असम : एसटी दर्जा को लेकर चाय श्रमिक आदिवासियों में असंतोष, आर या पार की तैयारी

असम में चुनाव होने हैं। वहां के चाय श्रमिक जिनमें अधिकांश आदिवासी हैं, अपने संवैधानिक दर्जे के लिए संघर्षरत हैं। उनका कहना है कि पिछली बार भाजपा ने उनके साथ ठगी की। बता रहे हैं राजन कुमार

पूर्वोत्तर के असम में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आदिवासी चाय श्रमिक आंदोलनरत हैं। वे अनुसूचित जनजाति के दर्जा देने, दैनिक मजदूरी बढ़ाने और आवास पट्टा देने की मांग कर रहे हैं। इस क्रम में बीते 7 फरवरी, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब असम के ढेकियाजुली में आरोप लगा रहे थे कि विदेशी ताकतों द्वारा भारतीय चाय की छवि बिगाड़ने की साजिश रची जा रही है। उसी दौरान असम के चाय श्रमिक उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के मद्देनजर उत्तरी असम के बिश्वनाथ, सोनितपुर और नगांव जिले में अनेक जगहों पर आदिवासी चाय श्रमिकों ने अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। 6 फरवरी, 2021 की रात से ही जगह-जगह सड़कों पर टायर एवं मोदी के पुतले का दहन कर अपना विरोध जताया गया। 

जेपी नड्डा के बयान से उठ रहे सवाल

ध्यातव्य है कि वर्ष 2014 के केंद्रीय आम चुनाव एवं 2016 में प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी चाय श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया था। साथ ही, आवास का पट्टा देने और दैनिक मजदूरी 351 रुपए करने संबंधी घोषणा भी की गई थी। इन घोषणाओं के कारण ही चाय श्रमिकों ने चुनाव में भाजपा को वोट देकर उसकी सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।

लेकिन वास्तविकता यह है कि भाजपा सरकार ने चाय श्रमिकों से किया अपना वादा नहीं निभाया है। अब जबकि राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक है, भाजपा कह रही है कि असम के छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया है, जिसमें चाय जनजाति भी शामिल हैं। बीते 8 फरवरी, 2021 को कछार जिले के सिलचर शहर में एक रैली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि “भाजपा सरकार ने असम के छह समुदायों की दुर्दशा की पहचान की और उन्हें राज्य के अन्य जनजातियों को प्रभावित किए बिना एसटी का दर्जा दिया। कांग्रेस ने कभी ऐसा साहस नहीं दिखाया।” रैली के दौरान असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, वरिष्ठ मंत्री हेमंत बिश्वशर्मा और असम भाजपा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास भी मौजूद थे। 

अनुसूचित जनजाति का दर्जा की मांग के लिए प्रदर्शन करती एक महिला व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की तस्वीर

वहीं, नड्डा के इस बयान को कांग्रेस ने झूठा और दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए उनकी आलोचना की है। राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के असम राज्य इकाई प्रमुख रिपुन बोरा ने कहा कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा अध्यक्ष ने इस तरह की असंसदीय टिप्पणी की। मैं आपको बता सकता हूं कि छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने का बिल संसद में भी पेश नहीं किया गया है और इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी नहीं मिली है। फिर भाजपा सरकार उन्हें एसटी का दर्जा कैसे दे सकती है?” 

एनडीटीवी द्वारा प्रकाशित एक खबर के मुताबिक असम के छह समुदायों– कोच राजबोंगशी, ताई अहोम, चुटिया, मटक, मोरन और चाय जनजाति को एसटी का दर्जा दिए जाने का मामला अभी भी लंबित है। एसटी का दर्जा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को अनुच्छेद 342 के तहत आवश्यक सिफारिश के लिए अपना निष्कर्ष अभी अग्रेषित किया जाना है।

