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मीतवाडी कृष्णन : केरल में बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के प्रणेता

अधिवक्ता रहे कृष्णन ने अपनी अंग्रेजी शिक्षा और औपनिवेशिक विधिक ढांचे का उपयोग कर अपने कई साथी अछूतों को मुक्ति दिलवाई। फुले और आंबेडकर की तरह उनकी भी मान्यता थी कि ब्रिटिश राज से मुक्ति से पहले पददलितों को उनकी जातिगत और सामाजिक गुलामी से मुक्ति दिलवाई जानी चाहिए

मीतवाडी कृष्णन (11 जून, 1867 – 29 नवम्बर, 1938)

चंगारम कोमरथ कृष्णन केरल में प्रेस और सामाजिक परिवर्तन के प्रणेताओं में से एक थे। वे नारायणगुरु के शिष्य और सहोदरन अय्यपन के साथी थे तथा सामाजिक असमानता व जाति के विरुद्ध इन दोनों शख्सियतों के जीवनपर्यंत संघर्ष में साझेदार थे। कृष्णन का जन्म 11 जून, 1867 को गुरुवयूर के निकट मुल्लास्सेरी में एक सुशिक्षित थिय्या परिवार में हुआ था। वे हाईकोर्ट में वकालत करते थे। इसके साथ ही वे पत्रकार, संपादक, बैंकर, सामाजिक क्रांतिकारी, तार्किकतावादी, नवबौद्ध चिन्तक व बहुआयामी व्यक्तित्व वाले इंसान थे।

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लेखक के बारे में

डॉ. अजय एस. शेखर

डॉ. अजय एस. शेखर कलाडी, केरल में स्थित एसएस यूनिवर्सिटी ऑफ संस्कृत में अंग्रेजी के सहायक प्राध्यापक और ''सहोदरन अय्यप्पन: टूवर्डस ए डेमोक्रेटिक फ्यूचर" के लेखक हैं। हाल में केरल की संस्कृति और सभ्यता के बौद्ध आधार पर पुत्तन केरलम शीर्षक से मलयालम में उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई है

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