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बहस-तलब : भारत में आदिवासियत

भारत के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न जनजातियों में बंटे आदिवासी रहते हैं। हालांकि उनकी संस्कृतियां और परंपराएं अलग-अलग हैं। परंतु, साझा तथ्य यह है कि सभी प्रकृति पूजक हैं। यह एक सूत्र है, जिसके जरिए देश भर के आदिवासी खुद को जोड़ सकते हैं और मजबूत ताकत बन सकते हैं। बता रहे हैं हिमांशु कुमार

भारत में आदिवासी भारत की हर दिशा के जंगलों में फैले हुए हैं वे अंडमानमें हैं तो कश्मीर और हिमाचल की पहाड़ियों में भी हैं यह पश्चिम भारत के गुजरात और गोवा में हैं तो ये पूर्वी हिस्से नागालैंड में भी हैं देश में अनेक ऐसे हिस्से हैं, जहां आदिवासी समुदाया के लोगों की संख्या गैर-आदिवासियों से ज़्यादा है। 

ऐसे ही दुनिया भर में आदिवासी रहते हैं। अनेक देशों में इन्हें मूलनिवासी का दर्जा प्राप्त है। लेकिन भारत में इन्हें मूलनिवासी का दर्जा नहीं मिल सका है। भारतीय संविधान इन्हें अनुसूचित जनजाति के नाम से पहचानता है। मैं जब 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ गया और वहां मैंने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के मानवाधिकार हनन का सवाल रखा तो कमीशन फॉर इंडिजिनस पीपुल्स के अध्यक्ष ने कहा कि भारत ने आदिवासियों को इंडिजिनस यानी मूलनिवासी नहीं माना है, इसलिए वे कोई मदद नही कर सकते। 

भारत में आंध, गोंड, मुण्डा, खड़िया, बोडो, कोल, भील, कोली, सहरिया, संथाल, मीणा, उरांव, लोहरा, बिरहोर, पारधी, असुर, टाकणकार आदि मुख्य आदिवासी समूह हैं। भारत में 461 जनजातियां हैं, जिसमें से 424 भारत के सात क्षेत्रों में बंटी हुई हैं। इनमें उत्तरी क्षेत्र– जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि में लेपचा, भूटिया, थारू, बुक्सा, जौसारी, खाम्पटी, कनोटा मुख्य जातियां हैं। इनकी नस्ल मंगोलियन है। इन्हें तिरछी छोटी आंखे, श्वेत रंग, सीधे बाल, चौड़ी व, चपटी नाक के जरिए आसानी से पहचाना जा सकता है। वहींउत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में थारु, बोक्सा, भूटिया, राजी, जौनसारी के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, देवरिया, बलिया, व सोनभद्र आदि जिलों में गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोड़, खरवार, सहरिया आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। सोनभद्र में बैगा, पनिका, पहडिया, पंखा, अगरिया, पतरी, चेरो भूइया जनजाति के लोग बहुतायत में हैं।

वहीं झारखंड और बिहार में मुंडा, संथाल, हो, असुर, अगरिया, बैगा, बनजारा, बैठुडी, बेदिया, खरवार, आदि जनजातियां हैं। जबकि पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में गारो जनजाति के लोग हैं। 

गारो हिल्स में रहने वाली इस जनजाति की आबादी मेघालय की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा है। इनका समाज दुनिया के कुछ शेष मातृवंशीय समाजों में से एक है, जहां बच्चे अपनी मां से अपने कबीले की उपाधि लेते हैं। परिवार की सबसे छोटी बेटी को संपत्ति उसकी मां से विरासत में मिलती है, जबकि बेटे युवा होने पर घर छोड़ देते हैं। वे नोकपंते नामक एक अस्थायी आवास में रहते हैं और शादी के बाद अपनी पत्नी के घर में रहते हैं।

नगालैंड में प्रमुख जातीय समूहों में सूमी जनजाति है। वे नगालैंड के जुन्हेबोटो जिले और दीमापुर जिले में रहते हैं। ईसाई मिशनरियों के आने से पहले सूमी जनजाति के लोग शिकार पर आश्रित थे। इस जनजाति के दो प्रमुख त्यौहार हैंतुलुनी (8 जुलाई) और अहुना (14 नवंबर)। वहीं कुकी जनजाति के लोग सभी पूर्वोत्तर राज्यों में रहते हैं। लेकिन ये मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं। इस जनजाति के पुरुष रंगीन संगखोल या जैकेट और फेचावम या धोती पहनते हैं। वहीं महिलाएं झुमके, कंगन, चूड़ियां और हार आदि गहने पहनती हैं। 

पारंपरिक पोशाक पहने असम के बोडो आदिवासी

मेघालय की खासी जनजाति पूर्वोत्तर में प्रमुख आदिवासी समुदाय है, जो मेघालय की कुल आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा है। ये मुख्य रूप से खासी और जयंतिया पहाड़ियों में रहते हैं और मातृसत्तात्मक समाज का पालन करते हैं। इस जनजाति की महिलाएं सभी प्रमुख भूमिकाएं निभाती हैं और सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती हैँ।

