बर्बरता की बाढ़ में दलित स्त्री

वर्ष 2020 का उत्तरार्ध भीषण यौनहिंसा और हत्या के लिए याद किया जाएगा। यह भी याद रखा जाएगा कि कैसे शासन-प्रशासन ने अधिकांश मामलों में आपराधिक संवेदनहीनता दिखाई और अभियुक्तों के पक्ष में खड़ा दिखा। सितंबर-अक्टूबर महीने में बलात्कार और हत्या की पाँच बड़ी घटनाएं हुईं। इनमें 4 उत्तर प्रदेश में और एक घटना पंजाब सूबे में हुई। बता रहे हैं प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी

बहस के बीचों-बीच

हिंसा करने और मामले को दबा देने में हमारे समाज का वर्चस्वशाली वर्ग बहुत अनुभवी है। पितृसत्ता और जातिसत्ता हिंसा के बल पर ही कायम हैं। दलित स्त्री दोनों तरह की हिंसा का शिकार होती है। उस पर होने वाली हिंसा के विभिन्न रूपों में यौन हिंसा मुख्य है। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर पंद्रह मिनट पर बलात्कार का एक केस दर्ज हो जाता है और एक दिन में करीब 16 दलित महिलाएं यौन हिंसा का शिकार होती हैं। सर्वाधिक हिंसाग्रस्त राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा हैं। खासकर वर्ष 2020 का उत्तरार्ध भीषण यौनहिंसा और हत्या के लिए याद किया जाएगा। यह भी याद रखा जाएगा कि कैसे शासन-प्रशासन ने अधिकांश मामलों में आपराधिक संवेदनहीनता दिखाई और अभियुक्तों के पक्ष में खड़ा दिखा। सितंबर-अक्टूबर महीने में बलात्कार और हत्या की पाँच बड़ी घटनाएं हुईं। इनमें 4 उत्तर प्रदेश में और एक घटना पंजाब सूबे में हुई। 

मीडिया में जिस घटना की सबसे ज्यादा चर्चा रही वह उत्तर प्रदेश के हाथरस की है। इससे कम तवज्जो बलरामपुर की घटना को मिली। भदोही, बाराबंकी और होशियारपुर की घटनाओं को ठीक से उठाया नहीं गया। मैं इनमें से तथ्य-संग्रह हेतु मात्र दो जगहों पर जा सका– बलरामपुर और हाथरस। बलरामपुर 8 अक्टूबर, 2020 को गया और हाथरस 11 अक्टूबर, 2020 को। मध्य अक्टूबर में कोरोना से संक्रमित हो जाने के कारण समय से इनकी रिपोर्ट भी नहीं तैयार कर सका। भदोही की घटना पहली अक्टूबर की है, बाराबंकी 14 अक्टूबर की और होशियारपुर 21 अक्टूबर की जबकि हाथरस 14 सितंबर और बलरामपुर 29-30 सितंबर की घटनाएं हैं|

भदोही कांड

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिले भदोही के कोतवाली गोपीगंज अंतर्गत गाँव चक-राजाराम तिवारीपुर पड़ता है। यहाँ 1 अक्टूबर को बाजरे के खेत में एक नाबालिग दलित लड़की की लाश मिली। कुछ मीडिया रिपोर्ट में लड़की की उम्र 11 वर्ष और कुछ में 14 वर्ष लिखी गई है। लड़की शौच हेतु खेत की तरफ गई थी। बहुत देर तक वापस न आयी तो परिवारजनों ने खोजबीन शुरू की। उन्हें खेत में अचेतावस्था में खून सनी बेटी पड़ी मिली। अस्पताल ले जाने पर डाक्टरों ने मृत घोषित किया। परिवार वालों का कहना था कि बेटी के कपड़े गायब थे। उन्हें आशंका थी कि बेटी के साथ बलात्कार हुआ है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस ने बताया कि गला घोंटकर लड़की की हत्या की गई है और बलात्कार नहीं हुआ है। गला घोंटने पर सिर से खून नहीं निकलेगा जबकि परिवार वालों का दावा है कि लड़की का सिर कुचला गया था और वह रक्त-रंजित थी। अपनी तफसीस में पुलिस ने पाया कि एक अन्य दलित परिवार से घटना के दो दिन पहले पीड़ित परिवार का झगड़ा हुआ था। सबक सिखाने या बदला लेने के लिए उस परिवार की लड़की को निशाना बनाया गया। हत्या का मुख्य आरोपी 16 वर्ष का लड़का है। 

