तेजस्वी यादव : रह गई अनेक आंच की कसर

बिहार चुनाव के परिणाम सामने आ चुके हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में नई सरकार के गठन की अब महज औपचारिकता शेष है। इस चुनाव में तेजस्वी प्रसाद यादव की मेहनत को विजयी पक्ष भी स्वीकार कर रहा है। लेकिन परिणाम बताते हैं कि उनके प्रयास में कसर रह गई

विश्लेषण

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद 125 सीटें जीतकर जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन चौथी बार नीतीश कुमार की नेतृत्व में सरकार बनाने को तैयार है वहीं महागठबंधन 110 सीटें पाने के बाद बहुमत के जादुई आंकड़ों को पाने में विफल होकर भी लोक विमर्श के केंद्र में है। विशेषकर महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने जिस तरह से चुनाव की कैंपेनिंग की वह बिहार में अभूतपूर्व रहा। वह एक उभरते हुए और संजीदा नेता के तौर पर अपनी छवि गढ़ने में सफल रहे। 

ऐसा पहली बार हुआ जब बिहार में किसी दल ने अपने पूरे चुनाव प्रचार को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती-किसानी और भ्रष्टाचार जैसे निहायत ही जन सरोकार से जुड़े मुद्दे से भटकने नहीं दिया। महागठबंधन ने अपने चुनावी घोषणापत्र में निजीकरण खत्म करने, संविदा नौकरी के स्थान पर स्थाई नौकरी देने, नई यूनिवर्सिटी, नए अस्पताल, कल-कारखाने खोलने, बिजली की दर कम करने और पेंशन की राशि बढ़ाने जैसे लोक कल्याणकारी वादे किए थे जो बिहारी अवाम की वास्तविक समस्या और जरूरत है। तेजस्वी के इस रणनीति का असर रहा कि चुनाव में भाजपा सांप्रदायिक मुद्दों को हवा देने में पूरी तरह विफल साबित हुई और जनता ने उसकी कोशिशों को सिरे से खारिज कर दिया। महागठबंधन की तरफ से 10 लाख रोजगार देने के वादे और तेजस्वी की रैलियों में उमड़ रही युवाओं की भीड़ से ऐसा लगा, मानो, बिहार इस चुनाव में जाति के सवालों और उसके प्रभाव से आजाद होकर कोई नई कहानी गढ़ने जा रहा हो, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। पहले और दूसरे चरण के बाद लोगों के मतदान व्यवहार में बदलाव हुआ। इसे महागठबंधन को पहले चरण में मिले 48, दूसरे चरण में 42 और तीसरे चरण में मिले 20 सीटों के आंकड़े से बखूबी समझा जा सकता है। 

इस तरह महागठबंधन की हार से बिहार पूरे देश में एक नजीर पेश करने से चूक गया। महागठबंधन जीतता तो पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरे भारत में यह आसानी से संदेश पहुंचाया जा सकता था कि चुनाव जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद से हटकर जनता के वास्तविक मु्द्दों पर भी लड़ा और जीता जा सकता है। इससे देश के राष्ट्रीय दलों के साथ ही क्षेत्रीय दलों को अपने चुनावी रणनीति को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता और एक स्वस्थ्य राजनीतिक परंपरा की शुरुआत होती। लेकिन बिहार की जनता खुद को जाति की राजनीति से आजाद नहीं कर पाई। स्वयं राजद को भी अपने जातिगत आधार वोटरों मसलन, यादव जाति का 83 प्रतिशत और मुसलमानों 76 प्रतिशत मत मिले। वहीं कुर्मी जाति का 81 फीसदी वोट एनडीए को प्राप्त हुआ। महागठबंधन की हार का कारण अकेले जाति की राजनीति को नहीं दिया जा सकता है। इसके लिए कई अन्य कारक भी समान रूप से जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।

