प्राख्यात बहुजन विचारक गेल ऑम्वेट का निधन, दलित-बहुजनों में शोक की लहर

प्रसिद्ध विचारक व फुलेवादी साहित्य की पैरोकार डॉ. गेल ऑम्वेट का निधन हो गया है। उनके निधन पर देशभर के दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों ने दुख व्यक्त किया है

देश की जानीमानी बहुजन विचारक डॉ. गेल ऑम्वेट का निधन 25 अगस्त, 2021 को हो गया। वह 80 वर्ष की थीं। वह मूल रूप से अमेरिकी प्रांत मिनिसोटा की थीं और 1970 के दशक में भारत आयीं। भारत में रहकर उन्होंने भारतीय समाज और इतिहास का गहन अध्ययन किया और करीब दो दर्जन किताबें लिखीं। उन्होंने दलित-बहुजन को अपने विमर्श का केंद्र बनाया। उनके निधन के बाद देश के दलित-बहुजन जगत में शोक की लहर है। पूर्व केंद्रीय मंत्री व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने ट्वीटर पर जारी शोक संदेश में कहा कि जानीमानी समाजशास्त्री व विपुल लेखन करने वाली लेखिका डॉ. गेल ऑम्वेट के निधन की सूचना से दुखी हूं भारत ने गैर-जातिवाद, किसानों और महिलाओं के अधिकारों की एक मजबूत आवाज को खो दिया है। 

गेल ऑम्वेट भारत की स्मृतियों में हमेशा रहेंगीं : कांचा आयलैया शेपर्ड

वहीं अपने शोक संदेश में प्रो. कांचा आयलैया शेपर्ड लिखते हैं कि “प्रकरण अध्ययन की महानतम अध्येताओं में से एक डॉ. गेल ऑम्वेट, की 25 अगस्त 2021 को उनके गाँव कसेगाँव, महाराष्ट्र में मृत्यु हो गई। वे सन् 1970 के दशक में विद्यार्थी के रूप में भारत आईं और फिर यहीं की होकर रह गईं। भारत में जाति अध्ययन की प्रणेता, गेल ने मार्क्सवादी अध्येता और कार्यकर्ता भरत पाटणकर से विवाह कर लिया। वे मृत्युपर्यंत अपने पति के साथ उनके गाँव में रहीं। गेल पीएचडी स्कॉलर बतौर जाति और महाराष्ट्र में महात्मा फुले के आंदोलन का अध्ययन करने भारत आईं थीं। भारत में व्याप्त जाति और अछूत प्रथा ने उन्हें इतना मर्माहत किया कि उन्होंने दमित वर्गों के मुक्ति के लिए संघर्ष करने हेतु भारत में ही बस जाने का निर्णय ले लिया। अमरीका में जन्मी भारतीय अध्येता, समाजशास्त्री और मानवाधिकार कार्यकर्ता, गेल, दलितों, ओबीसी और आदिवासियों पर उनके लेखन के लिए दुनिया भर में जानी जातीं थीं। उन्होंने विपुल लेखन किया और उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके पीएचडी शोधप्रबंध ने महात्मा फुले के सत्यशोधक आंदोलन से दुनिया को परिचित करवाया। उनकी विख्यात पुस्तक दलित्स एंड डेमोक्रेटिक रेवोलुशन  दुनिया भर के दक्षिण एशिया अध्ययन और भारत के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के तमाम विद्यार्थियों की हैंडबुक बन गई है। जाति और अछूत प्रथाओं को समझने और उनमें परिवर्तन लाने के तरीकों को जानने के लिए दुनिया भर के लोग उनकी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। वे एक महान फुले-आंबेडकरवादी थीं, जिन्होंने अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। देशभर के ओबीसी, दलित, आदिवासी आंदोलन हमेशा उनकी ऋणी रहेंगे और उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे।

डॉ. गेल ऑम्वेट (2 अगस्त, 1941 – 25 अगस्त, 2021)

उन्होंने आगे लिखा कि “हम सभी, जो पिछले चार दशकों से उनके व उनके पति भरत पाटणकर और उनकी इकलौती संतान, प्राची पाटणकर के साथ दलितों, ओबीसी, आदिवासी और महिलाओं के मुक्ति संघर्ष के हमराह रहे हैं, उन पर गर्व करते हैं और हम उनके जीवन का उत्सव मनाते रहेंगे।”

एक मौलिक समाजशास्त्री और उत्पीड़ित व वंचित समाज की पक्षधर लेखिका रहीं गेल : उर्मिलेश

फेसबुक पर जारी अपने शोक संदेश में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा है कि “कुछ ही देर पहले दुखी करने वाली यह बुरी खबर मिली। प्रख्यात लेखिका गेल ऑम्वेट नहीं रहीं। महाराष्ट्र के कासेगांव में उनका निधन हुआ, जहां वह अपने पति भरत पाटणकर और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सन् 1978 से ही रहती थीं। 

गेल का जन्म भले ही अमेरिका में हुआ था, परंतु उन्होंने जीवन का बडा हिस्सा एक भारतीय नागरिक और यहां के दलित-उत्पीडित लोगों की आवाज उठाने वाली एक विदुषी के रूप में जिया! उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से समाजशास्त्र में पीएचडी किया। एक शोध अध्ययन के सिलसिले में वह भारत आयीं और फिर यहीं की होकर रह गयीं।

