कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने शूद्र राजाओं को शक्तिहीन कैसे बनाया?

शूद्रों द्वारा शासित हर राज्य के मुख्य पुजारी और प्रधानमंत्री ब्राह्मण हुआ करते थे। शासनकला पर केन्द्रित पुस्तक अर्थशास्त्र के लेखक कौटिल्य के काल से ही राज्यों पर इस वर्ग का नियंत्रण रहा है, बता रहे हैं कांचा इलैया शेपर्ड

अगर शाहूजी महाराज द्वारा वर्ष 1918 में बंबई प्रेसीडेंसी के पूर्व गवर्नर लार्ड सिडेनहैम को लिखा गया एक पत्र संयोगवश मेरी आंखों के सामने से नहीं गुजरा होता, तो शायद यह लेख लिखने का विचार मेरे मन में नहीं आता। स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद भी समाज और राज्य पर ब्राह्मणों और बनियों के वर्चस्व के बारे में जैसे-जैसे मैं लेख आदि लिखता गया, वैसे-वैसे मुझे जान से मार देने की धमकियां मिलने लगीं तथा मुझ पर कई अदालतों में मुकदमें दायर कर दिए गएञ परंतु इसके साथ ही द्विज विद्वानों ने मेरे तर्कों को खारिज करने का प्रयास भी किया। कई ब्राह्मण-बनिया उदारवादी बुद्धिजीवियों का तर्क था कि जब प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अनेक शूद्र शासक थे, तब भला पूरी व्यवस्था पर ब्राह्मणों और बनियों का नियंत्रण कैसे हो सकता था। ये बुद्धिजीवी ब्राह्मणों के राज्य पर नियंत्रण होने के जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर के दावों का भी इन्हीं तर्कों के आधार पर एक लंबे समय से खंडन करते आए हैं। परंतु कोल्हापुर राज्य, जो स्वतंत्रता के समय 1947 तक अस्तित्व में था और जिसके शासक महान राजा छत्रपति शिवाजी के वंशज थे, के शासक शाहूजी महाराज द्वारा लिखा गया लंबा पत्र हमें बताता है कि ब्राह्मणों के आध्यात्मिक और बौद्धिक वर्चस्व के कारण शूद्र शासकों को क्या-क्या भोगना पड़ता था।

ब्राह्मण पुरोहित वर्ग के सदस्य हर राज्य के मुख्य पुजारी और शूद्रों द्वारा शासित सभी राज्यों के प्रधानमंत्री और नौकरशाही के मुखिया हुआ करते थे। शासनकला पर आधारित पुस्तक अर्थशास्त्र  के लेखक कौटिल्य के काल से ही राज्यों पर इस वर्ग का नियंत्रण रहा है।

इस लेख में शाहूजी महाराज के पत्र के आधार पर हम यह बताएंगे कि किस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य के काल से ही शूद्र राजा ब्राह्मणों से भयभीत रहते आये हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र  में कहा गया है कि राज्य को निम्नानुसार जाति प्रथा को संरक्षित रखना है–

वेदों की त्रयी चारों जातियों और धार्मिक जीवन के चारों वर्गों के क्रमशः कर्तव्यों का निर्धारण करती है और यह बहुत उपयोगी है

ब्राह्मण का कर्तव्य है शिक्षा प्राप्त करना, शिक्षा प्रदान करना, यज्ञ करना, अन्यों द्वारा किए जा रहे यज्ञों को संपन्न करवाना और भेंट देना   ेंट स्वीकार करना

क्षत्रिय का कर्तव्य हैअध्ययन करना, यज्ञ करना, भेंट देना, सैन्य कार्य करना और जीवन की रक्षा करना

वैश्य का कर्तव्य हैअध्ययन करना, यज्ञ करना, भेंट देना कृषि, मवेशीपालन और व्यापार करना

शूद्र का कर्तव्य हैद्विजातियों की सेवा करना, कृषि, पशुपालन व्यापार करना, शिल्पकार का व्यवसाय करना और दरबारी भाट (कुरूकुशिलावकर्म) के रूप में काम करना[1]

इस लोक में जहां चार वर्ण और धार्मिक जीवन के चार वर्ग हैं, वहां राजा जब अपने राजदंड से शासन करेंगे तो सभी लोग अपनेअपने लिखे निर्धारित पथ पर चलेंगे और अपनेअपने कर्तव्यों व्यवसायों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे

कौटिल्य आगे कहते हैं, “अपने कर्तव्यों पर स्थिर रहने से व्यक्ति को स्वर्ग और अपरिमित आनंद की प्राप्ति होती है। जब इस व्यवस्था का उल्लंघन होता है, तब जातियों और उनके कर्तव्यों के संबंध में भ्रांतियां उत्पन्न होती हैं, जिससे यह दुनिया समाप्त हो जाती है। अतः राजा कभी भी लोगों को अपने कर्तव्यों से भटकने नहीं देगा, क्योंकि जो अपने कर्तव्यों का पालन करता है, आर्यों के रीति-रिवाजों पर दृढ़ रहता है और जाति व धार्मिक जीवन के विभाजन संबंधी नियमों का पालन करता है, वह इस लोक और परलोक में प्रसन्नता प्राप्त करता है। वेदों की त्रयी की आज्ञाओं के आधार पर यदि इस दुनिया का संचालन किया जाएगा तो दुनिया उन्नति करेगी और कभी नष्ट नहीं होगी।”[2]

जातिगत कर्तव्यों का सख्ती से निर्धारण कर और शूद्रों को ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा करने का निर्देश देकर और इस प्रकार द्विजों को शूद्रों के श्रम का हमेशा के लिए उपयोग करने का अधिकार प्रदान देकर कौटिल्य शूद्रों से यह झूठा वायदा करते हैं कि अगर वे उनके लिए निर्धारित राह पर चलेंगे तो उन्हें मोक्ष अथवा स्वर्ग की प्राप्ति होगी। शूद्रजनों को यह विश्वास दिलाया गया कि अगर वे जाति व्यवस्था का पालन नहीं करेंगे तो उन्हें इस जीवन में और मृत्यु के पश्चात ब्राह्मण देवों द्वारा दंड दिया जाएगा। दुनिया में कहीं भी धार्मिक पुस्तकों के लेखकों ने इतनी दुष्टता से उत्पादक वर्ग के अशिक्षित व अज्ञानी और सीधे-साधे व्यक्तियों के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ नहीं किया। वेदों को दैवीय पुस्तकों का दर्जा देकर कौटिल्य और मनु ने एक बर्बर नागरिक समाज और राज्य का निर्माण किया। उनके बाद के ब्राह्मणों ने इन पुस्तकों में वर्णित राजनैतिक और आध्यात्मिक विचारधारा का पालन किया। कोई दैवीय पुस्तक मनुष्यों का इस प्रकार का अमानवीय विभाजन नहीं कर सकती और ना ही धर्म और राज्य की संयुक्त शक्ति से उन्हें आतंकित कर यह विश्वास दिला सकती है कि अगर वे गुलाम बने रहें, तो उन्हें स्वर्ग में स्थान प्राप्त होगा। भारत को छोड़कर दुनिया में कहीं भी, कोई भी इस तरह की बर्बरता को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले ज्ञान को ईश्वरीय नहीं मानेगा। परंतु भारत के शूद्रों और दलितों ने इस कथित दैवीय आदेश को हजारों वर्ष तक स्वीकार किया।

