त्वरित विश्लेषण
उत्तर प्रदेश में अब तक भाजपा सरकार के तीन मंत्री और आठ विधायकों ने पार्टी से नाता तोड़ लिया है और समाजवादी पार्टी के खेमे की शरण ली है। इनमें बीते गुरुवार को राज्य के आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), डॉ. धर्म सिंह सैनी और मुकेश वर्मा, विनय शाक्य व बाला प्रसाद अवस्थी द्वारा दिया गया इस्तीफा भी शामिल है। जिस तरह से यह सब हो रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा की सत्ता में वापसी की राह बेहद मुश्किल हो गई है। इसमें किसी को शक नहीं है कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के अलावा 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली बंपर जीत में दलित और ओबीसी मतदाताओं की अहम भूमिका थी। अब सवाल यह है कि इस बीच ऐसा क्या हो गया जो दलित और ओबीसी वोटर भाजपा से छिटक कर सपा की तरफ जाते दिख रहे हैं?
उत्तर प्रदेश में हाल ही के दिनों में जो सियासी उठापटक़ हुई है उसके बाद भाजपा के रणनीतिकार हैरानी में हैं। अभी तक उनके नेता समझ नही पा रहे हैं पार्टी छोड़कर गए नेताओं की तरफ से जारी बयानों का क्या जवाब दिया जाए। मसलन, डॉ. धर्म सिंह सैनी ने अपने त्यागपत्र में लिखा है–
“माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रिपरिषद में आयष, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (स्वतंत्र प्रभार) राज्य मंत्री के रूप में रहकर पूरे मनोयोग के साथ उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया है, लेकिन जिन अपेक्षाओं के साथ दलितों, पिछड़ों, किसानों, शिक्षित बेरोजगारों, छोटे एवं मध्यम श्रेणी के व्यापरियों ने मिलकर प्रचंड बहुमत से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने का काम किया, उनकी व उनके जनप्रतिनिधियों के प्रति लगातार उपेक्षात्मक रवैये के कारण उत्तर प्रदेश के मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देता हूं।”
भाजपा के आईटी सेल ने शुरु में कहना शुरु किया कि सिर्फ वो नेता जा रहे हैं, जिनका टिकट काटा जा रहा है। इसके बाद तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया ने इसे परोसना शुरु किया कि भाजपा में सौ से ज़्यादा मौजूदा विधायकों का टिकट कटने की चर्चा है। हालांकि पार्टी को शायद जल्द ही समझ आ गया कि इस बात के फैलने का असर पार्टी में बचे रह गए विधायकों के मनोबल पर भी पड़ेगा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
दरअसल, लोगों ने सवाल पूछना शुरु कर दिया कि सिर्फ ओबीसी और दलित विधायक और मंत्रियों के टिकट कटने हैं क्या? यह सवाल इसलिए भी लाज़िम है क्योंकि जिन नेताओं ने हाल के दिनों में मंत्री पद से इस्तीफा दिया है या पार्टी छोड़ी है, उनमें कुछ ब्राह्मणों को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी दलित या ओबीसी वर्ग से आते हैं। इस लिहाज़ से भाजपा नेताओं का यह कहना कि प्रदर्शन के आधार पर मौजूदा विधायकों को टिकट मिलेगा, पार्टी के लिए नकारात्मक ही रहा। प्रदर्शन अगर आधार रहा होता तो मौजूदा ठाकुर और बनिया विधायकों में भी कुछ तो हलचल होती ही।
ख़ैर, अब जो माहौल है, वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शब्दों में, अस्सी बनाम बीस ही है।
बस इस अस्सी और बीस में अब इतना हो गया है कि उत्तर प्रदेश के सवर्ण मतदाताओं में शुमार 12 फीसदी ब्राह्मणों का एक हिस्सा, और 7 फीसदी राजपूतों, 3 फीसद के क़रीब बनिया, कायस्थ वोटर ही शायद विश्वास से कह सकते हैं कि वह भाजपा के लिए वोट करेंगे। राज्य के 19 फीसदी से ज़्यादा दलित और क़रीब 41 फीसद ओबीसी वोटरों के बड़े हिस्से में भाजपा के लिए अब यह विश्वास नज़र नहीं आता। ज़ाहिर है भाजपा के लिए यह चिंता की बात है। राज्य में ओबीसी और दलित वोटरों के बिना पार्टी सत्तर सीट का आंकड़ा भी नहीं छू सकती और इसकी वजहें हैं।
ध्यातव्य है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा को महज़ 17.5 फीसद वोट मिले थे। वहीं 2014 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 42.62 फीसद हो गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट प्रतिशत में 2012 के चुनाव के मुक़ाबले क़रीब 15 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई और पार्टी को 39.47 फीसद वोटरों को समर्थन हासिल हुआ। ज़ाहिर है 43 या 39 फीसद वोट सिर्फ ब्राह्मण, राजपूत, बनिया और कायस्थों के तो हो नहीं सकते। ऐसे में अगर नॅरेटीव सवर्ण बनाम दलित-ओबीसी बनता है तो भाजपा के लिए 17 फीसद वोट हासिल करना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
अब सवाल फिर से यही कि राज्य में ऐसा क्या हो गया कि दलित और ओबीसी भाजपा के पाले से छिटकते दिख रहे हैं?