जंगलराज और परिवारवाद के नैरेटिव से पीछा नहीं छुड़ा पाया राजद

इस चुनाव में एनडीए ने महागठबंधन और तेजस्वी यादव पर सर्वाधिक हमले पूर्व में लालू प्रसाद यादव के 15 साल के शासन को जंगलराज बताकर और परिवारवाद का आरोप लगाते हुए किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह सहित भाजपा के तामाम प्रचारकों ने इसी बात को लेकर राजद पर निशाना साधा। हालांकि इस चुनाव मंे महागठबंधन ने अपने पोस्टरों और बैनरों से लालू और राबड़ी की तस्वीरें हटाकर बहुत हद तक जंगलराज और परिवारवाद की उस छवि को जनता के दिमाग से मिटाने की कोशिश की। कई रैलियों और सभाओं में तेजस्वी यादव ने उन 15 सालों के कार्यकाल मेें हुई गलतियों को स्वीकार कर उसके लिए जनता से माफी भी मांगी, लेकिन लगता है जनता ने उन्हें दिल से माफ नहीं किया। सेंटर फाॅर द स्टडी ऑफ डेवेलपिंग सोसायटीज के निदेशक और प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, “एनडीए ने अपनी चुनावी सभाओं में बार-बार ‘जंगलराज’ को प्रचारित किया। चूंकि एनडीए के पास विपक्ष को घेरने के लिए मुद्दों का अभाव था, इसलिए उसने जंगलराज को ही अपना मुद्दा बना लिया। इसका असर यह हुआ कि जो लोग लालू प्रसाद के 15 साल के शासन को भूल चुके थे, उनकी स्मृतियों में बिहार के उस पिछड़ेपन का दौर पुनः याद आ गया और सत्ता परिवर्तन का उनका मन आशंकाओं से भर गया। इसका दूसरा नुकसान यह हुआ कि रोजगार के नाम पर जो युवा जात-पात से उपर उठकर परिवर्तन के हिमायती थे उन्होंने भी बाद में इस मुद्दे पर अपने अभिभावकों का साथ दिया। ऐन मौके पर वोटर महागठबंधन के पाले से खिसक गया।

एक चुनावी सभा को संबोधित करते तेजस्वी यादव

सरकार से नाराजगी को निर्णायक वोटों में तब्दील नहीं करा पाया विपक्ष

नीतीश कुमार के 15 साल के शासन से जनता बदलाव चाह रही थी और लाॅकडाउन से उपजे हालात को लेकर वह सरकार से बेहद नाराज थी, लेकिन इस बात का फायदा उठाकर जनता का मत अपने पाले में लाने में महागठबंधन कामयाब नहीं हुआ। इसका फायदा नीतीश कुमार और जदयू के सहयोगी भाजपा ने उठा लिया। लाखों की तादाद में देश के विभिन्न राज्यों से पैदल और विकट परिस्थितियों में घर लौटने वाले मजदूर में इस बात को लेकर बेहद गुस्सा था कि शुरुआती दिनों में नीतीश कुमार ने बिहार के दरवाजे उनके लिए बंद कर दिए थे। बिहार पुलिस ने पैदल आने वाले प्रवासी मजदूरों की जगह-जगह पिटाई भी की थी। लेकिन भाजपा प्रवासी मजदूरों को यह समझाने में कामयाब रही कि यह एक प्राकृतिक आपदा थी। वह यह भी समझाने में सफल रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुशल रणनीति और प्रबंधन क्षमता के कारण ही कोरोना संक्रमण से भारत में कम मौतें हुई और भारत के हालात इस मायने में यूरोपीयन देशों और अमेरिका के मुकाबले काफी अच्छे हैं। लाॅकडाउन के दौरान मजदूरों के खाते में 1000 रुपया देने और सस्ते मूल्य पर उन्हें अनाज उपलब्ध कराने का पूरा श्रेय भी भाजपा अपने खाते में डालने में सफल रही है। इसलिए नीतीश कुमार से जो जनता की नाराजगी थी वह भाजपा के वोटों में तब्दील हो गई।  

