बिहार राजभाषा पुरस्कार : द्विज नामवरों का खेल

पुरस्कार समिति के बारे में विचार करें। इसके संयोजक माधव कौशिक ब्राहण हैं और संप्रति साहित्य अकादमी के संयोजक हैं। उनके साथ पुरस्कार जूरी में अनामिका, नासिरा शर्मा, शांति जैन और बिनोद बंधु रहे ये सभी के सभी सवर्ण जाति या समुदाय से आते हैं। इसमें ओबीसी और दलित वर्ग का एक भी प्रतिनिधि शामिल नहीं हैं। बता रहे हैं आदित्य आनंद

बिहार में राजनीति का तो मंडलीकरण हुआ है परन्तु साहित्य, कला और संस्कृति का क्षेत्र इससे अछूता है। हम उस बिहार की बात कर रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में बहुजन समाज के लेखकों का बाहुल्य रहा है। लेकिन बिहार के पिछले तीस वर्षों के मंडल राज में राजभाषा पुरस्कारों की सूची पर नजर दौड़ाएं तो पुरस्कार निर्णायक से लेकर पुरस्कार प्राप्त करनेवालों में बहुसंख्या सवर्ण जाति के ही लेखक, पत्रकारों रहे हैं। यह स्थिति तब है जबकि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे दो मजबूत जनाधार वाले मुख्यमंत्री लगातार शासन में रहे हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि पिछड़े, दलित बौद्धिक जिस प्रतिनिधित्व को लेकर आत्मविश्वास से लबरेज रहते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि यह प्रतिनिधित्व उनके नेताओं के भौतिक, वैभव विलास के लिए चाहे जितना मुफीद रहा हो, उनके समाज के लिए उसका कोई मतलब नहीं। अभी हाल ही में राजभाषा ने जिन 14 लोगों को पुरस्कार के लिए चयनित किया है, उनमें 12 लेखक सवर्ण जाति समुदाय से और एक-एक दलित, पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग से आते हैं। यानी बिहार में सवर्ण समाज की कुल जनसंख्या में प्रतिशत लगभग 12  है परन्तु पुरस्कार में उनकी उपस्थिति करीब सौ प्रतिशत है और जिस बहुजन समाज की बहुसंख्या है, पुरस्कारों की सूची में उनकी उपस्थिति अत्यंत निराशाजनक है।

पुरस्कार किसे और क्यों?

राजभाषा ने इस साल अपने सबसे बड़े पुरस्कार के लिए विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का चयन किया है। यह तीन लाख रुपये की राशि है, जो डॉ. राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान के रूप में दी जाती रही है। श्री तिवारी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के हैं। वे ब्राहण समाज से आते हैं। एक जमाने में वे ‘दस्तावेज’ नामक पत्रिका निकालते थे। उनका लेखन आलोचना केंद्रित रहा है, लेकिन हिंदी आलोचना में उनकी कोई जगह नहीं है। उन पर आरोप लगता रहा है कि जब से साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में उनकी इंट्री हुई, उन्होंने देश भर में अपने रसूख से लोगों को उपकृत किया और अभी तक साहित्य अकादमी में नहीं रहने के बावजूद उनका प्रभाव वहां यथावत है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो पुरस्कार कभी रामनिरंजन परिमलेंदु सरीखे शोध मर्मज्ञ को दिया गया, आज उसकी गरिमा इतनी धूल-धूसरित हो चुकी है कि साहित्येतर शख्सियत को यह पुरस्कार दिया जा रहा है।

