रखी। उन्होंने दलितों को बांटा और महादलित बना दिया। इसी तर्ज पर उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग को तवज्जो देते हुए सामाजिक न्यायवादियों की एकता को खंडित कर दिया। इसका लाभ उन्हें मिला और भाजपा के साथ मिलकर सत्ता में बने रहे।

वर्ष 1991 में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की तस्वीर

एक तरह से नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद की सामाजिक न्याय की परिभाषा को बदल दिया। ओबीसी की ऊंची जातियों को नीतीश कुमार ने उनके हाल पर छोड़ते हुए अपना पूरा ध्यान अति पिछड़ा वर्ग पर लगाए रखा। वहीं पसमांदा मुसलमानों की राजनीति को उन्होंने हवा दी। जबकि लालू प्रसाद की सामाजिक न्याय की परिभाषा सुस्पष्ट नहीं थी। वे तमाम दलितों और ओबीसी को मिलाकर राजनीति करते रहे। मुसलमानों में वर्गीकरण को उन्होंने तरजीह नहीं दी। हालांकि अपने कार्यकाल में उर्दू और मदरसों के विकास के लिए उन्होंने कई योजनाओं की शुरूआत की।

तेजस्वी ने भी बदली अपने पिता द्वारा स्थापित परिभाषा

सामाजिक न्याय की परिभाषा को जब नीतीश कुमार ने दूसरी दिशा में मोड़ दिया तब तेजस्वी यादव ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। 2015 के विधानसभा चुनाव के समय उन्होंने आर्थिक न्याय की बात कही। उनका मानना है कि उनके पिता लालू प्रसाद ने 15 वर्षों के अपने शासनकाल में बिहार में दलितों और ओबीसी को सामाजिक रूप से सशक्त बनाया।अब उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। तेजस्वी यादव ने अपने पिता की राजनीति को खारिज तो नहीं किया लेकिन उसे एक नयी दिशा जरूर दी। इसका असर राजद के संगठन में भी साफ तौर पर दिखता है। उन्होंने ऊंची जातियों के लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया व जिम्मेदारियां दी है। 

उपेंद्र कुशवाहा भी सामाजिक न्याय से दूर

सामाजिक न्याय की राजनीति के सहारे राजनीति में जगह बनाने वाले तथा एक समय बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे उपेंद्र कुशवाहा भी अब सामाजिक न्याय से दूर हो गए हैं। नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री के पद पर रहते हुए कुशवाहा ने शिक्षा को मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने बिहार में राजनीतिक गोलबंदी के प्रयास भी तेज किए। इसलिए पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव के समय जब भाजपा ने नीतीश कुमार को अधिक महत्व दिया तब उन्होंने खुद को एनडीए से अलग कर लिया और महागठबंधन में शामिल हो गए। हालांकि इसका लाभ उन्हें नहीं मिला। वे अपनी सीटें भी हार गए।

रामविलास पासवान के लिए सामाजिक न्याय कोई मुद्दा नहीं रहा 

बिहार की राजनीति में करीब 5 दशकों से सक्रिय रामविलास पासवान की पहचान उस शख्स के रूप में रही है, जिसने संसद में मंडल कमीशन से संबंधित विधेयक प्रस्तुत किया था। तब वे विश्वनाथ प्रताप सिंह मंत्रिमंडल में समाज कल्याण मंत्री थे। उन दिनों ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने का देश भर में ऊंची जातियों के लोगों ने विरोध किया था तब रामविलास पासवान उन अग्रणी नेताओं में थे, जिन्होंने आलोचकों को मुखर होकर जवाब दिया। लेकिन बाद के दिनों में रामविलास पासवान की छवि अस्थिर नेता की रही है। बिहार के सियासी गलियारे में उन्हें मौसम वैज्ञानिक की संज्ञा दी जाती है, जिन्हें इसका पूर्व अहसास रहता है कि कौन सी पार्टी जीत हासिल करने वाली है और वे इसके आधार पर ही गठबंधन करते हैं। अब तो हालात यह है कि पासवान सामाजिक न्याय के सवालों की चर्चा भी नहीं करते।

रामविलास पासवान की छवि चाहे जैसी भी हो, वे प्रासंगिक बने रहे हैं। इस बार का विधानसभा चुनाव अलग है। वे अस्पताल में भर्ती हैं और उनके बदले उनके पुत्र चिराग पासवान ने पार्टी की कमान संभाल ली है। चिराग ने भी सामाजिक न्याय के सवालों को दूर रखा है। इस बार के चुनाव में वे ‘बिहारी फर्स्ट’ अभियान चला रहे हैं। 

बहरहाल, अभी किसी भी राजनीतिक दल अथवा गठबंधन ने अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है। लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वाकई इस बार का चुनाव सामाजिक न्याय को हाशिए पर रखकर लड़ा जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो इसके परिणाम क्या होंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

(संपादन : अमरीश)


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