दुर्गापूजा का चंदा नहीं दिया तो गोंड आदिवासियों का सामाजिक बहिष्कार, एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की मांग

गोंड विचारक डा. सूर्या बाली के मुताबिक बात दो सौ रुपए की नहीं है। असल में गोंड समुदाय के लोग अब अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं को लेकर जागरूक हो चले हैं। उन्होंने उन पर थोपी जा रही परंपराओं का विरोध शुरू दिया है

आदिवासी बहुल इलाकों में द्विजवादी लोगों को डराने-धमकाने में लगे हैं। इसके लिए वे अब सामाजिक बहिष्कार का हथियार के तौर पर इस्तेमाल भी करते हैं। ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिले बालाघाट में सामने आया है। यहां द्विजवादियों ने 14 गोंड परिवारों का सामाजिक बहिष्कार केवल इस कारण कर दिया क्योंकि वे दुर्गापूजा के लिए 200 रुपए का चंदा नहीं दे सके। न केवल उन्हें दुकानों से राशन आदि लेने से रोका गया बल्कि उन्हें मजदूरी भी नहीं करने दी गई। मामले का पटाक्षेप तब हुआ जब पीड़ित आदिवासियों ने जिला प्रशासन से गुहार लगायी। मध्यप्रदेश के गोंड समुदाय से आने वाले विधायक डा. हीरालाल अलावा ने दोषियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की मांग की है।

लॉकडाउन के शिकार परिवारों ने सौ-सौ रुपए देने की बात कही

संस्कृति के नाम पर दादागिरी का यह खेल मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के लामटा गांव में हुआ। इस गांव में करीब 170 परिवार रहते हैं। इनमें 40 परिवार गोंड आदिवासियों के हैं। ये बेहद गरीब हैं और अधिकांश घरों के लोग मजदूरी करने दूसरे राज्यों में जाते हैं। कोरोना के कारण तालाबंदी और इससे उत्पन्न स्थितियों के शिकार इन लोगों से दुर्गापूजा संस्था के लोगों ने दो-दो सौ रुपए चंदा मांगा। लेकिन पहले से ही खस्ताहाल हो चुके गोंड समुदाय के लोगों ने हाथ खड़े कर दिए। यह सब 14 अक्टूबर, 2020 को तब हुआ जब दुर्गापूजा संस्था के लोगों ने बैठक की। बैठक में गोंड आदिवासियों पर चंदा देने के लिए दबाव बनाया गया।

सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ विरोध जताने बालाघाट जिला मुख्यालय पहुंचे गोंड समुदाय के पीड़ित (तस्वीर साभार : इंडियन एक्सप्रेस)

चालीस परिवारों में से 26 परिवारों ने उनके दबाव को स्वीकार करते हुए दो-दो सौ रुपए चंदा में दे दिए। लेकिन 14 परिवारों ने कहा कि वे यह रकम देने में असमर्थ हैं। इसके बावजूद उन पर दबाव बनाया गया तब वे सौ-सौ रुपए देने को तैयार हुए। लेकिन संस्था वाले जिद पर अड़े रहे। जब 14 परिवारों ने चंदा की राशि नहीं दी तब उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया।

गुहार के बाद हरकत में आया जिला प्रशासन, लेकिन दोषियों पर कार्रवाई नहीं

यह सामाजिक बहिष्कार दो सप्ताह से अधिक समय तक चला। इस दौरान पीड़ित परिवारों को राशन लेने से रोका गया। साथ ही उन्हें मजदूरी भी नहीं करने दी गई। पीड़ित परिवार दाने-दाने को मोहताज कर दिए गए। इसके बाद पीड़ित परिवारों ने जिला प्रशासन से गुहार लगायी। जिलाधिकारी दीपक आर्य ने गांव वालों के साथ बातचीत कर मामले को खत्म किया। परंतु, जिन लोगों ने 14 गोंड परिवारों को यातनाएं दीं, उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।

मामला केवल दो सौ रुपए चंदा का नहीं है

मध्यप्रदेश से विधायक डा. हीरालाल अलावा ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि उनके संज्ञान में यह मामला आया है। वे आगामी 25 नवंबर को राज्य सरकार को अपने संगठन जयस के बैनर तले इस बाबत एक ज्ञापन देंगे कि दोषी लोगों पर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया जाय। उन्होंने कहा कि यह घटना अत्यंत ही निंदनीय है। 

विधायक डा. हीरालाल अलावा व गोंड साहित्य व संस्कृति के अध्येता डा. सूर्या बाली

वहीं गोंड सभ्यता के जानकार डा. सूर्या बाली का मानना है कि यह केवल दो सौ रुपए का सवाल नहीं है। असल में सांस्कृतिक वर्चस्ववादियों को छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के गोंड बहुल इलाकों में मजबूत सांस्कृतिक प्रतिवाद झेलना पड़ा है। यह सब पिछले एक दशक में हुआ है जब गोंड समुदाय के लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता को लेकर जागरूक हुए हैं और उन पर थोपी जा रही परंपराओं का विरोध करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक बहिष्कार कर वर्चस्ववादियों ने इस विरोध को दबाने का प्रयास किया है। लेकिन गोंड समुदाय के लोगों ने अब उनकी परंपराओं को छोड़ना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि यह समझने की आवश्यकता है कि अभी भी गांवों में सारे संसाधनों पर वर्चस्ववादियों का अधिकार है। फिर चाहे वह राशन की दुकान हो या फिर दवाई की दुकान, अधिकांश दुकानों के मालिक गैर-आदिवासी ही होते हैं। इसलिए गांव के स्तर पर सामाजिक बहिष्कार का विरोध करना गांववालों के लिए मुश्किल होता है। 

(संपादन : अनिल/अमरीश)


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