गठबंधन में छोटे दलों को शामिल करने में हुई चूक

महागठबंधन में कांग्रेस और वामदलों को शामिल करने के अलावा भी एनडीए के खेमे में गए दल और दूसरे गठबंधनों के दलों को साधने में महागठबंधन की विफलता हार का कारण बनी। जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी शुरुआती दिनों में महागठबंधन के पाले में आती दिख रही थी, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर वह दोनों पार्टियां अलग हो गई। इस चुनाव में हम ने 4 सीटें जीती और उसका वोट शेयरिंग 0.9 प्रतिशत रहा। वीआईपी ने भी कुल 4 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 1.5 प्रतिशत रहा। अगर हम एनडीए और महागठबंधन दोनों को प्राप्त मतों की बात करें तो एनडीए को जहां 37.3 प्रतिशत मत मिले वहीं महागठबंधन को 37.2 प्रतिशत मत मिले। दोनों को मिलने वाले वोटों में सिर्फ 12270 मतों का अंतर है जबकि सीटों में 15 का अंतर है। उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोकदल और पप्पू यादव के जनअधिकार पार्टी को साथ लेकर चलने से भी महागठबंधन को फायदा हो सकता था। 11 ऐसी सीटों पर महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा जहां वोटों का मार्जिन मात्र 12 से लेकर 951 के बीच था। रालोसपा और जाप को साधकर ऐसे नुकसान से आसानी से बचा जा सकता था।

महादलित और अतिपिछड़ों को साधने में विफलता

महागठबंधन नीतीश कुमार के कोर वोटर महादलित और अति पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने से भी चूक गया। उसे आशा के अनुरूप इस वर्ग का वोट नहीं मिल पाया। इसका कारण यह माना जाता रहा है कि राजद इस वर्ग के उम्मीदवारों को टिकट देने में भी अपनी उदारता नहीं दिखाता है। अति पिछड़ा
श्रेणी का मुसलमान भी राजद से इस बात को लेकर नाराज दिखता है। शायद यही वजह है कि इस बार मुसलमानों में एकजुटता होने और भाजपा से दूरी रखने के बावजूद एनडीए के खाते में 5 प्रतिशत मुस्लिम वोट ट्रांसफर हुए। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, जदयू के अगर कुर्मी और कोईरी मतदाताओं की बात करें तो इन दोनों जातियों ने महागठबंधन को क्रमशः 11 और 16 प्रतिशत वोट दिए जबकि एनडीए के खाते में 81 और 51 प्रतिशत वोट पड़े। रालोसपा को साध कर कुशवाहा मतों का लाभ महागठबंधन ले सकता था।  दूसरी ओबीसी और अति पिछड़ी जातियों का भी सिर्फ 18 प्रतिशत मत हासिल करने में महागठबंधन कामयाब रहा है जबकि इसी श्रेणी का 58 प्रतिशत मत एनडीए के खाते में गया। रविदास का 34 प्रतिशत, पासवान का 22 प्रतिशत, मुसहर का 24 प्रतिशत और अन्य दलितों का 24 प्रतिशत मत महागठबंधन के झोली में आया।    

कांग्रेस को अधिक सीटें और एआईएमआईएम फैक्टर

महागठबंधन की हार के बाद विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को 70 सीटें देना भी राजद के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। 70 सीटों में से कांग्रेस महज 19 सीटें ही जीत पाई। अगर ये सीटें वामदलों या सीटों का तालमेल न बैठने के कारण महागठबंधन से अलग हुए दलों को दिया जाता तो ऐसी स्थिति नहीं बनती है। दूसरी ओर ओवैसी फैक्टर को भी महागठबंधन को हुए नुकसान का कारण माना जा रहा है। सीमांचल में ओवैसी की पार्टी ने कुल 5 सीटें जीती हैं। हालांकि राजद नेतृत्व ने इन दोनों कारणों को हार की वजह से दूर रख है क्योंकि कांग्रेस को जो सीटें दी गई थी वह सीटें जीतना राजद के लिए भी आसान नहीं थी और ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल में जिन पांच सीटों पर विजय हासिल की है उनमें राजद से सीधा मुकाबला सिर्फ एक ही सीट पर था बाकी सीटें उसने जदयू, भाजपा या अन्य दलों से झटके हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व यह मानती है कि सीमांचल और मिथिलांचल में पार्टी की हार की वजह उम्मीदवारों का सही चयन नहीं करना था। इन इलाकों में पार्टी के अधिकांश उम्मीदवार गठबंधन और सीटों के बंटवारे का ध्यान में रखकर तय किए गए थे जबकि वे उम्मीदवार स्थानीय जनता को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरा नुकसान इसलिए भी उठाना पड़ा क्योंकि महागठबंधन ने इन इलाकों में अपेक्षाकृत कम मेहनत किया था। पार्टी वह यहां से अधिकांश सीटों पर अपनी जीत के लिए लगभग आश्वस्त थी और वह जनता की नाराजगी को भांपने में विफल रही। 

(संपादन : नवल/अनिल)

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