परशुराम को भज रहीं पसमांदा मुसलमानों को वोट बैंक समझने वाली पार्टियां : अली अनवर

अभी पसमांदा का जो सवाल है तो उसमें मुस्लिमों को जिस तरह से आरएसएस और भाजपा टारगेट कर रही है, तो वैसी स्थिति में भी हम इस सवाल को ज़िंदा रखे हैं। लेकिन ऐसे में मुख्य खतरे से लड़ना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है। गौर करने की बात यह है कि इन हालात में भी ज़्यादातर टारगेट पसमांदा मुसलमान यानी गरीब और पिछड़े मुसलमान ही हो रहे हैं। पढ़ें, पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी का यह साक्षात्कार

उत्तर प्रदेश व देश के कुछ अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में अब कुछ माह ही शेष हैं। लिहाजा राजनीतिक राजनीतिक बिसातें बिछायी जाने लगी हैं और दांव पर देश की धर्मनिरपेक्षता है। भाजपा एक तरफ हिंदू-मुस्लिम की राजनीति को बढ़ावा दे रही है और इस क्रम में हाल ही में अलीगढ़ का नाम बदलकर हरिगढ़ करने का प्रस्ताव भी किया गया है। वहीं सपा और बसपा जैसी पार्टियां भी भाजपा के तर्ज पर आचरण करने लगी हैं। इन सवालों में पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे क्या हैं और वे क्यों विमर्श के केंद्र में नहीं हैं, इस बारे में असद शेख ने पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी से बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश 

मौजूदा दौर में आरएसएस देश की सत्ता पर काबिज है। ऐसे में विपक्षी पार्टियों के बीच साझी रणनीति अपनाए जाने के संबंध में संकेत मिलते हैं। पसमांदा मुसलमानों से संबंधित सियासत को आज आप किस मोड़ पर पाते हैं? 

देखिये, फ़िलहाल पूरी मुस्लिम सियासत का भाव ही ख़त्म हो गया है। उसका कोई मोल नहीं है अभी की सियासत में। इसकी दो वजहें हैं। एक तो भाजपा, मुसलमानों को जिस तरह से टारगेट करती है, उसके कारण लोगों के अंदर एक खौफ है। और जब इस तरह का कोई बाहरी हमला होता है तो जो अंदरूनी विरोध है वह थोड़ा-सा ढंक-छिप जाता है। ये ऐसे हालात होते हैं, जैसे भाई-भाई के झगड़े में हम दूसरे से जाकर मिल जाएं और खुन्नस निकालें तो इसे बहुत खराब माना जाता है। ऐसी स्थिति में आदर्श स्थिति यह है कि पहले बाहरी हमले का मिलकर मुक़ाबला करते हैं। 

तो अभी पसमांदा का जो सवाल है तो उसमें मुस्लिमों को जिस तरह से आरएसएस और भाजपा टारगेट कर रही है, तो वैसी स्थिति में भी हम इस सवाल को ज़िंदा रखे हैं। लेकिन ऐसे में मुख्य खतरे से लड़ना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है। गौर करने की बात यह है कि इन हालात में भी ज़्यादातर टारगेट पसमांदा मुसलमान यानी गरीब और पिछड़े मुसलमान ही हो रहे हैं।

इसलिए प्राथमिक लड़ाई लड़ना हमारी जिम्मेदारी हो जाती है। हमारी प्राथमिकता है कि जो भी समतामूलक समाज के निर्माण में विश्वास रखते हैं, जो जातीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित नही हैं, वो हमारे अपने हैं। उनके साथ मिलकर सामाजिक न्याय की बात की जाए।

पसमांदा समाज के सवालों को लेकर आप मुखर रहे हैं। आपने एक किताब भी लिखी। आपके हिसाब से वे कौन से तत्व हैं जो पसमांदा समाज के लिए बेहद जरूरी हैं, और जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है?

