आखिर किस सियासी ट्वीट को लेकर जिग्नेश मेवाणी को असम पुलिस ने किया गुजरात से गिरफ्तार?

जिग्नेश मेवाणी को बुधवार की रात असम पुलिस ने गुजरात के पालनपुर सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर लिया। लेकिन उनकी गिरफ्तारी किस ट्वीट के मद्देनजर की गयी है, यह अस्पष्ट है, बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरे रोज-ब-रोज सख्त किये जा रहे हैं। अब इनकी जद में निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी आ गए हैं। यहां तक कि अब दूसरे राज्यों की पुलिस भी जाकर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर रही है। इसका ताजा उदाहरण है गुजरात के वड़गाम विधानसभा क्षेत्र से दलित कांग्रेसी विधायक जिग्नेश मेवाणी की असम पुलिस द्वारा गुजरात जाकर गिरफ्तारी। जिग्नेश पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में ट्वीटर पर एक टिप्पणी की थी। हालांकि यह टिप्पणी एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी थी। तो सवाल यह उठता है कि जिग्नेश की गिरफ्तारी के लिए असम पुलिस का उपयोग क्यों किया गया? क्या इसकी वजह केवल यह है कि असम में भी भाजपा की सरकार है और गुजरात में भी?

कोकराझार जिले में दर्ज किया गया ‘सियासी’ मुकदमा

जिग्नेश मेवाणी की गिरफ्तारी की पुष्टि असम के कोकराझार जिले के एसपी प्रतीक विजय कुमार ने की है। उनके मुताबिक मेवाणी की गिरफ्तार बीते बुधवार की रात साढ़े ग्यारह बजे गुजरात के पालनपुर स्थित सर्किट हाउस से की गयी। उन्हें हवाई मार्ग से असम लाया गया है। उन्होंने बताया कि मेवाणी के खिलाफ भादंवि की धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र), धारा 153 (ए) (दो समुदायों के खिलाफ शत्रुता बढ़ाना), 295(ए) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से भड़काने वाली बातें कहना) तथा आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया है। 

अब बात उस ट्वीट की जिसके कारण जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ उपरोक्त धाराओं में मामला दर्ज कराया गया और गुजरात से उनकी गिरफ्तारी की गई । जिग्नेश ने अपने ट्वीट में लिखा था, “गोडसे को अपना आराध्य देव माननेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 तारीख से दौरे पर हैं, उनसे अपील है कि गुजरात में हिम्मत नगर, खंभात और वेरावल में जो कौमी हादसे हुए उनके खिलाफ शांति और अमन की अपील करें। महात्मा मंदिर के निर्माता से इतनी उम्मीद तो बनती है ना?”

सवाल खड़े कर रही है असम पुलिस की युद्ध स्तरीय कार्रवाई

सवाल यह है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गिरफ्तारी संबंधी प्रावधान क्या हैं? और क्या दूसरे राज्यों की पुलिस सीधे उन्हें गिरफ्तार कर अपने राज्य ले जा सकती है? बिहार विधानसभा के पूर्व सदस्य एन. के. नंदा इस संबंध में बताते हैं कि किसी भी विधायक की सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है। विधायक की गिरफ्तारी के लिए केवल यही काफी नहीं है कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज है, बल्कि सक्षम न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी का आदेश जारी किया जाना भी आवश्यक होता है।

अब इस आधार पर देखें तो जिग्नेश मेवाणी के मामले में असम पुलिस ने युद्ध स्तर पर कार्रवाई की। मतलब यह कि 19 अप्रैल को जिग्नेश ने उपरोक्त ट्वीट किया और उसी दिन उनके खिलाफ कोकराझार थाने में अनूप कुमार डे नामक एक व्यक्ति द्वारा मुकदमा दर्ज किया गया। हालांकि मुकदमे में जिस ट्वीट के बारे में जिक्र किया गया है, उसकी तारीख 18 अप्रैल बतायी गयी है। जबकि 18 अप्रैल को जिग्नेश द्वारा जारी जिस ट्वीट को ट्वीटर ने हटा दिया है, वह है– “नागपुर के जिन गद्दारों ने दशकों तक तिरंगा नहीं लहराया, वही आरएसएस के लोग कल भगवा झंडा लेकर गुजरात के वेरावल तहसील की एक मस्जिद पर नाच रहे थे। गद्दारों कुछ तो शर्म करो। यह रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां का मुल्क है। यहां शांति और अमन बनाए रखिए। सरकार अपने … इरादों से बाज आये।”