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर पुरस्कार इस बार अशोक कुमार को दिया गया है। उनके सम्मान की राशि ढाई लाख रुपये की है। दो-दो लाख रुपये के पांच पुरस्कार– मृणाल पांडे, सुशीला टाकभौरे, सत्यनारायण, रामश्रेष्ठ दीवाना और जाबिर हुसेन को क्रमशः कर्पूरी ठाकुर, बीपी मंडल, नागार्जुन, दिनकर और रेणु के नाम पर दिया गया। इनमें एक ब्राहण, एक दलित, एक कायस्थ, एक ओबीसी और एक सवर्ण मुस्लिम जाति समूह से आते हैं। इनमें 3 बिहार की राजधानी पटना में रहते हैं और दो मुम्बई से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन दिल्ली में रहते हैं। यह आश्चर्यजनक है कि जिस मृणाल पांडे और सत्यनारायण को कर्पूरी ठाकुर और नागार्जुन सम्मान से पुरस्कृत करने का निर्णय लिया गया है, ये दोनों ही संबंधित शख्सियतों की वैचारिक धारा के खिलाफ रहे हैं। यह जातिवाद और अवसरवाद की अनुपम मिसाल है। चयन समिति से इतनी अपेक्षा तो कम से कम रहनी ही चाहिए थी कि हम जिस महापुरूष के नाम पर यह पुरस्कार दे रहे हैं वह पुरस्कार पानेवाला व्यक्ति कम-से-कम उनके विचारों का सम्मान करनेवाला हो। मसलन, मृणाल पांडे आरक्षण विरोधी रही हैं। दिल्ली से योगेेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने जब मीडिया में हिस्सेदारी को लेकर एक बुकलेट जारी की थी हिन्दुस्तान के संपादक के रूप में मृणाल पांडे ने उसका लिखित विरोध किया था। मृणाल के पूरे लेखन में जातीय संघर्ष को लेकर न कोई चिंता है ना ही सरोकार। तो फिर यह पुरस्कार उन्हें कर्पूरी ठाकुर के नाम पर दिया जाना कर्पूरी ठाकुर का अपमान नहीं है तो फिर क्या है? इसी प्रकार जो नागार्जुन सम्मान सत्यनारायण को दिया गया, वह स्वयं नागार्जुन के कट्टर विरोधी रहे हैं। यह वही सत्यनारायण हैं, जो डॉ. राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान नागार्जुन को दिये जाने के विरोध में अपील पर पहले हस्तारक्षर कर्ता थे।

सम्माान पर सवाल

पचास हजार रुपये का पुरस्कार जिन सात लेखकों को दिया गया है, उनमें पूनम सिंह, वनजा, गीताश्री, राकेश सिन्हा रवि, भगवती प्रसाद द्विवेदी, छाया सिन्हा और अनंत विजय हैं। इनको क्रमशः महादेवी वर्मा, गंगाशरण, विद्यापति, मोहनलाल महतो वियोगी, भिखारी ठाकुर, ग्रिर्यसन और फादर कामिल बुल्के के नाम पर यह पुरस्कार दिये गए हैं। इनमें तीन भूमिहार, एक ब्राहण, एक राजपूत और दो कायस्थ हैं। इसमें चार महिलाएं हैं, जिनमें दो भूमिहार और एक-एक कायस्थ जाति समुदाय से आती हैं। अनंत विजय भूमिहार जाति समाज से आते हैं। इस पूरी सूची में बहुजन लेखकों व लेखिकाओं की न्यूनतम भागीदारी पुरस्कार समिति की जातिवादी संरचना की पोल खोलती है। पूनम सिंह और गीताश्री दोनों महिलाएं मुजफ्फरपुर से हैं। और दोनों ही भूमिहार जाति से आती हैं। सवाल यह उठता है कि क्या बिहार में और लेखिकाएं नहीं हैं? फिर उनके रहते इन्हें यह पुरस्कार दिया जाना जातीयता, क्षेत्रीय पूवाग्रहों के सिवा और क्या हो सकता है? जबकि बिहार में सवर्ण जातियों की महिलाओं की ही बात की जाए तो यहां नीलिमा सिन्हा, सोमा भारती सरीखी कई महिलाएं थीं और कविता की बात की जाए तो उतिमा केशरी जैसी वरिष्ठ और महत्वपूर्ण कवयित्री थीं। आलोचना के क्षेत्र में सुनीता गुप्ता जैसी बहुजन स्त्रियां रही हैं, लेकिन चूंकि यह इन्हें नहीं दिया जाना था, इसलिए इनके नाम पर कोई विचार नहीं किया गया। 

