h n

उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण-विरोधी कानून का झूठ

अगर जहांगीर और उमर धर्मांतरण कराने वाले गिरोह या रैकेट हैं, तो श्रीराम कृष्ण मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), गीता प्रेस, महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और बाइबिल सोसाइटी ऑफ इंडिया भी गिरोह और रैकेट क्यों नहीं हैं? सवाल उठा रहे हैं कंवल भारती

दुनिया में धर्म और धर्मांतरण दोनों एक साथ आए। इसलिए धर्म रहेगा, तो धर्मांतरण भी होता रहेगा। इन दोनों का एक-दूसरे के साथ अटूट संबंध है। धर्मांतरण तभी खत्म होगा, जब धर्म खत्म होगा। चूंकि धर्म के खत्म होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए धर्मांतरण भी खत्म होने वाला नहीं है। लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदार के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दुनिया के ऐसे अजूबे संगठन हैं, जिन्हें हिंदुओं द्वारा दलित जातियों के साथ किए जा रहे भेदभाव, दमन, शोषण और अस्पृश्यता का व्यवहार परेशान नहीं करता है, बल्कि दलित जातियों का दूसरे धर्मों में धर्मांतरण उद्वेलित कर देता है। जैसे प्रेमचंद की कहानी ‘सौभाग्य के कोड़े’ में जब रायसाहब एक दलित बच्चे नथुवा को एक ईसाई के पंजे से छुड़ाते हैं, और घर की बची-खुची जूठन पर नौकर बनाकर रखते हैं, तो प्रेमचंद लिखते हैं, ‘इन्हें इसकी परवाह न हुई कि मिशन में उसकी शिक्षा होगी, आराम से रहेगा। उन्हें यह मंजूर था कि वह हिंदू रहे। अपने घर के जूठे भोजन को वह मिशन के भोजन से कहीं पवित्र समझते थे। उनके कमरों की सफाई मिशन की पाठशाला की पढ़ाई से कहीं बढ़कर थी। हिंदू रहे, चाहे जिस दशा में रहे। ईसाई हुआ तो फिर सदा के लिए हाथ से निकल गया।’

पूरा आर्टिकल यहां पढें : उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण-विरोधी कानून का झूठ

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

संबंधित आलेख

अर्जक विवाह से साकार हो रहा जगदेव प्रसाद का आह्वान, टूट रहीं शाखा की बेड़ियां
बड़की दांगी और कोइरी (कुशवाहा) के बीच शादियां नहीं होती थीं। जबकि छोटकी दांगी और कोइरी जाति के बीच वैवाहिक संबंध बनते रहे हैं।...
मध्य प्रदेश : केन-बेतवा लिंक परियोजना में कम मुआवजे का दर्द झेल रहे दलित-आदिवासी
पलकोंहा गांव के पूर्व सरपंच चूरा अहिरवार बताते हैं कि “परियोजना में मुख्य समस्या कम मुआवजे की ही है। गांव में किसी को घर...
जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है
वस्तुतः मंडल ने अंतर्विरोधों को पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उजागर कर दिया। यदि गरीबों के आर्थिक अधिकारों को लेकर सहमति थी, तो आरक्षण...
बिहार में भरत भूषण तिवारी की ‘हत्या’, समाज, तंत्र और मीडिया
भरत भूषण तिवारी को मारने के आरोप के खिलाफ जो लोग बोल रहे हैं, वे कब किस मुठभेड़ के बाद नाचने-गाने व ताली बजाने...
राजस्थान : मतदाता से दावेदार बने बावरी समाज के राजनीतिक आत्मविश्वास की कहानी
बावरी (दलित) समुदाय की चार महिला विधायकों के विधानसभा पहुंचने का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। दोनों जिलों में पंचायत चुनावों...