भाजपा से ओबीसी वर्ग की नाराज़गी समझने के लिए पार्टी छोड़कर जा रहे विधायक और मंत्रियों के बयान दोबारा से देखिए। इन सबमें एक समानता है। इन नेताओं का कहना है कि पिछले पांच साल में न तो उनकी कोई बात सुनी गई और न ही उनके वर्ग के लिए भाजपा ने किसी योजना को अमली जामा पहनाया। हालांकि चुनाव के वक़्त ऐसे बयान दे दिए जाते हैं लेकिन इनका असर दूर तक जाता है। ऐसा नहीं है कि भाजपा के पाले में अभी ओबीसी नहीं हैं। अनुप्रिया पटेल का अपना दल और संजय निषाद की निषाद पार्टी अभी भी भाजपा के साथ हैं। इसके अलावा पार्टी के पास केशव प्रसाद मौर्य जैसे कई नेता हैं। लेकिन भाजपा में जितने ओबीसी या दलित नेता बचे हैं, उनमें बेचैनी है और इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता।
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दरअसल, यूपी की राजनीति भावनात्मक मुद्दों में भले ही बह जाए, लेकिन जाति यहां अकाट्य सत्य है। पिछले पांच साल में योगी आदित्यनाथ की मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यशैली और उनके सजातीय नेताओं की दबंगई के ख़िलाफ लोगों में नाराज़गी तो है। भाजपा का दावा है कि उसने तमाम अपराधियों की संपत्ति ज़ब्त की, उनके घरों पर बुलडोज़र चले, वह जेल गए या फिर उनका एनकाउंटर कर दिया गया। इस दावे का एक पक्ष यह भी है कि इस तरह की कार्रवाई में राजपूत समाज के लोगों को गाय की तरह पूजनीय माना जाता रहा, यानी वह तमाम दबंगई और अपराध करके भी बच निकलते रहे। सरकारी ठेकों, अधिकारियों से लेकर थानेदारों की नियुक्ति, भर्ती में भी यह असंतुलन साफ दिखता है। इसके अलावा उत्पीड़न ऐसा मुद्दा है जिसकी छींटों से भाजपा बच नहीं सकती।
अप्रैल 2017 में सहारनपुर में दलित विरोधी हिंसा महज़ बानगी है। इसके बाद से यूपी में दलित और ओबीसी वर्ग न सिर्फ जातीय हिंसा बल्कि सरकारी उत्पीड़न का भी शिकार हुए हैं। किसी भी वोटर से सवाल कीजिए, वह जवाब देता है कि 2014, 2017 और 2019 में वोट देने के बावजूद उसे कभी ऐसा नहीं लगा कि राज्य में उसकी सरकार है, लेकिन ब्राह्मणों को छोड़कर क्या राज्य के सवर्ण भी ऐसा कह सकते हैं? उन्नाव और हाथरस में जो हुआ क्या उसे बदला जा सकता है? ज़ाहिर है, दलित और ओबीसी वर्ग भाजपा के लिए वोट ज़रूर करते रहे, मगर उनके भीतर “यह मेरी सरकार है” जैसी भावना पिछले आठ साल में नहीं बन पाई है। अखिलेश यादव ने इस भावना को शायद समय रहते पढ़ लिया।
पिछले दो वर्षों में अखिलेश यादव ने जिस तरह दलित और ओबीसी नेताओं को अपने पाले में लिया है और ग़ैर यादव ओबीसी के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशें की हैं, वह उनके पक्ष में गई हैं। 2014 के बाद से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कमज़ोर होने के पीछे एक बड़ी वजह ग़ैर-यादव ओबीसी और ग़ैर-जाटव दलित का भाजपा की तरफ जाना भी रहा है। 2022 में इसके उलट हो रहा है। हालांकि वोटिंग तक चुनाव अभी कई और रंग बदलेगा, लेकिन यूपी में अगर इसी वक़्त मतदान करा लिया जाए तो भाजपा शायद सत्ता में न लौट पाए। भाजपा को राज्य में सत्ता वापस चाहिए तो राज्य के ओबीसी और दलित वर्गों को यक़ीन दिलाना पड़ेगा कि अब न तो पिछली ग़लतियां दोहराई जाएंगी और न ही उनकी अनदेखी होगी। अगर पार्टी यह यक़ीन नहीं दिला पाती है तो दलित और ओबीसी वर्ग के पास समाजवादी पार्टी के रुप में एक मज़बूत विकल्प बनता दिख ही रहा है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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