नियंत्रण में शूद्र राजा

प्राचीनकाल से और विशेषकर चन्द्रगुप्त मौर्य के युग से लेकर अब तक शूद्र राजा, ब्राह्मण लेखकों के आध्यात्मिक नियंत्रण में रहे. यद्यपि उन्हें युद्धकला आती थी, वे प्राकृतिक शक्तियों से मुकाबला कर सकते थे और खाद्यानों का उत्पादन करने में सक्षम थे। इसके बाद भी शूद्रजनों ने लिखित शब्द को ब्राह्मणों को समर्पित कर दिया और भय व दास भाव को अपनी मानसिकता में शामिल कर लिया। ब्राह्मणों ने ईश्वर का दर्जा हासिल कर लिया और खाद्यान्न उत्पादक उनसे डरने लगे तथा यह मानने लगे कि ब्राह्मणों में वे सभी शक्तियां हैं, जो ईश्वर में होती हैं। मनुष्यों में ईश्वर के विचार का विकास, शिकारी और मछुआरो से मवेशी पालक और फिर कृषक बनने की मनुष्य जाति की यात्रा के दौरान हुआ। ब्राह्मणों ने भूदेव होने के नाम पर खुद को अन्य लोगों पर लाद दिया। यह करने में उन्होंने असाधारण आध्यात्मिक कपटता का परिचय दिया। भारत में उन्होंने धर्म की प्रकृति को ही विकृत कर दिया। कौटिल्य ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में ही ब्राह्मणों की दैवीय दर्जे को राज्य का आवश्यक तत्त्व बना दिया था।

कौटिल्य ने राज्य की संस्थाओं के प्रशासन और संचालन के संदर्भ में किसी व्यक्ति की जाति में परिवर्तन की संभावना को पूर्णतः नकार दिया। यहां तक कि उन्होंने व्यक्तियों के व्यवसाय में परिवर्तन की संभावनाओं को भी समाप्त कर दिया। जातिगत पदक्रम को बनाए रखने के लिए, राज्य को हिंसक और क्रूर बना दिया कौटिल्य ने शूद्रों/दलितों को याचक की मुद्रा में लाकर, राज्य के सभी संसाधनों का समूर्ण नियंत्रण ब्राह्मण, क्षत्रिय और बनिया शक्तियों को दे दिया। यह तब जबकि शूद्र/दलित मुख्य उत्पादक शक्ति थे।

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अध्येताओं के अनुसार, अर्थशास्त्र, जिसे मौर्य काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान लिखा गया था, के काफी बाद मनुस्मृति लिखी गई। यह वह दौर था जब राज्य की संस्थाओं पर ब्राह्मणों की पकड़ और मज़बूत हो रही थी। ‘ईश्वर के विधान’ पर आधारित वैदिक सभ्यता की स्थापना के साथ ही हड़प्पा की सभ्यता के अर्थशास्त्रियों, पशुपलकों और कृषि कर्मियों, जिन्हें शूद्र कहा गया, को गुलाम का दर्जा दे दिया गया। अर्थशास्त्र  ने इस दैवीय व्यवस्था को राज्य तंत्र का हिस्सा बना दिया और इसे लागू करने के लिए यह घोषित कर दिया कि जो इसका पालन नहीं करेंगे, वे ईश्वर के कोप के भागी होंगे।

शूद्र राजाओं को खेतों में पसीना बहाने वाले उनके ही बंधुओं का दमन करने के लिए मजबूर किया गया।  कौटिल्य ने ब्राह्मणों को हर किस्म की स्वतंत्रता और ढेर सारा अवकाश का समय दिया और उन्हें शूद्रों और राज्य से भेंट प्राप्त करने का पात्र घोषित किया। शूद्रों, वैश्यों और क्षत्रियों को यह ज़िम्मेदारी दी गई कि वे ब्राह्मणों को धन-संपत्ति का दान करें। इससे साफ़ है कि ब्राह्मणों से श्रम करने या उत्पादन प्रक्रिया में भागीदारी करने की अपेक्षा नहीं थी।

जिस तथाकथित मानसिक श्रम को करने की ज़िम्मेदारी ब्राह्मणों ने अपने कंधों पर ली, वह पूरी तरह से नकारात्मक था। अगर शूद्र उन्हें दान-दक्षिणा देने में आनाकानी करें तो वे राज्य के ज़रिये उन्हें सजा दिलवा सकते थे। शूद्रों को राज्य को कर देने होते थे और साथ ही उन्हें श्रम करने की आवश्यकता से मुक्त ब्राह्मणों की पूरी आबादी के जीने का खर्च भी उठाना होता था। भारतीय इतिहास में ब्राह्मण कभी दाता नहीं रहे। वे हमेशा प्राप्तकर्ता रहे। भूदेव का विचार, उस सार्वभौमिक ईश्वर की परिकल्पना का निषेध है, जो मनुष्यों को जीवन, संपत्ति और धरा से भोजन पैदा करने का और अपना परिवार चलने की योग्यता और क्षमता देता है। ब्राह्मणों के ईश्वर और ब्राह्मण स्वयं सार्वभौमिक आध्यात्मिक आचार और नैतिकता के विलोम हैं। ब्राह्मण का दैवीय दर्जा स्वीकार करने के बाद, शूद्र अपने ही हितों के खिलाफ काम करने और अपने लोगों के खिलाफ कानून बनाने पर मजबूर हो गए।