आक्रोशित हैं चाय श्रमिक आदिवासी नेता 

अखिल असम आदिवासी छात्र संघ के अध्यक्ष प्रदीप नाग ने 10 फरवरी 2021 को विश्वनाथ जिले में एक रैली के दौरान कहा कि 2019 में चुनाव के कारण भाजपा सरकार ने असम के आदिवासी चाय श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव पारित कराया लेकिन राज्यसभा में प्रस्ताव लाया ही नहीं गया। साथ ही आवास पट्टा देने और दैनिक मजदूरी 351 रुपए करने का भी वादा पूरा नहीं किया, जिससे असम के आदिवासी चाय श्रमिक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। 

असम टी-ट्राईब स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सचिव बसंत कुर्मी ने कहा कि चाय जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की हमारी मांग लंबे समय से लंबित है। हमारे कार्यकर्ताओं ने सोनितपुर और बिश्वनाथ जिलों के कई चाय बागानों में पीएम मोदी के पुतले इसलिए जलाए ताकि हमारी मांग पर सरकार ध्यान दे। अनुसूचित जनजाति का दर्जा, आवास पट्टा और दैनिक मजदूरी सुनिश्चित करने में भाजपानीत सरकार की विफलता ने हमें काफी निराश किया है। यह हालत तब है जब हम असम समेत देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, फिर भी हमारे मजदूर अल्प वेतन 167 रुपए प्रतिदिन पर काम कर रहे हैं।

ऑल आदिवासी स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ असम संगठन के प्रचार सचिव लक्ष्मण पारजा कहते हैं कि भाजपा सरकार ने हमलोगों को धोखा दिया है। इसलिए हमलोग लगातार भाजपा के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा और अमित शाह चुनावी कार्यक्रमों में बता रहे हैं कि चाय बागान के आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया गया है, जो पूरी तरह से झूठ है। वे हमें मूर्ख बना रहे हैं। हम सभी संगठन मिलकर चाय बागानों, बस्तियों और गांवों में जनसभा कर रहे हैं। हमारा नारा है– भाजपा हटाओ, असम के आदिवासियों को बचाओ। 

उन्होंने कहा कि हमारे साथ सरकार ऐसे बर्ताव कर रही है, जैसे हम किसी दूसरे देश के लोग हैं। पिछले साल हमलोग दिल्ली गए थे। वहां केंद्रीय मंत्री फगनसिंह कुलस्ते और अर्जुन मुंडा से हमलोगों ने मुलाकात भी की, लेकिन भाजपा ने हमारे पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। बीते 10 फरवरी, 2021 को हमलोगों ने 20 हजार से भी अधिक संख्या में बिश्वनाथ जिला समाहरणालय और कोर्ट का घेराव किया था। हमारी समस्याओं का हल कैसे होगा, इसका हम विकल्प ढूंढ रहे हैं। हमें चाय बागान आदिवासियों की भावनाओं और मांगों को समझने वाला एमएलए चाहिए, जो हमारी बात करे। हम लोग “आदिवासी नेशनल पार्टी ऑफ असम” पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने पर विचार कर रहे हैं।

चाय जनजाति बताकर किया जा रहा है हमारा अपमान

लक्ष्मण पारजा ने आगे बताया कि हम मूलरुप से प्रकृति पूजक आदिवासी लोग हैं। हम झारखंड-मध्य प्रदेश के उरांव, मुंडा, हो, संथाल, गोंड आदिवासी हैं। ये लोग हमें चाय जनजाति कहकर हमारा अपमान करते हैं। क्या कोई चाय की जनजाति होती है? चाय जनजाति बोलकर हमलोगों को बहिष्कृत और वंचित रखने की कोशिश की जा रही है। असम में अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिलने से हमलोगों को कई मूलभूत अधिकारों से वंचित होना पड़ता है। जबकि हम शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से लगभग 60 वर्ष से भी अधिक समय से एसटी दर्जे की मांग कर रहे हैं। लेकिन असम की सरकार ने ए.के. चंदा, शबर और लोकूर समितियों और आयोगों द्वारा की गई स्पष्ट सिफारिशों के बावजूद हमारी मांगों की उपेक्षा जारी रखा है। 