सतरिख कांड, बाराबंकी

बाराबंकी के सतरिख इलाके में 14 अक्टूबर को दलित परिवार की नाबालिग बेटी धान काटने खेत पर गई हुई थी। जब वह घर नहीं लौटी तो पिता खोजने निकले। उन्हें धान के खेत में बेटी की लाश मिली। पुलिस ने पहले हत्या का मामला दर्ज किया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद बलात्कार की धाराएं जोड़ी गईं। एक टेलीविजन चैनल को परिवार के सदस्य ने बताया कि खेत में पड़ी डेडबॉडी निर्वस्त्र थी और हाथ-पाँव बंधे हुए थे। इस मामले में पहले गाँव के ही एक युवक दिनेश गौतम (19 वर्ष) की गिरफ्तारी हुई। उसके बाद ऋषिकेश सिंह (21 वर्ष) की। ऋषिकेश गाँव में किराने की दुकान चलाता है। यह बलात्कार और हत्या सुनियोजित थी। दिनेश पहले से पीछे लगा हुआ था और उसी ने पीड़िता के धान काटने हेतु खेत में होने की खबर ऋषिकेश को दी थी। ऐसी खबर मीडिया में रही कि पुलिस ने आनन-फानन में पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करवा दिया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने का इंतज़ार भी नहीं किया। 

हाथरस, उत्तर प्रदेश में दलित युवती के साथ बलात्कार और बाद में हुई उसकी मौत के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान एक इस्लाम धर्मावलंबी महिला

होशियारपुर कांड

ग्राम-जलालपुर, थाना-टांडा, जिला होशियारपुर, पंजाब में 21 अक्टूबर, 2020 को निहायत घिनौनी वारदात हुई। रूदल ऋषिदेव, पुत्र परमेश्वर ऋषिदेव, मूलनिवासी जिलाभागलपुर (बिहार) पिछले तीन दशकों से इस गांव में परिवार सहित रह रहे हैं। पत्नी का नाम रीना देवी है। उनकी कुल 6 संतानें (लड़कियाँ) हैं। सबसे बड़ी लड़की शादीशुदा है। शेष पाँच लड़कियाँ माँ-बाप के साथ रहती हैं। पिता रूदल दिहाड़ी पर मजदूरी करने गाँव से बाहर जाते है। माँ और तीन बड़ी लड़कियाँ गाँव में लोगों के यहाँ काम करती हैं। शेष दो छोटी लड़कियाँ घर पर रहती हैं। घटना के दिन यानी 21अक्टूबर, 2020 को आरोपी सुरप्रीत सिंह पुत्र दलविंदर सिंह रूदल के घर आया। सबसे छोटी बेटी जिसकी उम्र 6 वर्ष से कुछ महीने अधिक होगी, को अपने साथ कुछ खिलाने का लालच देकर बुला ले गया। पीड़ित और आरोपी दोनों परिवार अनुसूचित जाति से हैं। भदोही और बाराबंकी में भी इसी तरह का मामला था। दोपहर को माँ जब काम से लौट कर आई तो दूसरी बेटी ने यह जानकारी दी। परिवार परिचित था और दोनों का एक-दूसरे के यहाँ आना जाना था। माँ अपनी बेटी को तलाशने लगी लेकिन कोई पता नहीं चला। शाम को करीब पाँच बजे आरोपी सुरप्रीत के दादा सुरजीत सिंह ने आकर बताया कि गायब बेटी उनके घर जली पड़ी है। फोन से पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस आई और लाश बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। घटना स्थल से पुलिस ने आरोपियों के ख़ून से सने कपड़े, चप्पल, माचिस, मिट्टी के तेल का खाली कैन, ख़ून से सनी एक ईंट, राख आदि बरामद किया है। प्राप्त सूचना के अनुसार बच्ची पहले यौनहिंसा का शिकार हुई और उसके बाद दादा-पोते ने मिलकर उसे जला दिया। आरोपियों को गिरफ्तार कर 22 अक्टूबर, 2020 को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर पुलिस ने दो दिन का रिमांड लिया और बाद में 24 अक्टूबर, 2020 को फिर तीन दिन का रिमांड और लिया ताकि मामले की गहनता से छानबीन की जा सके। मामले की जाँच पुलिस उपाधीक्षक की निगरानी में टांडा थाना की उपनिरीक्षका कर रही थीं। मुकदमा सं. 265, दि. 21-10-2020, धारा 302, 376डी, 201, 34, आई.पी.सी. पाक्सो एक्ट तथा एससी-एसटी एक्ट के अंतर्गत है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटकर हत्या करने की पुष्टि हुई|