बिहार सरकार के राजभाषा विभाग पुरस्कार-2021 के लिए चयनित लेखकों व उनकी जाति की सूची

पुरस्कार का नामराशिचयनित साहित्यकारजाति
डाॅ. राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान तीन लाख रुपएविश्वनाथ तिवारीब्राह्मण
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पुरस्कार ढाई लाख रुपएडॉ. अशोक कुमारलोहार
जननायक कर्पूरी ठाकुरदो लाख रुपएमृणाल पांडेब्राह्मण
बीपी मंडल पुरस्कार दो लाख रुपएसुशीला टाकभौरेदलित
नागार्जुन पुरस्कारदो लाख रुपएसत्यनारायणकायस्थ
दिनकर पुरस्कारदो लाख रुपएरामश्रेष्ठ दीवानायादव
फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कारदो लाख रुपएजाबिर हुसेनअशराफ मुसलमान
महादेवी वर्मा पुरस्कार पचास हजार रुपएडाॅ. पूनम सिंहभूमिहार 
गंगाशरण पुरस्कार पचास हजार रुपएवनजासवर्ण (केरल)
विद्यापति पुरस्कारपचास हजार रुपएगीताश्रीभूमिहार
मोहनलाल महतो वियोगी पुरस्कारपचास हजार रुपएराकेश सिन्हा रविकायस्थ
भिखारी ठाकुर सम्मानपचास हजार रुपएभगवती प्रसाद द्विवेदीब्राह्मण
डाॅ. ग्रिर्यसन पुरस्कारपचास हजार रुपएडाॅ. छाया सिन्हाकायस्थ
डाॅ. फादर कामिल बुल्के पुरस्कारपचास हजार रुपएअनंत विजयभूमिहार

बिहार में कर्पूरी ठाकुर सम्मान के लिए उसी मुजफ्फरपुर से हरिनारायण ठाकुर जैसे प्रतिबद्ध लेखक थे। इनके अलावा नंदकिशोर नंदन, राणा प्रताप, जयनंदन जैसे लेखकों की उपेक्षा इसी सवर्ण ग्रंथी का परिणाम है। बिहार के ही कमलेश वर्मा, अश्विनी कुमार पंकज और सुधा सिंह जैसे बहुजन लेखक जिस तरह के कामों के माध्यम से हिंदी रचनात्मकता में अपनी मिसाल कायम कर रहे हैं, क्या वे इसके हकदार नहीं हो सकते थे? अनंत विजय की अवसरवादी पहचान जगजाहिर है। फादर कामिल बुल्के को हिंदी भाषा के विकास में अहम योगदान के लिए याद किया जाता रहा है। जबकि अनंत विजय की इस दिशा में भूमिका नगण्य रही है। 

पुरस्कार समिति की जाति

अब पुरस्कार समिति के बारे में विचार करें। इसके संयोजक माधव कौशिक ब्राहण हैं और संप्रति साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के संयोजक हैं। उनके साथ पुरस्कार जूरी में अनामिका, नासिरा शर्मा, कमल किशोर गोयनका, शांति जैन (अब दिवंगत) और बिनोद बंधु रहे। ये सभी के सभी सवर्ण जाति या समुदाय से आते हैं। इसमें ओबीसी और दलित वर्ग का एक भी प्रतिनिधि शामिल नहीं हैं। हद तो यह कि विशुद्ध द्विज पत्रकार बिनोद बंधु तक को निर्णायक जूरी में रखा गया। 

ध्यातव्य है कि राजभाषा विभाग के मंत्री स्वयं नीतीश कुमार हैं। सवाल है कि पुरस्कारों की फाइल पर हस्ताक्षर करने के पहले क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा कि जिसे उनका विभाग पुरस्कृत करने जा रहा है, वे क्या हैं और कौन हैं? 

