बीते 8 सितंबर, 2020 को रात करीब 8 बजे झारखंड के मानवाधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी को एनआईए की टीम ने भीमा-कोरेगांव मामले में रांची के नामकुम स्थित उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया तथा उन्हें अपने साथ मुंबई ले गई। उनकी गिरफ्तारी रांची सहित देश के कई हिस्सों में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं तथा यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या आदिवासियों के हितों की बात करना गुनाह है?
हेमंत सोरेन ने उठाया सवाल
स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ट्विटर पर जारी संदेश में उन्होंने कहा है कि “गरीब, वंचितों और आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले 83 वर्षीय वृद्ध स्टेन स्वामी को गिरफ्तार कर केंद्र की भाजपा सरकार क्या संदेश देना चाहती है? अपने विरोध की हर आवाज को दबाने की ये कैसी जिद?” वहीं सामाजिक कार्यकर्ता एवं नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि “स्टेन स्वामी झारखंड में विस्थापन के विरोध में आदिवासियों और वंचितों की हमेशा से आवाज बनते रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब किसी को फर्जी तरीके से फंसाया गया है। करीब 6 हजार से अधिक आदिवासियों को नक्सली के नाम पर फर्जी मामलों में आरोपित किया गया है।” हेरेंज यहीं नहीं रूकते। वे कहते हैं कि “आज केंद्र सरकार पूरी तरह कारपोरेट घरानों की कतपुटली बन गई है। कारपोरेट घरानों का मकसद आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना है। इसमें स्टेन स्वामी जैसे आदिवासियों के पक्षधर बाधक बन रहे हैं। इसीलिए केंद्र की भाजपा सरकार उनकी आवाज को दबाने के लिए ऐसी ओछी राजनीति कर रही है।”

क्या अपराध है फादर स्टेन स्वामी का? पूर्व कांग्रेसी मंत्री थियोडोर किडो ने पूछा सवाल
वहीं कांग्रेस के पूर्व विधायक एवं पूर्व मंत्री थियोडोर किडो कहते हैं कि “करीब 83 साल के सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों के हक-अधिकार के लिए लगा दिया, वे अपराधी हैं? क्या आदिवासियों के हक की बात करना और आवाज उठाना भाजपा सरकार की निगाह में गुनाह है?” उनके मुताबिक, स्टेन स्वामी हमेशा सच के साथ खड़े रहे हैं। यही बात सरकार को पच नहीं रही है।
जबकि सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के पूर्व सदस्य वाल्टर कंडुलना का मानना है कि “फादर स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी, किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है। अगर स्वामी से पूछताछ ही करनी थी तो झारखंड में ही एनआईए के कार्यालय में किया जा सकता था। 83 साल के वृद्ध को, वह भी इस कोरोना संक्रमण के काल में गिरफ्तार करके मुंबई ले जाना अमानवीयता की पराकाष्ठा है।”
अविलंब रिहा करे सरकार : दयामनी बारला
वहीं आदिवासी मामलों की जानकार दयामनी बारला कहती हैं कि “भीमा कोरेगांव केस के बहाने फादर स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी, आदिवासी व दलित समुदाय के हक-अधिकार के पक्ष में खड़ा रहने वालों के सरकार की ओर से एक चेतावनी है कि उनका भी यही हाल हो सकता है, अगर वे सच का साथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन हम सच का साथ कतई नहीं छोड़ने वाले हैं और इस गिरफ्तारी का विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि उन्हें अविलंब रिहा किया जाय। नहीं तो पूरे झारखंड में इसके विरोध में आंदोलन किया जाएगा।”
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अमानवीय कृत्य : बिनोद सिंह, माले विधायक
अपनी प्रतिक्रिया में भाकपा-माले के विधायक बिनोद सिंह कहते है कि “जब फादर स्टेन स्वामी को एनआईए की टीम दो बार पूछताछ कर चुकी है तब कोरोना काल में पूछताछ के लिए ले जाना बिल्कुल निंदनीय है। एक ऐसे बुजुर्ग जिनकी उम्र 83 वर्ष से भी ज्यादा हो चुकी हो, पूछताछ के नाम पर उन्हें प्रताड़ित करना अमानवीय कृत्य है। लिहाजा हमारी मांग है कि फादर स्टेन स्वामी की उम्र को देखते हुए तथा कोरोना काल की जटिलता को ध्यान में रखकर एनआईए अपनी दमनात्मक कार्रवाई पर रोक लगाए। फादर को बाइज्जत व सही सलामत वापस भेजे।”

पांच दशकों से झारखंड के आदिवासियों के लिए काम कर रहे केरल के फादर स्टेन स्वामी
ध्यातव्य है कि मूल रूप से केरल के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी करीब पांच दशक से झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। विशेष रूप से वे विस्थापन, कंपनियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने, विचाराधीन कैदियों को रिहा कराने और पेसा कानून लागू करवाने आदि के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि जुलाई, 2018 में झारखंड की खूंटी पुलिस द्वारा पत्थलगड़ी आंदोलन मामले में फादर स्टेन स्वामी और कांग्रेस के पूर्व विधायक थियोडोर किड़ो सहित 20 अन्य लोगों पर राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था, जिसे हेमंत सोरेन ने सीएम बनने के बाद वापस ले लिया था।
हालांकि भीमा-कोरेगांव मामले में 12 जुलाई 2019 को महाराष्ट्र पुलिस की आठ सदस्यीय टीम ने स्टेन स्वामी के घर पर छापा मारा था। लगभग चार घंटों तक उनके कमरे की छानबीन की गई थी। इसके बाद उनके कंप्यूटर के हार्ड डिस्क और इंटरनेट मॉडेम आदि को जब्त कर लिया गया था। इसके पहले 28 अगस्त, 2018 को भी महाराष्ट्र पुलिस ने स्टेन स्वामी के कमरे की तलाशी ली थी।
क्या है भीमा-कोरेगांव मामला?
बता दें कि भीम कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित छोटा सा गांव है। यहां 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना (जिसमें 500 महार सैनिक थे) ने बाजीराव पेशवा द्वितीय की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था। दलित इसे जीत के रूप में मनाते हैं। वर्ष 2018 में जीत की 200वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए भारी संख्या में देश भर के दलित समुदाय के लोग जुटे थे। इस दौरान दलितों और आरएसएस के मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गयी थी। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गयी, जबकि कई लोग घायल हो गये थे।
(संपादन : नवल)
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