देवरी जनजाति के लोग असम और अरुणाचल प्रदेश में रहते हैं। मुख्य रूप से असम के शिवसागर, जोरहाट, डिब्रूगढ़, लखीमपुर, तिनसुकिया जिलों और अरुणाचल के लोहित और चांगलांग जिलों में इनका वास है।

बोडो जनजाति का संबंध भी मुख्य रूप से असम से हैलेकिन अब ये देश के दूसरे हिस्सों में भी चली गए हैं। बोडो जनजाति के लोग चावल की खेती, चाय बागान और मुर्गी पालन आदि करते हैं। इसके अलावा बुनाई और रेशमकीट पालन भी इनकी आजीविका का हिस्सा है। चावल उनका मुख्य भोजन है, जबकि जू माई (चावल की शराब) उनका घरेलू पेय है।

हम देखते हैं कि भारत के विभिन्न आदिवासी समूह सांस्कृतिक रूप से अलग अलग विशेषताएं रखते हैं। उनका खानपान, पहनावा, उनकी भाषा उनके पर्व-त्यौहार अलग अलग हैं। इस कारण से भी भारत के आदिवासी आज तक एक राजनैतिक समूह के रूप में संगठित नहीं हो पाए हैं और इनके अधिकांश नेता अपने राज्यों की स्थानीय स्तर तक सीमित रहे हैं। पूरे देश के आदिवासियों के संसाधनों उनके अस्तित्व पर आ रहे खतरे के विरुद्ध कोई अखिल भारतीय आन्दोलन अभी तक नहीं हुआ है और ना ही कोई अखिल भारतीय नेतृत्व ही मौजूद है।

भूटिया जनजाति का वास उत्तरी सिक्किम के लाचेन और लाचुंग क्षेत्रों में है। यहां के लोग भूटिया बोलते हैं, जो तिब्बत की एक बोली है। इस जनजाति को सबसे विकसित और शिक्षित माना जाता है। भूटिया ज्यादातर सरकारी क्षेत्रों और व्यापार में काम करते हैं। इस जनजाति की महिलाओं में भी सोने के गहने पहनने का रिवाज है। इनके घर ज्यादातर आयताकार आकार के होते हैं, जिन्हें खिन कहा जाता है। भेड़ और याक इनकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। 

उत्तर पूर्व में सबसे विशिष्ट जनजातियों में से एक अपतानी जनजाति है, जो अरुणाचल प्रदेश के निचले सुबनसिरी जिले में जीरो घाटी में रहते हैं। ये अंग्रेजी और हिंदी भाषा बोलते हैं।नकी गीली चावल की खेती और कृषि प्रणाली उल्लेखनीय है। यूनेस्को ने पारिस्थितिकी को संरक्षित करने के अत्यंत उच्च उत्पादकताऔर अद्वितीयतरीके के लिए अपतानी घाटी को विरासत स्थल के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। अपतानी जनजाति की महिलाओं को विशिष्ट तरीके से नाक छिदवाने और गहने आदि पहनने की परंपरा है। वहीं पुरुषों में खास तरह के टैटू का क्रेज। 

अंगामी जनजाति नगालैंड का एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है। ये मणिपुर में भी पाए जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में चावल और अन्य अनाज की खेती इनके प्रमुख व्यवसायों में से एक है। इस जनजाति के पुरुष शॉल पहनते हैं जबकि महिलाएं मेखला पहनती हैंरंगीन आभूषण स्त्री-पुरुष दोनों पहनते हैँ। यह जनजाति लकड़ी के शिल्प के लिए प्रसिद्ध है,, जिसमें बेंत के फर्नीचर भी शामिल हैं। बांस की टहनियों के साथ सूअर का मांस इनका मुख्य भोजन है।

अरुणाचल प्रदेश के मूलनिवासी आदि जनजाति पहाड़ियों से संबंधित है और उनके अपने गांव, अपने कानून और परिषद हैं। यह जनजाति कई उप-जनजातियों में विभाजित है। इस जनजाति के पुरुष बेंत, भालू और हिरण की खाल की हेलमेटनुमा टोपी पहनते हैंयह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस क्षेत्र से संबंधित हैं। वहीं महिलाएं अपनी उम्र और वैवाहिक स्थिति के अनुसार कपड़े पहनती हैं। अविवाहित महिलाएं बेयोप पहनती हैं, जो उनके पेटीकोट के नीचे पांच से छह पीतल की प्लेटों से बना एक आभूषण होता है। 

अब यदि पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा की बात करें तो यहां जुआंग, खोड़, भूमिज, खरिया आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। पश्चिम बंगाल में मुण्डा, संथाल, उरांव, कोड़ा आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। इनका रंग काला, लंबा सिर, चौड़ी छोटी व चपटी नाक, हल्के घुंघराले बाल। यह सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबंधित हैं।