तीस फीसदी आबादी, लेकिन की जा रही है उपेक्षा

लक्ष्मण पारजा के मुताबिक असम में आदिवासी चाय श्रमिकों की संख्या लगभग एक करोड़ है, जो वहां की 3.5 करोड़ आबादी का लगभग 30 फीसदी है। यदि हम आदिवासी चाय श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाएगा तो हमलोगों के लिए यहां लगभग 45 विधानसभा सीटें आरक्षित हो जाएंगीं और हमलोग राज्य में सरकार बनाने में मुख्य भूमिका में आ जाएंगे। इसलिए यहां सत्ता में बैठे असमिया लोग आदिवासी चाय श्रमिकों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, हमारी मांगों को लेकर हमें असमिया समुदायों द्वारा हिंसा का शिकार होना पड़ता है। 

कौन हैं चाय श्रमिक और कौन हैं आदिवासी?

असम और पश्चिम बंगाल के चाय के बागानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश के मूल आदिवासी हैं। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इन्हें चाय बागानों में काम करने के लिए कुली (मजदूर) के रुप में लाए थे। पश्चिम बंगाल में तो इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल चुका है, लेकिन असम में चाय श्रमिक अनुसूचित जनजाति की दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ये चाय श्रमिक लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने या अलग कोटे के तहत 30 फीसदी आरक्षण की मांग करते हैं। साथ ही राज्य के बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल और दीमा हसाओ ऑटोनोमस काउंसिल की तर्ज पर चाय उत्पादक इलाकों में भी एक अलग स्वायत्त परिषद बनाने की मांग भी लंबित है।

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माना जाता है कि इन चाय श्रमिकों में कुल 60 प्रतिशत यानि लगभग 60 लाख ही ऐसे श्रमिक हैं जो आदिवासी हैं। इन मजदूरों की संख्या उत्तरी असम में खास तौर से तिनसुकिया, डिब्रुगढ़, गोलाघाट, शिवसागर और सोनितपुर जिलों जो चाय उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं, में ज्यादा है।

पहले भी की जा चुकी हैं अनुशंसाएं, लेकिन कार्रवाई लंबित

बताते चलें कि जनजातीय समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य स्थिति की जाँच करने और उनमें सुधार के लिये उपयुक्त हस्तक्षेपकारी उपायों की सिफारिश करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा वर्ष 2013 में प्रो. वर्जिनियस खाखा की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भी असम के आदिवासी चाय श्रमिकों को झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ के मूल आदिवासी के रुप में रेखांकित करते हुए कहा है– “पूर्व-स्वतंत्रता काल में झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की जनजातियों, जैसे-मुंडा, उरांव, संथाल एवं अन्य ने करारबद्ध मज़दूरों के रूप में असम के विशाल चाय बागानों की ओर भी पलायन किया था किंतु, स्वतंत्रता के बाद उन्हें असम में अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल नहीं किया गया है।”

वहीं 1965 में अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के मानदंड पर विचार करने के लिए गठित की गई लोकूर समिति ने असम के आदिवासी चाय श्रमिकों के बारे में कहा कि– “60 वर्ष या उससे भी बहुत पहले काफी संख्या में संथाल, मुंडा, उरांव और गोंड आदिवासी समुदाय के लोग बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश से पलायन कर उत्तरी बंगाल, असम, मणिपुर और त्रिपुरा के चाय बागानों में स्थायी रुप से बस गए। इनकी संख्या लगभग 20 लाख है। चूंकि पिछड़ा वर्ग आयोग (1953) ने इन्हें सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़ा होने के कारण ओबीसी के रुप में श्रेणीकरण किया है। अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने के लिए जोर नहीं दिया है। बस इतना ही कहा है कि उनलोगों को अपने घर और जीवनशैली से संबंध बनाए रखने के लिए सहायता दी जानी चाहिए।”

