झारखंड के 21 साल का जश्न मनाने से पहले भुखमरी पर करें विचार

बिरसा मुंडा की जयंती के मौके पर 21 साल पहले झारखंड बिहार से अलग राज्य बना। इसकी स्थापना दिवस के मौके पर विशद कुमार बता रहे हैं झारखंड के सुदूर इलाकों की स्थिति, जहां आज भी भुखमरी की समस्या मुंह बाए खड़ी है

आज झारखंड के स्थापना 21वीं सालगिरह है। आज के ही दिन 2001 को झारखंड बिहार से अलग हुआ था और आज के ही दिन 1875 को धरती आबा बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। लिहाजा 15 नवंबर की तारीख झारखंड के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण तारीख बन गयी है। वर्ष 2001 से लेकर अबतक राज्य में भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित अनेक दलों की सरकारों ने शासन किया है। वर्तमान में इसके मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हैं, जो झारखंड आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के नेता रहे शिबू सोरेन के पुत्र हैं। हर साल की भांति इस बार भी आज के दिन को खास बनाने की कोशिशें राज्य और केंद्र सरकार के दोनों स्तरों पर किया गया है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि झारखंड अब भी तमाम वन संसाधन व खनिज आदि के होने के बावजूद देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है। सरकारों के दावों पर सवाल उठाने वाला एक सवाल भुखमरी की समस्या भी है। राज्य सरकार के जो अधिकृत आंकड़े उपलब्ध हैं, उसके अनुसार दिसम्बर 2016 से 2020 तक झारखंड में भूख से 24 लोगों की मौत भोजन की अनुपलब्धता के कारण हुई है।

मसलन पश्चिम सिहभूम का प्रखंड है सोनूआ, जहां से मात्र 3-4 किलोमीटर की दूरी पर बसा है पोड़ाहाट गांव। इसकी जनसंख्या लगभग 1800 है। यहां कुड़मी, कुम्हार, लोहार सहित आदिवासी समुदाय के हो जनजाति के लोग रहते हैं। हो जनजाति के लोगों की संख्या यहां करीब 500 है। इसी गांव का एक टोला है– भालूमारा, जहां 57 वर्षीया विधवा नंदी हेम्ब्रम रहती हैं। नंदी हेम्ब्रम झारखंड के उन मजलूमों में शामिल है, जो भुखमरी की शिकार हैं। 

नंदी हेम्ब्रम के पास आधार कार्ड व वोटर कार्ड के अलावा सरकारी कल्याण योजनाओं का कोई लाभ नहीं है। इंदिरा आवास, प्रधानमंत्री आवास, राशन कार्ड, विधवा पेंशन, स्वास्थ्य कार्ड, गैस, शौचालय कुछ भी नहीं है। मनरेगा का काफी पुराना जॉब कार्ड तो है, लेकिन उस पर आज तक कोई काम नहीं मिला है। दिलचस्प यह कि नंदी के घर में सरकारी योजना के अंतर्गत आदिवासियों के घर में मुफ्त बिजली देने के तहत बिजली का कनेक्शन है और घर में बल्ब भी लटका है, लेकिन वह आजतक कभी जला नहीं, क्योंकि अभी तक इसमें बिजली की सप्लाई नहीं दी गई है।

20 साल पहले विधवा हुई नंदी हेम्ब्रम का पति सीदीयों हेम्ब्रम पश्चिम बंगाल में एक ईट भट्ठा में काम करता था। अपनी आजीविका के लिए नंदी हेम्ब्रम वनोपजों पर निर्भर है। वह खेतों में मजदूरी से लेकर दातून आदि बेचती है। 

नंदी हेम्ब्रम कहती है कि धान कटाई के सीजन में बेटी बुला लेती है और वह बेटी का सहयोग कर देती है, जिससे तीन-चार महीने का खाना मिल जाता है। लेकिन बाद के दिनों में भुखमरी की स्थिति रहती है।