बलरामपुर कांड

बलरामपुर का पीड़ित परिवार पथरकट समुदाय से है। पहले यह समुदाय घुमंतू था। पिछली सदी के आखिरी दशकों में इस समुदाय ने जहाँ भी जगह मिली, स्थायी आवास बनाना शुरू किया। डॉ. रमाशंकर सिंह ने अपने हाल के अध्ययनों में नट, पथरकट, चमरमंगता और महाउत जैसे घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन पर अच्छी रोशनी डाली है। तुलसीराम जी की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ से ज्ञात होता है कि कम्युनिस्ट आंदोलन ने इन समुदायों से अपने को जोड़ा था। छठे दशक के कम्युनिस्ट नेताओं में श्रीनाथ पथरकट का नाम आता है, जिनकी सक्रियता पूरब के मऊ, आजमगढ़, फैजाबाद आदि जिलों में विशेष रूप से थी। उक्त समुदायों की उन्नति के विशेष प्रावधान किए जाने थे लेकिन शासकीय उदासीनता के चलते ऐसा न हो सका। आज भी पथरकट समुदाय शैक्षिक और आर्थिक पैमानों पर बहुत पिछड़ा हुआ है। यह समुदाय अनुसूचित जाति के अंतर्गत आता है। अब इसके सदस्य अपने को ‘शिल्पकार’ कहते या लिखते-लिखवाते हैं। 