संविधान बनाम मनु का विधान

वर्तमान में हमारे देश पर शासन कर रही हिंदुत्ववादी शक्तियों को हमें ब्राह्मणों के लेखन और उसके अध्यात्मिक प्रभाव की पृष्ठभूमि में समझना होगा। वे केवल वैदिक और उत्तर-वैदिक साहित्य और ब्राह्मणों की कृतियों जैसे अर्थशास्त्र, मनुस्मृति और वात्स्यायन के कामसूत्र को भारतीय सभ्यता के मूलाधार के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। वे अर्थशास्त्र  पर आधारित राज्य और मनुवाद पर आधारित नागरिक समाज की पुनर्स्थापना करने का प्रयास कर रही हैं। बहुत कम शूद्र इस ऐतिहासिक प्रक्रिया, जिसका स्वयं वे भी भाग हैं, को समझ पा रहे हैं। जैसा कि हमने अपनी किताब शूद्रास: विज़न फॉर न्यू पाथ  में बताया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक के.बी. हेडगेवार ने मनु की सराहना करते हुए उनकी संहिता को लाईसरगिस और सोलोन की संहिता से बेहतर बताते हुए खेदपूर्वक कहा था कि “संविधान के पंडितों के लिए इसका (मनु की संहिता) कोई मोल ही नहीं है।” हेडगेवार के मन में उस संविधान, जिसके मसविदे को तैयार करने में आंबेडकर की भी भूमिका थी, के प्रति ज़रा भी सम्मान नहीं था उस संविधान के प्रति, जिसने आरएसएस के सदस्य और एक ओबीसी नरेंद्र मोदी की 2014 में देश का प्रधानमंत्री बनने में मदद की। मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में आरएसएस नेता राम माधव ने अपनी पुस्तक बिकॉज़ इंडिया कंम्स फर्स्टरिफ्लेक्शन्स ऑन नेशनलिज्म, आइडेंटिटी एंड कल्चर (2020) की भूमिका में लिखा, “पांच हज़ार के अपने ज्ञात इतिहास में भारत ने ज्ञान के ऐसे मोती दुनिया को दिए, जिनसे संपूर्ण मानवता समृद्ध हुई…यह ज्ञान और विवेक भारत के सबसे पुराने संविधानों में से एक मनुस्मृति में प्रकाशित है।” उन्होंने मनुस्मृति  से एक संस्कृत श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा, “दुनिया के सब लोग चरित्र के बारे में शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस देश में जन्में महान पुरुषों से सीखेंगें।”[3]  माधव के अनुसार, मनु भारत का सबसे ज्ञानी व्यक्ति था और दुनिया को संस्थाओं का निर्माण करना उससे सीखना चाहिए। शायद वे जाति और अछूत प्रथा की संस्थाओं की बात कर रहे थे! वे अच्छी तरह से जानते हैं कि आंबेडकर ने इस ‘महान संविधान’ का दहन किया था, क्योंकि वे मानते थे कि यह पुस्तक एक बर्बर व्यवस्था के निर्माण की बात करती है और उसमें कुछ भी सकारात्मक नहीं है। आरएसएस नेता माधव, आंध्र प्रदेश के ब्राह्मण हैं और जानते हैं कि पूरे देश के शूद्र और दलित मनुवादियों को राष्ट्र-विरोधी मानते हैं क्योंकि उनके कारण ये वर्ग स्थाई रूप से गुलाम बन गए। नरेंद्र मोदी कभी मनु का नाम नहीं लेते। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वे केवल गौतम बुद्ध का नाम लेते हैं, परंतु राम माधव चाहते हैं कि आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन भाजपा के लिए काम करने वाले सभी शूद्र, दलित और आदिवासी केवल मनुस्मृति, जिसे आंबेडकर ने जलाया था, का पालन करें और उस संविधान को न मानें, आंबेडकर जिसके हिमायती थे और जो उन्हें कम से कम राज्यतंत्र में ब्राह्मणों के समकक्ष दर्जा देता है। हिंदू आध्यात्मिक व्यवस्था में अब भी ब्राह्मणों का राज है। आरएसएस के शूद्र, दलित और आदिवासी भी हिंदू मंदिरों में पुजारी नहीं बन सकते। संघ परिवार से जुड़े शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को यह समझना चाहिए कि आज 21वीं सदी में भी हेडगेवार से लेकर राम माधव तक संघ के सभी ब्राह्मण नेता केवल कौटिल्य और मनु में श्रद्धा रखते हैं। आंबेडकर, जिनके द्वारा निर्मित संविधान ने कानून और राजनीति के क्षेत्रों में इन वर्गों को मुक्ति दिलाई, संघ के नेतृत्व के सम्मान का पात्र नहीं हैं।

दकियानूसी बनाम धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मण

हिन्दुत्ववादी ब्राह्मण खुलकर कौटिल्य और मनु की प्रशंसा के गीत गाते हैं। धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी और वामपंथी ब्राह्मण इस संबंध में चुप्पी साधे रहते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं कि मानो उनके लिए प्राचीन ब्राह्मणों के विचारों का कोई महत्व ही नहीं है। ब्राह्मणवादी ग्रंथों की ऐसी एक भी वामपंथी-उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष समालोचना उपलब्ध नहीं है, जिसका प्रयोग हिन्दुत्ववादी ब्राह्मणों से मुकाबला करने के लिए किया जा सके। व्यवहार के स्तर पर बात तो यह है कि इस मामले में वामपंथी-उदारवादी ब्राह्मणों की चुप्पी को हिंदू ब्राह्मणों से उनकी सहमति के रूप में देखा जाना चाहिए और इसलिए शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को उनके उदारवाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को शंका की दृष्टि से देखना चाहिए। परंतु शूद्र-ता और ब्राह्म्ण-ता के साथ कुछ मूलभूत समस्याएं हैं, जिन पर मैं इस लेख के अंत में चर्चा करूंगा।

पिछली सदी के उत्तरार्ध में कई शूद्र विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री व केन्द्र तथा राज्य सरकारों में मंत्री बने। उनके संदर्भ में भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर भारत में शूद्र शासक कब तक ब्राह्मणों के ग्रंथों की आध्यात्मिकता के गुलाम बने रहेंगे? इस मामले में आरएसएस की सुविचारित चुप्पी का अर्थ यह है कि वह चाहता है कि ब्राह्मणों की आध्यात्मिक शक्तियां कायम रहें और उन पर कोई नियंत्रण न हो। आरएसएस के ब्राह्मण नेताओं में इतनी अक्ल तो है ही कि वे राजनीति के क्षेत्र में उन्हें प्रचुर शक्तियां देने वाले मनु और कौटिल्य का दामन न छोड़ें।

अर्थशास्त्र  में निर्दयता

कौटिल्य का अर्थशास्त्र चाडांल और आदिवासियों को पृथक श्रेणियां नहीं मानता। कौटिल्य के वर्गीकरण के अनुसार दलित और आदिवासी दोनों शूद्र की श्रेणी में आते हैं। कौटिल्य ने जिस सामाजिक-विधिक तंत्र का निरूपण किया है, उसमें सभी कृषक और शिल्पकार शूद्र हैं। परंतु, इसके साथ ही उन्हें उनके पेशों के आधार पर कई टुकड़ों में बांट दिया गया है। कौटिल्य की राज्य से अपेक्षा है कि वह लोगों को उनके व्यवसाय और जाति की सीमाओं से बाहर न जाने दे। ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता द्वारा जाति और पेशागत नियमों को इतने लंबे समय से लागू किया जा रहा है कि आज भी शूद्र, जो आधुनिक भारत की आबादी का 52 प्रतिशत से अधिक हैं, यह मानते हैं कि उन्हें आध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्रों में ब्राह्मणों के प्रभुत्व को स्वीकार करना चाहिए। आधुनिक भारत में उनका राजनैतिक और आर्थिक दर्जा चाहे जो हो, वे आज भी ब्राह्मणों को भू-देवता मानते हैं। इस तरह के मानसिक आत्मसमर्पण के कारण उनकी बौद्धिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक क्षमताओं का अब भी पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रहा है। उदाहरण के लिए, बंगाल में शूद्र और नमोशूद्र, फिर चाहे वे वामपंथी हों, उदारवादी या हिन्दुत्वववादी, सभी ब्राह्मणों और कायस्थों के समक्ष नतमस्तक हैं।

मनुस्मृति  के जरिए उत्पादक शूद्र, दलित और आदिवासी वर्गों को ब्राह्मणवाद के मजबूत चंगुल में फंसाकर उन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने में मनु की भूमिका पर बहुत चर्चा हो चुकी है। परंतु इस संदर्भ में पर्याप्त विमर्श नहीं हुआ है कि पदक्रम पर आधारित वर्ण व्यवस्था व ब्राह्मणवादी विचारधारा के पालनार्थ राज्य की संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करने में कौटिल्य के अर्थशास्त्र  की क्या भूमिका थी। हिंदू सामाजिक व्यवस्था की अपनी गहन समीक्षा में बी.आर. आंबेडकर ने अर्थशास्त्र को छोड़कर ब्राह्मणवाद के लगभग सभी प्रमुख ग्रंथों की पड़ताल की है। परंतु अर्थशास्त्र ही वह ग्रंथ है जो उस रणनीति को प्रस्तुत करता है, जिससे ब्राह्मणवादी भारत में राज्य के ढांचे पर अपना चिरस्थायी नियंत्रण स्थापित कर सके। आज भी राज्य की संस्थाओं पर ब्राह्मणवादियों की पकड़ बहुत मजबूत है, क्योंकि कौटिल्य द्वारा किया गया वर्णों का वर्गीकरण आज भी वह नियामक सिद्वांत बना हुआ है जो राज्य का पथ प्रदर्शन करता है। कथित धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी द्विज अध्येताओं ने भारतीय राज्य के इस पहलू को सबसे छुपाए रखा, क्योंकि वे जानते थे कि इससे ही वे स्वाधीन भारत में राज्य की संस्थाओं और नागरिक समाज पर अपना नियंत्रण कायम रख सकेंगे।