बता दें कि यह हाल अकेले नंदी हेम्ब्रम का नहीं है, ऐसे ही हालात का शिकार है इसी गांव के इसी टोला की 5 बच्चों के साथ 35 वर्षीया विधवा गुम्मी दिग्गी। 4 साल पहले उसके पति की मौत ईंट भट्ठा की दीवार गिरने से उसके नीचे दबकर हो गई थी। वह भी पश्चिम बंगाल में ईंट भट्ठा में काम करता था। ईंट की पकाई के बाद उसके निकालने की प्रक्रिया में अचानक ईंट का टाल उसके उपर आ गिरा जिससे उसकी घटना स्थल पर ही मौत हो गई। 

गुम्मी दिग्गी भी हो जनजाति समुदाय से आती है, वह भी हिन्दी बोल नहीं पाती है। वह अपनी हो भाषा में बताती है कि “मेरे पास सरकारी कोई भी योजना का लाभ नहीं मिला है। राशन कार्ड, विधवा पेंशन, स्वास्थ्य कार्ड, मनरेगा कार्ड, गैस, शौचालय नहीं है। केवल प्रधान मंत्री आवास है। 14 साल की बेटी बंगाल काम करने गई है। हम यहां मजदूरी करते हैं, लेकिन करोना के कारण वह भी नहीं मिलता है। पांच बच्चे हैं। पति की चार साल पहले मौत हो गई है।”

बता दें कि विगत वर्षों में झारखंड में भूख से होने वाली मौतों की खबरें सुर्खियों में रही हैं।

झारखंड में भूख से मौत : सवाल शेष है 

कबमृतक/मृतका का नामस्थान
दिसंबर 2016इंदरदेव माली (40 वर्ष) हजारीबाग
28 सितंबर, 2017संतोषी कुमारी (11 वर्ष) सिमडेगा
21 अक्टूबर, 2017बैजनाथ रविदास (40 वर्ष) झरिया 
23 अक्टूबर, 2017रूपलाल मरांडी (60 वर्ष) देवघर
अक्टूबर 2017ललिता कुमारी (45 वर्ष) गढ़वा
1 दिसंबर, 2017प्रेममणी कुनवार (64 वर्ष) गढ़वा
25 दिसंबर, 2017एतवरिया देवी (67 वर्ष) गढ़वा
13 जनवरी, 2018बुधनी सोरेन (40 वर्ष) गिरिडीह
23 जनवरी, 2018लक्खी मुर्मू (30 वर्ष) पाकुड़
29 अप्रैल, 2018सारथी महतोवाइन धनबाद
2 जून, 2018सावित्री देवी (55 वर्ष) गिरिडीह
4 जून, 2018मीना मुसहर (45 वर्ष) चतरा
14 जून, 2018चिंतामल मल्हार (40 वर्ष) रामगढ़
10 जुलाई, 2018लालजी महतो (70 वर्ष) जामताड़ा
24 जुलाई, 2018राजेंद्र बिरहोर (39 वर्ष) रामगढ़
16 सितंबर, 2018चमटू सबर (45 वर्ष) पूर्वी सिंहभूम
25 अक्टूबर, 2018सीता देवी (75 वर्ष) गुमला
11 नवंबर, 2018कालेश्वर सोरेन (45 वर्ष) दुमका
1 जनवरी, 2019बुधनी बिरजिआन (80 वर्ष) लातेहार
22 मई, 2019मोटका मांझी (50 वर्ष) दुमका
5 जून, 2019रामचरण मुंडा (65 वर्ष) लातेहार
16 जून, 2019झिंगूर भूंइया (42 वर्ष) चतरा 
6 मार्च, 2020भूखल घासी (42 वर्ष) बोकारो 
2 अप्रैल, 2020सोमारिया देवी (70 वर्ष) गढ़वा

बहरहाल, उपरोक्त सूची यह बताने के लिए काफी है कि झारखंड में सरकारें किस तरह से रोजी-रोटी की समस्या दूर कर पाने में असफल रही हैं। सवाल यही है कि झारखंड कब भुखमरी जैसी त्रासदी से मुक्त हो सकेगा?