मुसलमानों के लिए भाजपा सबसे बड़ा खतरा है। दूसरा खतरा हैं सेक्युलर पार्टियां, जो भाजपा के दबाव में आकर पिछडों को “टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड” ले रहे हैं। पसमांदा मुसलमानों की बात छोड़ ही दीजिये। वो ये सोच रहे हैं कि यह लोग (मुसलमान) हमारे साथ हैं ही। ये लोग उनके लिए ज़्यादा मान मनोवल्ल कर रहे हैं जो इनसे दूर हैं। जैसे अखिलेश और मायावती जी मे प्रतिस्पर्धा शुरू हो गया है कि परशुराम की सबसे ऊँची मूर्ति कौन लगायेगा।

इन लोगों का यह रास्ता बहुत कमज़ोर रास्ता है। इससे बहुत कुछ लाभ नहीं होने वाला है। जैसे तेजस्वी ‘एमवाई’ समीकरण को बदल कर ‘एटूजेड’ बोल रहे हैं, मायावती जी बहुजन से सर्वजन बोल रही हैं। कहने का मतलब ये है कि ऐसे हालात में जबकि उपेक्षा और कम हिस्सेदारी के कारण पसमांदा समाज के लोगों में एक तरह की बेचैनी है और इसका फायदा ओवैसी जैसे नेता उठा रहे हैं। 

सामान्य तौर पर पसमांदा समाज के मुद्दों के बारे में सोचा जाता है तो ले-देकर रोजी-रोजगार तक बात आकर खत्म हो जाती है। लेकिन आपको नहीं लगता है कि पसमांदा समाज के लिए एक समग्र नीति बनाए जाने की आवश्यकता है, जिसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य अनिवार्य रूप से शामिल हो?

जिस मुद्दे पर हम बात कर रहे हैं, वहां हमारा सवाल क़ायम है। हमारा तो यह कहना है कि जबतक पसमांदा समाज आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक मुस्लिम समाज की तरक्की नहीं होगी। क्योंकि तालीम में, विरासत में और सियासत में उन्हें हिस्सेदारी नहीं मिली है और वे आबादी में ज़्यादा हैं। यूपी में 22 फीसदी मुस्लिम हैं। बिहार में 18 फीसदी मुस्लिम हैं। अगर इसमें पसमांदा मुस्लिमों की भागीदारी नहीं होगी तो मुसलमान पिछड़ा ही रहेगा। हमारा तो नारा है “दलित-पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान”। यह नारा हम देते हैं।

हमारा एक और नारा है “वोट हमारा, फतवा तुम्हारा नहीं चलेगा”। मज़हबी इदारों के नाम पर चल रहे ये इदारे जिनमें जमीयत उलेमा हिन्द है, इमारत-ए-शरिया है। उस समय ये लोग अपने दस्तावेज दुरुस्त कर रहे थे जब देशभर ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) को लेकर विरोध हो रहा था। आप ही बताइये कि क्या वह सिर्फ कागज़ जमा करने का सवाल था? 

जब देश भर में मुसलमान सड़कों पर थे, उस वक़्त हमारे ये लीडर्स कहां थे? कोई इनसे पूछे कि जब शाहबानो का मसला हुआ था, तो ये सभी सड़कों पर क्यों थे। इसलिए हम सवाल उठाते हैं कि नेतृत्व के मामले में मुसलमानों की नुमाइंदगी घट रही है, और इसमें भी पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी शून्य है।

सेक्युलर पार्टियाँ भी इस तरफ भी ध्यान नहीं दे रही हैं, क्योंकि उनका डर भी वोट बेंक हैं। अब बीते महीने का उदाहरण देखिये आप। तेजस्वी यादव अपने लेटर हेड पर लिख रहे हैं कि “हिंदू पिछडों की जातिगत जनगणना”। अब इन लोगों को इतना भी नहीं पता है कि पिछड़ा वर्ग मुस्लिमों में भी है। इसका मतलब यह है कि आप भाजपा के एजेंडे पर जा रहे हैं, उससे डर रहे हैं। अब आप क्या उनके हथियार से लड़ाई लड़ेंगें?

