ब्राह्मणवादी कारख़ाने के विरुद्ध फुले का ‘तृतीय रत्न’

फुले की यह रचना जहां एक तरफ पुरोहितों के छल-पाखंड और चीमड़पन का पर्दाफाश करती है। वहीं दूसरी तरफ शूद्रों की शिक्षा का सवाल भी बड़ी शिद्दत से उठाती है। औपनिवेशिक भारत में शिक्षा विभाग पर उच्च श्रेणी के हिन्दुओं का कब्जा था। जो अपनी मनोवृति में शूद्र शिक्षा के प्रबल विरोधी होते थे। उच्च श्रेणी के तथाकथित हिन्दू अफसर औपनिवेशिक शासन की आखों में धूल झोंककर शूद्रों को शिक्षा से वंचित कर देते थे। सुरेश कुमार कर रहे हैं पुनर्पाठ

जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890) पर विशेष

उन्नीसवीं सदी में महान विचारक जोतीराव फुले का पदार्पण एक बड़े बदलाव का सूचक था। इस महान विचारक का वैचारिक प्रोजेक्ट ब्राह्मणवादी निर्मितियों के विरुद्ध था। फुले अपनी विचारिकी में  शूद्रों-अतिशूद्रों की सार्वजनिक हलक़ों में भागीदारी का सवाल बड़ी शिद्दत के साथ उठाते हैं। औपनिवेशिक भारत में पुरोहितों और पोथाधारियों का भीषण बोलबाला था। उनके वचनों को लोग ईश्वर तुल्य समझते थे। पुरोहित और पोथाधारी अपने स्वार्थसिद्धि की पूर्ति के लिए समाज को अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ने में लगे हुए थे। फुले इस बात को बड़ी शिद्त से महसूस कर रहें थे कि यदि पुरोहितवादी व्यवस्था का नाश नहीं किया गया तो शूद्र और स्त्रियां पूरी तरह से पंगु हो जाएंगे। इस महान विचारक ने सन 1855 में ‘तृतीय रत्न’ नाटक लिखकर पुरोहितवाद के शिकंजे से शूद्रों को मुक्त करने की कवायद को अंजाम दिया। यह नाटक बड़ी धार तरीके से पुरोहितवादी सत्ता को चुनौती पेश करता है।

औपनिवेशिक भारत में  फुले ने ‘तृतीय रत्न’ नाटक के मार्फत से पुरोहित और पोथधारियों व्यवस्था को बड़ा जोरदार झटका देते हैं। फुले इस नाटक में दिखाते हैं कि कैसे पुरोहित  शूद्रों और अतिशूद्रों को गृह नक्षत्र का भय दिखाकर उनका संचित धन हड़प लेते हैं। वह इस रचना के हवाले से बताते हैं कि पुरोहित और पोथाधारी अपने आचरण में कितने पांखडी और शूद्र विरोधी हैं। महात्मा फुले  शूद्रों और दलितों की दुर्दशा का जिम्मेदार पुरोहितों को माना था। उनका दावा था कि पुरोहितवाद के चलते ही शूद्र संपत्तिहीन और शिक्षाहीन होते जा रहे हैं। ‘तृतीय रत्न’ नाटक की कथा में दिखाया गया है कि एक कुनबी परिवार को पुरोहित गृह नक्षत्र और जन्मपत्री का भय दिखाकर उसका सारा धन ठग लेता है। इस नाटक का पुरोहित पात्र  शूद्र  स्त्री के भीतर इस बात का भय पैदा कर देता है कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे पर गृह दोष का प्रकोप चल रहा है। यह सुनकर स्त्री बड़ी भयभीत हो जाती है। शूद्र स्त्री बला टालने का उपाय पुरोहित से पूछती हैं। पुरोहित और शूद्र स्त्री के बीच का यह संवाद देखिए : 

जोशी : क्या तुमको ग्रहों की बला मालूम नहीं ? बहन, महादेव जैसे भगवान को भी डर के मारे पानी में डुबकी लगाकर छुपना पड़ा था। उनकी लपट  झपट से कौन बचा है! 

विदूषक : (सभी लोगों की ओर हाथ दिखाते हुए) महादेव सचमुच ही भोले हैं। इसलिए उन्होंने जोशी की बात सुनी और ग्रहों से डर गए। 

स्त्री : (डरते हुए) तो क्या वे मुझ पर बला डालना चाहते हैं? तेरे को तो नहीं, किंतु तेरे होनेवाले बेटे के मूल पर वे नजर रखे हुए हैं। 

जोशी :  मैं कह नहीं सकता, वे उसका अंत कैसे करेंगे! 