अपनी कई शोधपरक पुस्तकों के जरिए उन्होने प्रबुद्ध, लोकतांत्रिक और समावेशी होने की कोशिश करते भारत की तलाश की है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें जो इस वक्त याद आ रही हैं उनमें ‘दलित एन्ड डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन’, ‘अंडरस्टैन्डिग कास्ट: फ्राम बुद्ध टू अम्बेडकर एन्ड बियान्ड’ और ‘अम्बेडकर: टुवर्ड्स एन इनलाटेन्ड इंडिया’ शामिल हैं।

उनको पढ़ने का मेरा सिलसिला तो काफी पहले शुरू हुआ लेकिन उनसे मुलाकात और निजी परिचय बहुत बाद में हुआ। कुछ साल पहले एक संगोष्ठी में हमदोनों ने एक ही मंच के एक ही सत्र में अपनी-अपनी बात रखी। गेल की मौलिकता और सहजता से मैं प्रभावित था! एक मौलिक समाजशास्त्री और उत्पीड़ित व वंचित समाज की पक्षधर लेखिका के तौर पर गेल हमेशा याद की जाएंगीं। उनके जीवनसाथी भरत पाटणकर और बेटी प्राची पाटणकर के प्रति हमारी शोक संवेदना, सलाम और श्रद्धांजलि गेल ऑम्वेट!”

दलित साहित्य को अपूर्णीय क्षति : अनिता भारती

दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती ने अपने शोक संदेश में कहा है कि “2 अगस्त 1941 को अमेरिका में जन्मी, परन्तु जीवनपर्यंत भारत में रहकर जाति के खिलाफ लिखने-पढ़ने वाली विदुषी डॉ. गेल ऑम्वेट के निधन हो जाने से दलित साहित्य की अपूर्णीय क्षति हुई है। दलित लेखक संघ उनके प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता है और उनके दलित समाज, संस्कृति, दर्शन और साहित्य में दिए गए योगदान के प्रति आभार और आदर प्रकट करता है।”

गेल के निधन से भारतीय समाजशास्त्रीय लेखन को बड़ी क्षति : वीरेंद्र यादव

प्रसिद्ध बहुजन लेखक वीरेंद्र यादव ने फेसबुक पर जारी अपने शोक संदेश में लिखा है कि “प्रख्यात समाजशास्त्री गेल ऑम्वेटके निधन का समाचार दुखद है। मैंने उनका अधिकतर लेखन पढ़ा है और उससे समृद्ध हुआ हूं। हाशिये के समाज के दृष्टिकोण से उनका लेखन स्थायी महत्व का है। भारतीय समाजशास्त्रीय लेखन की यह एक बड़ी क्षति है। सादर नमन और  परिवार के प्रति मेरी शोक संवेदना।”

ब्राह्मणवादी विचारधारा को बेनकाब करने में अहम रहा गेल का योगदान : संजय श्रमण जोठे

युवा बहुजन विमर्शकार संजय श्रमण जोठे ने फेसबुक पर अपने शोक संदेश में लिखा है कि “भारत की 85 प्रतिशद आबादी (ओबीसी, एससी एसटी, धार्मिक अल्पसंख्यक) के शोषण और दमन की ब्राह्मणवादी विचारधारा को बेनकाब करने में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। एक तरफ इस देश के विश्वविद्यालय एवं साहित्य जगत में जहां ब्राह्मणवाद को बेनकाब करने में सुस्ती छाई रहती है, वहीं विदुषी गेल ऑम्वेट ने सच्ची आंबेडकरवादी क्रांतिकारी की भूमिका निभाते हुए जीवन भर भारत की 85 प्रतिशत आबादी के लिए सैद्धांतिक काम किया। जाति, धर्म और पहचान की राजनीति पर उनके विश्लेषण भारत को सभ्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। भारत की बहुसंख्य आबादी अपने ही देश में क्यों पीड़ित, तिरस्कृत और पिछड़ी बनी हुई है, इस विषय पर उनका काम बहुत महत्वपूर्ण है। इससे आगे बढ़ते हुए उन्होंने भारत में बौद्ध धर्म और जाति विषय पर भी बहुत गंभीर काम किया है। बहुजन भारत के धार्मिक विमर्श हेतु उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थापना यह रही है कि प्राचीन बौद्ध धर्म को ही तोड़ मरोड़कर एवं एप्रोप्रियेट करके आज के प्रचलित धर्म का निर्माण किया गया है। विदुषी गेल ऑम्वेट को जय भीम!”

मेरे लिए निजी क्षति : दिलीप मंंडल

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने अपने शोक संदश में लिखा है कि “भारत में बहुजन, बौद्ध, श्रमिक और नारीवाद आंदोलन की इतिहास लेखक, हम सबकी बेहद प्रिय, प्रखर चिंतक, विचारक, ज्ञानवंत, मान्यवर कांशीराम की वैचारिक सहयोगी प्रोफ़ेसर गेल आम्वेट नहीं रहीं। आपकी लिखी बीसियों किताबें आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करती रहेंगी। मेरे लिए यह निजी क्षति है। मैंने जिनसे सबसे ज़्यादा सीखा, उनमें प्रो. ऑम्वेट प्रमुख हैं।” 

(संपादन : नवल/ अनिल) 

(आलेख परिवर्द्धित : 25 अगस्त, 2021, 4:12 PM)

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