कई लोग इस पुस्तक के शीर्षक से भ्रमित होकर यह सोचते हैं कि अर्थशास्त्र धन के विज्ञान पर केन्द्रित है। दरअसल, यह पुस्तक ब्राह्मणवादियों को राज्यसत्ता के हर पहलू में प्राधान्य प्रदान करती है और उत्पादक शक्तियों – शूद्रों और दलितों – के सामर्थ्य को कमजोर करती है।

कामसूत्र  से क्षति

तीसरी पुस्तक है कामसूत्र, जिसके लेखक प्राचीन ब्राह्मण वात्स्यायन हैं। इस पुस्तक का उद्धेश्य शूद्रों और दलितों, विशेषकर उनकी महिलाओं, पर नियंत्रण करना है। वात्स्यायन ने शूद्र, दलित व आदिवासी महिलाओं को कामवासना को संतुष्ट करने वाली वस्तुओं के रूप में प्रस्तुत किया।

जानी-मानी अमरीकी संस्कृत अध्येता वेन्डी डोनिगर का इस बारे में अलग मत है। वे लिखती हैं, “शास्त्रीय संस्कृत साहित्य में कामसूत्र  इस अर्थ में अनूठा है कि उसमें वर्ग (वर्ण) और जाति की पूरी तरह अवहेलना की गई है। पुस्तक में लिंग, धन-सम्पत्ति, राजनैतिक दर्जे और जाति पर आधारित सत्ता संबंध अर्न्तनिहित हैं, परंतु कामसूत्र के लेखक के लिए आर्थिक संपन्नता सबसे महत्वपूर्ण है[4], परंतु कामुकता पर चर्चा के दौरान इस पुस्तक में सामाजिक भेदभाव की जिस तरह से चर्चा की गई है, उससे यह स्पष्ट है कि यह पुस्तक ब्राह्मणों और क्षत्रियों के शासकवर्ग और बनिया व्यापारियों के लिए लिखी गई थी, जिनकी उत्पादन में कोई भूमिका नहीं होती थी और जिनके पास पर्याप्त खाली समय उपलब्ध रहता था।

कामसूत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण महिलाओं को केवल ब्राह्मण पुरूषों की पत्नी होना चाहिए, परंतु शूद्र/दलित महिलाओं को नागरिकों (शहरी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुरूष जो मौज-मस्ती करना चाहते थे) की सुविधा के लिए गणिका (सेक्स वर्कर) के रूप में काम करना चाहिए।

मानगांव, कोल्हापुर राज्य में मार्च 1920 में आयोजित दक्षिण महाराष्ट्र बहिष्कृत वर्ग सम्मेलन में शाहूजी महाराज व डॉ. आंबेडकर; बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़

भारत के लंबे इतिहास में किसी शूद्र राजा की ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई। शूद्र राजाओं में इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि वे ब्राह्मणवाद की छतरी से बाहर के उत्पादक वर्गों की आध्यात्मिक प्रणाली का अनुमोदन या अभिलेखीकरण करते। उन्होंने न तो शूद्र बच्चों के लिए स्कूल खोले और ना ही अपने स्वयं के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता पर पुस्तकों का लेखन करवाया। शूद्र और द्विज एक राष्ट्र नहीं रहते थे। वे पृथक सांस्कृतिक और संस्थागत समूह थे। राजाओं तक को बिना कोई प्रश्न उठाए ब्राह्मणों के आदेश मानने पर मजबूर किया गया। वे स्वयं भी ब्राह्मणों को भूदेव मानते थे। राजा होते हुए भी वे सामाजिक-आध्यात्मिक दास थे और उन्हें पुस्तकें लिखने-पढ़ने का अधिकार नहीं था। क्षत्रिय का दर्जा पाने के बाद उनमें से कुछ लिख-पढ़ सकते थे, परंतु उनके मन में ब्राह्मणों के नियंत्रण वाले देवों का भय इस कदर भर दिया गया था कि वे उत्पादक आमजनों से दूरी बनाए रखते थे। शूद्र राजाओं को कभी यह अहसास ही नहीं हुआ कि उनके पूर्वजों के देवी-देवता, ब्राह्मणवादी पुस्तकों के देवी-देवताओं से अलग थे। ब्राह्मणों के देव मुख्यतः युद्धों के नायक थे. इसके विपरीत शूद्रों के देवी-देवताओं उत्पादन और विकास की प्रक्रियाओं पर आधारित उनकी संस्कृति (देखें इस लेखक की पुस्तक व्हाय आई एम नॉट हिंदू) से विकसित हुए थे। आज भी शूद्र नेता ब्राह्मण देवों पर श्रद्धा रखते हैं। ब्राह्मण शूद्र राजा से कहते थे कि अगर वह उनकी बात नहीं मानेगा तो वे उसे श्राप दे देंगे या उनके देवता उसे दंडित करेंगे। ब्राह्मणवादी आध्यात्मिक विचारधारा पूरी तरह से मिथक थी और इसका विकास सिर्फ इसलिए किया गया था ताकि कृषि और कारीगरी में भागीदारी के बगैर धन और सत्ता हासिल की जा सके।

शूद्रों को मौखिक व लिखित रूप से प्रसारित किए जा रहे इस आध्यात्मिक सिद्धांत का विरोध करना था। आखिर ब्राह्मणों की तरह वे भी मनुष्य थे। शूद्र राजाओं के मन में ब्राह्मणों द्वारा लिखित पुस्तकों का भय इस तरह भर दिया गया था, जैसे वे पुस्तकें ईश्वर की वाणी और ध्रुव सत्य हों। ब्राह्मणों ने शूद्रों से कहा कि उन्हें इन पुस्तकों को छूने तक का अधिकार नहीं है और शूद्रों ने इसे मान लिया। इस तरह का आदेश आध्यात्मिकता के नाम पर ऐतिहासिक प्रवंचना थी। शूद्रों, दलितों और आदिवासियों से इन पुस्तकों को पढ़ने तक का अधिकार छीन लिया गया, जिससे उनके मन में ब्राह्मणों और उनके देवताओं का भय और गहरा हो गया।

यह तो सुखद है कि छत्रपति शाहूजी महाराज ने उनके राज्य पर ब्राह्मणों की मजबूत पकड़ का लेखा-जोखा हमारे लिए छोड़ा है। वे एक क्रांतिकारी शासक थे, जो जाति के पदक्रम को पलट देना चाहते थे। उन्होंने अपने राज्य का हाल स्वयं बयान किया। उन्होंने बताया है कि किस प्रकार ब्राह्मणों का राज्य में पूर्ण वर्चस्व था और राज्य की गतिविधियों के सभी क्षेत्रों पर उनका पूर्ण नियंत्रण था। बंबई प्रांत के पूर्व गर्वनर को लिखे पत्र में उन्होंने अपने राज्य में ब्राह्मणों की भूमिका का विवरण दिया है। यह एकमात्र ऐसा दस्तावेज है, जो शूद्रों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध किसी शूद्र राजा द्वारा लिखा गया है।