इस संबंध में झारखंड महिला आयोग की पूर्व सदस्य डॉ. वासवी किड़ो ने बताती हैं कि “भुखमरी की स्थिति को बयां करने के लिए किसी आंकड़े की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी देश या प्रांत में किसी एक व्यक्ति की मौत भी भुखमरी के कारण होती है तो यह उस देश अथवा प्रांत के शर्मनाक स्थिति है। और रही बात झारखंड की तो आपको पहले यह समझना होगा कि झारखंड लंबे संघर्ष के बाद भले ही पृथक राज्य बन गया, परंतु सरकार की नीति, योजनाएं व कार्यक्रम आदिवासियों-मूलनिवासियों के विरूद्ध है। इसे समझने के लिए आपको यह समझना होगा कि अलग झारखंड की मांग के लिए जब मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने 1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष जो प्रारूप रखा था, उसमें क्या था। आपको यह जानना चाहिए कि जयपाल सिंह मुंडा ने अपने प्रारूप में यहां की खनिज और वन संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था की बात कही थी। उनका मसौदा था कि यहां जो भी वनोपज हाेते हैं, जिनमें औषधीय पौधे हैं, लाह है, क्योंद (एक फल) है, इन सबसे जुड़े माइक्रो लेवल के उद्योग हों। इसलिए जयपाल सिंह मुंडा ने अलग झारखंड के लिए विस्तृत मसौदे में झारखंड के हर आदिवासी नागरिक के आर्थिक उत्थान का खाका रखा था। फिर उनके विचारों को दिशोम गुरू शिबू सोरेन और दिशाेम गोमके एन. ई. होरो ने आगे बढ़ाया। आज आप देखिए कि क्या हुआ है। अलग झारखंड बनने के बाद यहां के संसाधनों की लूट हो रही है। पूर्ववर्ती सरकार ने तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों को बुलाकर झारखंड का विकास करने की बात कही। आदिवासियों की जमीन सस्ते दर लेकर लैंड बैंक बनाने की बात कही। लेकिन इससे झारखंड के आदिवासियों का विकास नहीं होगा। आप यह देखिए कि केंद्र सरकार के स्तर पर मध्यम, लघु व सूक्ष्म स्तर के औद्योगिक इकाइयों की स्थापना हेतु एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए 80 हजार करोड़ रुपए के योजना की बात कही जाती है। लेकिन यह केवल कहने की बात है। यदि यह पैसा सही मायने में एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों के पास जाता तो उनकी स्थिति बदलती। मैं सूबे की हेमंत सरकार के बारे में कह रही हूं कि इस सरकार के पास भी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए कोई सुनिश्चित योजना नहीं है। सरकार और उसके अधिकारियों को यह समझ ही नहीं है कि उनके यहां अडाणी-अंबानी को संपन्न बनाने वाला फार्मूला काम नहीं करेगा। यहां रोजगार के साधन यहां के लोगों के हिसाब से, संसाधनों के हिसाब से उपलब्ध कराने होंगे। मतलब यह कि खनिज संपदा और वन संपदा आधारित अर्थव्यवस्था चाहिए। महुआ उद्योग चाहिए। औषधीय पौधों पर आधारित उद्योग चाहिए। तरह-तरह की जड़ी-बूटियों पर आधारित उद्योग चाहिए। पावर प्लांट बनने से अडाणी का विकास होगा, आदिवासियों व मूलनिवासियों का नहीं। भूख से मौत रोकने के लिए छोटे उद्योग लगाने होंगे। कोयला, लोहा और यूरेनियम के खनिज के प्रबंधन की जिम्मेदारी आदिवासियों व मूलनिवासियों को देनी होगी, क्योंकि सारे खनिज उनकी जमीन के नीचे है तो मालिक भी वही हों। यदि ऐसा नहीं होगा तो भूख से होनेवाली मौतों को रोका नहीं जा सकता।” 

(संपादन : नवल/अनिल)


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