अंदरखाने की खबर तो यह कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहते विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के मोहरे के रूप में एक ओबीसी लेखक डाॅ. रामवचन राय सामने आए हैं। राय अरसे से बिहार से साहित्य अकादमी के स्थानीय सदस्य रहे हैं। सवाल है कि क्या तिवारी ने उनकी साहित्य अकादेमी की सदस्यता निर्बाध बनाए रखने की शर्त पर बिहार राजभाषा विभाग पुरस्कार समिति का संयोजक अपने शिष्य माधव कौशिक को बनवाया

पर्दे के पीछे का खलनायकत्व

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में पिछड़े समाज से आनेवाले लेखकों, नेताओं की भूमिका भी कम खतरनाक नहीं रही है। डाॅ. रामवचन राय और प्रेमकुमार मणि सरीखे लेखकों की अपने-अपने समय में इस संदर्भ में गहरे ताल्लुकात रहे। इन दोनों का राजनीतिक रसूख होने के कारण राजभाषा विभाग पर कमोवेश प्रभाव रहा। अंदरखाने की खबर यह कि राजभाषा पुरस्कार समिति के गठन में इन दोनों ने ही सवर्ण लेखकों को शामिल करवाया। इस बार की पूरी जूरी रामवचन राय के प्रभाव में गठित हुई। इसका परिणाम सामने है। पिछली बार जब प्रेमकुमार मणि नीतीश कुमार के प्रभाव में थे तो उन्होंने पुरस्कार समिति में नामवर सिंह, मैनेजर पांडे और देवेंद्र चौबे को रखवाया था। नामवर सिंह ने अपने रहते नंदकिशोर नवल, अरुण कमल और अपने अनुज काशीनाथ सिंह को यह पुरस्कार दिलवा दिया। 

राजभाषा विभाग के अधिकारी रहे कुणाल कुमार कहते हैं कि राजभाषा में यह नियम है कि पुरस्कार चयन समिति से जुड़े लोगों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव रखनेवाले किसी व्यक्ति को यह सम्मान नहीं दिया जा सकता। लेकिन नामवर सिंह ने अपने निर्णय में इसकी अवहेलना करते हुए अपने भाई और आलोचना से गहरे जुड़े नवल और अरुण कमल को यह पुरस्कार दिलवाया। 

बहरहाल, मंडल चेतना में दीक्षित हो रही वर्तमान पीढ़ी को आगे आना होगा। उन्हें एकता बनानी होगी और अपने नेतृत्व को मेमोरेंडम के माध्यम से पर्दे के पीछे जारी सवर्ण वर्चस्व की इतिला दिलानी होगी। यह काम न जनवादी लेखक संघ करेगा, न जन संस्कृति मंच और ना ही प्रगतिशील लेखक संघ, क्योंकि इनके अंदर का सवर्ण नेतृत्व यथास्थितिवाद बनाये रखना चाहता है। वजह यह कि पुरस्कार के माध्यम से भी उनके ही जातीय तुष्टि फलित होती रही है। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक रहे राजेंद्र यादव को एक बार बिहार सरकार का सम्मान मिला था। उन्होंने जब सम्मान लेने के लिए बिहार आने का फैसला किया तो जन संस्कृति मंच, बिहार और प्रसिद्ध वामपंथी पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के संपादक रहे रामजी राय आदि ने तीखा प्रतिकार किया। उस समय बिहार बाथे नरसंहार के लिए सुर्खियों में था और उनका तर्क था कि इसकी कसूरवार लालू सरकार ही है। जबकि सच क्या था सबको मालूम है। यही रामजी राय जब नामवर सिंह अपने अनुज काशीनाथ, नवल को सम्मान दिलवा रहे थे तो किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे। उस समय भी बिहार सुर्खियों में था रणवीर सेना के हत्यारे मुखिया की हत्या के कारण। तब रणवीर सेना के समर्थक बिहार सरकार की शह पर पटना की सड़कों पर उत्पात मचा रहे थे। चूंकि यह उनके वर्ग हितों के अनुकूल था इसलिए रामजी राय सरीखे वामपंथियों की इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई।

(संपादन : नवल/अनिल)

(आलेख परिवर्द्धित : 24 जुलाई, 2021 07:32 PM)


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