संभवतः तीसरी सदी ईसा पूर्व में कौटिल्य के चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही शूद्र वर्ण के शासक ब्राह्मण प्रधानमंत्री और मुख्य पुजारी के नियंत्रण में रहने आए हैं। मुस्लिम राजाओं और फिर अंग्रेजों के शासनकाल में भी इस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। यह एक ज्ञात ऐतिहासिक तथ्य है कि शूद्र कृषक और शिल्पकार समुदायों ने कभी वेदों, अर्थशास्त्र और मनुस्मृति द्वारा निगमित वर्णधर्म व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह नहीं किया। अंग्रेजों द्वारा स्कूलों के द्वार शूद्रों के लिए खोलने के पूर्व तक उन्हें शिक्षा प्राप्त करने और लिखित रूप में अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार नहीं था। शूद्र कभी अपने आंतरिक जाति व पेशागत विभाजनों से ऊपर उठकर स्वयं को संगठित नहीं कर पाए। ब्राह्मणवादी ज्ञान ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद नहीं की, बल्कि उसने खाद्यान्न उत्पादकों, जो राष्ट्रीय संपत्ति के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे, की प्रगति को बाधित किया और उनमें बदलाव की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया। शूद्रों द्वारा शासित राज्यों के शिलालेखों पर क्या लिखा जाना है, इसका निर्धारण भी ब्राह्मण ही करते थे। अशोक के अलावा कोई भी राजा ब्राह्मणों की सत्ता को दरकिनार नहीं कर सका और अशोक भी यह तब कर पाया जब उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। यह विडंबना ही है कि अशोक के नेतृत्व में प्राचीन भारत में जो बौद्ध क्रांति हुई थी और जनकल्याण पर आधारित जो प्रशासनिक व्यवस्था कायम हुई थी, उसे पुष्यमित्र शुंग के सत्ता में आने के बाद ब्राह्मणों के नेतृत्व में हुई प्रतिक्रांति ने नष्ट कर दिया। तब से कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मनु के धर्मशास्त्र का जीवन के सभी क्षेत्रों में शूद्रों का सुनियोजित ढंग से दमन करने के लिए उपयोग किया जाता रहा। उस काल से लेकर मुसलमानों का शासन स्थापित होने तक सभी राजा, शासन व्यवस्था का संचालन ब्राह्मणों के नेतृत्व और पथ प्रदर्शन में करते रहे।

मैंने अपनी पुस्तक गॉड एज पालिटिकल फिलासफर बुद्धास चैलेंज टू ब्रह्मनिज्म (2000) में समाज और राजनीति के संबंध में बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म के विचारों के बीच मूलभूत अंतर का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। बौद्ध धर्म के भारत में प्रसार के बाद यह धर्म शासकों को रास्ता दिखाने लगा। यह तब तक जारी रहा जब तक कौटिल्य ने अर्थशास्त्र  लिखकर एक ऐसी नई व्यवस्था को नहीं रचा, जिसमें शासक भले ही किसी भी वर्ण या जाति का क्यों न हो, सत्ता का संचालन मुख्य पुरोहित और प्रधानमंत्री के रूप में ब्राह्मण ही करते थे। मौर्य काल से लेकर नंदों के शासनकाल, अर्थात तीसरी सदी, तक ब्राह्मणों को राज्य के कार्यकलापों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था। कौटिल्य ने सुनियोजित ढंग से नंद कुल को उखाड़ फेंका और चंद्रगुप्त मौर्य, जो एक शूद्र था, के शासन को स्थापित किया। परंतु प्रधानमंत्री और मुख्य पुरोहित के रूप में कौटिल्य का राज्य पर संपूर्ण नियंत्रण था। भारत में औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद भी ब्राह्मणों की सत्ता और उनके दबदबे में कोई कमी नहीं आई।

मुझ जैसे लोगों, जो निज़ाम के राज्य के हिस्से हैदराबाद में जन्मे और बड़े हुए, को यह देख कर बहुत आश्चर्य होता था कि ब्राह्मण किस तरह शास तंत्र और नागरिक समाज पर अपना प्रभुत्व स्थापित किए हुए थे। हैदराबाद में मुस्लिम शासन लगभग तीन सौ वर्ष चला। परंतु सन् 1948 में इसके समाप्त होते ही एक ब्राह्मण, बरगुला रामकृष्ण राव, संयुक्त आंध्र प्रदेश (जिसमें वर्तमान तेलंगाना भी शामिल था) के प्रथम मुख्यमंत्री बन गए। इसके साथ ही इस राज्य पर ब्राह्मणों के नियंत्रण का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। सातवाहन और काकतीय वंश के शासनकाल (13वीं सदी से प्रारंभ) में भी ब्राह्मण नौकरशाही और पुरोहिताई पर अपना एकाधिकार बनाए रखने में सफल रहे। आज भी कुम्हारी (कुम्हार) जाति के लोग यह दावा करते हैं कि सातवाहन उनके समुदाय से थे। कुम्हार शूद्रों में भी निम्न श्रेणी के समझे जाते हैं। काकतीय भी शूद्र थे और आज कई शूद्र जातियां उनके वंशज होने का दावा करती हैं। यह दावा किया जाता है कि काकतिया कम्मा या मुदीराजा थे। परंतु इसकी बाद भी काकतिया वंश के शिलालेखों में भी चातुर्वर्ण व्यवस्था का कड़ाई से पालन किए जाने का निर्देश दिया गया है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी छोटे-छोटे राजे-रजवाड़ों के शासक ब्राह्मणों की सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे। ब्राह्मणों का हिंदू व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। शूद्र राजा निडर होकर युद्ध लड़ लेते थे, परंतु ब्राह्मणों की आध्यात्मिक शक्ति से भयभीत रहते थे। जिन शूद्र योद्धाओं ने युद्ध जीतकर सत्ता पर अपना कब्जा जमाया, उन्हें भी ब्राह्मणों द्वारा यह कहकर क्षत्रिय का दर्जा लेने पर मजबूर किया गया कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो दैवीय दंड के भागी होंगे। उन्हें क्षत्रिय घोषित करने के बाद उन्हें यह निर्देश दिया जाता था कि वे शूद्र आमजनों से दूर रहें, ब्राह्मणों के आदेशों का पालन करें और राज्य का संचालन ब्राह्मण प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार करें।

धार्मिक मामलों में ब्राह्मण मुख्य पुरोहित राजा का पथप्रदर्शक होता था। पुजारी नियमित रूप से राजा से भेंट प्राप्त करते थे। कई मामलों में उन्हें कृषि भूमि दान में दी जाती थी, जिसे अग्रहार भूमि कहा जाता था। समय के साथ पुजारियों का परिवार इस भूमि को अपनी निजी संपत्ति बना लेता था। इस भूमि पर बिना मजदूरी दिए शूद्रों से खेती करवाई जाती थी। पुजारी और मंत्रियों के कहने पर राजा राज्य के धन से आगम शास्त्रों के अनुरूप ब्राह्मण देवों के विशाल मंदिर बनाते थे। इन मंदिरों में पूजा करने का अधिकार उनके आसपास रहने वाले ब्राह्मण परिवारों को दे दिया जाता था।

पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध शूद्र महिला शासक रानी रासमणि ने 19वीं सदी में हुगली में गंगा के तट पर प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण करवाया। रानी ने मंदिर के आसपास 33 एकड़ भूमि भी खरीदी, परंतु बंगाल के ब्राह्मणों ने रानी को मंदिर का उद्घाटन नहीं करने दिया। उन्होंने रानी से कहा कि मंदिर में देवी तभी स्थापित की जा सकती हैं, जब वे मंदिर और उसके आसपास की पूरी भूमि किसी ब्राह्मण को सौंप दें। रानी ने मंदिर और उसकी भूमि का मालिकाना हक रामकृष्ण परमहंस के बुजुर्ग पिता रामकुमार चट्टोपाध्याय को स्थानांतरित कर दिया। परमहंस को वह भूमि और मंदिर विरासत में प्राप्त हुआ और उसका इस्तेमाल कर उन्होंने एक आध्यात्मिक विद्वान के रूप में अपनी छवि बनाई। धीरे-धीरे उन्होंने इतिहास से रानी का नाम ही मिटा दिया।  हिंदू  में अपने लेख में अमितान्घुश आचार्य लिखते हैं, “जैसे-जैसे उच्च जातियों (ब्राह्मण और कायस्थ) के राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का नाम होता गया, वैसे-वैसे रानी रासमणि, जो 19वीं सदी का एक प्रमुख व्यक्तित्व थीं, इतिहास के हाशिये पर खिसकती गईं।”[5]

कौटिल्य की पुस्तक ब्राह्मणों को निःशुल्क भूमि और निःशुल्क श्रम के साथ-साथ शिक्षा पर एकाधिकार भी देती है और शिक्षा पर एकाधिकार नागरिक समाज और राज्य की ब्राह्मणों को सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भेंट है। ब्राह्मणों की शक्ति का स्रोतहैं वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र और मनुस्मृति. शारीरिक बल या किसी भी अन्य तरीके से कभी वे इतनी व्यापक शक्ति हासिल नहीं कर सकते थे, जितनी कि लिखित शब्द की आध्यात्मिक ताकत ने उन्हें दी। जब देश स्वतंत्र हुआ तब भी ब्राह्मण इस शक्ति और भौतिक संपत्ति से संपन्न थे। उन्होंने तुरंत संस्कृत की जगह अंग्रेजी पढ़ना शुरू कर दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू (जो कश्मीरी ब्राह्मण थे) के नेतृत्व में ब्राह्मण, जिनमें से अधिकांश इंग्लैंड में शिक्षित थे, ने राज्य और नागरिक समाज की संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। जो ब्राह्मण अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने इंग्लैंड नहीं जा सके, वे देश में स्थित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों या संस्कृत गुरूकुलों में पढ़ने लगे और अधिकारी और मंदिरों के पुजारी बन गए। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अपना प्राधान्य करने के लिए उन्होंने शूद्रो, दलितों और आदिवासियों को हिंदू घोषित कर दिया, परंतु उन्हें उनके मूलभूत आध्यात्मिक अधिकार नहीं दिए। शूद्र, दलित और आदिवासी या तो अशिक्षित बने रहे या उनकी शिक्षा केवल उनकी क्षेत्रीय भाषा तक सीमित रह गई।

अतीत में ब्राह्मण पुरोहितों और प्रधानमंत्रियों ने शासकों का उत्पादक वर्गों से कभी सीधा रिश्ता नहीं बनने दिया। शूद्र राजा ब्राह्मण की शक्ति को कम करने के लिए कुछ न कर सके। अगर शूद्र राजाओं ने ब्राह्मणों के आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनैतिक प्रभुत्व के विरूद्ध विद्रोह किया होता तो स्तरीकृत असमानता और जाति-आधारित अछूत प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो जाती। परंतु ब्राह्मणों की शक्ति की जड़ें बहुत गहरी थीं। ईश्वर पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी और इस कारण राजा भी ब्राह्मणों का विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा सके। शूद्र, चाहे वे शासक रहे हों या आमजन, यह नहीं समझ पाए कि ब्राह्मणों से इतर उनकी एक स्वतंत्र आध्यात्मिक परंपरा है। परंतु ब्राह्मणों की तरह उनकी परंपरा को किताबों में दर्ज नहीं किया गया है और ना ही उस परंपरा में प्रशिक्षित पुरोहित उपलब्ध हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ब्राह्मणों ने अपने गुरूकुलों में शूद्रों को शिक्षा देने से इंकार कर दिया और शूद्र राजाओं को उनके अपने स्कूल खोलने की इजाजत नहीं दी। अपने भोलेपन में शूद्र राजा यह मानते रहे कि अगर वे अपनी स्कूल खोलेंगे तो उन्हें ब्राह्मणों और उनके देवों के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। ऐसे कई शूद्र योद्धाओं के बारे में हम जानते हैं जो युद्धकला में पारंगत होने के बाद भी ब्राह्मणों और मंत्रों की आध्यात्मिक शक्ति के आगे नतमस्तक थे।

छत्रपति शिवाजी को ब्राह्मण पुरोहितों के नेतृत्व में क्षत्रिय का दर्जा स्वीकार करना पड़ा। चूंकि वे एक साधारण मराठा परिवार से थे, इसलिए स्थानीय ब्राह्मणों ने उनका राजतिलक करने से इंकार कर दिया। इसके बाद काशी से ब्राह्मण पुरोहितों को बुलवाया गया, जिन्होंने उनका राजतिलक किया। इस प्रकार शिवाजी ने भी ब्राह्मणों की आध्यात्मिक शक्ति के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इतने वीर योद्धा के मन में यह विचार नहीं आया कि वह शूद्रों को प्रशिक्षित कर उन्हें पुजारी बना सकता है और इस प्रकार धर्म को शूद्रों के नियंत्रण में रख सकता है। जिस व्यक्ति ने मुगल शासकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वह धर्म के क्षेत्र के सर्वेसर्वा ब्राह्मणों से मुकाबला नहीं कर सका। सच तो यह है कि जो धर्म सबके लिए खुला न हो वह धर्म हो ही नहीं सकता। परंतु ब्राह्मण और बनिया बुद्धिजीवी हिंदू धर्म को समावेशी बताते नहीं थकते। शूद्र राजा ब्राह्मणों को ईश्वरतुल्य मानते थे और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के निर्देशानुसार उनकी हर मांग पूरी करते थे।

उदाहरण के लिए बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़, जिन्होंने आंबेडकर को उच्च शिक्षा प्राप्त करने अमरीका भेजा था, वे एक शूद्र शासक थे। परंतु वे दूरदृष्टा थे और उन्होंने एक मेधावी दलित विद्यार्थी की विदेश में पढ़ाई को प्रायोजित करने का निर्णय लिया। आंबेडकर को वजीफा इस शर्त पर दिया गया कि शिक्षा पूरी करने के बाद वे बड़ौदा राज्य के लिए काम करेंगे। परंतु जब अमरीका से लौटने के बाद आंबेडकर ने बड़ौदा प्रशासन में काम करना शुरू किया तो यह ब्राह्मणों को रास नहीं आया। बीसवीं सदी में भी ब्राह्मणों को यह स्वीकार न था कि कोई दलित उनका वरिष्ठ अधिकारी या सहकर्मी बने। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स में पढ़े थे। बड़ौदा के पुरोहित वर्ग ने राजा को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे शहर में आंबेडकर को रहने का स्थान न दें। अंततः केवल चार दिन नौकरी करने के बाद आंबेडकर को काम छोड़कर बंबई रवाना होना पड़ा। यह 1917 की बात है। इससे स्पष्ट है कि दलितों सहित दमित वर्गों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने में विश्वास रखने वाला शूद्र राजा भी ब्राह्मणों की शक्ति के आगे असहाय था।[6]