इस बात का सीधा सा मतलब यह है कि वैचारिक तौर पर ये सभी कमज़ोर हैं और बहुजनों पर इनका भरोसा नहीं है। इसलिए सवर्ण भी मुश्किल से इनके साथ आतें हैं।

अली अनवर

सच्चर आयोग और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रपटों में की गयी अनुशंसाओं के आलोक में केंद्र सरकार द्वारा जो योजनाएं बनायी गयीं, उन्हें आप पसमांदा समाज के दृष्टिकोण से कितना व्यावहारिक मानते हैं?

देखिये कुछ नहीं बना है। कोई योजना नहीं बनी है। सच्चर कमिटी रिपोर्ट एक तरह से मुसलमानों का आईना है। रंगनाथ मिश्रा में एक टर्म का इस्तेमाल हुआ है “हिंदुओं के अलावा, जो दलित मुसलमानों में हैं, उनकी पहचान करें और उनके प्रतिनिधित्व के लिए उनकी तरक्की के लिये उपाय सुझाएं।”

हाल यह है कि जब ये रिपोर्ट आ गयी थी तो संसद में पेश नहीं हो पा रही थी। और जब मैंने वहां आवाज़ उठाई तो मेरा समर्थन करने वालों में एक या दो मुस्लिम सदस्य ही शामिल थे। इतना ही नहीं, तीन-तीन बार राज्यसभा स्थगित कराने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया था। इसके बाद जाकर यह रिपोर्ट पेश हो पायी।

इस रिपोर्ट को लागू करने की बात तो बहुत दूर हो गयी। भाजपा तब भी इसके खिलाफ थी। लेकिन कांग्रेस चाहती तो कर सकती थी, मगर उसके नेताओं ने नहीं किया। इस तरह से हमने इस मुद्दे पर लड़ाई लड़ी है। वहीं सच्चर कमिटी की सिफारिशों पर कोई भी काम नहीं किया गया।

आपकी किताब “मसावात की जंग” मुसलमानों से सवाल तो करती है, लेकिन पसमांदा समाज के लिए ठोस ब्लूप्रिंट नहीं रखती है। क्या आप कोई पहल करेंगे?

इसी ब्लूप्रिंट को बनाने के लिए तो हम दर दर भटक रहे हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों पर मुझे अब तरस आता है। सामाजिक न्याय का हमारा मामला अब अंधी गली में फंस कर रह गया है क्योंकि 2014 के बाद सियासत बहुत महंगी हो गयी है। पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा है। हाल यह है कि वामपंथी दल तक रैली और जनसभा के लिए लोगों को बसों में ढो-ढोकर लेकर आते हैं।

इसके अलावा राजनीतिक पार्टियां सामाजिक न्याय के मुद्दे पर जिनमें समाजवादी दल हो या वामपंथी दल हों, अब पसमांदा समाज के मुद्दों को तवज्जो नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह डर हो गया है कि मुसलमान तो हमें वोट करेगा ही और अगर इसमें पसमांदा बंटवारा होगा तो नुक़सान हमारा ही होगा। 

अब तो किसी भी सेक्युलर दल को डर नहीं हैं, क्योंकि उन्हें पता है ये (पसमांदा) हमको ही वोट देंगे। जाएंगे कहां? बस इनका काम रह गया है कि भाजपा से चोंच लड़ाना है। इसी वजह से ओवैसी जैसे नेता पनप रहे हैं।

पसमांदा राजनीति के नाम पर अबतक होता यह आया है कि केवल कुछ गिने-चुने लोगों को एमपी, एमएलए और एमएलसी बना दिया जाता है। लेकिन क्या इतने मात्र से शासन-प्रशासन में पसमांदा समाज की समुचित भागीदारी मुमकिन है?