फुले इस नाटक में जोशी के ग्रह नक्षत्रों के दोष वाली बात को ढकोसला करार देते हैं। उनका कहना था कि यदि हर मर्ज का इलाज़ पाखंडी पुरोहितों के पास है तो सरकार को अस्पतालों पर ताला लगा देना चाहिए। इस नाटक में विदूषक पोथाधारियों के पाखंड पर बड़ी तल्ख टिप्पणी करता है। वह अपने कथन में कहता है कि, “यदि जोशी लोगों को मौत से बचा सकते हैं, तो अंग्रेज सरकार को सारी दवाएँ, इलाज एक ओर रख देना चाहिए, सारे अस्पताल बंद कर देने चाहिए और वह सारा काम जोशी को सौंप देना चाहिए या नहीं?”

पुणे के फुलेवाड़ा स्थित संग्रहालय में जोतीराव फुले की भित्ति चित्र

औपनिवेशिक भारत में शूद्र शिक्षा के अभाव में पुरोहितों के फंदे में फंस जाते थे। पुरोहित बला टालने के नाम पर शूद्रों को कंगाल बना डालते थे। पुरोहित शूद्र स्त्री से कहता है कि बच्चे के ग्रह दोष टालने हैं तो अनुष्ठान करना पड़ेगा। अनुष्ठान ही ग्रह टालने का मात्र एक उपाय है। शूद्र स्त्री का पति अनुष्ठान के लिए एक साहूकार से कर्ज लेता है। शूद्र स्त्री अपने पति से कहती है कि, “तुम चिंता क्यों करते हो! जाओ, बाबाजी साहूकार के काले खेत में रहता है। उसके पास से दस रुपए सवाई के भाव से ले आओ। साढ़े बारह का कर्ज लिखा दो। मतलब हम धीरे-धीरे चुकता कर देंगे फिर क्या बचता है।” पुरोहित अनुष्ठान और ब्राह्मण भोज के नाम पर सारा पैसा ठग लेता है। इस तरह से शूद्र परिवार पूरी तरह से कर्ज में डूब जाता है। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि पुरोहित इतना पैसा लेने के बाद अनुष्ठान अपने घर पर ही करता है। फुले, इस शूद्र समाज को ब्राह्मणों के शिकंजे में न फसने की नसीहत देते हैं। इस विचारक का मत था कि घर पर डाका पढ़ जाए तब भी चलेगा पर पुरोहितों की बातों पर भरोसा सपने में भी मत करना। ‘तृतीय रत्न नाटक’ की आगे की कथा में एक पादरी का प्रवेश होता है। इस पादरी की बातें सुनकर कुनबी के भीतर चेतना का संचार होता है। वह पुरोहितों के झांसे से मुक्त होकर हिन्दू धर्म के कर्म कांडों को मानने से इंकार कर देता है। वह कहता है कि, “साहबजी, आप कुछ भी समझिए, मेरा तो यह मन बन चुका है कि यह पत्थर तो पूजने के काबिल है ही नहीं, अब तो उसको तोड़ करके, उसके टुकड़े-टुकड़े करके, मिट्टी में मिला करके उसके अस्तित्व को ही नष्ट कर देना चाहिए, ताकि मेरे जैसे अन्य भोले भाले लोग ब्राह्मणों के बहकावे में आकर, भगवान के नाम पर जाल में फँसकर, कर्जदार न हो सकें। जब तक इस स्वाँग को नष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक, सही में जो भगवान है, उसको हमारे जैसे लोग पहचान ही नहीं पाएँगे ।” 