असम पुलिस की हिरासत में जिग्नेश मेवाणी

हालांकि जिग्नेश ने ट्वीटर द्वारा उपरोक्त दोनों संदेशों को प्रतिबंधित किये जाने के बाद एक ट्वीट 20 अप्रैल को सुबह 11 बजे किया, जिसमें उन्होंने भाजपा को चुनाैती दी कि यदि उनके ट्वीट में कोई तथ्य गलत है तो वह उसे साबित करे। इस ट्वीट के साथ ही जिग्नेश ने ट्वीटर द्वारा हटाए गए संदशों के स्क्रीनशाॅट भी संलग्न किया है। दिलचस्प यह कि ट्वीटर ने इस ट्वीट को नहीं हटाया है।

यह मुमकिन है कि कल यानी 20 अप्रैल को असम पुलिस ने मुकदमे को लेकर वहां की स्थानीय अदालत को सूचित किया हो और कल ही अदालत ने जिग्नेश की गिरफ्तारी का वारंट भी जारी कर दिया हो और वारंट लेकर असम पुलिस गुजरात भी पहुंच गई।

जिग्नेश के खिलाफ दर्ज कराए गए मुकदमे के आवेदन की छायाप्रति

क्या हैं किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की गिरफ्तारी संबंधी कानून?

इस संबंध में लोकसभा संचालन नियमावली के अध्याय 20 (क) में उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, “जब किसी सदस्य को आपराधिक आरोप पर या आपराधिक अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है अथवा किसी न्यायालय द्वारा कारावास का दंड दिया जाता है या किसी कार्यपालक आदेश के अधीन निरुद्ध किया जाता है तो सुपुर्दगीकार न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या कार्यपालक प्राधिकारी, यथास्थिति द्वितीय अनुसूची में उपवर्णित समुचित प्रपत्र में सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध या दोषसिद्धि, यथास्थिति के कारणों और निरोध या कारावास के स्थान को दर्शाते हुए, तुरन्त इस तथ्य की सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देगा।” 

यही व्यवस्था देश के सभी विधानसभाओं में लागू है और यह मुमकिन है कि जिग्नेश के मामले में गुजरात विधानसभा अध्यक्ष को सूचित कर इसका अनुपालन कर दिया गया हो। 

निर्वाचित जनप्रतिनिधि को डराने की कोशिश

जाहिर तौर पर जिग्नेश मेवाणी ने एक सियासी टिप्पणी की है और इसके निहितार्थ भी सियासी हैं। ऐसे अनेकानेक टिप्पणियां आए दिन ट्वीटर और फेसबुक पर लिखे व भेजे जाते हैं। परंतु, जिग्नेश का मामला अलग है। इस समय वे गुजरात में उभरते हुए नेता हैं और कांग्रेस ने उन पर विश्वास जताया है। क्या यही वजह है उनकी गिरफ्तारी की? 

इस सवाल पर गुजरात के सेवानिवृत्त प्रो. अर्जुन पटेल का कहना है कि यह सब डराने की साजिश है। चूंकि राज्य में अब एक नया नेतृत्व उभर रहा है और भाजपा यहां किसी को उभरने नहीं देना चाहती है तो वह इस तरह की हरकतें कर रही है। वहीं कांग्रेस नेता जगदीश ठाकोर ने कहा है कि यह एक विधायक को डराने-धमकाने का प्रयास है।

बहरहाल, जिग्नेश मेवाणी के एक सहयोगी ने कहा है कि पुलिस ने अभी तक उनके साथ एफआईआर की प्रति साझा नहीं की है। प्रथम दृष्टया हमें उनके खिलाफ असम में दर्ज कुछ मामलों के बारे में सूचित किया गया है। जबकि, गिरफ्तारी के बाद एक बयान में स्वयं जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि “हो सकता है कि मेरे किसी ट्वीट के सिलसिले में मुझे गिरफ्तार किया गया हो।” 

(संपादन : अनिल/अमरीश)


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