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छत्तीसगढ़ : दलितों को तालाब के उपयोग पर औकात में रहने की धमकी

मामला छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का है। दो दलित जातियों को तालाब से दूर रहने के संबंध में धमकी दी गई है। इसे लेकर स्थानीय दलितों में आक्रोश है। तामेश्वर सिन्हा की खबर

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने वर्ष 1928 में महाड़ सत्याग्रह किया था। यह सत्याग्रह इसलिए था ताकि दलितों को तालाब के पानी का उपयोग करने दिया जाय। इस सत्याग्रह के करीब 92 साल बाद भी देश में द्विज ताकतों की मानसिकता में बदलाव नहीं आया है। मामला छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना थाना क्षेत्र के ग्राम सिंघनपुर छुईपाली का है, जहां द्विजवादियों की घृणित मानसिकता उजागर हुई है। इन तत्वों ने अनुसूचित वर्ग में शामिल दो जातियों गांड़ा व घसिया जाति के लोगों को गांव के तालाब से दूर रहने को कहा है। इस बाबत तालाब के घाट यानी पचरी की दीवार पर धमकी लिख दिया गया है, जिसमें औकात में रहने की बात कही गयी है। 

छत्तीसगढ़ में गांड़ा और घसिया जातियों के लोगों के साथ द्विजवादी दोयम दर्जें का व्यवहार करते हैं। छुईपाली निवासी दलित ग्रामीण सुरेंद्र चौहान ने बताया कि अज्ञात लोगों ने गांव में स्थित तालाब की पचरी की दीवाल पर चूना से लिखा है कि “गाड़ा-घसिया साइड में नहाएं, यहां पचरी पर मत नहाएं, और अपनी औकात में रहें”। 

तालाब के घाट की दीवार लिखी गयी धमकी

हालांकि इस बात की सूचना सरपंच विजय साहू को दी गई और उन्होंने घाट की दीवार पर लिखे अपमानजनक टिप्पणी व धमकी को मिटवा दिया है। वहीं ग्रामीण रवींद्र चौहान ने बताया कि यह हमारे गांव के किसी व्यक्ति द्वारा लिखा गया है, जिसके विरोध में लोग आक्रोशित हैं। घटना की पुष्टि करते हुए उपसरपंच ने बताया कि जिस किसी ने जातिसूचक शब्दों का उपयोग कर धमकी दी है, उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। 

विरोध में एकजुट हुए गांव के दलित-बहुजन

वहीं, ग्राम पंचायत के सरपंच विजय साहू ने बताया कि उन्होंने 24 घंटे का समय दिया है जिसमे यदि धमकी देने वाला गांव का है तो वह अपना गुनाह कबूल कर ले और समाज से माफी मांग ले। नहीं तो इस मामले की प्राथमिकी उनके द्वारा थाने में दर्ज करवाई जाएगी। जबकि बसना थाना प्रभारी लेखराम ठाकुर ने बताया कि उनकी जानकारी में मामला आया है। अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत हुई है। लेकिन अभी तक एफआईआर दर्ज नही की गई है। मामले की जांच की जा रही है।

उधर इस मामले को लेकर दलित समाज आक्रोशित है। चौहान सेना से जुड़े चातुरी नंद ने कहा कि संविधान विरोधी कृत्य करने वाले जातिवादी लोगों पर कार्रवाई आवश्यक है। ऐसे लोगों को कतई माफ़ी नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय प्रशासन ने आरोपियों की गिरफ्तारी नही की तो चौहान सेना उग्र आन्दोलन को बाध्य होगी। आगे चातुरी नंद ने कहा कि यह जिले में छुआछूत और जातिगत भेदभाव की घटना का पहला मामला नही है। इससे पहले भी बरिहापाली गांव में गांड़ा जाति के लोगों के श्मशान घाट पर भी जातिवादी गुंडों ने कब्जा कर लिया था, जिसका मामला अबतक न्यायालय में विचाराधीन है। उन्होंने बताया कि इस घटना के विरोध में चौहान सेना 21 अक्टूबर को आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करेगी। 

वहीं दलित कार्यकर्ता संजीत बर्मन ने कहा कि जातिगत उत्पीड़न की घटनाएं छत्तीसगढ़ में भी लगातार होती रही हैं, लेकिन मामले प्रशासन द्वारा दबा दिए जाते हैं। अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण थानों की हालात बुरी है। वैसे तो इन थानों की स्थापना का मकसद ही ऐसे मामलों में कार्रवाई करना है लेकिन वे करते इसके विपरीत हैं तथा जातिवादी टिप्पणियों व अत्याचार करने वालों को संरक्षण प्रदान करते हैं। जब कभी कोई घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है तब ये हरकत में आते हैं। यह अत्यंत ही अफसोसजनक है। राज्य सरकार को ऐसे मामले में कठोरतम कार्रवाई करनी चाहिए। 

(संपादन : नवल/अमरीश)


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लेखक के बारे में

तामेश्वर सिन्हा

तामेश्वर सिन्हा छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार हैं। इन्होंने आदिवासियों के संघर्ष को अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाया है और वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रिपोर्टिंग करते हैं

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