बलरामपुर के मझौली गाँव निवासी बजरंगी शिल्पकार को एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। बारहवीं पास बेटे की चीनी सामानों की दुकान है। छोटी बेटी की शादी कर चुके हैं। जब मैं उनके पास पहुँचा तब वे अपने दामाद परमेश कुमार के साथ थे। बड़ी बेटी ने यह कहते हुए शादी करने से मना कर दिया था कि इससे उसकी पढ़ाई रुक जाएगी। गहरे रोष और दुःख में डूबे बजरंगी शिल्पकार ने बताया कि बेटी की बड़ी इच्छा एडवोकेट बनने की थी। वह विमला विक्रम डिग्री कॉलेज में पढ़ती थी। बी.ए. प्रथम वर्ष में उसके बहुत अच्छे अंक आए थे। वह द्वितीय वर्ष में एडमिशन हेतु फीस भरने गई थी और देर तक नहीं लौटी। चिंतित परिवार वाले खोजने निकले। शाम सात बजे के करीब पीड़िता एक रिक्शे पर घर आयी। तब उसकी हालत खराब थी। यह घटना 29 सितंबर, 2020 की है। मां को उसने बताया कि उसके पेट में तेज जलन है। परिवारजन उसे लेकर एक स्थानीय डॉक्टर के पास गए। हालत बिगड़ती देख तुलसीपुर अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया गया। पीड़ित युवती रास्ते में अचेत हो गई। तुलसीपुर में डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बड़ी तेजी से पोस्टमार्टम किया गया होगा क्योंकि घर वाले लाश लेकर 9 बजे रात अपने गाँव गैसड़ी पहुँच गए थे। रात 11 बजे तक लाश को जला भी दिया गया। बलात्कार पीड़िता की लाश जलाना किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। मैंने इस बाबत पीड़िता के पिता से पूछा तो उनका जवाब था कि पुलिस ने उन्हें जैसा निर्देश दिया, वैसा उन्होंने किया। “विवाहिता की लाश जलाई जाती है लेकिन कुँवारियों की नहीं। फिर आपने अपनी बेटी के दाह संस्कार पर आपत्ति क्यों नहीं की?” मेरे इस सवाल पर पूर्वोक्त उत्तर दुहरा दिया गया। ‘डेडबॉडी’ जलाई नहीं गई है तो पुनः पोस्टमार्टम कराया जा सकता है। यह आखिरकार हत्या का केस था और पीड़िता यौन हिंसा की शिकार हुई थी। इसलिए भी, शव को नष्ट होने से रोका जाना था। इस मामले को जानने वाले कई स्थानीय लोगों ने कहा कि मृतका का अग्नि-दाह परिवार की रजामंदी से, परिवार द्वारा ही हुआ था। मृतका की मां से मिलना चाहता था जिससे पता चल सके कि घर पहुँचने पर उसने क्या कहा था। बताया गया कि मां प्रशासन के बुलावे पर बलरामपुर गई हुई हैं। इलाके के कई जिम्मेदार लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि पीड़िता की मां से किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा है। उनको कहीं अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया है। इस घटना की एफआइआर नामजद की गई थी। 29 सितंबर को ही। एफआइआर के आधार पर पुलिस ने मुख्य आरोपी शाहिद (25 वर्ष), प्राथमिक उपचार देने वाला कंपाउंडर शकील (15 वर्ष) और लड़की को अपने रिक्शे से घर पहुँचाने वाला कफील या गुड्डू (52 वर्ष) को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। 

यह बेहद उलझा हुआ केस है। पुलिस का कहना है कि मृतका और शाहिद एक-दूसरे से भलीभांति परिचित थे और पिछले तीन वर्षों से उनके बीच दोस्ती थी। घटना वाले दिन फीस जमा करने मृतका शाहिद के साथ उसकी मोटरसाइकिल पर गई थी। आरोपी शाहिद का बयान पुलिस ने पीड़ित परिवार के समक्ष लिया। अपने बयान में शाहिद ने क्या कहा, इसका खुलासा न पुलिस ने किया और न परिवार वालों ने। सिर्फ इतनी बात सामने आई कि आरोपी ने हत्या की बात कबूल कर ली है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि मृतका की आंत फटी हुई थी और पूरे शरीर में दस जगहों पर चोट के निशान थे। क्या एक व्यक्ति अकेले इतना सब कर सकता था? आरोपी का कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं रहा है। युवती घायल अवस्था में जब अपने घर पहुँची थी तब उसकी नाड़ी में कैनुला या वीगो लगा हुआ था। हत्या की कोशिश करने वाला इलाज कराने क्योंकर ले जाएगा? यह कहा गया कि आरोपी मृतका को अपनी दुकान पर लाया था। मैंने वह दुकान देखी। दुकान मेन रोड के साथ ही है। बाज़ार होने के कारण सड़क हमेशा जनाकीर्ण रहती है। पीछे घनी बस्ती है। ऐसे में कोई निहायत अहमक होगा जो हत्या के इरादे से ‘शिकार’ को अपनी दुकान या आवास ले जाएगा। स्वाभाविक यह था कि हत्या की कोशिश के बाद आरोपी फरार हो जाता। फरार होने की बजाए उसने रिक्शे पर युवती को उसके घर भेजने का बंदोबस्त किया! पुलिस को मृतका तथा आरोपी का मोबाइल फोन व सिम मिल गया था। पुलिस ने न पत्रकारों के समक्ष ब्रीफिंग की और न यह बताया कि कॉल डिटेल्स से क्या पता चलता है। 