फुले की यह रचना जहां एक तरफ पुरोहितों के छल-पाखंड और चीमड़पन का पर्दाफाश करती है। वहीं दूसरी तरफ शूद्रों की शिक्षा का सवाल भी बड़ी शिद्दत से उठाती है। औपनिवेशिक भारत में शिक्षा विभाग पर उच्च श्रेणी के हिन्दुओं का कब्जा था। जो अपनी मनोवृति में शूद्र शिक्षा के प्रबल विरोधी होते थे। उच्च श्रेणी के तथाकथित हिन्दू अफसर औपनिवेशिक शासन की आखों में धूल झोंककर शूद्रों को शिक्षा से वंचित कर देते थे। इस नाटक का शूद्र पात्र पादरी साहेब से कहता है कि विक्टोरिया सरकार के अफसर भी ब्राह्मणों के षड्यंत्र को ठीक से नहीं समझ पाते है। वह ब्राह्मणों की बातों पर आँख मीच कर विश्वास कर लेते है। महात्मा फुले ब्राह्मणों कि साज़िस का पर्दाफास करते हुए लिखते हैं कि, “तुम ब्राह्मण लोग हमारे माँ-बाप को क्या बार-बार इस तरह से नहीं बताते थे कि अरे, तुमको पढ़ने-लिखने का अधिकार, वह कौन है तुम्हारा मनु या फनु, उसके ही कानून के अनुसार नहीं है? फिर वे क्या करते? तुम्हारे मनु के कानून को कूड़ा-कर्कट के ढेर में डालकर अपने बच्चों को स्कूल भेजने की हिम्मत क्या वे लोग कर पाते ? क्योंकि तुमने उनको पढ़ने-लिखने का मौका ही नहीं दिया। वे लोग केवल अंधे की तरह तुम्हारी बातों को सुनते रहे। लेकिन अब इस हिंदुस्थान में अंग्रेज सरकार की कृपा से हमारे कुछ माली-कुनबी ऐसे हो गए हैं (और भगवान ने चाहा तो एक दिन महार-मातंग भी हो जाएंगे) कि वे तुम्हारे मनु या फनु के कानून को कूड़ा-कर्कट के ढेर में डालने की परवाह नहीं करते, बल्कि वे एकाएक ऐसा करिश्मा कर दिखाएंगे कि तुम्हारे मनु के जितने भी कानून हैं, वे सारे-के-सारे सूंघनी की पुड़िया बाँधने के लिए बेच करके उससे कौड़ियाँ खरीदकर अंधे-लंगड़ों की धर्मशाला में भिजवा देंगे।”

फुले इस बात को बड़ी शिद्दत से समझते थे कि पोथाधारी बिना कानून के सुधरने वाले नहीं है।  वह इस नाटक के हवाले से विक्टोरिया सरकार से कानून बनाने का मांग करते है। उनका कहना था कि सरकार को एक ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसमें शूद्र वर्ग की शिक्षा का निश्चित प्रावधान किया जाए। उन स्कूलों को सरकार बंद कर दे जिसमें शूद्र के बच्चों का दाखिला नहीं होता है। महात्मा फुले का सुझाव था कि, “मुझे ऐसा लगता है कि सरकारी बोर्ड ऑफ एज्यूकेशन के द्वारा एक ऐसा कानून बना लेना चाहिए कि हर देहात के गाँव में माली-कुनबियों के मोहल्लों का अंदाज करके निश्चित संख्या में उनके बच्चे स्कूल में आने चाहिए। यदि गाँव के लोग उतने बच्चे स्कूल में दाखिल नहीं करें, तो वहाँ के स्कूल को बंद कर देना चाहिए। फिर देखिए, यही ब्राह्मण लोग, हम माली-कुनबियों को उपदेश करने लग जाएँगे कि भाई रे, अपने बच्चों को स्कूल में अवश्य भेजो। आखिर में यह भी कहने लगेंगे कि ये माली-कुनबी भाइयो! पिछले शास्त्रों में यह जो कुछ लिखा गया है कि शूद्रों को नहीं पढ़ना चाहिए, वह सब झूठ है।” उन्नीसवीं सदी के छठे दशक में लिखा गया ‘तृतीय रत्न’ नाटक ब्राह्मणी तंत्र के खि़लाफ़ गोलबंदी करता हुआ बहुजन अधिकारों के पक्ष में विमर्श का माहौल निर्मित करता है। यह नाटक ब्राह्मणवाद की धज्जिया उड़ाकर रख देता है। यह नाटक शूद्रों और अतिशूद्रों की दुर्दशा का जिम्मेदार ब्राह्मणवादी विधान को मानता है। महात्मा फुले का साफ तौर पर कहना था शूद्रों की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवादी निर्मितियाँ है। फुले ने इस रचना में पुरोहित-ब्राह्मणों की जितनी तीखी और मारक आलोचना की है, उतनी तीखी और पैनी आलोचना तो आज विमर्शों के दौर में भी नहीं दिखाई देती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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