किसी भी राजनीतिक पार्टियों के लिए जब कोई सामाजिक संगठन मज़बूती से सवाल उठाता है तो ये उसे समायोजित करते हुए एमएलसी या राज्यसभा भेज देते हैं। इसके बाद ये लोग जिस दल से चुनकर आते हैं, उसमें अपने संगठन का विलय कर देते हैं। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। हम लोग बराबर सवाल उठाते रहे हैं। कई बार जदयू के नेताओं को शिकायत हुई कि ये सवाल क्यों उठा रहे हैं, लेकिन हमसे कहने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।

समझने की ज़रुरत यह है कि जब हमें राज्यसभा भेजे जाने की कवायद नीतीशजी की तरफ से शुरू हुई हुई थी, उसमें हमारा स्टैंड क्लियर था कि पिछड़ा और अति पिछड़ा (पसमांदा) समाज की बात उठाते रहेंगे और हमने मजबूती से उठाया। उदाहरण के लिए बिहार पहला राज्य है, जहां अब अति पिछड़ा, जिसमें पसमांदा मुसलमानों की 80 फीसदी आबादी थी, उसमें हमने अपने लोगों को चुने जाने का अधिकार दिलाया।

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नगर पंचायत निकाय आदि के चुनाव में अब कुल 40 हज़ार के करीब मुसलमान अति पिछड़ा-पिछड़ा (हिन्दू -मुसलमान) लड़ सकते हैं, जबकि पहले सिर्फ दर्जन या 2 दर्जन ही पसमांदा मुसलमान मुखिया वगैरह चुनकर आते थे। यादव-कुर्मी नेताओं ने इसका विरोध किया, मगर नीतीश कुमार तब भी पीछे नहीं हटे, क्योंकि हमलोगों ने अपनी पूरी कोशिश की थी।

लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के आने के बाद हम ही उनमें से एक थे, जिन्होंने नीतीश कुमार पर ज़ोर डाला और उन्हें एनडीए से अलग किया था। वहीं जब दोबारा नीतीश कुमार एनडीए के साथ गए तो मैं पहला शख्स था, जो सब छोड़कर अलग हो गया।

हमारी आइडियोलॉजी ये है कि हमने अपने उसूलों से खिलवाड़ नहीं किया। वहीं जदयू में गुलाम रसूल बलियावी और कहकशां परवीन, जो खुद पसमांदा समाज से थीं, तब भी वो लोग नीतीश कुमार के साथ गद्दी बचाने के लिए जुड़े रहें और आज भी जुड़े हैं।

क्या आप इस मांग का समर्थन करेंगे कि जैसे हर राजनीतिक दल में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ हैं, वैसे ही पसमांदा समाज के लिए भी एक प्रकोष्ठ हो या फिर पसमांदा कल्याण विभाग बनाया जाए?

बिल्कुल, बिल्कुल होना चाहिए … जब अति पिछड़ा प्रकोष्ठ है, अति पिछड़ा आयोग है तो पसमांदा प्रकोष्ठ या पसमांदा विभाग क्यों नहीं होना चाहिए? क्या समस्या है? पसमांदा पार्टियों में पसमांदा प्रकोष्ठ क्यूँ नहीं होगा? दूसरी बात ये है कि “पसमांदा” शब्द एक ऐसा शब्द अब चल गया है कि ये सभी की ज़ुबान पर चढ़ चुका है। अब तो कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इस विषय पर पीएचडी हो रही है। बर्लिन में इस विषय पर रिसर्च किया जा रहा है। भारत में ही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी छोड़ कर शायद ही कोई यूनिवर्सिटी हो, जहां इस विषय पर युवा रिसर्च न कर रहे हैं। तो अब ये विषय और यह चिंतन लोगों से जुड़ गया है और वे इसे समझ रहे हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)

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