लोकूर समिति ने इस बात को भी रेखांकित करते हुए लिखा है कि– “असम सरकार ने जमीनी स्तर पर उनकी स्थिति में किसी भी बदलाव का लगातार विरोध किया है और कहा है कि इससे स्थानीय राजनीतिक ढांचे को गंभीर रूप से नुकसान होगा। हमें औसत अप्रवासी मजदूरों के बारे में भी विश्वसनीय रूप से बताया गया है जिन्हें दैनिक मजदूरी और विशेष कानून द्वारा संरक्षण प्राप्त होता है, उनके आर्थिक मानक अन्य आदिवासी समुदायों की तुलना में बेहतर हैं। यह भी बताया गया है कि चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों में बदले माहौल के कारण आदिवासी गुणों में ह्रास हो रहा है और उन्हें विशेष शैक्षणिक सहायता दी जा रही है।”

चाय श्रमिकों की समस्याएं

पिछले सात दशकों से आदिवासी चाय श्रमिक राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक बने हुए हैं। चाय श्रमिकों की मुख्य मांग आवास के लिए पट्टा और मजदूरी में बढ़ोतरी ही रहती है। वर्तमान में इन्हें दैनिक 167 रुपए मजदूरी दी जाती है और चाय बागान में ही टीन शेड्स की क्वार्टर में रहने की जगह दी जाती है। चाय श्रमिक काफी समय से दैनिक मजदूरी 351 रुपए करने की मांग कर रहे हैं, जिसे असम सरकार ने अभी तक नहीं माना है।

दूसरे राज्यों के चाय श्रमिकों को मिलने वाली दैनिक मजदूरी की बात करें तो केरल के चाय श्रमिकों को 380 रुपये दैनिक मजदूरी के साथ कई तरह की अन्य सुविधाएं मिलती हैं। जबकि तमिलनाडु के चाय श्रमिकों को 333 रूपये दैनिक मजदूरी मिलती है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में 176 रुपए दैनिक मजदूरी मिलती थी, जिसे हाल ही में बढ़ाकर 202 रुपए किया गया है।

अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन की टिप्पणी

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के असम में चाय बागानों में श्रमिकों के अधिकार का खुला उल्लंघन कर उन्हें स्वास्थ्य, अनुदानित दर पर खाद्यान्न, आवास और साफ पेयजल आदि बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। साथ ही, उनका यौन उत्पीड़न भी होता है। 

वे हमें बंधुआ मजदूर बनाते जा रहे हैं

असम के एक चाय श्रमिक रिंटू बोरा कहते हैं कि “असम के चाय उद्योग पीढ़ियों से हम आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। हमें बंधुआ मज़दूर में बदल रहे हैं, अयोग्य, गरीब, अनपढ़ बनाए रखने और अलग-थलग करने के लिए प्रयासरत हैं। चाय बागानों में गुलामी की औपनिवेशिक शोषक संरचना के अभी तक बने होने के कारण ही श्रमिकों को बहुत कम मजदूरी, अस्वस्थकारी जीवन और देर समय तक काम करने की मजबूरी बनी हुई है। पश्चिमी असम में कोकराझार, बोंगाईगांव और धुबरी जिलों में 1996 और 1998 के जघन्य नरसंहारों ने हजारों चाय श्रमिक आदिवासियों को बेघर कर दिया था। कई अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं। अक्टूबर 2010 में चाय श्रमिक आदिवासियों के घरों और संपत्तियों को सरकारी लोगों के संरक्षण में अमानवीय और अवैध ढंग से जलाया गया। यहां तक कि स्कूलों और पूजा स्थलों को भी जला दिया गया। ऐसे अत्याचारों की सूची बहुत लंबी है। यह शर्म की बात है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आज भी ऐसी अमानवीय स्थिति बनी हुई है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने असमिया जातीय-राष्ट्रवाद को संचालित किया है जो मेहनतकश चाय श्रमिक आदिवासियों को भूमिहीन बनाए रखने की परियोजना को आगे बढ़ाता है।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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