मुस्लिम शासन के दौरान भी स्थानीय शूद्र राजा फारसी भाषा को समझने और लिखने के लिए ब्राह्मणों, कायस्थों या खत्रियों पर निर्भर थे। मुस्लिम शासक भी ब्राह्मणों से उलझना नहीं चाहते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि वे शूद्र आमजनों को भड़काकर उनके खिलाफ विद्रोह करवा देंगे। मुस्लिम काल में शायद ही किसी शूद्र ने फारसी भाषा सीखी हो। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मुस्लिम शासकों ने गांवों में शूद्रों जो मुख्यतः कृषक, पशुपालक और शिल्पकार थे, के लिए फारसी स्कूल खोला हो।

यह सही है कि चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर औपनिवेशिक काल तक के कई राजे-रजवाड़े और उनसे लेकर स्वतंत्र भारत के कई राज्यों के मुख्यमंत्री तक शूद्र रहे हैं। परंतु वे कभी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त नहीं कर सके। उनकी राजनैतिक शक्तियों पर भी ब्राह्मण अधिकारियों और पुरोहितों द्वारा तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए जाते थे। राजाओं से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी वर्ण-आधारित आध्यात्मिक व्यवस्था के गुलाम थे और हैं. यह नियंत्रण अब तक कायम है क्योंकि हिंदू आध्यात्मिक व्यवस्था के प्रजातांत्रिकरण का कभी कोई प्रयास ही नहीं किया गया।

आखिर शासक ब्राह्मणों से इतना डरते क्यों थे? आखिर ब्राह्मणों की आबादी बहुत कम थी और सेना पर उनका प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता था। खाद्यान्न उत्पादन और उसकी तकनीकी में बेहतरी में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। बल्कि वे तो खेतों में काम को प्रदूषित करने वाला मानते थे। परंतु उसके बाद भी शूद्र शासकों और जनता पर उनका संपूर्ण नियंत्रण था। जैसा कि मैंने पहले बताया उनकी आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत था लिखित शब्द। ब्राह्मण पूरे देश में फैले हुए थे और उन सबकी एक ही भाषा थी– संस्कृत। शूद्रजन भी देश के विभिन्न हिस्सों में रहते थे, परंतु उनकी कोई एक भाषा नहीं थी और वे एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं थे। ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण स्थानीय भाषाएं नहीं सीखते थे। वे उन्हें सीखते थे और धीरे-धीरे उनका संस्कृतकरण करते थे। आज सदियों में जिन क्षेत्रीय भाषाओं का उत्पादक वर्गों ने विकास किया है, उन सबका अलग-अलग स्तर तक संस्कृतकरण हो गया है। जब इन भाषाओं की लिपि का विकास हुआ तब ब्राह्मणों ने उसमें संस्कृत शब्दावली ठूंसना शुरू कर दिया। साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि शूद्र और दलित प्राचीनकाल में संस्कृत, मुस्लिम काल में फारसी और ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी न सीख सकें। फुले और आंबेडकर का जीवन इस बात का सुबूत है कि शूद्रों को अंग्रेजी या संस्कृत सीखने में किस तरह की परेशानियां होती थीं।आंबेडकर को तो संस्कृत सीखने के लिए जर्मनी जाना पड़ा।

शूद्र राजाओं की संतानों को भी भारत की स्वतंत्रता तक संस्कृत, फारसी या अंग्रेजी में अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती थी। सन् 1947 तक शिक्षित वर्गों में केवल द्विज शामिल थे। द्विज वे थे, जिन्हें ब्राह्मणों, विशेषकर कौटिल्य और मनु ने, तीन उच्च वर्गों का दर्जा दिया था और जिन्हें खेती या पशुपालन से संबंधित कोई काम नहीं करना पड़ता था। स्वाधीन भारत के मुख्य स्तंभ बने गुजराती बनिया गांधी, जो एक छोटे से रजवाड़े के प्रधानमंत्री का बेटे थे और नेहरू जो कश्मीरी ब्राह्मण थे इन दोनों को जिस तरह की शिक्षा मिली, वैसी किसी शूद्र राजा को भी नसीब नहीं होती थी। सरदार वल्लभभाई पटेल, जो कि शूद्र किसान थे और आंबेडकर, जो एक दलित थे, विदेशी डिग्रियों में तो नेहरू और गांधी से मुकाबला कर सकते थे, परंतु उन्हें हमेशा उन पदों से दूर रखा गया, जिस पर बैठने वालों के हाथों में असली शक्तियां होती थीं। आंबेडकर एक बौद्ध के रूप में मरे और पटेल एक शूद्र के रूप में।

जिस दौर में भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था, उस समय शूद्र राजाओं द्वारा शासित राज्यों में ब्राह्मणों की क्या भूमिका हुआ करती थी, उसे हम शाहूजी महाराज (1874-1922) द्वारा बंबई प्रांत के पूर्व गवर्नर लार्ड सिडेनहेम को लिखे गए एक पत्र से समझ सकते हैं।

शाहूजी महाराज को यह अहसास था कि पुरोहित का दर्जा ब्राह्मणों को नागरिक समाज पर नियंत्रण रखने में बहुत उपयोगी था। वे लिखते हैं: “ब्राह्मण लोगों के धार्मिक जीवन के साथ-साथ उनके गैर-धार्मिक जीवन पर भी नियंत्रण रखते हैं।” उनके अनुसार ब्राह्मण केवल ब्राह्मणों के काम आता है। वे भारतीय समाज को पुरोहितों से भरा और जातियों में विभाजित बताते हैं। वे दक्कन के समाज के बारे में लिखते हैं कि वह (ब्राह्मण) पुरोहितों के उत्पीड़न और अत्याचार से कराह रहा है। चाहे दरबार हो या अदालत, ब्राह्मण एक-दूसरे की मदद करते हैं। गांव के स्तर के राजस्व अधिकारी ब्राह्मण  होते हैं, जिन्हें कुलकर्णी कहते हैं। वे किसानों का जमकर शोषण करते हैं। इसी तरह की व्यवस्था शेष भारत में भी थी। तेलंगाना में भी, जहां का शासक एक मुसलमान था। मेरा बचपन वर्तमान तेलंगाना राज्य में बीता और मुझे याद है कि वहां की संपूर्ण राजस्व प्रणाली ब्राह्मणों के नियंत्रण में थी। शाहूजी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जब तक विभिन्न वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण नहीं दिया जाता, तब तक गैर- ब्राह्मण उत्पादक वर्ग को न्याय नहीं मिलेगा। उस समय से लेकर आज तक पूरा मामला सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के आसपास घूम रहा है। शूद्रों की ओर से यह मांग अब तक सामने नहीं आई है कि पूरे तंत्र को बदला जाए और शूद्रों को पुरोहिताई और आध्यात्मिक दर्शन को पढ़ने-समझने से लेकर हिंदू जीवन के प्रत्येक पक्ष में शामिल किया जाए।

ब्राह्मणों ने आध्यात्मिक प्रणाली के जरिए अपने प्राधान्य को स्थापित किया और इस प्रणाली ने लिखित दार्शनिक ग्रंथों के रूप में संस्थागत स्वरूप अख्तियार कर लिया। परंतु किसी भी धर्म के दर्शन और उसके विभिन्न प्रतीकों की भूमिका को समझने के लिए धार्मिक ग्रंथों का समालोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। परंतु शूद्रों ने, चाहे वे शासक रहे हों या कृषक या शिल्पकार, कभी भी धार्मिक जीवन में समानता हासिल करने के लिए इस मूलभूत कार्य को नहीं किया। उदाहरण के लिए अपनी प्रसिद्ध कृति हू वर शूद्राज : हाउ दे केम टू बी फोर्थ वर्णा इन इंडोआर्यन सोसायटी में आंबेडकर लिखते हैं–