वहीं भारत मध्य क्षेत्र यानी छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, पूर्वी आंध्र-प्रदेश में गोंड, कोल, परधान, बैगा, मारिया, अबूझमाडिया, धनवार/धनुहार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, हल्बा, कंवर आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। ये सभी प्रोटो ऑस्टेलाइड प्रजाति से संबंधित हैं।

पश्चिमी भारत गुजरात, राजस्थान में विशेषकर उदयपुर सभांग में भील, गरासिया व सिरोही में आबुरोङ व पिण्डवाङा में भील व मीणा, वगरासिया आदि जनजातियों बहुल है। वहीं पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में भील, मीणा, गोंड़, धाणका भीलाला, बारेला जनजातियों का वास है। 

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में कोटा, बदागा, टोडा आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। टोडा जनजातियों में बहुपति प्रथा प्रचलित है। इनके अलावा तमिलनाडु और केरल में कुरूंबा, कादर, चेंचु, पूलियान, नायक, चेट्टी आदि जनजातियों के लोग रहते हैं। काला/गोरा रंग, बड़े होठ और बड़ी नाक इनकी खास पहचान हैं।

भारत के द्विपीय क्षेत्र अंडमान-निकोबार में जाखा, आन्गे, सेन्टलिस, सेम्पियन (शोम्पेन) आदि जनजातियां रहती हैं। ये लुप्त होने के कगार पर हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत के विभिन्न आदिवासी समूह सांस्कृतिक रूप से अलग अलग विशेषताएं रखते हैं। उनका खानपान, पहनावा, उनकी भाषा उनके पर्व-त्यौहार अलग अलग हैं। इस कारण से भी भारत के आदिवासी आज तक एक राजनैतिक समूह के रूप में संगठित नहीं हो पाए हैं और इनके अधिकांश नेता अपने राज्यों की स्थानीय स्तर तक सीमित रहे हैं। पूरे देश के आदिवासियों के संसाधनों उनके अस्तित्व पर आ रहे खतरे के विरुद्ध कोई अखिल भारतीय आन्दोलन अभी तक नहीं हुआ है और ना ही कोई अखिल भारतीय नेतृत्व ही मौजूद है।

इसका फायदा शासक वर्ग उठाता है। एक उदाहरण देखिए कि जब बस्तर में आदिवासी सलवा जुडूम के खिलाफ 2005 में आंदोलन कर रहे थे तब उनका दमन करने के लिए नगालैंड के आदिवासियों की अर्द्ध सैनिक बलों की पलटन को यहां तैनात किया गया था। हालांकि नगा आदिवासी भी अतीत में इसी तरह का राज्य दमन झेल चुके थे।   

लेकिन आदिवासियों में बहुत कुछ ऐसा है जो पूरे भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आदिवासियों को एक आदिवासी संस्कृति के सूत्र में पिरोता है। दुनिया के सभी आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं। उनका जीवन और उनका अस्तित्व जंगलों पर ही आश्रित होता है। जंगल आदिवासियों के बाहर ही नहीं, उनके भीतर भी होता है। मेरी बड़ी बहन का ससुराल गुजरात के आदिवासी समुदाय में था। मेरे बड़े बहनोई आदिवासी थे। मेरी बहन की आदिवासी ननदें जब मेरी बहन के साथ दिल्ली आती थीं तो वे जंगल से बिछड़ने के गम में कुछ ही दिनों में परेशान होकर बीमार हो जाती थीं और जंगल में वापिस लौटते ही ठीक हो जाती थीं। मेरा भी यही अनुभव है। बस्तर के लोग दिल्ली जाते ही उदास हो जाते थे और वापिस बस्तर के जंगलों में लौटते ही हंसने लगते थे। 

आदिवासियों का धर्म आदि धर्म है। वे अपने पहाड़, जंगल, नदी और अपने पुरखों को देवता मानते हैं। उनको आस पास के समुदाय के लोग अपने धर्म में जोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। आदिवासियों के इलाके में बेशकीमती खनिज हैं। आदिवासियों के पास नदियां और जंगल हैं। इसलिए आदिवासी मुनाफाखोर व्यापारियों के निशाने पर हैं और आज ज्यादातर आदिवासी इलाकों में सैनिक भेजे जा चुके हैं। 

भारतीय संविधान में हालांकि आदिवासियों के संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं, लेकिन उन प्रावधानों का कभी अनुपालन नहीं किया गया। इन सबसे अलग आदिवासी हमें बताते हैं कि मनुष्यता की परिभाषा क्या है। वे हमें यह भी बताते हैं कि मनुष्य चाहे तो आज भी सुखी हो सकता है। आदिवासी हमारी सभ्यता की पाठशाला हैं, लेकिन हमने इस पाठशाला को मिटाने का रास्ता चुना है। संभव है इस पाठशाला के ना रहने पर मनुष्य सुखी होने का पाठ हमेशा के लिए भूल जाय।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

हिमांशु कुमार

हिमांशु कुमार प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता है। वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के जल जंगल जमीन के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में आदिवासियों के मुद्दे पर लिखी गई पुस्तक ‘विकास आदिवासी और हिंसा’ शामिल है।

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