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मझौली और गैसड़ी अगल-बगल के गाँव हैं। मझौली में मुसलमानों के 5-6 परिवार हैं जबकि गैसड़ी मुस्लिम बहुल गाँव है। पहले ग्राम पंचायत में तीन गाँव- मझौली डीह, सुगाँव और मझौली आते हैं। पूरे ग्राम पंचायत में करीब पंद्रह सौ वोटर होंगे जबकि गैसड़ी में लगभग पाँच हज़ार। डॉ. विमल प्रकाश वर्मा की मदद से मैं दोनों ग्राम प्रधानों से मिल सका। मझौली के ग्राम प्रधान राम गोपाल गुप्ता ने बताया कि उनके गाँव के लोग शांत स्वभाव के हैं। आरोपी क्योंकि मुस्लिम समुदाय का है इसलिए मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। यह कोशिश नाकामयाब रही। बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय भी ऐसी ही कोशिश की गई थी। तब भी यह इलाका शांत बना रहा था। उन्होंने बताया कि मृतका की लाश घर वालों की सहमति से ही रात 9 बजे के बाद जलाई गई थी। वे स्वयं शोक संवेदना व्यक्त करने बजरंगी शिल्पकार के घर रात 10.30 बजे गए थे। ग्राम प्रधान ने कहा कि प्रशासन अपना काम कर रहा है। पीड़ित घर वाले आरोपियों का नार्को टेस्ट कराने और सीबीआइ. जांच की मांग कर रहे हैं। पीड़िता की चप्पल आरोपी की दुकान से बरामद हुई है। रिक्शे पर घर लौटी घायल पीड़िता अपना बयान दे सकती थी। उसका बयान दर्ज हो जाता तो अनुमानों और अफवाहों की बाढ़ न आती|

गैसड़ी की ग्राम प्रधान श्रीमती शहनाज़ खातून हैं। प्रधान पति का नाम सलीम अहमद है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले पर पर्दा पड़ा हुआ है। असली बात किसी को नहीं मालूम। किसी की जुबान नहीं खुल रही। मृतका का ननिहाल गैसड़ी में ही है। उनके नाना राम किसुन शिल्पकार ग्राम विकास अधिकारी थे। उनकी प्रेरणा और प्रयास से बजरंगी शिल्पकार के तीनों बच्चे पढ़ सके। मृतका को जलाने की पहल अथवा सहमति मृतका के परिवार ने की। उनकी अपील थी कि मामले की निष्पक्ष जाँच हो। किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। जैसे गुड्डू (रिक्शावाला) जेल में है। इस गरीब को जेल भेजने का कोई तुक नहीं। 