“1. शूद्र एक सूर्यवंशी आर्य समुदाय थे के थे। 2. एक समय आर्य समाज केवल तीन वर्णों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को मान्यता देता था। 3. शूद्र एक अलग वर्ण नहीं थे। भारतीय-आर्य समाज में वे क्षत्रिय वर्ण का भाग थे। 4. शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत बैर था और इसके नतीजे में शूद्रों द्वारा ब्राह्मणों पर घोर अत्याचार किए गए और उन्हें हर ढंग से अपमानित किया गया। 5. इन अत्याचारों और दमन से ब्राह्मणों के मन में शूद्रों के प्रति घृणा का भाव पैदा हो गया और उन्होंने शूद्रों का उपनयन करने से इंकार कर दिया। 6. उपनयन न होने से, शूद्र, जो क्षत्रिय थे के सामाजिक दर्जे में गिरावट आई और वे वैश्यों से भी निम्न श्रेणी के करार दे दिए गए। उन्हें एक चौथा वर्ण मान लिया गया।”[7]

आंबेडकर शूद्रों को आर्य समाज का भाग मानते थे। शायद इसलिए क्योंकि जिस समय उन्होंने यह पुस्तक लिखी थी, उस समय किसी की व्यक्ति की नस्ल का पुरातात्विक और डीएनए अध्ययनो के द्वारा पता लगाना संभव नहीं था। अब यह निश्चित हो गया है कि शूद्र भारतीय-द्रविड हैं, और उनकी जड़ें भारत और अफ्रीका में हैं।

महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आंबेडकर ने उपनयन के आध्यात्मिक प्रतीक को बहुत महत्व दिया है। ब्राह्मण पुरोहित वर्ग के लिए यह प्रतीक अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज भी जब आरएसएस सभी शूद्रों को हिंदू के रूप में परिभाषित करता है, तब भी वह इस मुद्दे पर बहस करना नहीं चाहता कि क्या सभी को उपनयन का अधिकार मिलना चाहिए। जिन शूद्रों को क्षत्रिय का दर्जा दिया जाता था उनका उपनयन संस्कार होता था, परंतु उन्हें पुरोहित के रूप में कार्य करने का अधिकार नहीं था। क्यों? दरअसल ब्राह्मण धार्मिक मामलों पर अपना और केवल अपना अधिकार रखना चाहते थे। आज भी क्षत्रिय और वैश्य जोर-शोर से बहुत सी मांगें उठा रहे हैं, परंतु उन्होंने कभी पुरोहित बनने का अधिकार नहीं मांगा। वे राज्य की सेवाओं में अपने लिए आरक्षण अवश्य चाहते हैं और कई बनिया जातियों ने स्वयं को ओबीसी घोषित कर आरक्षित वर्ग में घुसने में सफलता भी प्राप्त कर ली है।

भारत में कई राजनैतिक प्रणालियां लागू रहीं। एक समय यहां राजतंत्र था, जो बाद में लोकतंत्र स्थापित हो गया। परंतु इतिहास में कभी भी आध्यात्मिक प्रणाली का नियंत्रण ब्राह्मणों के हाथों से नहीं छूटा। इस कारण भारत एक ठहरा, रूका हुआ देश बन गया। पुरोहित वर्ग का कोई प्रतियोगी नहीं था और इसलिए उसने कभी आध्यात्मिक प्रणाली में कोई सार्थक परिवर्तन करने की चेष्टा नहीं की। शूद्र और द्विज, विशेषकर ब्राह्मण, पूरे इतिहास में स्थिर और सुस्त बने रहे। शूद्र और दलित न केवल सामाजिक विभाजन बल्कि अशिक्षा, आध्यात्मिक पिछड़ेपन और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मामलों की जानकारी के अभाव के कारण वहीं के वहीं रहते आए। जनता और शासक दोनों अपनी-अपनी तरह से असहाय थे और अपनी-अपनी तरह से अनियोजित जीवन जीते रहे। ब्राह्मण-ता और शूद्र-ता बेड़ियां बन गईं, जिन्होंने उत्पादक शक्तियों और बाजार संबंधों को आदिम युग में बनाए रखा। शूद्र शक्तियों ने कभी कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं चलाया और ब्राह्मणवाद ने कभी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के प्रकाश में खुद में सुधार लाने का प्रयास नहीं किया। अंग्रेजों ने अपना राज कायम करने और रखने के लिए भले ही कितनी भी हिंसा की हो, परंतु हमें यह तो स्वीकार करना होगा कि अगर अंग्रेज और उनका वैश्विक ज्ञान भारत में नहीं आता तो यहां के ब्राह्मण और अधिक प्रतिगामी होते। संस्कृत का ज्ञान उन्हें शूद्रजनों पर आध्यात्मिक नियंत्रण के अतिरिक्त और कोई फायदा नहीं देता।

अगर देश में गतिशील आध्यात्मिक विमर्श हुआ होता और इस विमर्श में आमजनों को शामिल किया गया होता तो राष्ट्रीय जीवन के हर पहलू में बदलाव आता। परंतु ब्राह्मणवाद उसके दमनकारी आध्यात्मिक शासन के विरूद्ध हर विद्रोह को या तो पचा गया या उसने उसे अपना हिस्सा बना लिया। भारत का स्वाधीनता संग्राम वह पहली बड़ी परिघटना थी, जिसने शूद्र और द्विजों दोनों पर गहरा प्रभाव डाला। भारत में इस्लामिक शासन के कायम होने और बने रहने से भी भारतीयों के जीवन में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया। मुस्लिम शासकों और शासक वर्ग का जुड़ाव शूद्रों की अपेक्षा ब्राह्मणों और अन्य द्विजों से अधिक रहा। यह उस काल के बारे में भी सच है जब उन्होंने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर अपनी सत्ता स्थापित की और तब के बारे में भी जब उन्होंने तेलंगाना, मैसूर और जूनागढ़ जैसे विशिष्ट इलाकों पर अपना अधिकार कायम किया। इस ऐतिहासिक तथ्य को एक अलग अध्ययन की दरकार है।

संदर्भ :

[1] कौटिल्य के अर्थशास्त्र का शामाशास्त्री का अनुवाद, पृष्ठ 10 https://ia802703.us.archive.org/13/items/Arthasastra_English_Translation/Arthashastra_of_Chanakya_-_English.pdf Page 10

[2] वही, पृष्ठ 10-11

[3] राम माधव, बिकाज इंडिया कम्स फर्स्टः रिफ्लेक्शंस ऑन नेशनलिज्म, आईडेंटिटी एंड कल्चर, वेस्टलैंड, चैन्नई, 2020

[4] वेन्डी डोनिगर, ‘व्हाट इज कामसूत्रा रियली एबाउट? वेन्डी डोनीगर रीड्स द क्लासिकल टेक्सट, स्क्राल, 6 अगस्त 2015

[5] https://www.thehindu.com/society/the-shudra-queen-rashmoni-and-a-sacred-river/article34847554.ece

[6] http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/txt_ambedkar_waiting.html

[7] बी.आर. आम्बेडकर, बाबासाहेब आम्बेडकर राईटिंग्स एंड स्पीचेज, खण्ड 7, महाराष्ट्र शासन, बंबई, 1990, पृष्ठ 11-12

(अनुवाद :अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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