मझौली से विदा होने के पहले मैंने मृतका के पिता (बजरंगी शिल्पकार) से उनके परिवार के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि उनके यहाँ पढ़ाई-लिखाई की कोई रवायत नहीं रही है। उनके सभी बच्चे अपने नाना (राम किसुन शिल्पकार, गैसड़ी) के घर रहकर पढ़े हैं। राम किसुन इलाके के गणमान्य व्यक्ति हैं। वे कुश्ती-दंगल का आयोजन करवाते रहे हैं। ग्राम विकास अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति के बाद वे पत्थर का थोक व्यापार करते हैं। बाहर से पत्थर आता है और सभी शिल्पकार घरों को मांग के मुताबिक सिल्लियां दी जाती हैं। सिल-लोढ़ा और चक्की बनाकर गाँव-गाँव सप्लाई किया जाता है। बातचीत में उन्होंने बताया कि छोटी बेटी की शादी कर दी लेकिन बड़ी बेटी आगे पढ़ना चाहती थी, इसलिए उस पर शादी का दबाव नहीं डाला। वह अपना खर्चा चलाने के लिए कृषि से जुड़े एक एनजीओ ‘पानी संस्था’ में काम भी करती थी, जहाँ से उसे प्रति माह तीन हज़ार रुपये मिलते थे। बजरंगी तीन भाई हैं। वे सबसे बड़े हैं। मंझला भाई दिल्ली में मेहनत-मजदूरी करता था। कुछ साल पहले गायब हो गया। नहीं लौटा तो हमने उसे मरा हुआ मान लिया। छोटे भाई का परिवार फैजाबाद में है। मझले के परिवार की देखभाल यही करता है। मैंने पूछा कि क्या आप पर हमीदुल्ला (अभियुक्त शाहिद के पिता) की तरफ से या किसी अन्य पार्टी से समझौता करने का कोई प्रस्ताव अथवा दबाव है। बजरंगी ने इससे इनकार किया। उन्होंने मांग की कि उनका भरोसा स्थानीय पुलिस पर नहीं है लिहाजा यह केस सीबीआइ के सुपुर्द किया जाए। “मेरी बेटी के हत्यारों को फांसी होनी चाहिए|” उन्होंने कई बार इसे दोहराया|

हाथरस कांड

हाथरस की घटना को जागरूक संगठनों, सोशल एक्टिविस्टों और राजनीतिक दलों की सक्रियता के चलते राष्ट्रीय मीडिया ने प्रमुखता से उठाया। हम एक टीम के रूप में दिल्ली से 11 अक्टूबर, 2020 को हाथरस गए। इस टीम में प्रो. हेमलता महिश्वर, लेखिका डॉ. रजत रानी मीनू, रचनाकार-एक्टिविस्ट डॉ. पूनम तुषामड़, राजनीतिशास्त्री डॉ. सीमा माथुर और फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार थे। 12 अक्टूबर सोमवार को लखनऊ हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई थी और रास्ते में हमें सूचना मिली कि कोर्ट के निर्देशानुसार पीड़ित परिवार को एसडीएम की उपस्थिति और पुलिस सुरक्षा में लखनऊ ले जाया गया होगा। जब हम पहुँचे तब तक प्रशासन ने लखनऊ भेजने का कोई इंतजाम नहीं किया था। परिवार सुबह से इसके लिए तैयार बैठा था। इस बीच सूचना मिली कि 2.30 बजे उन्हें ले जाया जाएगा। लेकिन, देर शाम तक कोई नहीं आया। इसके बाद एसडीएम और कुछ पुलिस अधिकारी आए और परिवार से यात्रा के लिए तैयार होने को कहा। रात की यात्रा को लेकर परिवार शंकित था तो उन्होंने आज जाने से मना कर दिया। हमें इस तरह परिवार से मिलने और बात करने का समय मिल गया। 

अंधेरे में मनीषा की लाश जलाते उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मी

घटना 14 सितंबर, 2020 को घटित हुई।। बघना ग्रामसभा के अंतर्गत छोटा-सा गाँव है वूलगढ़ी। करीब 70 परिवार होंगे। बहुसंख्यक ठाकुर हैं-40 परिवार। इसके बाद ब्राह्मण 20-22 घर, वाल्मीकि 4 परिवार और दो-दो परिवार प्रजापति व नाई के। घटना वाले दिन पीड़िता अपनी मां और भाई के साथ बाजरे के खेत पर घास काटने गई थी। धूप तेज थी। उसे प्यास लग आई तो मां ने अपने बेटे को पानी लाने घर भेज दिया। खेत से घर की दूरी 600-700 मीटर की होगी। बाजरे की फसल ऊंची होती है। बाहर से देखने पर उसमें गया व्यक्ति नज़र नहीं आता। घास काटते-काटते मां थोड़ा आगे निकल गई। कुछ देर बाद बेटी को आवाज दी तो कोई जवाब नहीं मिला। मां को लगा कि बेटी पानी पीने के लिए खुद ही घर चली गई होगी। बिलंब होते देख मां ने घर का रुख किया। वहां भी बेटी नहीं थी। खेत में तलाश शुरू की। जहाँ बेटी घास काट रही थी वहां उसकी एक चप्पल पड़ी हुई थी। उसके कुछ दूर आगे अर्धनग्न अचेतावस्था में बेटी पड़ी हुई मिली। चुन्नी से बेटी का गला कस दिया गया था। बाजरे की फसल आसपास रौंदी पड़ी थी। कई लोगों ने मिलकर यह दुष्कर्म किया होगा, इतना साफ़ जाहिर था। बाद में मालूम चल गया कि कुल चार कुकर्मी थे। हमें सारा विवरण मां और उनकी ननद (पीड़िता की बुआ) ने बताया। ननद सिरसौली, इगलास से आयी थी। घटना के बाद से हर दिन सामाजिक कार्यकर्ता उनके घर पहुँच रहे हैं। सभी पीड़ित परिवार की ज़ुबानी पूरी घटना सुनना चाहते हैं। बेहोश बेटी को लेकर परिवार थाने गया। एफआइआर लिखने में पुलिस ने भरसक आनाकानी की। इसी चक्कर में बेटी का समय से उपचार भी नहीं हो सका। हाथरस के अस्पताल में हालत सुधरती न देख पीड़िता को अलीगढ़ लाना पड़ा। फिर, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल। जीवन और मृत्यु के बीच झूलती पीड़िता ने 29 सितंबर, 2020 को आखिरी सांस ली। उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई थी। वह खड़ी नहीं हो सकती थी। यूपी पुलिस ने अपनी गाड़ी में शव को दिल्ली से हाथरस पहुँचाया। परिवार वाले राजी नहीं थे कि रात में ‘अंतिम संस्कार’ किया जाए। प्रशासन ने अपनी ताकत के बल पर रात दो बजे लाश को आग के हवाले कर दिया। इस गैरकानूनी, अमानवीय कृत्य को उन्होंने ‘अंतेष्टि’ कहा। 

राज्य सरकार, प्रशासन और स्थानीय पुलिस का रवैया बेहद चिंताजनक रहा। उन्होंने पीड़ित परिवार को राहत देने की जगह निरंतर पीड़ा ही पहुँचाई। अब मामला सीबीआई के सुपुर्द और हाईकोर्ट की निगरानी में है। चारों आरोपी जेल में हैं। आस-पास के गाँवों में जाति पंचायतें हो रही हैं। वाल्मीकि परिवार बहुत डरा हुआ है। वह अपना गाँव छोड़ना और दिल्ली जैसे किसी सुरक्षित स्थान पर भेजे/बसाए जाने की माँग कर रहा है|

हम उस परिवार की मांग का समर्थन करते हुए कहना चाहते हैं कि उक्त सभी मामलों का स्पीडी ट्रायल (त्वरित सुनवाई) हो। पीड़ित परिवारों का उचित पुनर्वास किया जाए। समाज और खासकर पुलिस को संवेदनशील बनाने का दीर्घकालिक प्लान तैयार किया जाए। साक्ष्य नष्ट करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाई हो। हाथरस, बलरामपुर व अन्य जगहों की पीड़िताओं की स्मृति में चिकित्सालय, विद्यालय और पुस्तकालय आदि की स्थापना की जाए।

(संपादन : नवल)

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